//अदरक की खेती – (Ginger Farming in India Hindi)

अदरक की खेती – (Ginger Farming in India Hindi)

अदरक की खेती
अदरक की खेती

अदरक की खेती – भारत में अदरक का इस्तेमाल मसाले के रूप में ज्यादा किया जाता हैं. मसाले के अलावा अदरक का इस्तेमाल चाय, अचार और किसी भी व्यंजन को खुशबूदार बनाने में किया जाता है. अदरक को सुखाकर उसकी सोंठ बनाई जाती. जिसको घी और शुगर ( चीनी ) में मिलाकर लड्डू भी बनाए जाते हैं.

अदरक का उपयोग साग-सब्ज़ी बनाने में, छौंका लगाने में, चटनी सलाद व अचार आदि के साथ तमाम प्रकार की खाद्य सामग्रियों को बनाने में किया जाता है। आज कल अदरक की खेती को लोग एक बिज़नेस के रूप में कर रहे हैं ।पूरे वर्ष की अदरक की माँग बाज़ार में बनी रहती है। सर्दी, ख़ासी, ज़ुकाम सहित तमाम बीमारियों में अदरक औषधि के रूप में काम आती है ।

अदरक में औषधीय तत्वों की बात करें । तो अदरक प्रोटीन,वसा, कार्बोहाईड्रेट, तथा थायमिन,रिबोफ्लेविन, निकोटीन अम्ल, विटामिन A, C, से भरपूर होता है।

इसे सुखकर सोंठ बनायी जाती है। किसान भाइयों आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी। कि अदरक की खेती अन्य फ़सलों के मुक़ाबले अधिक की जाने लगी है। अगर हम विश्व स्तर पर अदरक की खेती की बात करें। तो यह भारत से पाकिस्तान, कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और मास्को सहित बहुत सारे देशों में भेजा जाता है। हम विश्व का 15 प्रतिशत अदरक अपने देश में पैदा करते हैं। यह हमारे लिए गर्व की बात है।

भूमि कैसे होने चाहिए – अदरक की खेती के लिए भूमि की जानकारी होना बहुत अवश्यक है. उचित जल निकास वाली दोमट, रेतीली भूमि सर्वोत्तम होती है। इसके अलावा अदरक की खेती  रेतीली, चिकनी दोमट, लाल दोमट और लैटराइट दोमट मृदाओं में भी की जाती है।

अदरक की खेती के लिए भूमि की तैयारी –सबसे पहले 4 से 5 जुताइयाँ देशी हल अथवा कल्टीवेटर के करनी चाहिए। फिर पाटा लगाकर खेत को समतल कर लें। ऐसा करने से ढेले टूट जाएँगे और खेत भुरभुरा हो जाएगा। बुवाई से पहले थीमेट 10 जी की 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से भूमि को उपचारित कर लेना चाहिए।

अबीज बोने का सही तरीका एव समय – अदरक के बीज को खेत में मेड पर लगाना चाहिए. इसके लिए खेत की जुताई के बाद खेत में मेड बना देनी चाहिए. इन मेड़ों के बीच की दूरी एक से सवा फिट होनी चाहिए. मेड पर अदरक के बीज को 3 से 5 सेंटीमीटर की गहराई में 15 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए. अदरक की खेती करने से पहले ध्यान रखे की जहाँ इसकी खेती की जा रही हैं, वहां किसी भी तरह की छाया नही होनी चाहिए. क्योंकि छाया में इसका पौधा अच्छे से वृद्धि नही करता है. और पैदावार भी कम देता है.

दक्षिण भारत में अदरक की रोपाई अप्रैल माह में कर देनी चाहिए. जबकि उत्तर भारत में इसकी रोपाई के लिए मई का महीना उपयुक्त होता है. मई बाद इसे जून के पहले सप्ताह में भी उगा सकते हैं. लेकिन इसके बाद उगाने पर इसके कंद बड़ी मात्रा में खराब हो जाते हैं. जिसका असर पैदावार पर देखने को मिलता हैं.

जहाँ सिंचाई की उचित व्यवस्था हो वहां इसकी रोपाई फरवरी माह में भी कर सकते हैं. फरवरी माह में इसकी रोपाई करने पर पैदावार अधिक मात्रा में होती है. और बाज़ार में फसल की कीमत भी अधिक मिलती है.

एक हेक्टेयर में अदरक के लगभग 140000 पौधे लगाये जाते हैं. जिसके लिए लगभग 25 क्विंटल प्रकन्द (बीज) की जरूरत पड़ती हैं. जबकि मैदानी भाग में सिर्फ 18 क्विंटल प्रकन्द (बीज) काफी होता है. किसान भाई को अदरक का बीज काफी महंगा पड़ता है. इसलिए इसके बीजों के कंद को देखकर खरीदना चाहिए.  इसका बीज इसके कंद से ही तैयार किया जाता है. प्रत्येक प्रकन्द में दो आँख का होना जरूरी है. जिन्हें कंद से काटकर अलग किया जाता है.

 उर्वक की मात्र –अदरक का कंद जमीन के अंदर रहकर वृद्धि करता हैं. इसके कंद को विकास करने के लिए पौषक तत्वों की अधिक जरूरत होती है. अदरक के पौधे की जड़ें जमीन में ज्यादा गहराई में नही जाती. इसके कंद जमीन में सिर्फ 6 से 8 इंच नीचे तक पाए जाते हैं. इस कारण इसे अपनी वृद्धि के लिए पौषक तत्व जमीन की ऊपरी सतह से ही हासिल करने होते हैं.

अदरक की खेती करने से पहले किसान भाई को अपने खेत की मिट्टी को किसान सेवा केंद्र ले जाकर जांच करा लेनी चाहिए. और उसके बाद आवश्यकता के अनुसार मिट्टी को उर्वरक की मात्रा देना चाहिए. लेकिन साधारण रूप में इसकी खेती के लिए कुछ उर्वरक जरूरी होते हैं. इसके लिए खेत की जुताई के वक्त खेत में 10 से 15 गाडी गोबर की खाद प्रति एकड़ के हिसाब से डालकर उसे मिट्टी में मिला दें.

अदरक की उत्रत किस्मे – अदरक के कच्चे प्रयोग के लिए बिना रेशे वाली प्रजातियां अधिक उपयुक्त होती है। जिसमें रिपो-डी-जेनेरो एवं चायना प्रजाति उत्तम है और दोनों ही प्रजातियां पश्चिम उत्तर प्रदेश के लिए उपयुक्त है। उन्होंने बताया कि अप्रैल मई माह में अदरक की बुवाई की जाती है तथा नौ माह पर फसल पूर्ण होती है। प्रति हेक्टेअर 15 से 20 कुंतल बीज की आवश्यकता होती है व उत्पादन 150 से 200 कुंतल प्रति हेक्टेअर तक हो जाता है।

अदरक की खुदइे एव सफई  –

अदरक का पौधा रोपाई के आठ महीने बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाता है. कंदों के तैयार हो जाने पर पौधे की पत्तियां पिली होकर सूखने लगती है. अदरक की खुदाई दो तरीके से की जाती है. अगर अदरक की खुदाई सब्जी के रूप में लेनी हो तो इसकी खुदाई इसके पूर्ण रूप से पकने से पहले ही 6 या 7 महीने में कर लेनी चाहिए. उसके बाद अदरक की मिट्टी को अच्छे से साफ कर उसे एक दिन धूप में सुखाकर बाज़ार में बेचनी चाहिए.

आठ महीने बाद अदरक की खुदाई भण्डारण और बीज के लिए की जाती है. इस दौरान इसकी खुदाई पौधे की पत्तियां पूर्ण रूप से सुख जाने के बाद की जाती है. इससे कंद अधिक गुणवत्ता वाले प्राप्त होते हैं. जिन्हें साफ कर अधिक समय तक भंडारण कर रखा जा सकता है. इसके कंदों को पानी से साफ़ कर उसके छिल्को को हटा देते हैं. जिसके बाद कंदों को लगभग सात दिनों तक तेज़ धूप में सुखाया जाता है. अगर इसके कंदों का भंडारण बीज बनाने के लिए कर रहे हो तो कंदों को क्विनालफॉस या मैन्कोजेब से उपचारित कर ही भंडारण करें. इससे बीज ज्यादा दिन तक सुरक्षित रहते हैं

अदरक की पैदावार से कितना लाभ – अदरक की अलग अलग किस्मों के आधार पर इसकी औसत पैदावार 15 से 20 टन तक हो जाती है. जिसको सुखाने पर इसकी पैदावार 20 से 22 प्रतिशत शेष रह जाती है. इसकी गीली पैदावार की बाज़ार में कीमत 8 से 10 रूपये प्रति किलो होती है. जिससे किसान भाई एक बार में दो लाख तक की कमाई कर लेते हैं.

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