//अरहर में बड़े पैमाने पर बहु स्थानीय आईपीएम प्रदर्शन की सफलता की कहानी

अरहर में बड़े पैमाने पर बहु स्थानीय आईपीएम प्रदर्शन की सफलता की कहानी

परिचय

अरहर की कम उत्पादकता के लिए कई अजैविक और जैविक कारक उत्तरदायी हैं जिनमें नाशीजीवों का तीव्र प्रकोप प्रमुख है] अरहर में 250 से अधिक कीट प्रजातियाँ द्वारा आक्रमण किया जा रहा है। इनमें सबसे प्रमुख फली छेदक हैं जैसे (हेलिकोवरपा, अर्मिजेरा), धब्बे फली छेदक (मरूका टेस्तूलालिस), प्लुमा मोथ (एक्सेलास्टिक अतोमोसा) फली मक्खी (मेलानाग्रोम्यजा ओब्टूसा) जो प्रजनन चरण के दौरान आक्रमण करते हैं। अरहर की फसल में नाशीजीवों के प्रकोप की वजह से आर्थिक नुकसान लगभग 8.48 मिलियन होने का अनुमान लगाया गया है। कीटों के नुकसान में अकेले एच अर्मिजेरा का योगदान 50 प्रतिशत तक आंका गया है जबकि एवं ओब्ट्यूसा द्वारा अनुमानित नुकसान 10 – 80 प्रतिशत है। वास्तविक समय कीट स्थिति के बारे में जानकारी, उचित उत्पादन और सुरक्षा प्रौद्योगिकियों के अभाव के कारण अरहर के उत्पादन में निरंतर कमी हो रही है। इन कारणों से एकिकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) की अवधारणा पर अधिक जोर दिया जाना आवश्यक है। अरहर में एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) की अवधारण पर अधिक जोर दिया जाना आवश्यक है। अरहर में एकीकृत कीट प्रबन्धन (आईपीएम) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत अरहर उत्पादक 13 राज्यों में लागू किया गया जिसके कारण उत्पादकता में काफी हद तक वृद्धि देखी गई।

परिक्षण अध्ययन – महाराष्ट्र

कीट – रोग प्रकोप प्रबंधन के द्वारा उत्पादन बढ़ाने में मदद करने के लिए बदलते परिस्थिति की तंत्र और समग्र दृष्टिकोण के आधार पर वर्तमान में प्रयास किये जा रहे हैं। उस्मानाबाद जिली में जो कि पूर्ण रूप से वर्षा आधारित क्षेत्र है, इस परियोजना को 3631.4 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर आईपीएम क्षेत्रों के 2627  चयनित लाभार्थी किसानों (2445 पुरूषों और 182 महिला किसानों प्रत्येक गाँव से कम से कम एक गैर  आईपीएम और  आईपीएम क्षेत्र के रूप में अन्य लोगों के साथ) को शामिल करके लागू किया गया। प्रत्येक सप्ताह नियमित रूप से सभी चयनित गांवों में फसल निगरानी की गई  जिसके अंतर्गत तय मानक रिकार्ड डाटा शीट के अनुसार सभी ब्लॉकों के विभिन्न गांवों में स्थित भूखंडों से आंकड़े लिए गये। सभी चयनित क्षेत्रों से लिए गये आंकड़े राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंध अनुसंधान केंद्र की वेबसाइट पर अपलोड किये गये जिनका विश्लेषण कर उपयुक्त सलाह जारी की गयी।

इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र राज्य में जालना जनपद में स्थित बदनापुर में ५० हेक्टेयर क्षेत्रफल में 50 किसानों के सहयोग से अरहर की तीन प्रजातियों बीएसएमआर 736, 853 और बीडीएन 711 में बहु स्थानीय आईपीएम प्रदर्शन किये गये।

आधारभूत जानकारी

जलवायु

जलवायु के अनुसार इस क्षेत्र में 3 मौसम होते है, खरीफ मौसम जून से सितंबर के मध्य तक, रबी अक्टूबर से जनवरी तक और जायद फ़रवरी से मई तक। इस क्षेत्र की औसत वर्षा 649 मिमी तथा यह मध्य महाराष्ट्र के पठार क्षेत्र के अंतर्गत आता है। औसत न्यूनतम और अधिकतम तापमान पिछले पांच वर्षों के दौरान 15.25  और 43.850 रहा।

क्षेत्र की प्रमुख फसलें

इस क्षेत्र के प्रमुख खरीफ फसलें अनाज (ज्वार, मक्का और बाजरा),  तिलहन (सोयाबीन, सूरजमुखी और तिल) और नकदी फसलें (कपास और गन्ना) हैं। रबी मौसम में चना, गेहूं, ज्वार, सूरजमुखी, कुसूम और ज्यादा मौसम में मूंगफली, मूंग और अलसी उगाये जाते हैं।

फसल पद्धति – इस क्षेत्र में मूंग/उड़द महत्वपूर्ण फसल पद्धति के रूप में अपनाई जाती है। तत्पश्चात ज्याद में ज्वार की खेती की जाती है। हाइब्रिड ज्वार, बाजरा, मक्का के बाद गेहूं. चना, कपास, अरहर और गर्मियों में मूंगफली उगाई जाती है। चना की फसल  जहाँ सिंचाई सुविधा सिमित है या अवशिष्ट नमी रहने पर आम तौर पर उगाई जाती है। कपास के साथ एक स्ट्रिप खेती के रूप में अरहर बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से अरहर, मूंग/उड़द/सोयाबीन लोकप्रिय होता जा रहा है। वर्षों आधारित क्षेत्रों में कई किसानों द्वारा चने के साथ कुसूम की स्ट्रिप खेती भी की जाती है।

जालना जिले के 6.76 लाख हे. कृषि योग्य क्षेत्र के लगभग 41.728 हे. में अरहर उगाई जाती है। इस क्षेत्र में स्थानीय किस्मों ने प्रभुत्व जमा रखा था, जिसकी जगह वर्ष 2015 के दौरान किसानों द्वारा बीएसएमआर 736,853 और बीडीएन 711  मुख्य प्रजाति के रूप में उगाई गई।

इस क्षेत्र में अरहर में लगने वाले प्रमुख कीट फली, बेधक, फली मक्खी एवं प्लूम मोथ तथा रोगों में बाँझपन मोजेक एवं उकठा रोग मुख्य हैं जिससे लगभग 60 प्रतिशत तक नुकसान आंका गया है।

वर्ष 2015 – 16  के दौरान रासनाप्रअनुके के मार्गदर्शन में अरहर में आईपीएम पद्धतियों को अपनाया गया जिसमें बीजोपचार एवं रासायनिकों का विवेकपूर्ण प्रयोग प्रमुख रहे जे आज भी अपनाये जा रहे हैं।

किसान हानिकारक और लाभप्रद कीटों की पहचान करने में सक्षम हैं। विभिन्न कीटों को आर्थिक क्षति के आर्थिक क्षति स्तरों के परभक्षी एवं परजीवी कीटों, अरहर की बिमारियों एवं प्रमुख कीट से किसान अच्छी तरह से वाकिफ है। जिससे अरहर में कीट प्रबंधन के लिए किसानों की योग्यता, विश्वास एवं निर्णय लेने की क्षमता बढ़ रही है।

हाल में बनी आईपीएम पेकेज जिसमें नीम तेल एच, एन, पी वी, जैविक रासायन, फेरोमों ट्रैप आदि जो कि फसली बेधक कॉप्लेक्स के लिए प्रयोग होते हैं के बारे में किसान अनभिज्ञ थे।

अरहर के लिए संस्तुत आईपीएम मॉड्यूल

  1. साफ – सफाई अभियान और गर्मियों में भूमि की जुताई करें।
  2. उच्च उपज और रोग प्रतिरोध किस्मों अर्थात बीएसएमआर 736, 853 बीडीएन 711  आदि का प्रयोग करें।
  3. ट्राईकोडर्मा 10 ग्रा./ किग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।
  4. एन अर्मिजेरा फली बेधक की पुष्प अवस्था से पहले निगरानी के लिए 5 ट्रैप/हे. की दर से फेरोमोन ट्रैप लगाना।
  5. एच आर्मिजेरा की पूर्ण विकसित सुंडी को हाथों से नष्ट करना।
  6. फसल का 50 प्रतिशत पुष्पण अवस्था में 5 प्रतिशत एनएसकेई अथवा नीम तेल छिड़काव।
  7. फली बेधक के लिए 4 ग्रा./10 ली. पानी का एमामेक्टिन बेंजाएट 5 एसजी की दर से छिड़काव।
  8. फली मक्खी के लिए 12.5 मिली ग्रा.. 10 ली. की पानी दर से मोनोक्रोटोफॉस 36 एसअल का छिड़काव।

तकनीकी का प्रभाव

जैव कीटनाशकों के साथ – साथ जैव – उर्वरक से बीजोपचार करने पर स्वस्थ फसल विकास के अलावा उकठा, मृदु सड़न एवं फाईटोफ्थोरा झुलसा से फसल का बचाव हुआ। हेलिकोवरपा आर्मिजेरा एवं सर्वभक्षी कीट है जो पुष्प कली, फूल और फली पर छेद करता है जिसके परिणामस्वरुप उपज में काफी कमी होती है। किसानों के द्वारा इस कीट के वयस्कों की फेरोमोन ट्रैप के माध्मय से पूरे फसल मौसम में नियमित रूप से निगरानी की गई। फसल के विकास के विभिन्न चरण में मानक नमूना प्रक्रिया अपना कर प्रत्येक्ष निगरानी द्वारा सुंडी की संख्या का अवलोकन किया गया।

फली छेदक लार्वा की संख्या दोनों मौसम के दौरान गैर आईपीएम क्षेत्रों की तुलना में आई पीएम क्षेत्रों में कम पाई गयी। फली छेदक लार्वा का प्रकोप परियोजना के तहत गांवों में 45 वें मानक मौसम स्थिति मौसम सप्ताह के बाद से देखा गया। सबसे अधिक संख्या की स्थिति में क्रमशः आईपी एम 47 वें मानक मौसम सप्ताह 0.26 लार्वा प्रति पौध और गैर – आईपीएम के तहत ४८३ वें मानक मौसम सप्ताह में 0.31 लार्वा प्रति पौध दर्ज की गई। वयस्क नर कीट कैच फेरोमोन ट्रैप विश्लेषण से पता चला है कि हेलिकोवरपा कीटों की संख्या के दौरान क्रमश: आईपीएम परिस्थिति के अंतर्गत द्वितीय मानक मौसम सप्ताह और गैर – आईपीएम के तहत तीसरे मानक मौसम सप्ताह, में अपने चरम पर थी। कीट संख्या गैर – आईपीएम की तुलना में आईपीएम की स्थिति में कम होती देखी गयी।

फूल और फली बेधक के लार्वा के कारण पौधों पर जाल की संख्या गैर – आईपीएम क्षेत्रों की तुलना में आईपीएम क्षेत्रों में कम रही।

प्लूम मोथ लार्वा का संख्या दोनों मौसम के दौरान गैर  आईपीएम क्षेत्रों की तुलना में आईपीएम क्षेत्रों में कम थी। परियोजना के तहत गांवों में प्लूमा मोथ की स्थिति 45 वें सप्ताह के बाद से देखी गई थी। सबसे अधिक संख्या आईपीएम में क्रमश: 46 वें, 48 वें, 49 वें और 50 वें मानक मोसम सप्ताह में 0.17 लार्वा प्रति पौधा और गैर – आईपीएम में 48 मानक मौसम सप्ताह इ 0.24 लार्वा प्रति पौधा दर्ज की गई।

उपलब्धियां

  • बड़े पैमाने पर बहु स्थानीय आईपीएम प्रक्षेत्रों के प्रदर्शन के लिए 2 -3 प्रतिशत नीम एवं निबोलियों का सत, 50 प्रतिशत पुष्प अवस्था में, फली विकास में फ्लूबेंडामाइड  20 डब्ल्यूजी, फली परिपक्वता में प्रोफेनोफोस 50 प्रतिशत ईसी का प्रयोग कीट की उपस्थिति एवं आर्थिक क्षति स्तर के आधार पर किया गया।
  • जबकि गैर आईपीएम (कृषक क्षेत्र) खेतों में 4 – 5 कीटनाशकों क्लोरेनट्रानिलिप्रल 18.5 एस सी इन्डोक्साकार्व 15.8 ईसी. फ्लूबेंडामाइड 39.35 एससी, स्पिनोसाद 45 एससी और क्लोरापाय\रिफास 20 ईसी का प्रयोग किया गया।
  • कीटों में फली बेधक का प्रकोप आईपीएम में औसतन 10.22 से 18.36 प्रतिशत जबकि गैर आईपीएम में 21. 45 से 40.00 प्रतिशत दर्ज किया गया।

क्र.सं.

उपचार

अनाज की उपज कु./हे.

उपज की वृद्धि पर नियंत्रण

मौद्रिक लाभ (रू.)

उपचार की लागत (रू.)

शुद्ध लाभ (रू.)

लाभ लागत अनुपात

1.

किसान विधि

5.25

2100/-

2.

आईपीएम तकनीकी

8.56

3.31

23832

5600/-

18032/-

1.:3.25

  • सोमाथाना, बदनापुर, धोपतेश्वर और गोद्जेल गांवों में कीटों की स्थिति यह दर्शाती है कि लगभग सभी गांवों में किसान खेत में होलिकावर्पा की स्थिति पूरे वर्ष देखी जा जा सकती है। सितंबर से दिसंबर के दौरान आर्थिक नुकसान आईपीएम की अपेक्षा पारंपरिक खेतों में अधिक होता है। फसल मौसम (सितंबर – दिसंबर) सर्वत्र मनाया जा सकता है फिर भी यह दिसंबर तक दर्ज किया जाता है तथा अधिक नुकसान आईपीएम की तुलना में पारंपरिक खेतों में ज्यादा होता है। फली मक्खी का प्रकोप सभी चार गांवों में आईपीएम क्षेत्रों की तुलना में आईपीएम की अपेक्षा गैर आईपीएम में अधिक पाया गया। हालाँकि विल्ट और एसएमडी घटना अक्टूबर से जनवरी तक वृद्धि पर थी। दिसंबर एवं जनवरी के कम वर्षा के कारण उकठा के साथ – साथ बांझपन मोजेक का प्रकोप आईपीएम पद्धति की तुलना में पारंपरिक खेती में अधिक पाया गया।

आईपीएम प्रदर्शन

प्रशिक्षण कार्यक्रम/किसान खेत पाठशाला

इस परियोजना के तहत बदनापुर केंद्र के अंतर्गत आने वाले विभिन्न गांवो में किसान फिल्ड स्कूल (एफएफएस) की व्यवस्था कर रहे हैं। किसान सक्रिय रूप से भाग लेते हैं और अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए अपने अनुभवों को साझा करत हैं। स्थानीय किस्मों की सिफारिश की विविधता, कीट और रोगों, आईपीएम और ईटीएल अवधारण को सशक्त बनाने, कीटनाशकों के प्रयोग हेतु निर्णय लेने आदि से संबंधित किसानों को मार्गदर्शन दिया जाता है। आईपीएम कार्यक्रम के कार्यान्वयन के दौरान, किसानों को अरहर की फसल के सभी स्थितियों के बारे में संरचित अनुभवों को प्रदान किया गया ताकि वे खुद आईपीएम तरीकों का परीक्षण कर सकें।

नोट: गाँव और किसानों के चयन से पहले अरहर की फसल की बुवाई हो चुकी थी जीसे इस परियोजना में बुवाई के समय आईपीएम घटकों की आपूर्ति नहीं की जा सकी। हालांकि कुछ किसानों बीज के साथ (15 प्रतिशत) उपचारित बीज की बुवाई की।

कीट निगरानी

शत्रु एवं मित्र कीटों की पहचान करने के लिए खेतों का भ्रमण किया गया। सप्ताहिक अन्तराल पर डाटा शीट के साथ कीट स्तर दर्ज किया गया। एच अर्मिजेरा कीट की संख्या की निगरानी के लिए आईपीएम खेतों में फेरोमोन ट्रैप स्थापित किये गये। सप्ताहिक अन्तराल पर फेरोमोन ट्रैप में मोथ की संख्या दर्ज की गई।

आईपीएम

किसानों की पद्धतियाँ

  1. फ्लुबेनडामाइड 20 प्रतिशत डब्ल्यूजी

1. क्लोरेनट्रा निलिप्रोल 18.5 एससीन

  1. प्रोफेनोफोस 50 प्रतिशत ईसी

2. इंडोकासकार्ब 15.8 ईसी

3. फ्लुबेनडामाइड 39.35 एससी

– –

4. स्पिनोसेड 45 एससीया क्लोरापायरिफोस 20 ईसी

क्विन्ल्फोस 25 ईसीध्मोनोक्रोटोफोस 36 ईसी

गुणवत्ता आईपीएम आदानों की उपलब्धता

होलिकोवर्पा के प्रबंधन के लिए बड़े पैमाने पर अरहर में सफलता आईपीएम घटकों जैसे, फेरीमोन ट्रैप, एचएएन पीवी, एंड परजीवी की उपलब्धता पर निर्भर करता है जो स्थानीय बाजार एवं ब्लॉक कार्यालय में उपलब्ध हो सकें।

लेखन: ओ. पी. शर्मा, एस. वेनिला, एन. आर. पतंगे, एस. डी. बन्तेवाड, डी. के. पाटिल एवं वी. राजप्पा

स्त्रोत: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र

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