सरसों की खेती (Musterd)

दोस्तों आप सभी का इतना प्यार और साथ मिल रहा है उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद। आप सब मेरी सारी पोस्ट पढ़ते हैं इस बात से मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है।और मै ये ख़ुशी के पलों के साथ लाया हूँ आपके सामने एक और पोस्ट वैसे तो ये पोस्ट मुझे मेरे एक दोस्त ने भेजी है लेकिन इसमें बहुत ज्यादा जानकारियां है इसलिए इसे मै आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ जिससे आप सभी का ज्ञान बढ़े।

किसान भाइयों आज मैं आपको सरसों की खेती के बारें में विस्तार से जानकारी दूंगा इस को पढ़कर आप अपने दिमाग के निम्न प्रश्नों को शांत कर पाएंगे –

 सरसों
की फसल की भूमि तैयारी एवं सिंचाई कैसे करें?

सरसों
में कीटों के नियंत्रण कैसे करें?

सरसों
में लगने वाले रोगों के बारे में

सरसों
की उन्नत किस्मे कौन कौनसी है?

सरसों में
सिंचाई बुआई, निराई, गुड़ाई कब, क्यों एवं कैसे की जाती है?

सरसों
की फसल में वार्षिक उत्पादन कितना होता है?



वैज्ञानिक नाम – ब्रेसिका कम्प्रेसटिस

सरसों, तोरिया, राई आदि फसलों को रबी में बोई जाने वाली फसलों के नाम से जाना गया है। इन फसलों से हमको खाद्य तेलों की आपूर्ति होती है। खाद्य तेलों में मूंगफली की फसल के बाद सरसों का नाम आता
है। इसका उत्पादन भारत में आदिकाल से किया जा रहा है इसे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से पुकाराजाता है। सरसों, राई, तोरिया, लाहा आदि सभी को Rape Seed Crop के नाम से जाना जाता है। इनकों मुख्य रूप से तेल उत्पादन के लिए बोया जाता है।
इसकी खली को पशुओं के खिलाने एवं भूमि की उर्वरक क्षमता बढ़ाने के काम लाई जाती है। इसकी खली में 5 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2.5 प्रतिशत फास्फोरस एवं 1.5 प्रतिशत पोटाश पाया जाता है। इसकी खली में प्रोटीन की मात्रा भी पायी जाती है। इसके पौधों का उपयोग सब्जी बनाने एवं पशुओं को हरा चारा खिलाये जाने
के काम में लिया जाता है।


सरसों, तोरिया तथा राई के पौधों का वर्णन संस्कृत रोमन आदि लिपियों में मिला है। इससे यह विदित होता है कि इन फसलो के बारे में लोगों को ज्ञान था। एशिया महाद्वीप के लोगों को इनकी औषधियों की व्याख्या के बारे में पहले से ही ज्ञान था। इसकी खेती का ज्ञान एवं औषधि सम्बन्धी जानकारियों को ध्यान में रखकर इसकी उत्पत्ति स्थल को खोजना जटिलतापूर्ण कार्य है। राई या लाहा का उत्पत्ति स्थल कन्डोल (1882) के मतानुसार पूर्वी यूरोप तथा साइबेरिया को माना जाता है। प्रेन (1808) ने राई का उत्पत्ति स्थल, प्रचलित नामों का
संस्कृत भाषा में प्रचलन को ध्यान में रखते हुए चीन को माना हैं। इसके बीज चीन से अफगानिस्तान एवं भारत आयें। वेविलाल (1826) के अनुसार भूरी सरसों (Brassia) का उत्पत्ति स्थल अफगानिस्तान एवं इसके आस पास का भू-भाग पाकिस्तान को माना गया। भूरी सरसों का उत्पति स्थल पूर्व अफगानिस्तान को ही माना जा रहा है। यहां से इसका विस्तार पंजाब से लेकर बंगाल तक हुआ। पीली सरसों सबसे पुरानी फसल है। इसके बीजों में अलग-अलग भिन्नता पाये जाने एवं ग्रन्थों के आधार पर इसका उत्पत्ति स्थल भारत को माना गया
है। सरसों उत्पादन की दृष्टि से राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है।

इसकी 234200 हैक्टर भूमि में सरसों पैदा की जाती है। तथा इसका उत्पादन 10-12 क्विन्टल प्रति हैक्टयर तक रहता है। भारत में लगभग 15 लाख हेक्टर भूमि में सरसों की खेती होती है। जिसकी उपज 50 लाख टन के आस-पास रहती है।

 जलवायु:-

सरसों की फसल के लिए शुष्क ठण्डा मौसम उचित रहता है। इसके पौधे की वृद्धिके लिए मृदा में 50-60 प्रतिशत की नमी की आवश्यकता रहती है। फसल के
पकने के समय वातावरण शुष्क होना चाहिये। ठण्डा मौसम, शुष्क जलवायु साफ आसमान रहने पर फसल उत्पादन में वृद्धि होती है। फसल में फूल आने पर कोहरा या वर्षा का मौसम होने पर फसल में कीटों तथा बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है। इसकी उपज बालुई दोमट मृदा जिसकी पी.एच. 6.5 से 7.5 के मध्य हो, फसल अच्छी ली जा सकती है। हल्की दोमट मृदा, जिसमें वर्षा का पानी ठहराव नहीं हो, अच्छी रहती है।
तोरिया तथा सरसों का उल्लेख साथ-साथ किया जाता है तारामीरा को छोड़कर सभी जातियाँ सरसों कुल के ब्रेसिका वंश में रखी गयी है। तारामीरा कुल में एक ही जाति को रखा गया है जिसका वनस्पतिक नाम Brassica carinata Abr रखा गया है। जिसे करन राई (Ethiopian Mustar) कहा जाता है।

उन्नत किस्में –

सरसों की फसल हमारे देश की तिलहन अर्थव्यवस्था में
महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भारत सरसों के उत्पादन में विश्व में दूसरे स्थान पर है जो विश्व के क्षेत्रफल का 25.6 प्रतिशत और उत्पादन का 14.7 प्रतिशत है। भारत में
तिलहन के क्षेत्र में मूंगफली के बाद सरसों का स्थान दूसरा है जो कुल तिलहन उत्पादन का 22.9 प्रतिशत और कुल तिलहन क्षेत्र का 24.7 प्रतिशत है।

एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2010 तक 14.60 मिलियन टन खाद्य तेलों की आवश्यकता होगी।

इस बढ़ती हुई आवश्यकता की पूर्ति के लिए तिलहन फसलों, विशेषकर सरसों का उत्पादन बढ़ाना होगा।
यह तभी संभव है जब इनकी खेती नए-नए अनुसंधानों के फलस्वरूप नवीनतम तकनीकों का प्रयोग करते हुए की जाए। उन्नत बीज और तकनीक के चयन से उपज लगभग दो गुना तक बढ़ाई जा सकती है। हमारे देश में सरसों समूह की सात मुख्य फसले (सरसों, तोरिया, गोभी सरसों, पीली सरसों, भूरी सरसों, करन राई और तारामीरा) तिलहनी फसल के रूप में उगायी जाती है परन्तु इनमें से सरसों की खेती मुख्य रूप से की जाती है जिसका क्षेत्रफल कुल उगायी जाने वाली सरसों का लगभग 85 प्रतिशत है। इन सभी फसलों की उन्नतशील प्रजातियों के विकास का कार्य अखिल भारतीय सरसों की समन्वित परियोजना के अन्तर्गत देश के विभिन्न अनुसंधान केन्द्रों पर किया जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप अभी तक सरसों की करीब 60 किस्में विकसित की गई हैं। इन किस्मों का विकास भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की जलवायु, भूमि का प्रकार, सिंचाई की उपलब्धता, तेल और खली की गुणवत्ता आदि विशेषताओं के आधार पर किया गया है।

किस्में :-

अरावली मस्टर्ड (आर.एन.-393) – असिंचित क्षेत्र
के लिए उपयुक्त सूखा सहिष्णु यह किस्म 136 दिन में पककर तैयार होती है। इस किस्म की औसत उपज 1250 कि.ग्रा.प्रति हैक्टर तथा इसमें तेल की मात्रा 42 प्रतिशत तक होती है। इस किस्म को हरियाणा, पंजाब और राजस्थान राज्यों के लिए अनुमोदित किया गया है। यह किस्म सरसों के चैंपा और आरामक्खी के लिए बहुप्रतिरोधी है।

बसन्ती – पीले दाने की सफेद रोली, आल्टरनेरिया
पर्णचित्ती रोग से प्रतिरोधी 1500 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज वाली यह किस्म उत्तर प्रदेश के लिए अनुमोदित की गई है। इसकी फसल 130 दिन में पककर तैयार होने वाली इस किस्म में 40 प्रतिशत तेल होता है।

सी.एस.-52 – लवणीय तथा क्षारीय भूमि के लिए उपयोगी यह किस्म हरियाणा, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश राज्यों के लिए उपयुक्त है। इसमें 41 प्रतिशत तक तेल की मात्रा होती है तथा 135-145 दिनों में परिपक्व होकर 1150 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती है।

गुजरात मस्टर्ड-2 – चूर्णित आसिता प्रतिरोधी यह किस्म 112- 120 दिनों में पककर तैयार होती है। गुजरात राज्य के लिए अनुमोदित इस किस्म की औसत उपज 2400 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर हैं तथा इसमें 38 प्रतिशत तक तेल की मात्रा होती है।

जगन्नाथ (वी.एस.एल.-5) – सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त 160-180 से.मी. ऊँची यह किस्म 125-130 दिन में पककर 1800 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर उपज देती है। इसमें तेल की मात्रा 39-40 प्रतिशत होती है।

जवाहर मस्टर्ड-1 – सफेद रोली प्रतिरोधी इस किस्म का विकास मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों के लिए किया गया हैं, जहां सफेद रोली नामक बीमारी का अधिक प्रकोप होता है। 125-130 दिन में पकने वाली इस किस्म में तेल की मात्रा 42 प्रतिशत होती है, जिसकी औसत उपज 2000-2100 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर है।

क्रांति (पी.आर.-15) – सिंचित व असिंचित क्षेत्रों में बुआई के लिए उपयुक्त इस किस्म के पौधे 155-200 से.मी., ऊँचे, पत्तियां रोंयेदार, तना चिकना और फूल हल्के पीले रंग के हाते है। सिंचित क्षेत्र में इसकी पैदावार 1500-1800 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर होती है। दाना मोटा कत्थई तथा 40 प्रतिशत तेल लिए होता है। यह 125-135 दिन में पक जाती है। यह किस्म आल्टरनेरिया ब्लाइट (झुलसा) और आरा मक्खी के लिए साधारण अवरोधी है और वरूणा की अपेक्षा पाले के
प्रति अधिक सहनशील और तुलासिता व सफेद रोली रोधक है।

कृष्णा (पी.आर.-18) – 160-200 से.मी.
ऊँचाई, 130-140 दिन में पकने वाली इस किस्म में तेल की मात्रा 40 प्रतिशत तथा औसत उपज 1400 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर होती है। यह किस्म पाले के प्रति सहिष्णु है तथा चैंपा और आरामक्खी से कम संवेदनशील है।

लक्ष्मी (आर.एच.-8812) – हरियाणा राज्य के लिए अनुमोदित 170 से.मी. ऊँची यह किस्म 145 दिन में पककर 2200 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती है। इसके मोटे तथाकाले दानों में 40 प्रतिशत तेल पाया जाता है।

नरेन्द्र अगेती राई-4: अगेती, सिंचाई रोली और मृदुरोमिल आसिता के प्रति मध्यम प्रतिरोधी, उत्तर प्रदेश
राज्य के लिए अनुमोदित यह किस्म 90-110 (बुआई तिथि पर निर्भर) दिनों में पककर 1500-2000 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती है।

नरेन्द्र राई (एन.डी.आर.-8501): यह किस्म मध्य
प्रदेश व उत्तर प्रदेश की क्षारीय भूमि वाले स्थानों के लिए उपयुक्त है। 125 दिनों में पककर तैयार होने वाली इस किस्म में 39 प्रतिशत तेल होता है। इसकी औसत उपज 1350 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर है।

पी.बी.आर.-97: हरियाणा, पंजाब, जम्मू, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान राज्यों के लिए अनुमोदित यह किस्म 130-140 दिनों में पककर तैयार होती है। 41 प्रतिशत तेल अंश के साथ यह किस्म 1900-2200 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती है।

पूसा अग्रणी (सेज-2): यह 95 दिन में पककर तैयार हो जाने वाली किस्म है तथा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब तथा राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। जिन स्थानों पर तोरिया की कटाई के बाद गेहूं अथवा अन्य फसल ली जाती है वहां तोरिया के स्थान पर सरसों की इस किस्म को बोया जा सकता है। इसकी औसत उपज 1700 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर होती है। जिसमें 40
प्रतिशत तेल पाया जाता है।

पूसा बोल्ड (पी.आर.-45): सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त इस किस्म के पौधे 170-180 से.मी ऊँचे और शाखाएं फैली हुई होती हैं तथा अधिक निकलती है। इसके बीज में तेल की मात्रा 42 प्रतिशत और इसकी औसत पैदावार 1800 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर होती है। यह किस्म पूर्वी भारत के लिए उपयुक्त है।

पूसा जयकिसान (बायो-902): 180-190 से.मी.
ऊँची इस किस्म में फलियों के पकने पर दाने नहीं झड़ते है। इसका बीज कालापन लिए भूरे रंग का होता है। इसकी उपज 1600-2200 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर, तैयार होने की अवधि 112-135 दिन और तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होती है।

रजत (पी.सी.आर-7): गुजरात, महाराष्ट्र और
पश्चिमी राजस्थान के सिंचित और असिंचित क्षेत्रा के लिए उपयुक्त यह किस्म 175-180 से.मी. लम्बी होती है और इसकी शाखायें फैली हुई होती है। इसके बीज में तेल की मात्रा 38-40 प्रतिशत होती है। 130-135 दिनों में पककर यह 2000 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर उपज देती है। यह दाने झड़ने और गिरने के लिए प्रतिरोधी किस्में है।

आर.एच.-30: हरियाणा, जम्मू, पंजाब, उत्तरी राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सिंचित व असिंचित दोनों ही स्थितियों में मिश्रित खेती के लिए उपयुक्त इस किस्म के पौधे 190 से.मी. ऊँचे होते हैं। यह किस्म देर से बुआई के लिए भी उपुयक्त मानी गयी है। फसल 130-135 दिन में पक जाती है और इसके दाने मोटे होते हैं। इसकी 1600-2000 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज होती है। यदि 15-20 अक्टूबर तक इसकी बुआई कर दी जाये तो मोयले के प्रकोप से बचा जा सकता है।

आर.एच.-781: हरियाणा के सिंचित और देश के पूर्वी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त यह किस्म 145 दिन में पककर तैयार होती है। 175 से.मी. लम्बी इस किस्म में 40 प्रतिशत तेल होता है। इसकी औसत उपज 1800-2000 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर होती है। यह किस्म सूखा और पाला दोनों के प्रति सहिष्णु है। गेहूं के साथ अंतः फसल के लिए यह किस्म उपयुक्त है।

आर.एच.-819: सूखा सहिष्णु, उत्तर पश्चिमी क्षेत्र के असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त इस किस्म की ऊंचाई 255 से.मी. तक होती है। 148 दिन में पककर, यह किस्म सिंचित अवस्था में 2000-2800 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर तथा असिंचित क्षेत्रों में 1300-1400 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती हैं। इसमें तेल की मात्रा 40-41 प्रतिशत होती है।

आर.एल.-1359: उत्तरी पश्चिमी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त 135 से.मी. लम्बी यह किस्म 145 दिन में पककर 1900-2100 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती है। इसमें तेल की मात्रा 43 प्रतिशत तक होती है और यह किस्म चैंपा सहिष्णु है।

आर.एल.एम.-619: पछेती बुआई के लिए उपयुक्त इस किस्म को गुजरात, हरियाणा, जम्मू, पंजाब और राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों के लिए अनुमोदित किया गया है। 140-145 दिनों में पकने वाली इस किस्म में तेल की मात्रा 43 प्रतिशत तक होती है। चैंपा, मृदुरोमिल आसिता और सफेद रोली के प्रति मध्यम सहिष्णु इस किस्म की औसत उपज 1800-2000 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर होती है।

रोहिणी: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के लिए उपयुक्त यह किस्म 125- 130 दिन में पककर तैयार होती है। 150-155 से.मी. लम्बी इस किस्म में 43 प्रतिशत तेल होता है। जिसकी औसत उपज 2200-2800 कि.ग्रा.
प्रति हैक्टर होती है।

संजुक्ता आसेज: असम, बिहार, उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल के सिंचित व असिंचित दोनों ही स्थितियों के लिए उपयुक्त इस किस्म के पौधे 75-85 से.मी. ऊँचे होते है। यह किस्म गेहूं के साथ मिश्रित खेती के लिए भी उपयुक्त है। फसल 95-100 दिन में पक जाती है जिसमें 38 प्रतिशत तेल होता है और 1000-1200 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर इसकी औसत उपज होती है।

सौरभ (आर.एच.-8113): हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू, पंजाब और राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त यह किस्म 185 से.मी. लम्बी होती है। इसमें तेल की मात्रा 40-42 प्रतिशत होती है। 145-150 दिन में पककर यह 1900 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती है। यह किस्म काला धब्बा रोग के लिए मध्यम
प्रतिरोधी है।

सीता (बी.-85): जल्दी पकने वाली, पश्चिम बंगाल के
सिंचित और असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त 95-100 दिन में पककर 1200-1400 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती है। इस किस्म में 38 प्रतिशत तेल होता है। यह किस्म काला धब्बा और चैंपा सहिष्णु है।

उर्वशी (आर.के.-9510): उत्तर प्रदेश के सिंचित क्षेत्र के लिए विकसित की गई यह किस्म 125 दिन में पककर 2200-2500 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर औसत उपज देती है, जिसमें 39 प्रतिशत तेल होता है।

खेत की तैयारी:

इन फसलों के बीजों का आकार छोटा होने के कारण, खेत की अच्छी तैयारी की आवश्यकता पड़ती है। अतः खेत की गहरी जुताई कर, 3-4 जुताई हेरो से करनी चाहिए। मृदा में नमी के अभाव में बीजों की बुआई नहीं करनी चाहिए। नमी की कमी होने पर पलेवा करने के बाद ही बुआई करनी चाहिए। यदि इस फसल को गेहूं, जौ, चना आदि फसलों के साथ मिलाकर बोया जाता हे तो भूमि की अलग से तैयारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

बीज की मात्रा:

सरसों, तोरिया, राई की फसलों में
बुआई के समय का उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है। तोरिया का बुआई समय 15 सितम्बर तथा सरसों राई के बुआई का समय अक्टूबर के मध्य तक का माना गया है। सरसों की बुआई के लिए 5-6 किलोग्राम बीज की मात्रा प्रति हैक्टर काम में लायी जाती है। यदि इस फसल को दूसरी फसलों के साथ बोया जाता है तो 1.5 से 2.00 किलोग्राम बीज की मात्रा पर्याप्त होती है। इस फसल को कतारों में बोया जाना चाहिए। सरसों की फसल में पौधों से पौधों की दूरी 25 सेमी. तथा कतार से कतार की दूरी 35-40 से.मी. रखी जानी चाहिए। बीजों की बुआई 2.5 से 3.0 सेमी की गहराई पर की जानी चाहिए। बीजों की बुआई सीडड्रील
या देशी हल द्वारा की जानी चाहिए।

फसल की बुआई के 20-25 दिन बाद पौधों से पौधों की दूरी 20-25 से.मी. की तथा कतार से कतार की दूरी 35-40से.मी. रखते हुए पहली निराई-गुड़ाई कर लेनी चाहिए। जिससे फसल में खरपतवार की बढ़वार को रोका जा सकें। पहली निराई-गुड़ाई करने के बाद सिंचाई कर, 15-20 दिनों के अन्तराल से दूसरी निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए। खरपतवारों का नियन्त्रण खरपतवारनाशी दवाओं से भी किया जा सकता है इनमें आइसोप्रोट्यूरान की 1 किलोग्राम सक्रिय मात्रा एक हैक्टर के लिए पर्याप्त होती है। इसका उपयोग फसल बुआई के तुरन्त बाद 10-15 दिवस में किया जाता है।

खाद तथा उर्वरक

सरसों की फसल में खाद तथा उर्वरकों, दोनों की मात्राओं का समान प्रयोग करने पर फसल की पैदावार में काफी प्रभाव पड़ता है। फसल बुआई से पूर्व 15-20 टन खाद एवं 40 किलो नाइट्रोजन उर्वरक, 20 किलो
फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश की मात्रा दिया जाना आवश्यक माना गया है।
नाइट्रोजन की 40 किलोग्राम मात्रा का उपयोग फलों के समय करना चाहिए।

सिंचाई:

सरसों की खेती अधिकतर असिंचित क्षेत्रों में की जाती है। किन्तु पौधों को नमी की आवश्यकतानुसार दो से तीन सिंचाईयाँ कर देनी चाहिए। प्रथम सिंचाई फसल बुआई के 25 दिनों बाद निराई गुड़ाई करने के बाद तथा दूसरी सिंचाई फूल आने पर करनी चाहिए। जिससे दाना अच्छा बन सकें।

रोग –

आद्रगलन रोग (Damping of Seedings):
यह रोग बीज जनित कवकों से होता है इसमें फ्यूजेरियम, माइकोफोमिना, पिथियम आदि प्रमुख कवकों का बीजों पर आक्रमण होने से बीज अंकुरण होने से पूर्व ही मर जाते है। इस रोग से बचाव के लिए बीजों को बुआई के समय उपचारित कर बोया जाना चाहिए। बीजोपचार के लिए कैप्टान, थाइरम, वाविस्टिन दवाओं में से कोई भी एक दवा को काम लिया जा सकता है। आल्टरनेरिया रोग: इस रोग के कारण पत्तियों की सतहों पर हल्के से गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते है जो धीरे-धीरे बढ़कर पत्तों में फैल जाते है जिससे पत्ते सूखने लगते है। इससे फसल को बचाने के लिए स्वस्थ बीजों का उपयोग करना चाहिए। फसल में रोग लग जाने पर डाइथेन एम-45 का 2-3 बार 0.2 प्रतिशत घोल बनाकर 700-800 लीटर पानी प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करना लाभप्रद माना गया है।

मृदुरोमिल रोग (Downy Mildew)
 यह रोग मृदा जनित रोग होता है इसलिए फसल को एक ही खेत में बार-बार नहीं लेना चाहिए। इस रोग के लक्षण
पौधों की जमीन से छूते पत्तों पर उभरतें है जो धीरे- धीरे सम्पूर्ण पौधे पर फैल जाते है। इसकी रोकथाम के लिए कॉपर युक्त कवकनाशी जैसे कॉपर आक्सी क्लोराइड, बारडेक्स मिक्सचर का उपयोग कर रोग को नियंत्रित किया जा सकता है।

सफेद रोली रोग:
इस रोग के लक्षण पौधों की पत्तियों पर सफेद फफोलों की तरह उभरते है जो फैलकर पत्तियों की आन्तरिक
स्टोमेटा को नष्ट कर मृत अवस्था में ला देते है। तथा इसके आक्रमण से पुष्प विन्यास विखण्डित हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए प्रमाणित बीजों का उपयोग करना चाहिए। फसल में रोग की रोकथाम के लिए 0.2 प्रतिशत जिनेव अथव डाइफोलिटान के घोल का उपयोग करना उचित रहता है।

कीट:

सरसों कीआरामक्खी (Mustard Sawfly)
इस कीट की गिडार फसल के पत्तों में छेद कर उनमेंअन्दर घुस जाती है। पौधों की छोटी अवस्था में इसका प्रकोप अधिक होता है। सर्दी बढ़ने पर इस कीट का प्रकोप कम हो जाता है। इस कीट के बचाव के
लिए इण्डोसल्फान का पाउडर 20-22 किलो प्रति हैक्टर उपयोग में लिया जा सकता है।

एफिड्स (Aphids) –
इस कीट के शिशु तथा वयस्क दोनो ही फसल को नुकसान पहुँचाते है यह हरे रंग का कीट होता है। इस कीट का प्रकोप दिसम्बर जनवरी माह में अधिक होता है। बादलों के मौसम में इसका आक्रमण अधिक होता है। यह कीट फूलों, फलों तथा पत्तियों का रस चूसता है। इसकी रोकथाम के लिए रोगर 30 ई॰सी॰, मेटासिसटोक्स 25 ई॰सी॰ या डाइमेक्रोन का उपयोग किया जा सकता है।

बिहार हेयर केटर पिलर (Bihar Hair Cuter Pillar) –
इस कीट की सून्डिया फसल के पत्तों पर आरम्भ में आक्रमण करती है। इससे पत्तों को भारी क्षति होती है इसकी रोकथाम के लिए इन्डोसल्फान 35 ई॰सी॰ का 0.03 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करने से कीटों को नियंत्रित कर सकते है।

पेन्टेड बग (Painted Bug)
इस कीट की पौढ़ तथा निम्क दोनों ही पौधों के लिए हानिकारक है। यह कीट पौधों की पत्तियों से रस चूसता है। इस कीट का रंग चमकीला काला तथा भूरे धब्बे होते है। इसकी रोकथाम के लिए नुवाक्रान, इन्डोसल्फान, डाइमेक्रान का उपयोग किया जा सकता है।

उपज:

उन्नत किस्मों का उत्पादन 20-25 क्विंटल तथा सामान्य
किस्मों का उत्पादन 10-12 क्विंटल प्रति हैक्टर होता है।

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