/अक्टूबर माह के कृषि कार्य

अक्टूबर माह के कृषि कार्य

परिचय

अक्टूबर माह जिसे आश्विन-कार्तिक माह भी कहते है, मुख्यतः त्योहर्रों के लिए प्रसिद्ध है, वहीँ खरीफ फसलों की भरपूर पैदावार भी एक मुख्य कारण है तो दूसरी तरफ रबी मौसम की तैयारी भी शुरू करनी है ।

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इस माह में कृषि सम्बंधित मुख्य बातें

तीन जरूरी बातें –

* मिट्टी परीक्षण (मिट्टी का ज्योतिषी) – अक्टूबर माह में खेत खाली होने पर मिट्टी के नमूने ले लें । ३ वर्षों में एक बार अपने खेत का मिट्टी परीक्षण अवश्य करवाएं ताकि मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों (नत्रजन, फास्फोरस, पोटाशियम, सल्फर, जिक, लोहा, तांबा, मैंगनीज व अन्य) की मात्रा तथा फसलों में कौन सी खाद कब व कितनी मात्रा में डालनी है, का पता चल सके |

* अन्न भण्डरण ( खाद्य सुरक्षा) खरीफ की फसलों के दानों को कीड़े बहुत नुकसान पहुचातें हैं, इनसे बचाव के लिए अन्न को धूप में अच्छी तरह सुखा लें तथा साफ कर लें । गोदान व अन्न के ढोलों में सुराख व दरारें अच्छी तरह बंद कर लें । नई बोरियां प्रयोग में लाएं तथा उनको ०.१ प्रतिशत मैलाथियान के घोल में १०-१७ मिनट डुबोये फिर छाया में सुखाकर आनाज के ठंडा होने पर भंडारण करें । चना व अन्य दालों पर सरसों या मूगफली का तेल ७.७ मि.ली. प्रति कि.ग्रा. दानों की दर से अच्छी तरह मसल लें ।

* फसल विविधीकरण (लाभदायक कृषि) – आजकल गेहूं की काश्त में लाभ ना के बराबर रह गया हैं परंतु राई/सरसों से १२०० रूपये शुद्घ लाभ हो सकता है । गन्ने से भी ७०० रूपये से अछिक लाभ नहीं मिलता परंतु गैदा जैसे फूलों की खेती या सब्जियां उगाने से या चारा बोने से लाभ ही लाभ मिलता है तथा बेचने की भी कोई समस्या नहीं ।

धान

धान की कटाई से एक सप्ताह पहले खेत से पानी निकाल दें । जब पोधे पीले पडने लगे तथा वालियां लगभग पक जायें तो कटाई उन्नत हासिएं या कवाईन मशीनों से करें । देर करने पर दाने खेत में ही झड़ जाते हैं तथा पैदावार कम मिलती है । सूखी फसल की गहाई पैडी सोशर से भी कर सकते है । धान को १२ प्रतिशत नमी तक सुखाकर भण्डारण करें ।

कपास

देशी कपास की चुनाई ८-१० दिन के अन्तर पर करते रहे । अक्टूबर में अमेरिकन कपास भी चुनाई के लिए तैयार है, इसे १७-२० दिन के अन्तर पर चुने व सूखें गोदामों में रखें । यदि चित्तीदार सूडी, गुलाबी सुंडी, कुबडा कोडा का प्रकोप नजर आये तो जुलाई में बताई विधि से दवाईयों का छिडकाव करें ।

अरहर

अक्टूबर में सिंचाई न करें नहीं तो फसल जल्दी नहीं पकेगी । अरहर में ७० प्रतिशत फलियां लगने पर ६०० मि.ली. एण्डोसल्फान ३७ ई.सी को ३०० लीटर पानी में घोलकर छिडकें इससे फली छेदक की रोकथाम हो सकेगी । अरहर अक्टूबर के अन्त तक पक जाती है ।

मूंगफली

मानसून के बाद चेपा मूगफली के पोधों का रस चूसता है जिसकी रोकथाम के लिए २०० मि.ली. मैलाथियान ७० ई.सी. को २०० लीटर में मिलाकर छिडकें । अक्टूबर के अन्त में या नवम्बर के शुरू में मूगफली फसल में आखिरी सिंचाई कर दें । इससे भरपूर फलियों निकलती है व फसल खुदाई भी आसान हो जाती है । बची हुई नमी अगली फसल बोने के काम भी आ जाती है । ट्रैक्टर से चलने वाला मूगफली खुदाई यंत्र से पूरी पैदावार मिलती है।

गन्ना

अक्टूबर माह के पहले सप्ताह में शरदकालीन गन्ना लग सकता है जिसमें लाईनें २ फुट दूर रखें यदि लाईनें ३ फुट दूर रखें तो बीच में एक लाईन आलू लगा दें । आलू के लिए खाद अतिरिक्त दें । वाकी कृषि क्रियाओं के लिए अप्रैल का लेख देखें । गन्ने में २७ दिनों के अन्तर पर सिंचाई करते रहे । अक्टूबर में पायरिल्ला (घोडा) कोडा गन्ने का रस चूसता है तथा गुरदासपुर व अगोला वेधक गन्ने में सुराख कर देते है । इनकी रोकथाम के लिए अप्रैल व जून माह के लेख देखें । कीड़ाग्रस्त क्षेत्रों में पानी खडा न रहने दें तथा गन्ने के निचले भाग से २-३ बार पत्तियां उतारने के बाद ०.१ प्रतिशत मैलाथियान छिडकें । रत्ता, सोका या कंडुआ रोग लगने की दशा में रोगी पोधे को खेत से निकाल दें तथा मोढ़ी फसल न लें तथा अनन्य फसल चक्र अपनाएं |

सरसों, तोरिया, राया व तारामीरा

सरसों व राया १० अक्टूबर तक तथा तारमीरा सारे अक्टूबर माह में बीज सकते है। बीजाई संबंधी क्रियायें सितम्बर माह में बता चुके है । सितम्बर में बोई तोरिया व सरसों में आधा बोरा यूरिया पहली सिंचाई पर दे दें । अक्टूबर माह में लाल बालों वाली सुण्डियों व सरसों की आरा मक्खी फसलों को नुकसान करती है । सुण्डियां समुह में होने पर पत्तियां तोडकर नष्ट कर दें तथा ७०० मि.ली. एण्डोसल्फान ३७ ई.सी. को २०० लीटर पानी में घोलकर छिडके । चितकबरा कीड़े के लिए २०० मि.ली. मैलाथियान ७० ई.सी. को २०० लीटर पानी में मिलाकर छिडकें । बीमारियों से बचाव के लिए रोगरहित बीज चुने व समय पर बीजाई करें ।

गेहूं

बारानी क्षेत्रों में गेहूं, खरीफ मौसम की बची-खुची नमी के सहारे, अक्टूबर माह के चौथे सप्ताह से बीज सकते है जबकि तापमान लगभग २२० सैल्सियस होना चाहिए । इसके लिए उचित किस्में सी-३०६, डब्ल्यु.एच-७३३, पीबी डब्ल्यु-३९६, पी.वी. डब्ल्यु-२९९ व पी.वी.डब्ल्यु-१७५ है । ४० कि.ग्रा. बीज को ६० मि.ली. क्लोरपाइरीफास २० ई.सी. उपचार से दीमक तथा फिर ८० ग्राम बीटावैक्स या वैविस्टिन के सुखे-उपचार से खुली कंगियारी (गेहूं की वालियां का काले पाऊडर में बदलना) से फसल बचाव होता है । बीजाई ८ ईचं दूर लाईनों २-३ ईचं गहरा करें । बीजाई जीरो टिल मशीन से करने से कम खर्चा व अधिक पैदावार मिलती है । बीजाई के समय आधा बोरा यूरिया, एक बोरा सिंगल सुपरफासफेट , आधा बोरा म्यूरेट आफ पोटास तथा १०-२५ कि.ग्रा. जिंक सल्फेट डालेँ । खरपतवारनाशक ३ सप्ताह बाद तथा पहली सिंचाई से १-२ दिन पहले छिडके ।

जी – जो बारानी क्षेत्रों तथा रेतीली, कमजोर मिट्टियों के लिए उपयुक्त फसल है । फसल की पी.एल-४१९, पी.ए-४२६, पी.एल-१७२, सी-१३८, सी-१६४, बी.जी-२५, बी.एच-७५, बी.जी-१०५ व वी.एच-३९३ किस्मों को १५ अक्टूबर से १५ नवम्बर तक बो सकते है । ३७ कि.ग्रा. बीज को १०० ग्राम बीटावैक्स और १०० ग्राम थीराम से उपचारित करने के बाद बीमारियों से बचाव हो जायेगा । खेत को २-३ जुताई तथा सुहागा देकर उपचारित बीज को ८ ईंच दूर लाईनों में बीजें । बीजाई के समय आधा बोरा यूरिया व एक बोरा सिंगल सुपरफाफेट डालें । ७०० ग्राम एजोटोवैक्टर डालने से फसल में नाईट्रोजन की कमी नहीं होती है । फिर आधा बोरा यूरिया एक महीने बाद वर्षा आने पर डाल दें ।

शरदकालीन मक्की – यह मक्की २७ अक्टूबर से १० नवम्बर तक सफलतापूर्वक बोई जा सकती है तथा अप्रैल-मई में तैयार हो जाती है इसमें बीमारियां भी कम लगती है । इसके लिए किस्में एच.एच.एम-१,-२, गंगा-9, विजय कम्पोजिट, प्रताप-१ व शीतल उपयुक्त है | १० कि.ग्रा. बीज को ४० ग्राम थीराम से उपचारित करके दूरी २ फुट लाईनों में तथा ८ ईंच पोधे में रखकर २-३ ईचं गहरा बोयें । लाईन पूर्व से पश्चिम दिशा में होने से धूप अच्छी आती है तथा पैदावार बढ़ती है । वाकी सभी क्रियायें सामान्य मक्का की तरह करें जोकि हम पिछले लखों में बता चुके है ।

अलसी

इस फसल को चिकनी-दोमट अच्छे जल निकास वाली मिट्टी में तथा धान की फसल के बाद उगाया जाता है । अलसी की के-२, एल सी २०२३ व एल सी-७४ किस्मों के २० कि.ग्रा. बीज को ६० ग्राम थीराम से उपचारित करके ८ x ४ ईंच दूरी पर १-१७ अक्टूबर तक लगायें । बीजाई पर एक बोरा यूरिया दें तथा ३-४ सिंचाईयां करें जिसमें एक फूल खिलने पर दें ।

चना

चना अच्छी जल निकास वाली दोमट रेतीली तथा हल्की मिड़ियों में अच्छा होता है । खारी व कल्लर वाली मिट्टी जहां पी.एच ८.५ से अधिक, सेमवाली या जहां पानी का स्तर ऊंचा हैं, चना न लगाये | बारानी क्षेत्रों में देसी चना १०-२५१ अक्टूबर तक लगा दें । सिंचित क्षेत्रों में देसी व काबुली चने २७ अक्टूबर से १० नवम्बर तक लगा सकते है । बीजाई के समय तापमान ३०० सैन्सशियस से अधिक नहीं होना चाहिए | देसी चन्ने की उन्न्त किस्में पी डी जी-३ व ४, जी पी एफ-२, पी वी जी-१, जी एल-७६९, सी-२३५, एच-२०८, जी-२४, हरियाणा चना-१व ३ गोरव तथा काबुली चने में एच-१४४, गोरा हिसारी, हरियाणा काबली-१, वी जी-१०७३, एल-७७१, एल-७७० है । गहरी जुताई से बीमारियां तथा खरपतवार कम आते है । देसी चना १८ तथा काबुल ३६ कि.ग्रा. बीज को बीमारयों से बचाव के लिए १.७ ग्राम वैवीस्टीन तथा १.७ ग्राम थीराम प्रति कि.ग्रा. बीज के हिसाब से उपचारित करें । फिर दीमक के लिए ७०० मि.ली. क्लोरपाइरीफास २० ई.सी. को 1 लीटर घोल से उपचारित करें । फिर राइजोवियम जैव खाद से उपचारित करके बीजाई के समय १७ कि.ग्रा. यूरिया, देसी चने में एक तथा काबुली चने में दो सिंगल सुपरफासफेट बोरा दें । १० कि.ग्रा. जिंक सल्फेट भी दें । बीज को 1 फुट दूर लाईनों में तथा ८-९ ईच गहरा बोयें ।

मसूर

मसूर की उन्नत किस्मों में एल ९-१२, सपना, गरिमा, एल एल -६९९, व -१४७ व -७६ को अक्टूबर के अन्त से नवम्बर के दूसरे सप्ताह तक बीज दें । १७ कि.ग्रा. बीज को ३० ग्राम कैप्टान से उपचारित कर फिर एक पैकेट मसूर राईजावियम जैव खाद से उपचारित करके १७ ईंच दूर लाईनों में बोयें । बीजाई के समय १२ कि.ग्रा. यूरिया व २ बोरे सिंगल सुपरफासफेट डाल दें। १० कि.ग्रा. जिंक सल्फेट भी डालें ।

दाल मटर

इसे अक्टूबर अन्त से १७ नवम्बर तक लगाते है । उन्नत किस्मों में फील्ड पी-४८, पी.जी.-३, अपर्णा, जयन्ती, उत्तरा व टाईप-१६३ है । ३०-३७ कि.ग्रा. बीज को ७-१२ ईंच दूरी पर लाईनों में लगायें । बीमारियों के लिए ७० ग्राम वाविस्टिन से बीजोपचार करें तथा मटर राईजोवियम जैव खाद से उपचारित करें । २० कि.ग्रा. यूरिया तथा 1 बोरा सिंगल सुपर फासफेट बीजाई पर डालें ।

सब्जियां

प्याज की नर्सरी १७ अक्टूबर से १७ नवम्बर तक ऊंची उठी शैय्या पर लगायें । प्याज की उन्नत किस्मों में अलों ग्रनों, पूसा रेड, पूसा रतनार, पूसा व्हाईट पलैट, पूसा व्हाइट राऊड व पूसा माधवी है। इससे पहले नर्सरी में कम्पोस्ट खाद मिलाकर शैया तैयार करें फिर 5 कि.ग्रा. बीज को नर्सरी में लगायें।

टमाटर

टमाटर की विशेष फसल के लिए अक्टूबर के शुरू में बीजाई करके मध्य नवम्बर तक रोपाई कर दें । बोने से पहले, १७० ग्राम बीज को ०.७ ग्राम थीरम से उपचारित करें तथा हर १७ दिन बाद शाम के समय २ ग्राम थीरम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडके । सफेट मक्खी की रोकथाम के लिए नर्सरी में ०.१ प्रतिशत मैलाथियान १७ दिन के अन्तर पर छिडकें । पुरानी टमाटर की फसल से रोगग्रस्त पोधे उखाडकर जला दें । दवाईयों छिडकने से पहले फल तोड लें ।

फूलगोभी

पूसा स्नोवाल-१ व पूसा स्नोवाल के-१ किस्में १७ अक्टूबर तक नर्सरी में बोई जा सकती है तथा ४ सप्ताह बाद खेत में रोपी जा सकती है। पुरानी फसल में १० दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहें। खरपतवार नियंत्रण के लिए एक गुडाई भी करें तथा यूरिया की दूसरी किस्त 1 बोरा, पहले किस्त के ३०-४० दिन बाद दे दें। कीड़ों से बचाव के लिए फूलगोभी पर ०.२ प्रतिशत मैलाथियान का छिडकाव करते रहें।

पालक व मैथी

अक्टूबर में भी पालक व मैथी लगाये जा सकते है । सितम्बर में बोई फसल को ३० दिन बाद काट सकते है तथा हर कटाई के बाद आधा बोरा यूरिया डाल दें। सिंचाई हर सप्ताह करें। कीट-नियंत्रण ०.२ प्रतिशत मैलाथियान छिडकाव से हो जाता है ।

गाजर व मूली

जापानी व्हाईट मूली तथा पूसा केसर व पूसा मघाली गाजर अक्टूबर में बोई जा सकती है। सितम्बर में बोई फसल में आधा बोरा यूरिया डाल दें तथा १० दिन के अन्तर पर सिंचाई करें। कीट-नियंत्रण के लिए ०.२ प्रतिशत मैलाथियान छिडकें। मटर – मटर अर्कल १७ अक्टूबर से ७ नवम्बर तक तथा वोर्नवीला एवं लिकंन अक्टूबर अन्त से १७ नवम्बर तक बोया जा सकता है। बीजाई से पहले आधा बोरी यूरिया, ८ टन कम्पोस्ट, ३ बोरे सिंगल सुपर फासफेट, 1 बोरा म्युरेट आफ पोटास खेत में डालें । ३० कि.ग्रा. बीज रातभर भिगोकर १-१.५ फुट दूर लाईनों में 1 ईंच पोधों में दूरी रखकर बोयें। बीजाई के बाद हल्की सिंचाई कर सकते है। खरपतवार नियंत्रण के लिए ६०० ग्राम स्टोम्प को ३७० लीटर पानी में घोलकर बिजाई के १-२ दिन के अन्तर पर खेत में छिडकें फिर पहली सिंचाई २७-३० दिन बाद करें। कीट-नियंतत्र के लिए ०.१ प्रतिशत इण्डोसल्फान या मैलाथियान छिडकें।

बरसीम

बरसीम को अक्टूबर के आखिरी सप्ताह तक लगा सकते है । सितम्बर में लगी फसल में १० दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहें । रिजका (लूसर्न) भी चारे की अच्छी फसल है इसे गहरी अच्छे निकास वाली दोमट भूमि में १७ अक्टूबर से लगा सकते हैं । रिजका की उन्नत किस्में लुसर्न-९, एल एल कम्पोजिट-७ तथा लुसर्न-टी है । ७ कि.ग्रा. बीज को राइजावियम जैव खाद लगाकर 1 फुट दूर लाईनों में १-२ ईंच गहरा बोयें । बीजाई के समय आधा बोरा यूरिया तथा ४ बोरे सिंगल सुपरफासफेट को ८ ईंच गहरा ड्रिल करें । जई – १७ – ३० अक्टूबर तक जई बोने का उत्तम समय है । उन्नत किस्मों में ओ.एल-९, कैन्ट व हरियाणा जई है जोकि कई कटाईयां देती है । जई का २७ कि.ग्रा. बीज २७ ग्राम वीटावैक्स से उपचारित करके ७ ईंच दूर लाईनों में लगायें । बीजाई पूर्व सिंचाई बहुत लाभदायक रहती है । बीजाई के समय पौना बोरा यूरिया व 1 बोरा सिंगल सुपर फासफेट खेत में डालें ।

ईसबगोल

एक औषधीय फसल है जिसे अच्छे जल निकाल वाली मिट्टी तथा कम पानी वाले क्षेत्रों में १७ अक्टूबर से ७ नवम्बर के बीच लगा सकते है । इसके ३ कि.ग्रा. बीज को ९ ग्राम थिरम से उपचारित करें तथा ९ ईच दूर लाईनों में 1 ईंच से कम गहरा बोयें । बीजाई के पहले आधा बोरा यूरिया व आधा बोरा सिंगल सुपर फासफेट दें । पहला पानी एक माह बाद दें तथा बाद में आधा बोरा यूरिया दो लाईनों के बीच दें । दूसरी व तीसरी सिंचाई 1 माह के अन्तर पर करें । गुडाई से खरपतवार पर नियंत्रणण भी रखें ।

लहसुन

लहसुन की देसी किस्म की साफ २००-३०० कि.ग्रा० फांके 6×4 ईंच दूरी पर अक्टबर माह में लगायें । खेत तैयार करते समय २० टन कम्पोस्ट, आधा बोरा यूरिया, 1 बोरा सिंगल सुपर फास्फेट तथा 1 बोरा म्युरेट आफ पोटास दैं । शेष आधा बोरा यूरिया नवम्बर माह में लहसुन की लाईनों के बीच डालें ।

फल

पपीते को तन्ना गलन रोग से बचाने के लिए खेत में पानी न खडा रहने दें। बीमारी फैलने पर २ ग्राम केप्टाळून प्रति लीटर पानी में घोल कर १७ दिन बाद छिडकें । नींबू में रोगग्रस्त टहनियां काट दें फिर ०.३ प्रतिशत कॉपर-आक्सीक्लोराईड स्प्रे करें । वेट में ३-४ वर्ष से बडे पोधों को ७०० ग्राम यूरिया देने से पहले सिंचाई भी करें ।

फूल

किसान भाई खेती के साथ-साथ घर के आस-पास फूल भी उगायें । इससे अपने वातावरण को सुंदर बनाने तथा मन को शांति मिलती है | सितम्बर माह में बीजी नर्सरी से पौध को गमलों या क्यारियों में लगा दें । सर्दियों में खिलने वाले फूलों को अक्टूबर माह में भी बीज सकते है । गुलाब के पौधे की कांट-छांट व गुडाई भी कर सकते है । गुलदाऊदी पर जल्दी आई कलियों को तोड दें तांकि बाद वाले फूल बडे आकर के हो । डहलिया को गमलों में लगा दें तथा घास के लॉन में वारीक कटाई के बाद हल्का यूरिया छिडकें ।

स्त्रोत: ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान

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