//अरहर की खेती बना गिरिडीह के किसान के प्रगति का राज

अरहर की खेती बना गिरिडीह के किसान के प्रगति का राज

भूमिका

सरयू महतो का जन्म एक गरीब कृषक परिवार में 1 जून सन 1955 ई. को हुआ। पिता श्री विहारी महतो, माता श्रीमती भेदनी देवी, ग्राम-केन्दुआगडहा, प्रखंड – बेंगाबाद, जिला – गिरिडीह। स्थानीय प्राथमिक विद्यालय केन्दुआगडहा में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त हुई एवं उसके बाद राजकीय बुनयादी विद्यालय, बेंगाबाद में आठवीं तक पढ़ाई की। उसके बाद राज्य सम्पोषित उच्च विद्यालय, बेंगाबाद में इंटर की शिक्षा ग्रहण की। मेरी शादी 1978 में डोमापहाड़ी ग्राम के श्रीमती गंगीया देवी के साथ हुई। मैंने कई बार सरकारी नौकरी की तलाश की, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। मैंने देखा की मेरा परिवार वर्षो से पारंपरिक विधि से धान, गेहूँ, मक्का, अरहर, चना, आलू की खेती करता रहा है और इस विधि से उत्पादन इतना कम हो रहा था कि किसी तरह मेरे परिवार का भरण-पोषण हो रहा था। जिसके कारण आर्थिक तंगी झेलना पड़ रहा था। धीरे-धीरे परिवार की संख्या बढ़ रही थी। पाँच लड़कियाँ थी। जिनकी समुचित शिक्षा की व्यवस्था करने का दायित्व भी मेरे सिर पर था। जो मैं पूरा नहीं कर पा रहा था। तभी तंग आकर मैंने नई सोच से नई खेती करने का निर्णय लिया। धान, गेहूँ के अलावा मक्का, अरहर, साग-सब्जी, इत्यादी की खेती करना प्रारंभ किया। मेरे इस कार्य में पत्नी का भरपूर सहयोग मिला। उक्त फसलों की खेती कर मैं अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में जुट गया। जमीन के जोत के टुकड़े-टुकड़े होने के कारण धान-गेहूँ का उत्पादन कम हो रहा था। हमने सभी टुकड़ों को तोड़कर उसे बड़े खेत का रूप दिया। मैंने अच्छी जुताई की, गोबर एवं उर्वरक का प्रयोग किया, परन्तु उपज में ज्यादा फर्क नही आ रहा था। इसी बीच कृषि विभाग द्वारा मेरे गाँव केन्दुआगडहा में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इसमें प्रखंड कृषि पदाधिकारी के अलावा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तकनीकी सहायक श्री रमेश कुमार भी प्रशिक्षण दे रहे थे। श्री रमेश कुमार द्वारा प्रशिक्षण के क्रम में परती भूमि में अरहर की खेती की जानकारी दी जा रही थी, जो मैंने ध्यान से सुना। प्रशिक्षण समाप्ति के बाद मैं उनसे मिला तो उन्होंने मेरी उत्सुकता देखकर रा.खा.सु.मि. के तहत एक प्रत्यक्षण मेरे नाम से उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। इसी क्रम में मैं परियोजना निदेशक ‘आत्मा’ गिरिडीह से मिला। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तरीके से अरहर की खेती करने से कम से कम लागत में उत्पादन को दुगुना किया जा सकता है तथा अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यह बात मुझे अत्यंत उत्साहित करने का काम किया। मैंने परती जमीन पर अरहर ‘आत्मा’ गिरिडीह द्वारा बताये गये विधि को अपनाकर किया। जिला कृषि पदाधिकारी, गिरिडीह द्वारा खा गया कि इस विधि से आप एक बार अरहर की खेती करें, आपको सम्पूर्ण तकनीकी सहायता प्रदान की जायेगी। मैं इस विधि को पूर्णत: समझ गया था तथा अपनी जमीन पर प्रत्यक्षणकरने का मन बना चुका था। सबसे पहले इस विधि का ज्ञान मैंने अपनी पत्नी गंगीया देवी को दिया, परन्तु इस तकनीकी में अधिक मेहनत होने के कारण मेरी पत्नी इस विधि को अपनाने में इच्छुक नहीं थी, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। उसे समझा-बुझाकर सहमत किया।

कृषि विभाग के सहयोग और निर्देशों का पालन करते हुए पाई अच्छी फसल

जिला कृषि पदाधिकारी के सुझाव के पश्चात मेरी पत्नी ने मुझे मात्र एक एकड़ खेत पर अरहर के खेती करने की सलाह दी। प्रखंड कृषि पदाधिकारी, बेंगाबाद एवं श्री रमेश कुमार, प्रखंड तकनीकी प्रबंधक के द्वारा अरहर की खेती पर प्रत्यक्षण हेतु एक हें. क्षेत्र के लिए कई उपादान शत प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराया गया जैसे उन्नत अरहर बीज (बहार) – 4 किलो, चूना-3 क्विं., सूक्ष्म पोषक तत्व – 10 किलो, राईजोवीयम कल्चर – 100 ग्राम x 5 पै., पी.एस.बी. – 100 x 5 पै., यूरिया 10 किलो, कार्बेन्डाजिम – 40 ग्राम आदि। शेष 16 किलो बीज 50% अनुदान पर उपलब्ध कराया गया। आगे चलकर कीट तथा व्याधि से सुरक्षा के लिए आवश्यकतानुसार कीटनाशी एवं कवकनाशी अनुशंसा के अनुसार मिलता गया। अरहर की खेती पर जिला कृषि कार्यालय, गिरिडीह द्वारा राष्ट्रीय खा. सु. मिशन दलहन एवं आत्मा गिरिडीह के तहत प्रकाशित साहित्य भी उपलब्ध कराया गया।

प्रारम्भ में मैंने खेत को तैयार कर जिला कृषि पदाधिकारी तथा तकनीकी सहायक के सहयोग से अरहर बीज को 75*25 सें.मी. पर जुलाई के प्रथम सप्ताह में लगाया, तो सारे-ग्रामवासी उपहास करने लगे और कहने लगे बेकार का इतना मेहनत कर रहे हो, इससे कितना उत्पादन कर सकोगें। जब अरहर का पौधा पंक्ति में उगा और घास की निकाई के पश्चात कोड़नी की गई तब फसल की बढ़वार तेजी से हुआ। 40-50 दिनों के पश्चात मेरा खेत भरा-भरा सा दिखने लगा और अन्य खेतों की तुलना में पौधा स्वस्थ पाया गया, तब जाकर ग्रामवासियों ने कहा कि वाह! अब आपकी मेहनत रंग ला रही है। फसल बहुत ही अच्छा है, उपज भी अच्छा होगा। हमलोग भी अगले वर्ष इस विधि को अपनायेगें। मैं अपना प्रत्यक्षण प्लाट देखकर काफी गर्व महसूस कर रहा था। एक दिन अचानक जिला कृषि पदाधिकारी पूरी तकनीकी टीम के साथ मेरे खेत में आये और बतलाया कि फसल बहुत अच्छा है, इसे देख-रेख की जरूरत है।

फसल इतना अच्छा था कि आसपास के पंचायत तथा प्रखंडों से किसान अरहर को देखने आने लगे। ग्रामीणों के द्वारा दी गई जानकारी के आलोक में जिला कृषि पदाधिकारी, गिरिडीह ने 15.2.2013 को प्रक्षेत्र दिवस-सह-किसान गोष्ठी करने की सलाह दी तथा खुद उपस्थित होने की बात कही। मैं आज भी उस दिन को याद करता हूँ, जब जिला कृषि पदाधिकारी और प्रखंड कृषि पदाधिकारी हमारे प्रत्यक्षण प्लाट पर पहुंचे, तब पूरे ग्रामवासी तथा आसपास के पंचायतों के किसानों का जमावड़ा उस गोष्ठी में लग गया था।

प्रत्यक्षण प्लाट के उपज का अनुमान

कटनी के पूर्व 07.03.2013 को जिला एवं प्रखंड स्तर के कृषि विशेषज्ञ आए और 100 वर्ग मीटर क्षेत्र के फसल को काटकर दौनी-औसौनी किया गया तथा किसानों की उपस्थिति में दाना का वजन कराया। साफ दाना का वजन 1032 किलो प्रति एकड़ पाया गया। पूर्व में हमलोग पारंपरिक विधि से अरहर की खेती करते थे तो 300-500 किलो/एकड़ दाना प्राप्त होता था। इस प्रकार लगभग ढाई से तीन गुना अधिक उपज प्राप्त किया गया।

मुझे इस वर्ष 83040 रु./हें. लाभ हुआ जो कि पूर्व में किये जाने वाले पारंपरिक विधि की तुलना में लगभग दस गुना अधिक है। अब मैं अपने ऊपरी भूमि में जो की प्राय: परती रह जाती थी, दलहन फसलों की खेती करने का निश्चय किया है, जिससे एक सफल कृषक बनकर समाज, राज्य एवं देश के खाद्य उत्पादन की वृद्धि में अपना सहयोग दे सकूं।

स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार

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