/आंवला की खेती

आंवला की खेती

आँवला

आँवला युफ़ोरबिएसी परिवार का पौधा है। यह भारतीय मूल का एक महत्वपूर्ण फल है। भारत केविभिन्न क्षेत्रों में इसे विभिन्न नामों, जैसे, हिंदी में ‘आँवला’, संस्कृत में ‘धात्री’ या ‘आमलकी’, बंगाली एवं उड़ीया में, ‘अमला’ या ‘आमलकी’, तमिल एवं मलयालम में, ‘नेल्ली’, तेलगु में ‘अमलाकामू, गुरुमुखी में, ‘अमोलफल’, तथा अंग्रेजी में ‘ऐम्बलिक’, ‘माइरोबालान’ या इंडियन गूजबेरी के नाम से जाना जाता है। अपने अद्वितीय औषधीय एवं पोषक गुणों के कारण, भारतीय पौराणिक साहित्य जैसे वेद, स्कन्दपुराण, शिवपुराण, पदमपुराण, रामायण, कादम्बरी, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता में इसका वर्णन मिलता है। महर्षि चरक ने इस फल को जीवन दात्री अथवा अमृतफल के समान लाभकारी माना है। अत: इसे अमृत फल तथा कल्प वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है। आँवले की विशेषतायें हैं, प्रति इकाई उच्च उत्पादकता (15-20 टन/हेक्टेयर), विभिन्न प्रकार की भूमि (ऊसर, बीहड़, खादर, शुष्क, अर्धशुष्क, कांडी, घाड़) हेतु उपयुक्तता, पोषण एवं औषधीय (विटामिन सी, खनिज, फिनॉल, टैनिन) गुणों से भरपूर तथा विभिन्न रूपों में (खाद्य, प्रसाधन, आयुर्वेदिक) उपयोग के कारण आँवला 21वी सदी का प्रमुख फल हो सकता है। धर्म परायण हिन्दू इसके फलों एवं वृक्ष को अत्यंत पवित्र मानते हैं तथा इसका पौराणिक महत्व भी है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कार्तिक मास में इसके वृक्ष के नीचे बैठ कर विष्णु की पूजा की जाये तो स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यदि तुलसी का पौधा नहीं मिले तो भगवान विष्णु की पूजा आँवले के वृक्ष के नीचे बैठ कर की जा सकती है। हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि आँवले के वृक्ष के नीचे पिण्ड दान करने से पितरों को मुक्ति प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार कार्तिक मास में कम से कम एक दिन आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जब इसके फल परिपक्व होते है। हिन्दू धर्म के अनुसार आँवले के फल का लगातार 40 दिनों तक सेवन करते रहने वाले व्यक्ति में नई शारीरिक स्फूर्ति आती है तथा कायाकल्प हो जाता है।

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क्षेत्र एवं वितरण

आँवले के प्राकृतिक रूप से उगे वृक्ष भारत, श्रीलंका, क्यूबा, पोर्ट रिको, हवाई, फ्लोरिडा, ईरान, इराक, जावा, ट्रिनिडाड, पाकिस्तान, मलाया, चीन, और पनामा में पाये जाते हैं। परन्तु इसकी खेती भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश प्रांत में ज्यादा प्रचलित है। आज कल आँवले का सघन वृक्षारोपण उत्तर प्रदेश के लवणीय एवं क्षारीय मृदाओं वाले बीहड़ एवं खादर वाले जिलों, जैसे आगरा, मथुरा, इटावा एवं फतेहपुर एवं बुन्देलखण्ड के अर्ध शुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इसके अलावा आँवले के क्षेत्र अन्य प्रदेशों जैसे, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु के अर्ध शुष्क क्षेत्रों में, हरियाणा के अरावली क्षेत्रों में, पंजाब, उत्तरांचल एवं हिमाचल में तेजी से बढ़ रहे हैं। एक नये आंकड़े के अनुसार भारतवर्ष में आँवले का क्षेत्रफल लगभग 50,000 हेक्टेयर तथा कुल उत्पादन लगभग 1.5 लाख टन आँका गया है। झारखंड राज्य के शुष्क एवं अर्धशुष्क जिलों जैसे – लातेहार, डाल्टनगंज, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह, देवघर आदि में आँवला उत्पादन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

उपयोग

आँवले के पौधों के प्रत्येक भाग का आर्थिक महत्व है। इसके फलों में विटामिन ‘सी’ की अत्यधिक मात्रा पायी जाती है। इसके अतिरिक्त इसके फल लवण, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, कैल्शियम, लोहा, रेशा एवं अन्य विटामिनों के भी धनी होते हैं। इसमें पानी 81.2%, प्रोटीन 0.50%, वसा 0.10%, रेशा 3.40%, कार्बोहाइड्रेट 14.00%, कैल्शियम 0.05%, फोस्फोरस 0.02%, लोहा 1.20 (मिली ग्रा./100 ग्रा.), विटामिन ‘सी’ 400-1300 (मिली ग्रा./100 ग्रा.), विटामिन ‘बी’ 30.00 (माइक्रो ग्रा./100 ग्रा.) पाये जाते है। भारत में औषधीय गुणों से युक्त फलों में आँवले का अत्यंत महत्व है। शायद यह फल ही एक ऐसा फल है जो आयुर्वेदिक औषधि के रूप में पूर्ण स्वास्थ्य के लिए प्रयुक्त होता है। हिन्दू शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि तुलसी एवं आँवले के फलों से सिक्त जल से स्नान करना गंगा जल से स्नान करने के तुल्य है।

इसका फल तीक्ष्ण शीतलता दायक एवं मूत्रक और मृदुरेचक होता है। एक चम्मच आँवले के रस को यदि शहद के साथ मिला कर सेवन किया जाय तो इससे कई प्रकार के विकार जैसे क्षय रोग, दमा, खून का बहना, स्कर्वी, मधुमेह, खून की कमी, स्मरण शक्ति की दुर्बलता, कैंसर अवसाद एवं अन्य मस्तिष्क विकार एन्फ़्जलुएन्जा, ठंडक, समय से पहले बुढ़ापा एवं बालों का झड़ना एवं सफेद होने से बचा जा सकता है। प्राय: ऐसा देखा गया है कि यदि एक चम्मच ताजे आँवले का रस, एक कप करेले के रस में मिश्रित करके दो महीने तक प्राय: काल सेवन किया जाय तो प्राकृतिक इन्सुलिन का श्राव बढ़ जाता है। इस प्रकार यह मधुमेह रोग में रक्त मधु को नियंत्रित करके शरीर को स्वस्थ करता है। साथ ही रक्त की कमी, सामान्य दुर्बलता तथा अन्य कई परेशानियों से मुक्ति दिलाता है। इसका प्रतिदिन प्रात: सेवन करने से कुछ ही दिनों में शरीर में नई स्फूर्ति आती है। यदि ताजे फल प्राप्त न हों तो इसके सूखे चूर्ण को शहद के साथ मिश्रित करके सेवन किया जा सकता है। त्रिफला, च्यवनप्राश, अमृतकलश ख्याति प्राप्त स्वदेशी आयुर्वेदिक औषधियाँ हैं, जो मुख्यत: आँवले के फलों से बनायी जाती हैं। आँवला के इन्हीं गुणों के कारण इसे ‘रसायन’ एवं ‘मेखा रसायन’ (बुद्धि का विकास करने वाला) की श्रेणी में रखा गया है। आँवले के फलों का प्रयोग लिखने की स्याही एवं बाल रंगने के द्रव्य में भी किया जाता है। इसकी पत्तियों को पानी में उबालने के पश्चात उस पानी से कुल्ला करने पर मुँह के छाले ठीक हो जाते हैं। ऐसा इसकी पत्तियों में विद्यमान टैनिन एवं फिनोल की अधिकता के कारण होता है। यही नहीं, आँवले के फल को यदि खाया जाय तो वह मृदुरेंचक (पेट साफ़) का कार्य करता है एवं इसकी जड़ का सेवन पीलिया रोग को दूर करने में सहायक होता है। हिन्दू पौराणिक साहित्य में आँवले एवं तुलसी की लकड़ी की माला पहनना काफी शुभ माना गया है। इस प्रकार आँवला की लकड़ी भी उपयोगी है।

जलवायु

आँवला एक शुष्क उपोष्ण (जहाँ जाड़ा एवं गर्मी स्पष्ट रूप से पड़ती है) क्षेत्र का पौधा है परन्तु इसकी खेती उष्ण जलवायु में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। भारत में इसकी खेती समुद्र तटीय क्षेत्रों से 1800 मीटर ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। जाड़े में आँवले के नये बगीचों में पाले का हानिकारक प्रभाव पड़ता है परन्तु एक पूर्ण विकसित आँवले का वृक्ष 0-460 सेंटीग्रेट तापमान तक सहन करने की क्षमता रखता है। गर्म वातावरण, पुष्प कलिकाओं के निकलने हेतु सहायक होता है जबकि जुलाई-अगस्त माह में अधिक आर्द्रता का वातावरण सुसुप्त छोटे फलों की वृद्धि हेतु सहायक होता है। वर्षा ऋतु में शुष्क काल में छोटे फल अधिकता में गिरते हैं तथा नए छोटे फलों के निकलने में देरी होती है।

भूमि

आँवला एक सहिष्णु फल है और बलुई भूमि से लेकर चिकनी मिट्टी तक में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। गहरी उर्वर बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती हेतु सर्वोत्तम पायी जाती है। बंजर, कम अम्लीय एवं ऊसर भूमि (पी.एच. मान 6.5-9.5, विनियम शील सोडियम 30-35 प्रतिशत एवं विद्युत् चालकता 9.0 म्होज प्रति सें.मी. तक) में भी इसकी खेती सम्भव है। भारी मृदायें तथा ऐसी मृदायें जिनमें पानी का स्तर काफी ऊँचा हो, इसकी खेती हेतु अनुपयुक्त पायी गई हैं।

विभिन्न किस्में

पूर्व में आँवला की तीन प्रमुख किस्में यथा बनारसी, फ्रांसिस (हाथी झूल) एवं चकैइया हुआ करती थी। इन किस्मों की अपनी खूबियाँ एवं कमियाँ रही हैं। बनारसी किस्म में फलों का गिरना एवं फलों का कम भंडारण क्षमता, फ्रान्सिस किस्म में यद्यपि बड़े आकार के फल लगते हैं परन्तु उत्तक क्षय रोग अधिक होता है। चकैइया के फलों में अधिक रेशा एवं एकान्तर फलन की समस्या के कारण इन किस्मों के रोपण को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। पारम्परिक किस्मों की इन सब समस्याओं के निदान हेतु नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, फैजाबाद ने कुछ नयी किस्मों का चयन किया है जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न है:

कंचन (एन ए-4)

यह चकइया किस्म से चयनित किस्म है। इस किस्म में मादा फूलों की संख्या अधिक (4-7 मादा फूल प्रति शाखा) होने के कारण यह अधिक फलत नियमित रूप से देती है। फल मध्यम आकार के गोल एवं हल्के पीले रंग के व अधिक गुदायुक्त होते है। रेशेयुक्त होने के कारण यह किस्म गूदा निकालने हेतु एवं अन्य परिरक्षित पदार्थ बनने हेतु औद्योगिक इकाईयों द्वारा पसंद की जाती है। यह मध्यम समय में परिपक्व होने वाले किस्म हैं (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) तथा महाराष्ट्र एवं गुजरात के शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगायी जा रही है।

कृष्णा (एन.ए.-5)

यह बनारसी किस्म से चयनित एक अगेती किस्म है जो अक्टूबर से मध्य नवम्बर में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म के फल बड़े ऊपर से तिकोने, फल की सतह चिकनी, सफेद हरी पीली तथा लाल धब्बेदार होती है। फल का गूदा गुलाबी हरे रंग का, कम रेशायुक्त तथा अत्यधिक कसैला होता है। फल मध्यम भंडारण क्षमता वाले होते हैं। अपेक्षाकृत अधिक मादा फूल आने के कारण, इस किस्म की उत्पादन क्षमता बनारसी किस्म की अपेक्षा अधिक होती है। यह किस्म मुरब्बा, कैन्डी एवं जूस बनाने हेतु अत्यंत उपयुक्त पायी गयी है।

नरेन्द्र आँवला-6

यह चकैइया किस्म से चयनित किस्म है जो मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) में पक कर तैयार हो जाती है। पेड़ फैलाव लिए अधिक उत्पादन देने वाले होते हैं। (फलों का आकार मध्यम से बड़ा गोल, सतह चिकनी, हरी पीली, चमकदार, आकर्षक) गूदा रेशाहीन एवं मुलायम होता है। यह किस्म मुरब्बा, जैम एवं कैन्डी बनाने हेतु उपयुक्त पायी जाती है।

नरेन्द्र आँवला-7

यह फ्रांसिस (हाथी झूल) किस्म के बीजू पौधों से चयनित किस्म है। यह शीघ्र फलने वाली, नियमित एवं अत्यधिक फलन देने वाली किस्म है। इस किस्म में प्रति शाखा में औसत मादा फूलों की संख्या 9.7 तक पायी जाती है। यह मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) तक पक कर तैयार हो जाती है। यह किस्म उत्तक क्षय रोग से मुक्त है। फल मध्यम से बड़े आकार, के ऊपर तिकोने, चिकनी सतह तथा हल्के पीले रंग वाले होते हैं। गूदे में रेशे की मात्रा एन ए-6 किस्म से थोड़ी अधिक होती है। इस किस्म की प्रमुख समस्या अधिक फलत के कारण इसकी शाखाओं को टूटना है। अत: फल वृद्धि के समय शाखाओं में सहारा देना उचित होता है यह किस्म च्यवनप्राश, चटनी, अचार, जैम एवं स्क्वैश बनाने हेतु अच्छी पायी गयी है। इस किस्म को राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल तथा तमिलनाडु के क्षेत्रों में अच्छी तरह अपनाया गया है।

नरेन्द्र आँवला-10

यह किस्म बनारसी किस्म के बीजू पौधों से चयनित अधिक फलन देने वाली किस्म है। फल देखने में आकर्षक, मध्यम से बड़े आकार वाले, चपटे गोल होते हैं। सतह कम चिकनी, हल्के पीले रंग वाली गुलाबी रंग लिए होती है। फलों का गूदा सफेद हरा, रेशे की मात्रा अधिक एवं फिनाल की मात्रा कम होती है। अधिक उत्पादन क्षमता, शीघ्र पकने के कारण एवं सुखाने एवं अचार बनाने हेतु उपयुक्तता के कारण यह व्यवसायिक खेती हेतु उपयुक्त किस्म हैं, परन्तु इस किस्म में एकान्तर फलन की समस्या पायी जाती है।

इन सब किस्मों के अलावा लक्ष्मी-52, किसान चकला, हार्प-5, भवनी सागर आनंद-1, आनंद-2, एवं आनंद-3 किस्में विभिन्न शोध संस्थाओं से विकसित की गयी हैं परन्तु इनकी श्रेष्ठता देश के अन्य भागों में अभी सिद्ध नहीं हो पाई है।

प्रवर्धन एवं मूलवृंत

आँवले के बाग़ स्थापना में सबसे बड़ी समस्या सही किस्मों के पौधों का न मिलना है। हाल के वर्षो में आँवले के पौधों की मांग में कई गुना वृद्धि हुई है। अत: कायिक प्रवर्धन की व्यवसायिक विधि का मानकीकरण आवश्यक हो गया है।

पारम्परिक रूप से आँवले के पौधों के बीज द्वारा भेंट कलम बंधन द्वारा तैयार किये जाते थे। बीज द्वारा प्रवर्धन आसान एवं सस्ता होता है, परन्तु परपरागित होने के कारण बीज द्वारा तैयार पौधे अधिक समय में फलत देते हैं एवं गुण, आकार में भी मातृ पौधों के समान नहीं पाये जाते हैं। आँवले के पौधे ऊपर की तरफ बढ़ने वाले होते हैं। अत: निचली सतह से बहुत कम शाख निकलती हैं, जिससे भेंट कलम बंधन अधिक सफल नहीं हैं। हाल के वर्षो में आँवले के प्रवर्धन हेतु कई कायिक विधियों का मानकीकरण किया गया है। अब इसका सफल प्रवर्धन पैबंदी चश्मा, विरूपित छल्ला विधि, विनियर कलम एवं कोमल शाखा बंधन द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

बीज निकालना

उत्तर भारत में बीज निकालने हेतु चकैइया या देशी किस्मों के फलों को जनवरी या फरवरी माह में एकत्र कर लेते हैं। फलों को धूप में सूखा लिया जाता है। पूरी तरह से सूखने के बाद फल अपने आप फट जाते हैं और उनके अंतर से बीज बाहर आ जाते हैं। यदि बीज अपे आप फल से नहीं निकल रहें हों तो हल्का सा दबाव दिया जा सकता है। एक फल से प्राय: छह बीज प्राप्त होते हैं। लगभग एक क्विंटल फल से एक किलोग्राम बीज प्राप्त होता है।

बीज का जमना

बीज को बोने से 12 घंटे पहले पानी में भिगो देना चाहिए। जो बीज पानी में तैरने लगे उन बीजों को फेंक देना चाहिए। मार्च-अप्रैल के महीने में बीजों को जमीन की सतह से थोड़ी उठी हुई क्यारियों में बोना चाहिए। पाली हाउस में बीजों को जल्दी (फरवरी माह में) भी बोया जा सकता है। देर (मई एवं जून माह में) से बोये गये बीजों से उत्पन्न पौधे कलिकायन हेतु उपयुक्त होते हैं। मार्च-अप्रैल में बोये गये बीजों का जमाव करीब दो सप्ताह में हो जाता है तथा बुवाई के बाद 10 से.मी. ऊँची पौध करीब 35-40 दिनों में तैयार हो जाती है। इस प्रकार की पौध को खोद कर तीन दिनों तक छाया में रख कर पुन: लगाने से अधिकांश पौधे स्थापित हो जाते हैं।

कलिकायन

छह मास से एक वर्ष तक की पौध (मूलवृंत) कलिकायन के लिए उपयुक्त होती हैं। शाँकुर शाखा का चुनाव ऐसे मातृवृक्ष से करना चाहिए जो अधिक फलत देने वाला हो तथा कीड़ों एवं व्याधियों के प्रकोप से मुक्त हो। उत्तर भारतीय दशाओं में पैबंदी चश्मा तथा विरूपित छल्ला विधि से मई से सितम्बर माह तक चश्मा करने से 60 से 90 प्रतिशत तक सफलता प्राप्त होती है, जबकि दक्षिण भारतीय दशाओं में ग्रीन हाउस एवं नेट हाउस की सहायता से आँवले का प्रवर्धन साल के आठ से दस माह तक किया जा रहा है। कलिकायन के अतिरिक्त आँवला का प्रवर्धन विनियर कलम, कोमल शाखा बंधन के द्वारा 70 प्रतिशत सफलता के साथ किया जा सकता है, लेकिन कलिकायन की सफलता एवं क्षमता को देखते हुए आँवला प्रवर्धन हेतु यह विधि सर्वोत्तम पायी गयी है।

आँवले के प्रवर्धन के लिए पालीथीन के थैले, पाली ट्यूब्स, रूट ट्रेनर या स्व-स्थाने बाग स्थापन (मूल रूप से सूखा ग्रस्त क्षेत्र हेतु) आदि विधियों का भी मानकीकरण किया गया है, परन्तु उनके व्यापक प्रसार की आवश्यकता है। आँवले की शाँकुल शाखों को भीगी हुई मॉस घास या अखदार के टुकड़ों में लपेट कर 5-7 दिनों तक परिवहन/भंडारण किया जा सकता है।

पौध रोपण

कलम बंधन या कलिकायन के द्वारा तैयार पौधों को जुलाई-अगस्त या फरवरी के महीने में 8-10 मीटर की दूरी पर रोपाई करते हैं। पौधों की रोपाई वर्गाकार विधि से करते हैं, जिसमें पौधों से पौधों एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी बराबर रखी जाती है। प्रत्येक पौधों के वर्ग के बीच में एक अन्य पौधा भी लगाया जा सकता है। इस विधि को पूरक विधि या क्विनकन्स भी कहते है। इससे बागवान अधिक लाभ के अलावा खाली पड़े क्षेत्र का भी सही उपयोग कर सकते है। इस विधि हेतु अन्य फलों में बेर, अमरुद, नींबू, करौंदा एवं सहजन को पूरक पौधों के रूप में लगाना काफी अच्छा साबित हुआ है। कई स्थानों का पौधा रोपण झाड़ीनुमा पंक्ति में भी किया गया है। इस विधि में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 8 मीटर एवं पौधों से पौधों की दूरी घटा कर 4-5 मीटर तक रखते हैं। परती (खाली) भूमि में पौध रोपण से दो मास पूर्व एक घन मीटर का गड्ढा खोद लेते हैं। गड्ढे से निकली मिट्टी को दो भागों में बाँट देते हैं। ऊपरी आधे भाग को एक जगह तथा निचली आधी मिट्टी को दूसरी जगह रख देते हैं। ऊपरी आधी मिट्टी में तीन से चार टोकरी (25-40 किलोग्राम) सड़ी गोबर की खाद एवं एक किलोग्राम नीम की खली या 500 ग्राम हड्डी का चूरा मिला मिश्रण कर लेते हैं। इस प्रकार से तैयार मिश्रण को गड्ढे में इस प्रकार भरते हैं कि भरा हुआ गड्ढा 6 से 10 सें.मी. सतह से उठा रहे। क्षारीय मृदाओं में यदि पौध रोपण करना है तो उपरोक्त मिश्रण में जिप्सम आवश्यकतानुसार 5 से 8 किलोग्राम या पाइराइट या ऊसर तोड़ खाद एवं 20 किलोग्राम बालू मिला कर गड्ढे की भराई करनी चाहिए। यदि वर्षा न हो तो इस प्रकार से भरे गड्ढों के मध्य में कलमी पौधों को पिण्डी के साथ रोपित कर देना चाहिए एवं चारों तरफ की मिट्टी को अच्छी तरह से दबा देना चाहिए। तत्पश्चात, हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। ऊसर भूमि का रेखांकन करके बीजू पौधों को सीधा लगाना चाहिए तथा उपयुक्त आयु आने पर एक निश्चित ऊँचाई पर इन पर चश्मा चढ़ा देना चाहिए। इस विधि को स्व-स्थाने कलिकायन भी कहते हैं। आँवले की विभिन्न किस्मों में स्व-बन्ध्यता पायी जाती है। अत: अधिक उत्पादन हेतु एकान्तर पंक्ति में दो किस्मों को लगाना चाहिए। इसके लिए सबसे उत्तम संयोग एन ए-6 एवं ए-7 एवं एन ए-10 या कंचन एवं कृष्णा को पाया गया है।

संधायी एवं छंटाई

आँवले के पौधों को मध्यम ऊँचाई तक विकसित करने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए। नये पौधों को जमीन की सतह से लगभग 75 सें.मी. से एक मीटर तक अकेले बढ़ने देना चाहिए। तदुपरान्त शाखाओं को निकलने देना चाहिए जिससे पौधों के ढाँचे का भली प्रकार से विकास हो सके। पौधों को रूपांतरित प्ररोह प्रणाली के अनुसार साधना चाहिए। शुरू में अधिक कोण वाली दो से चार शाखाएं विपरीत दिशाओं में निकलने देना चाहिए। अनावश्यक शाखाओं को शुरू में निरंतर हटाते रहना चाहिए। इसके बाद चार से छह शाखाओं को चारों दिशाओं में बढ़ने देना चाहिए।आँवले के फलत वाले वृक्षों में नियमित काट-छांट की आवश्यकता नहीं होती है। आँवला अपने वृद्धि के अनुसार सारे सीमित प्ररोहों को गिरा देता है जो अगले साल की वृद्धि को प्रोत्साहित करते हैं। कमजोर, सूखी, रोग ग्रस्त, टूटी हुई, आपस में मिली हुई शाखाओं एवं मृलवृत्त से निकली हुई कलिकाओं को समय-समय पर निकालते रहना चाहिये।

शिखा रोपण

पुराने, बड़े, कम अच्छी किस्मों के पौधों (जैसे पुरानी किस्में बनारसी, फ्रांसिस एवं देशी) का शिखा रोपण द्वारा जीर्णोद्वार या नयी किस्मों में परिवर्तन किया जा सकता है। इस प्रकार के पौधों को जमीन की सतह से 3-4 मीटर की ऊँचाई पर (दिसम्बर-जनवरी माह में) इस प्रकार से काटते हैं कि चारों दिशाओं में 4-6 मुख्य शाखाएं कटी हुई रहें। इन कटे भागों पर वृक्ष लेप (गाय का गोबर + मिट्टी+पानी) या काली गाय के गोबर का लेप लगा देते हैं, जिससे इन भागों में फफूंदी का प्रकोप न होने पाये। इस प्रकार से कटी हुई मुख्य शाखाओं से 4 से 6 प्ररोह जो कि बाहर की तरु निकल रहे हों, को बढ़ने दिया जाता है। जून-जुलाई माह में इन्हीं प्ररोहों पर उन्नत किस्म की शांकुर शाखा से कलिकायन कर दिया जाता है। इसके उपरांत जब कलिका फुटाव ले लेती है तब प्ररोह को शीर्ष भाग को फुटाव वाली कलिका के ऊपर से काट दिया जाता है। इस प्रकार के पौधों में कीड़े, व्याधियों एवं तेज हवा से नुकसान की अधिक सम्भावनाएँ पायी जाती हैं। अत: पूर्ण सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

आँवले की पोषण आवश्यकता पर क्रमबद्ध तरीके से कार्य नहीं हुआ है। खाद की मात्रा मुख्य रूप से मृदा उर्वरकता, पौधों की आयु एवं उत्पादन पर निर्भर करती है। अनुभव के आधार पर खाद एवं उर्वरक की मात्रा निम्न सारणी के अनुसार देनी चाहिए:

पौधों की आयु

(वर्ष)

नाइट्रोजन

(ग्रा.)

फ़ॉस्फोरस

(ग्रा.)

पोटाश

(ग्रा.)

गोबर की खाद

(कि.ग्रा.)

1

100

50

100

5

2

200

100

200

10

3

300

150

300

15

4

400

200

400

20

5

500

250

500

25

6

600

300

600

30

7

700

350

700

35

8

800

400

800

40

9

900

450

900

45

10 तथा अधिक

1000

500

1000

50

गोबर की खाद की सम्पूर्ण मात्रा, नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा जनवरी-फरवरी माह में फूल आने से पहले डाल देनी चाहिए। शेष नत्रजन की आधी मात्रा जुलाई-अगस्त के महीने में डालनी चाहिए। गोबर की खाद एवं अन्य खादों के मिश्रण को पेड़ की छाया के बराबर बने थालों में फैला कर हल्की गुड़ाई एवं सिंचाई कर देनी चाहिए। क्षारीय मृदाओं में उपरोक्त खाद के मिश्रण के अतिरिक्त 100 ग्राम बोरेक्स (सुहागा), जिंक सल्फेट एवं कॉपर सल्फेट (100 ग्राम प्रत्येक का) प्रति पेड़ पौधों की आयु एवं ओज का ध्यान में रखते हुए डालना चाहिए। इसके अलावा सूक्ष्म तत्वों, जैसे बोरान, जिंक, कॉपर (0.4 प्रतिशत) का पर्णीय छिड़काव बुझे हुए चुने के साथ मिला कर करने से फलों का गिरना कम हो जाता है तथा फलों की गुणवत्ता में सुधार होता है।

आँवले का जैविक उत्पादन

ज्यादातर आँवले के फलों का उपयोग स्वास्थ्य सुधार एवं औषधीय गुणों के लिए किया जाता है। अत: इसका जैविक उत्पादन बड़ा महत्वपूर्ण है। इस प्रकार से उत्पादित आँवले से तैयार उत्पाद अधिक गुणवत्तायुक्त होने के कारण घरेलू एवं विदेशी बाजार में अधिक सराहे जाते हैं। आँवले के जैविक उत्पादन की दिशा में किये गये प्रारम्भिक कार्य में काफी अच्छी सफलता प्राप्त हुई है। कई प्रयोग करने के पश्चात ऐसा पाया गया है कि एक छिड़काव बी.डी.-500 का तथा 1.0 कि.ग्रा. केंचुएँ की खाद एवं 100 ग्रा. काऊ पैट पिट प्रति पौधों के थालों में एवं केले की पत्ती एवं धान के पुवाल से पलवार करने से काफी अच्छी सफलता प्राप्त हुई है। बी.डी. पेस्टीसाइड (बी.डी. 501) के द्वारा कीड़ों एवं बीमारियों को भी सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है।

सिंचाई

आँवले का पौधा काफी सहिष्णु होता है। अत: इसको सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है। एक पूर्ण विकसित आँवले के बाग़ में ज्यादातर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। प्राय: वर्षा आधारित जल से ही सिंचाई की आवश्यकता पूरी हो जाती है, यदि बाग़ सही किस्म की भूमि में स्थापित हो। वर्षा एवं शरद ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती है, परन्तु ग्रीष्म ऋतु में नये स्थापित बागों में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। सिंचाई के लिए खारे पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। फल देने वाले बागानों में पहली सिंचाई खाद देने के तुरन्त बाद जनवरी-फरवरी में देनी चाहिए। फूल आने के समय (मध्य मार्च से मध्य अप्रैल तक) सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

अवरोध परत

आँवले के बाग़ स्थापन में जैविक पदार्थो द्वारा अवरोध पर्त् करने से अच्छे परिणाम मिले हैं। विभिन्न प्रकार के पदार्थो, जैसे पुवाल, केले के पत्ते, ईख की पत्ती एवं गोबर की खाद से मल्विंग करने पर अच्छी सफलता प्राप्त हुई है। जैविक पदार्थ से कई वर्षो तक मल्चिंग करने से खरपतवार नियंत्रित रहते है, जड़ों का तापमान नियंत्रित रहता है, जैविक पदार्थ सड़ कर भूमि की उर्वराशक्ति तथा जल धारण करने की क्षमता को बढ़ाते हैं। इसके अतिरिक्त ये हानिकारक लवणों को जमीन की सतह पर आने से भी रोकता है। इस प्रकार, यह ऊसर भूमि में हानिकारक लवणों के प्रभाव को कम करते हैं, साथ ही मल्चिंग करने से पौधों की जड़ों के पास केंचुओं एवं लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि भी होती है।

सहफसलें या आँवला आधारित खेती की विधियाँ

फलदार वृक्षों का, काफी समय उपरांत, फलत में आना एक प्रमुख समस्या है। इसकी वजह से किसान अधिक क्षेत्र में फलों का रोपण नहीं कर पाते हैं। आँवला गहरी जड़ों वाला एवं छितरी पत्तियों वाला एक पर्णपाती वृक्ष है। साल के तीन-चार माह में पेड़ पर पत्तियाँ नहीं रहती हैं तथा शेष माह में छितरी पत्तियाँ होने के कारण भूमि पर पर्याप्त मात्र में सूर्य का प्रकाश उपलब्ध रहता है। परिणामत: इसके साथ सहफसली खेती को अनेक सम्भावनायें हैं। फलों में अमरुद रहता है। परिणामत: इसके साथ सहफसली खेती की अनेक सम्भावनायें हैं। फलों में अमरुद, करौंदा, सहजन एवं बेर, सब्जियों में लौकी, भिण्डी, फूलगोभी, धनिया, फूलों में ग्लैडियोलस एवं गेंदा एवं अन्य औषधि एवं सुगंधित पौधों, आँवले के साथ सहफसली खेती के रूप में काफी उपयुक्त पाये गये हैं। कुछ सह फसली खेती के नमूना निम्नवत हैं:

आँवला + बेर + मोठ या मूंग

आँवला + अमरुद + उरद या वर्षाश्रित धान्य फसलें

आँवला + बेर + फालसा (तीन पंक्ति खेती)

आँवला + ढ़ैचा + गेहूँ या जौ

आँवला + ढ़ैचा + प्याज/लहसुन + मेथी या बैंगन

आँवला + ढ़ैचा + जर्मन चमोमिल

इसके अलावा तुलसी, कालमेघ, सतावर, सर्पगंधा एवं अश्वगंधा की सह फसली खेती के भी अच्छे नतीजे प्राप्त हुए हैं। कुछ फसलें, जैसे धान एवं बरसीम, जिनको अत्याधिक पानी की आवश्यकता होती है, आँवला के साथ सह फसली खेती के रूप में बढ़ावा नहीं देना चाहिए। ऊसर या कम उपजाऊ जमीन में कुछ सालों तक ढ़ैचा की सह फसली खेती करना काफी लाभप्रद साबित हुआ है। इससे भूमि की भौतिक एवं रसायनिक गुणवत्ता में काफी सुधार होता है।

पुष्पन एवं फल वृद्धि

आँवले में फूल सीमित शाखाओं पर जो कि असीमित शाखाओं की गाँठ से निकलती हैं, बसंत ऋतु में आते हैं। फूलों का खिलना मार्च के अंतिम सप्ताह से शुरू होता है तथा तीन सप्ताह तक चलता है। बीजू किस्मों में पुष्पन की क्रिया पहले प्रारम्भ होती है, जबकि व्यवसायिक किस्मों में पुष्पन बाद में होता हैं। दक्षिण भारत में पुष्पन साल में दो बार होता है। पहली बार फरवरी-मार्च में और दूसरी बार जून-जुलाई में। पहली बार वाले पुष्प अच्छी फलत देते हैं परन्तु दूसरी बार के पुष्प कम फलत देते हैं। सीमित शाखाओं के निचले भाग पर पत्तियों के अक्ष से नर पुष्प गुच्छों में निकलते हैं और बाद में मादा पुष्प इन्हीं शाखाओं पर निकलते है। सीमित शाखाओं के अर्थ दूरस्थ भाग पर साधारणत: पत्तियाँ निकलती हैं। पुष्पक्रम असीमाक्षी प्रकार के होते हैं। फूल छोटे एक लिंगाश्रयी एवं छोटे वृत्तक से जुड़े होते हैं। नर पुष्प गुच्छों में पहले प्रकट होते हैं। परिदलपुंज 6, पीले हरे रंग से लेकर गहरे गुलाबी रंग के होते है एवं फलों की पंखुड़िया कार्स्पशी रूप में जुड़ी होती हैं। पुमंग में तीन पुंकेसर होते हैं। तंतु का जुड़ाव नीचे से होता है एवं परागकोष युक्त कोशी होते हैं। उनमें 5-7 भाग होते हैं, लेकिन सामान्यत: 6 भाग पाये जाते हैं। अंडाशय जायांगधार मणिबंधिका 3-4 तीन कक्षीय, बीजांडन्यस कक्षीय एवं दो बीजांड प्रतिकोष्ठक में पाये जाते हैं। आँवला एक पर-परागित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आँवले की किस्मों में स्व-अनिशेच्यता पायी जाती है। अत: एक से अधिक किस्मों को साथ-साथ रोपित करना चाहिए। निषेचन के तुरन्त बाद जो परागण के 36 घंटे बाद होता है, युग्मनज 120 से 130 दिनों तक एवं भ्रूणपोष नाभि में विभाजन के साथ फलों की सुसुप्तावस्था समाप्त हो जाती है। फलों में सर्वाधिक वृद्धि सितम्बर माह में होती है तथा उत्तर भारतीय दशाओं में फल नवम्बर तक परिपक्व हो जाते हैं।

आँवले का फल कैप्सूल अंडाकार गोल से लेकर चपटे गोल आकृति के, रंग सफेद हरा छिलका चिकना से खुरदुरा, अर्धपारदर्शी, 6-8 खण्डों में विभाजित एवं फलों की सतह चिकनी या हल्की उठी हुई होती है। फल की गुठली कड़ी, गोल से लेकर त्रिकोणीय आकार की होती है। बीज की बाहरी भित्ति कड़ी, बीज 6-8 हल्के भूरे रंग से लेकर गहरे भूरे रंग के होते है।

पौध संरक्षण

आँवले के रोग

आँवले की खेती सम्पूर्ण भारतवर्ष में की जाती है। यह एक ऐसी फसल है। जिसमें रोगों का प्रकोप कम होता है किन्तु आँवले के कुछ रोग महत्वपूर्ण है तथा आँवले की फसल के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। आँवले का रस्ट रोग राजस्थान में ख़ासतौर पर अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे फल तथा पत्तियाँ ग्रसित होती है तथा अत्यंत हानि होती है। अन्य प्रमुख रोग हैं आँवले की विभिन्न प्रकार की फलों की सड़न। चूँकि आँवले के फल शीध्र खराब हो जाते हैं अत: फलों पर साधारण सी भी चोट भंडारण तथा परिवहन के दौरान फलों को नुकसान पहुंचाती है। आँवले के कुछ रोगों का विवरण निम्नवत है:

रस्ट (रेवेलिया इम्बलिकी)

आँवले का रस्ट रोग आँवले की एक महत्वपूर्ण समस्या है। खासतौर से राजस्थान के उदयपुर जिले में यह अत्यंत गंभीर है। हाल में लखनऊ तथा प्रतापगढ़ क्षेत्र में आँवले की देसी किस्मों में फलों तथा पत्तियों पर इस रोग को पाया गया।

फलों पर आरंभ में काले छोटे उभार दिखाई देते हैं जो बाद में एक दूसरे से मिल कर घेरे के रूप में विकसित हो जाते हैं। धब्बे एक दूसरे से जुड़ कर फल का काफी क्षेत्र घेर लेते हैं। इन धब्बों के ऊपर कागजनुमा चमकीली झिल्ली दिखाई देती है। यह बाद में फट जाती हैं। जिससे काले बीजाणु बाहर बिखर जाते हैं। फल खराब दिखते हैं तथा बाजार में इनकी कीमत नहीं मिलता है। पत्तियों पर आरम्भ में गुलाबी भूरे छोटे-छोटे उभार नजर आते हैं जो अलग-अलग या समूह में विकसित होते हैं। बाद में इसका रंग गहरा भूरा हो जाता है। ऐसा समझा जाता है कि रोग फल से पत्तियों पर तथा पत्तियों से फल पर नहीं जाता है। फफूंदी रेवेनेलिया इम्बलिकी के टीलियोस्पोर फल तथा पत्तियों पर रोग पैदा करते हैं। घुलनशील गंधक (0.4:) या क्लोरथैलोनिल (0.2:) का तीन छिड़काव एक माह के अंतराल पर जुलाई से करने पर रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

उकठा (विल्ट)

हाल में आँवले के पौधों के सूखने की समस्या राजस्थान में देखी गई। राजस्थान में काफी संख्या में आँवले के पौधों में छालों का फटना, पत्तियों का झड़ा तथा पौधों के सूखने की समस्या देखी गई है। पेड़ के सूखने की समस्या ऐसे तो मुख्य रूप से पाले के कारण समझी जा रही है किन्तु ऐसे पौधों में “युजेरियम जाति की फफूंद भी संबंधित पाई गई है। नियंत्रण के लिए –

  1. पाले के समय छोटे पौधों को ढकना चाहिए तथा सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे पाले का असर न हो।
  2. थालों में घास-फूस या काली पालीथीन बिछाने तथा तने पर गाय के गोबर का लेप लगाने से रोग में कमी पाई गई। चूँकि पाले से रोग बढ़ता है, अत: पौधों को पाले से बचाने की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए।

काली फफूंद

ऐसे आँवले के पौधों जिनमें स्केल कीट का प्रकोप होता है उनमें काली फफूंद का भी प्रकोप होता है। आँवले की काली फफूंदी रोग में कई प्रकार की फफूंदी देखी गई है। काली फफूंद रोग (सूटी मोल्ड) में पत्तियों टहनियों तथा फूलों पर मखमली काली फफूंदी विकसित होती है। जो कीट द्वारा चिपचिपे पदार्थ के ऊपर विकसित होती है। यह फफूंदी सतह तक ही सीमित रहती है तथा पत्तियों टहनियों, फूल आदि में अंदर इसका प्रकोप नहीं होता है। काली फफूंद के प्रकोप को 2 प्रतिशत स्टार्च के छिड़काव के द्वारा रोका जा सकता है। यदि प्रकोप अधिक हो तो स्टार्च में 0.05 प्रतिशत मोनोक्रोटोफ़ॉस तथा 0.2 प्रतिशत घुलनशील गंधक मिला कर छिड़काव करना चाहिए।

नीली फफूंद (पेनीसीलीयम सिट्रिनम)

सर्वप्रथम आँवले की नीली फफूंदी को वाराणसी में देखा गया किन्तु यह रोग आँवले का एक ऐसा रोग है जो सभी आँवला उगाने वाले क्षेत्रों में आम है। आरम्भ में फलों पर भूरे जलसिक्त धब्बे बनते हैं। रोग के बढ़ने फलों पर फफूंद के तीन प्रकार के रंग एक के बाद एक दिखाई देते हैं। पहले चमकीला पीला रंग फिर भूरा रंग तथा अंत में हरा नीला रंग विकसित होता है जो सतह पर उभरती फफूंद के कारण होता है। फल की सतह पर पीली बूंदें भी दिखाई देती है। फलों से बुरी बदबू निकलती है। पूरा फल बाद में दानेदार नीली हरी फफूंद से ढका नजर आता है। प्रबंधन के लिए

  1. फलों की तुड़ाई अत्यंत सावधानीपूर्वक करनी चाहिए जिससे उसमें किसी प्रकार की चोट न लगे। चोट लगने से फलों पर नीली फफूंद का प्रकोप होने की संभावना रहती है।
  2. भंडारण में साफ़-सफाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए तथा भण्डारण स्थल को ओजोन गैस से शोधित करना चाहिए।
  3. फलों को बोरेक्स या नमक से उपचारित करने से रोग का रोका जा सकता है।
  4. फलों को कोर्बोन्डाजिम या थायोफनेट मिथाइल 0.1 प्रतिशत से उपचारित करके भी रोग नियंत्रित किया जा सकता है।
  5. फलों के ऊपर मेंथा के तेल के हल्के लेप से भी रोग को रोका जा सकता है।

एन्थ्रेकनोज (कालिटोट्राइकम ग्लीयोस्पोराइडिस या ग्लोमेरेला सिंगूलाटा)

एन्थ्रेकनोज, आँवले की पत्तियों व फलों पर अगस्त-सितम्बर माह में दिखाई देता है। सर्वप्रथम इसे उदयपुर में देखा गया। पत्तियों पर पहले छोटे, गोल, भूरे, पीले किनारों वाली धब्बे नजर आते हैं। धब्बों का मध्य भाग हल्का भूरा तथा काले पिन के सिरे से उभार सहित दिखाई देता है। फलों पर धंसे हुए भूरे धब्बे बनते हैं, जिनके मध्य में पिन के सिरे से गोलाई में गहरे काले उभार दिखाई देते हैं। धब्बे विभिन्न आकार एवं साइज़ के बनते हैं। अधिक नमी होने पर धब्बे से बीजाणु अधिक मात्रा में निकलते हैं, साथ ही फल सिकुड़े से नजर आते हैं और फिर सड़ जाते हैं।

मृदु सड़न (फोमोप्सिस फाइलेन्थाई)

आँवले की मृदु सड़न दिसम्बर से फरवरी के मध्य अधिक देखी जा सकती है। धुएं से भूरे काले, गोल धब्बे फलों पर 2-3 दिनों में विकसित होते हैं। संक्रमित भाग पर जलसिक्त भूरे रंग का धब्बा बनाता है, जो पूरे फल को करीब 8 दिनों में आच्छादित कर फल के आकार को विकृत कर देता है। ऐसे तो रोग छोटे तथा परिपक्व फल, दोनों को प्रभावित करता है, किन्तु परिपक्व फलों में इसका प्रकोप अधिक होता है। इस रोग के बढ़ने के लिए फलों में इसका प्रकोप अधिक होता है। इस रोग के बढ़ने के लिए फलों में चोट आवश्यक होती है। तुड़ाई उपरांत फलों को डाइफोलेटान (0.15 प्रतिशत), डाइथेन एम-45 या बैवेस्टीन (0.1 प्रतिशत) से उपचारित करके भंडारित करने से रोग की रोक थाम की जा सकती है।

फल सड़न (पेस्टेलोशिया क्रुएंटा)

यह रोग नवम्बर माह में आमतौर पर देखा जाता है। इस रोग में धब्बे अधिकतर अनियमिताकार तथा भूरे रंग के होते हैं। आरम्भ में भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जो धीरे-धीरे बढ़ते हैं। बाद में ये धब्बे सूखे भूरे हो जाते है जिनके किनारे हल्के भूरे होते हैं तथा ग्रसित भाग पर रुई की तरह सफेद फफूंद दिखाई देती है। संक्रामित फल का अंदर का हिस्सा सूखा, गहरा भूरा नजर आता है।

फल सड़न (अल्टरनेरिया अल्टरनेटा)

गिरे हुए फलों में अल्टरनेरिया अल्टरनेटा द्वारा सड़न पैदा होती है। फल सड़न को रोकने के सामान्य तरीकों में

  1. फल तोड़ने के 15 दिनों पूर्व 0.1 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करना चाहिए।
  2. फल तुड़ाई पूरी सावधानी से करनी चाहिए, जिससे फलों में किसी प्रकार का चोट न लगे।
  3. फलों को स्वच्छ पात्रों में भंडारित करना चाहिए।
  4. फलों के भंडारण तथा परिवहन के समय पूर्ण स्वच्छता बरतनी चाहिए।
  5. भंडारण स्थान स्वच्छ होना चाहिए तथा उसे ओजोन से उपचारित किया जाना चाहिए।
  6. फलों का उपचार बोरेक्स या नमक से करना चाहिए जिससे रोग का प्रकोप न हो।

आँवले के विकार

आंतरिक सड़न

आंतरिक सड़न आँवले के फलों में देखी गयी है। आँवले की प्रजाति फ्रांसिस में यह रोग सबसे अधिक होता है। बनारसी प्रजाति में भी इसका प्रकोप पाया गया है। जब अंत: उतक कड़ी लगती है तब यह सबसे पहले अंदर की ओर से भूरा होना आरम्भ करती है। बाद में मध्य उत्तक तथा अंत में बाहरी भूरी काली नजर आती है। आमतौर पर सितम्बर के दूसरे तथा तीसरे सप्ताह में यह दिखाई देती है। रोग के बढ़ने पर ये भाग कार्कनुमा कड़ा हो जाता है तथा रिक्त स्थान बनते हैं, जो गोंद से भरे होते हैं। चकइया, एन.ए.-6 तथा एन.ए.-7 में यह रोग नहीं देखा गया है। अत: इन प्रजातियों को लगाने हेतु बढ़ावा देना चाहिए। प्रबंधन के लिए जिंक सल्फेट (0.4%) कॉपर सल्फेट (0.4%) तथा बोरेक्स (0.4%) का छिड़काव सितम्बर-अक्टूबर माह में करना लाभप्रद होता है।

आँवले के नाशीकीट

छालभक्षी कीट (इन्डरबेला टेट्राओनिस)

यह कीट पूरे देश में पाया जाता है और बहुत से फल, फूलों वाले एवं वन वृक्षों को क्षति पहुँचाता है। आँवले के बागों में यह सामान्यत: पाया जाता है। साधारणत: जिन बागों की ठीक से देख-भाल नहीं होती, उनमें इस कीट का प्रकोप अधिक होता है। कीट का प्रकोप अप्रैल महीने से माथ निकलने के साथ प्रारम्भ होता है। इसके लार्वे प्ररोहों, शाखाओं एवं मुख्य तने की छाल को खाते एवं उनमें छेद करते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पेड़ों की वृद्धि रुक जाती है एवं पुष्पन और फलत प्रभावित होती है।

इसके प्रकोप की पहचान लार्वे द्वारा प्ररोहों, शाखाओं एवं तनों पर बनायी गयी अनियमित सुरंगों से होता है, जो रेशमी जालों, जिसमें चबायी हुई छाल के टुकड़े और इनके मल सम्मिलित होते हैं, से ढकी होती है। इनके आवासीय छिद्र विशेष कर प्ररोहों एवं शाखाओं के जोड़ पर देखे जा सकते हैं। प्ररोह सूख कर मर जाते हैं, जिससे पेड़ बीमार सा दिखता है। प्रबंधन के लिए

  1. बाग़ को साफ़-सुथरा और स्वस्थ रखना चाहिए।
  2. समय-समय पर बागों में जाकर नये सूखे प्ररोहों की जाँच करनी चाहिए ताकि समय रहते ही इस कीट का पता लग जाए।
  3. प्रकोप के शुरुआत में ही, आवासीय छिद्रों को साफ़ कर, उनमें तार डाल कर लार्वे को नष्ट कर देना चाहिए।
  4. अधिक प्रकोप होने पर सुरंगों एवं आवासीय छिद्रों को साफ़ कर रुई के फाये को 0.025 प्रतिशत डाइक्लोरवाँल के घोल में भिगो कर छिद्रों में रख कर, गीली मिट्टी से बंद कर देना चाहिए।
  5. इसके लार्वे बेवेरिया बैसिआना नामक फफूंद से प्राकृतिक रूप से ग्रासित होते हैं। इसका प्रयोग जैविक नियंत्रण के लिए किया जा सकता है।

प्ररोह पिटिका या शूट गाल बनाने वाला कीट (बेटूसा स्टाइलोफोरा)

इस कीट का प्रकोप नर्सरी के पौधों एवं पुराने फलदार वृक्षों में अधिक होता है। यह कीट जून से दिसम्बर माह तक क्रियाशील रहता है। इस कीट के लार्वे बढ़ते हुए तनों, प्ररोहों के आगे भाग में सुरंग बनाते है और यह भाग फूल का गॉल (पिटिका) आकार ले लेता है। जब लार्वा इसके अंदर क्रियाशील रहता है तो इसके एक सिरे से लाल रंग का बुरादा सा निकलता दिखाई पड़ता है। नयी पिटिका जून से अगस्त के दौरान बनती हैं। पूर्ण विकसित पिटिका या गॉल 2.3 से 2.5 से.मी. लम्बी एवं 1 से 1.5 सें.मी. चौड़ी होती है। गर्मी के मौसम के शुरुआत में यह लार्वा बाहर आ जाता है और पर्णकों (लीफलेट) के बीच प्यूपा में परिवर्तित हो जाता है। यह कीड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका गम्भीर प्रकोप होने पर पेड़ की वृद्धि रुक जाती है, जिससे पुष्पन और फलत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बचाव के दृष्टि से पेड़ बहुत घने नहीं होने चाहिए। गॉल वाले प्ररोहों काट कर कीड़ों सहित नष्ट कर देना चाहिए। जिन बागों में इसका प्रकोप लगातार होता रहा है उसमें 0.05 प्रतिशत मोनोक्रोटोफ़ॉस कीटनाशी का छिड़काव मौसम के शुरुआत में करें। यदि आवश्यकता हो तो दूसरा छिड़काव 15 दिनों के बाद करें।

अनार तितली (ड्यूडोरिक्स (वाइरेकोला) आइसोक्रेट्स)

यह अनार का प्रमुख कीट है, किन्तु आँवले और अन्य दूसरे फलों को भी हानि पहुँचाता है। इस कीट का प्रकोप सितम्बर-अक्टूबर माह में फलों के मौसम में होता है। बैंगनी-भूरी सी मादा तितली एक-एक करके छोटे, चमकदार, सफेद अंडे फलों पर देती है। इनमें से लार्वे निकल कर फल को छेद कर अंदर चले जाते हैं एवं गुठली वाले भाग को खाकर, खोखला कर देते हैं। यह मजबूत शरीर वाला, छोटे बालों से ढका, चपटा, लगभग 2 सें.मी. तक लम्बा होता है। यह फल के अंदर ही या बाहर आ कर प्यूपा में परिवर्तित हो जाता है। कैटरपिलर के अंदर घसने एवं बाहर आने वाले छिद्रों के द्वारा अन्य विभिन्न जीवाणुओं का भी फल पर प्रकोप हो जाता है। आमतौर पर कीट द्वारा ग्रसित फल कैटरपिलर के अंदर जाने वाले छिद्रों के पास विकृत हो जाते है, और ऐसे फल कमजोर होकर सड़ जाते हैं, तथा पकने से पहले ही गिर जाते है। ग्रसित फलों में छेद से बुरादा निकलता हुआ भी दिखाई पड़ता है। अधिक प्रकोप होने पर फलों को काफी हानि हो सकती है। प्रबंधन के लिए

  1. आँवला के बाग़ के साथ, अनार का बाग़ नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि यह इन फलों का मुख्य नाशीकीट है।
  2. ग्रसित फलों तथा जमीन पर गिरे हुए सभी फलों को एकत्र कर, कीड़ों सहित नष्ट कर देना चाहिए ताकि इनके प्रकोप दुबारा होने से रोका जा सके।
  3. इस कीट की रोकथाम के लिए 0.2 प्रतिशत कार्बेरिल या 0.04 प्रतिशत मोनोक्रोटाफ़ॉस कीटनाशी का छिड़काव फल के मटर के दाने के बराबर होने की अवस्था में करना चाहिए। दूसरा छिड़काव प्रकोप की तीव्रता पर निर्भर करता है, जिसे 15 दिनों के अंतराल पर किया जा सकता है।

मिली बग या चूर्णी बग (नाइलीकॉकस वाइरीडिस)

इनका प्रकोप मार्च से जुलाई के मध्य होता है और अप्रैल-मई में इनकी संख्या अधिक होती है। मादा अंडाकार होती हैं और निम्फ के बीच में आसानी से पहचानी जा सकती है। एक मादा सैकड़ों की तादाद में अंडे देती हैं। निम्फ पत्तियों, प्ररोहों एवं पुष्प मंजरियों पर स्थापित हो जाते हैं और इनका रस चूसते है। निम्फ 15-20 दिनों में वयस्क हो जाते हैं। अधिक रस चूस जाने के कारण पत्तियाँ और फूल सूख-सूख कर गिर जाते हैं। इसका प्रभाव पेड़ की बढ़वार, पुष्पन और फलत पर पड़ता है। ग्रसित नये प्ररोह झुके, मुड़े हुए से प्रतीत होते हैं एवं पत्तियाँ पीली पद जाती है। अधिक प्रकोप होने पर टहनियाँ पत्ती रहित होकर सूखने लगती हैं। इसके द्वारा काफी मात्रा में विसर्जित मधु भी देखा जा सकता है। इससे फूल सूख कर गिर जाते हैं। नियंत्रण के लिए

1.  बाग़ को साफ़-सुथरा और स्वस्थ रखना चाहिए।

2.  प्रभावित पत्तियों एवं प्ररोहों को शुरुआत में ही काट कर कीड़ों सहित नष्ट कर देना चाहिए जिससे वे आगे और फैलने न पायें।

3.  अधिक प्रकोप होने पर 0.05 प्रतिशत मोनोक्रोटोफ़ॉस या 0.05 प्रतिशत क्वीनलफ़ॉस का छिड़काव करना चाहिए।

आँवला एफिड (सरसीएफ्सी एम्बलिका)

इन कीटों का प्रकोप जुलाई से अक्टूबर तक रहता है तथा सितम्बर माह में प्रकोप सबसे अधिक होता है। इनका प्रकोप पेड़ों में नयें प्ररोहों के अग्रभाग पर होता है। निम्फ एवं वयस्क दोनों रस चूस कर क्षति पहुँचाते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पेड़ की (वृद्धि) पर प्रतिकूल असर पड़ता है जो अंतत: पुष्पन एवं फलत को प्रभावित करता है। प्रभावित पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और सूख कर गिरने लगती हैं। प्रभावित प्ररोह के अग्रभाग झुके और मुड़े हुए से प्रतीत होते हैं। चीटियों की मौजूदगी से भी इस कीट के प्रकोप होने की पहचान होती है इसके नियंत्रण के लिए प्रकोप के शुरुआत में ही प्रभावित पत्तियों एवं प्ररोहों को काट कर कीड़ों सहित नष्ट करना चाहिए। अधिक प्रकोप होने पर 0.06 प्रतिशत मोनोक्रोटोफ़ॉस कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए।

गुठली भेदक (करक्यूलिओ जाति)

यह कीट जून से जनवरी माह तक क्रियाशील रहता है। इस कीट का वयस्क एक छोटा सा घुन होता है, जो जून माह में बरसात शुरू होने पर जमीन के अंदर से बाहर आता है। घुन का निकलना जुलाई-अगस्त में जारी रहता है जो आँवले के फल लगने से मेल खाता है। अंडे फल में एक छोटा सा गड्ढा बना कर वाह्य सतह से नीचे दिए जाते हैं। अंडे देने के लिए 1.5 सें.मी.से 2 सें.मी. व्यास के फल पसंद किए जाते हैं। इसका लार्वा निकलने के बाद गूदे से होता हुआ गुठली को छेदता अंदर चला जाता है और बीजों को खाकर पूर्णत: नष्ट कर देता है। पूर्ण विकसित लार्वा, फल में एक छोटा छेद करके बाहर निकल कर जमीन पर गिर जाता है और भूमि में घुस कर अगले मौसम आने तक वहीं पड़ा रहता है। इस कीट का प्रकोप देशी एवं बनारसी जाति के आँवलों पर देखा गया है।

यह घुन जिस स्थान पर फल में अंडे देती है वहाँ एक छोटा, भूरा धब्बा से दिखाई पड़ता है। इसके अतिरिक्त फलों में कीड़े के बाहर निकलने वाले छेदों को देख कर भी इसके प्रकोप की पहचान की जा सकती है।

फल तुड़ाई के उपरांत गहरी जुताई करने से जमीन के अंदर प्रवेश किए लार्वो को नष्ट किया जा सकता है और इनकी संख्या में कमी लायी जा सकती है। अधिक प्रकोप होने पर प्रथम छिड़काव 0.2 प्रतिशत कार्बेरिल या 0.04 प्रतिशत मोनोक्रोटोफ़ॉस या 0.05 प्रतिशत क्वीनलफ़ॉस या 0.07 प्रतिशत एन्डोसल्फान कीटनाशी का फलों के मटर के दाने के बराबर की अवस्था में करना चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो दूसरा छिड़काव कीटनाशी बदल कर 15 दिनों के अंतराल पर करें।

परिपक्वता, तुड़ाई, पैकिंग एवं भंडारण

तुड़ाई के समय फल की परिपक्वता, उसकी गुणवत्ता एवं भंडारण क्षमता का निर्धारण करती है। फलों का गिरना प्रारम्भ हो जाता है। यह समस्या बनारसी एवं फ्रांसिस किस्मों में ज्यादा पायी जाती है। तुड़ाई में विलम्ब करने से अगले साल की फलत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। फलों को हाथ के द्वारा तोड़ा जाता है। तोड़ते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए। चोटिल या खरोंच लगे फलों में भंडारण के दौरान भूरे या काले रंग के धब्बे बनना प्रारम्भ हो जाते है। तुड़ाई उपरांत नुकसान को उचित तुड़ाई, पैकिंग एवं सही भंडारण तकनीक अपना कर कम किया जा सकता है।

परिपक्वता

आँवला के फलों की परिपक्वता कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे, स्थिति, जलवायु, मृदा प्रकार, नमी, इत्यादि। आँवला की व्यावसायिक किस्मों में परिपक्वता सूचकांक का निर्धारण फल लगने के उपरांत अवधि, टी. एस. एस. एसिड अनुपात, आपेक्षित घनत्व आदि के अनुसार किया जाता है। बनारसी एवं कृष्णा किस्मों में परिपक्वता फल लगने के 17-18 सप्ताह बाद आती है, जबकि कंचन और फ्रांसिस में 20 सप्ताह का समय लगता है। चकैइया किस्म, फल लगने के 23 सप्ताह बाद परिपक्व होते हैं। परिपक्वता के समय आपेक्षित घनत्व सभी किस्मों में 1.0 से अधिक पाया जाता है। आँवले में परिपक्वता निर्धारण का सबसे अच्छा तरीका फलों के रंग में परिवर्तन (हरे से चमकदार सफेद हरा या पीला हरा) एवं बीज के रंग में परिवर्तन (हल्के पीले सफेद से भूरे रंग में) को देखकर किया जा सकता है।

तुड़ाई

आँवले के फलों की तुड़ाई हाथ से करते हैं परन्तु यह क्रिया बड़े वृक्षों में सम्भव न होने के कारण, बांस से बनी सीढ़ियों पर चढ़ कर तुड़ाई की जाती है। फलों को प्रात: काल में तोड़ना चाहिए एवं प्लास्टिक के क्रेट्स में रखना चाहिए। फलों को तोड़ते समय जमीन में नहीं गिरने देना चाहिए अन्यथा चोटिल फल पैकिंग एवं भंडारण के समय सड़ कर अन्य फलों को भी नुकसान पहुँचाते हैं।

फलत

आँवले का कलमी पौधा रोपण से तीसरे साल तथा बीजू पौधा 6-8 साल बाद फलत देना प्रारम्भ कर देता है। कलमी पौधा 10-12 साल बाद पूर्ण फलत देने लगता है तथा अच्छे प्रकार से रख-रखाव के द्वारा 60-75 साल तक फलत देता रहता है। आँवले की विभिन्न किस्मों की उपज में भिन्नता पायी जात है। बनारसी कम फलत देने वाली, फ्रांसिस एवं नरेन्द्र आँवला-6 औसत फलत देने वाली, कंचन एवं नरेन्द्र आँवला-7 अत्यधिक फलत देने वाली किस्में हैं। आँवले की फलत को कई कारक प्रभावित करते है जैसे किस्म की आंतरिक क्षमता, वातावरणीय कारक एवं प्रबंधन तकनीकें इत्यादि। एक पूर्ण विकसित आँवले का वृक्ष एक से तीन क्विंटल फल देता है। इस प्रकार से 15-20 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।

श्रेणीकरण

आँवले के फलों को तीन श्रेणियों में उनके आकार, भार, रंग एवं पकने के समय के आधार पर बांटा जा सकता है। बड़े आकार के फल (व्यास 4 सें.मी. से अधिक) को मुरब्बा बनाने हेतु प्रयोग किया जाता है। मध्यम आकार के फलों को अन्य परिरक्षित पदार्थ बनाने में एवं छोटे आकार के फलों को औषधीय उत्पाद जैसे च्यवनप्राश, त्रिफला इत्यादि बनाने में प्रयोग किया जाता है। अपरिपक्व, चोटिल एवं व्याधिग्रस्त फलों को फेंक देना चाहिए।

पेटीबंदी

आँवले के फलों का अच्छी तरह से स्म्भ्लाव एवं पेटीबंदी न करने से लगभग 20 प्रतिशत तक का नुकसान होता है। इसलिए आँवले की पेटीबंदी करते समय अत्यधिक सावधानी रखने की आवश्यकता है। जूट की बोरियों एवं अरहर पौधों के तने की टोकरियाँ प्राय: आँवले की पेटीबंदी में प्रयुक्त की जाती हैं, जबकि इन पैकिंग पदार्थों में भार सहने की क्षमता कम होती है तथा रख-रखाव भी उपयुक्त नहीं हो पाता है। लगभग 40-50 किलोग्राम क्षमता की अरहर के तने द्वारा बनी टोकरियाँ आँवला की पैकिंग में प्रयोग की जाती है जिनमें अखबार की परत एवं आँवला की पत्तियों को कुशन के रूप में प्रयोग किया जाता है। आँवला को दूरस्थ स्थानों पर भेजने के लिए गत्ते (कारुगेटेट फाइबर बोर्ड) से बने डिब्बों में पैकिंग करके भेजा जा सकता है।

आय

आँवले का विक्रय मूल्य 400 रूपये से लेकर 4000 रूपये प्रति कुंतल तक रहता है। अत: प्रति हेक्टेयर क्षेत्र से 40,000 रूपये से लेकर दो लाख रूपये प्राप्त किये जा सकते हैं।

भंडारण

आँवले के भंडारण का मुख्य उद्देश्य संसाधन हेतु उसकी उपलब्धता को बढ़ाना है। किस्मों के अनुसार परिपक्व फलों को 6 से 9 दिनों तक कम ऊर्जा वाले शीतकक्षों में रख कर बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त आँवले के फलों को शीत तापक्रम (5-70 सेंटीग्रेट) पर दो माह तक रखा जा सकता है। फलों को 15 प्रतिशत नमक के घोल में रख कर 75 दिनों तक सामान्य तापक्रम पर भंडारित किया जा सकता है।

प्रसंस्करण

आँवले के फल अम्लीय एवं कसैले होने के कारण तुरन्त उपभोग हेतु उपयुक्त नहीं होते हैं। अत: फलों को संसाधित पदार्थ बनाने में उपयोग किया जा सकता है। संसाधित पदार्थ बनाने से इसमें विद्यमान विटामिन ‘सी’ के बड़े भाग का ह्रास होता है। फलों को तीन प्रकार से उपयोग में लाया जाता है। खाद्य पदार्थ के रूप में, स्वास्थ्य उत्पाद के रूप में। आँवले के संसोधित पदार्थो के बनाने की तकनीकों का विवरण निम्नवत है।

गूदा

पूर्ण परिपक्व फलों को गूदा निकालने के लिए प्रयोग किया जाता है। फलों को अच्छी प्रकार से धो कर बीज निकाल कर छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करके प्रयोग किया जाता है या 6 से 8 मिनट तक खौलते हुए पानी में उबालने से फलों की फांके स्वयं अलग हो जाती है तथा उनका रंग भी सफेद हो जाता है। इस प्रकार से अलग ही हुई फांकों में या कटे हुए टुकड़ों में उतनी ही मात्रा में पानी मिला कर गूदा निकालने वाली मशीन के द्वारा गूदा निकाल लिया जाता है। निकले हुए गूदे को 780 सेंटीग्रेट तक गर्म करके 1000 पी.पी.एम. सल्फर डाईआक्साइड या 2 ग्राम पोटेशियम मेटा बाई सल्फाइट प्रति किलो के हिसाब से मिला कर हवा अवरोधी बर्तनों में भर देते हैं।

जूस

आँवले के छोटे-छोटे टुकड़ों को फिल्टर प्रेस के द्वारा दबा कर जूस निकाला जाता है। उसको 780 ब तक गर्म कर निर्जीवाणुक या जीवाणु हीन कर दिया जाता है। तैयार जूस को कांच की निर्जमीकृत बोतलों में भर देते हैं। इस प्रकार से तैयार जूस 500 पी.पी.एम. सल्फर डाईआक्साइड या 1 ग्राम पोटेशियम मेटा बाई सल्फाइट प्रति लीटर के हिसाब से मिला कर परिरक्षित किया जाता है।

स्कवैश

स्कवैश, जूस या गूदा से बनाया जाता है। स्कवैश में 35 से 40 प्रतिशत जूस में 50 प्रतिशत चीनी, 1.1 प्रतिशत साइट्रिक अम्ल एवं 350 पी.पी.एम. सल्फर डाईआक्साइड (750 मिलीग्राम/किलोग्राम) मिलाते हैं। अच्छी प्रकार से मिलाने के बाद हल्की आंच पर गर्म करके, साफ़ की गई निजर्मीकृत बोतलों में भर कर भंडारित करते है। इस्तेमाल करते समय तीन भाग पानी में एक भाग स्कवैश को मिला लेते हैं।

आर.ओ. एस. पेय

इस तुरन्त उपयोग हेतु तैयार पेय में 10 प्रतिशत जूस, टी.एस.एम. 120 ब्रिक्स एवं 0.28 प्रतिशत खटास की मात्रा रखी जाती है। तैयार पेय को कांच को बोतलों में भर कर कार्क लगा कर 20 मिनट तक खौलते हुए पानी में रख कर निजर्मीकृत करते हैं। इस पेय में दो प्रतिशत अदरक के जूस को मिला कर इसका स्वाद और अच्छा बनाया जा सकता है।

मुरब्बा

बाजार में उपलब्ध आँवले के उत्पादों में मुरब्बा एक प्रमुख उत्पाद है। मुरब्बा बनाने के कई तरीके है। पारम्परिक रूप से मुरब्बा बनाने हेतु गूदे हुए आँवले के फलों को 2-8 प्रतिशत तक नमक के घोल या चूने के पानी में 1-1 दिनों तक रखते हैं। जिससे फलों का कसैलापन दूर हो जाता है। तदुपरान्त फलों को अच्छी प्रकार से धो कर उतनी ही मात्रा में चीनी मिला कर रात्रि भर के लिए रख देते हैं। दूसरे दिन चीनी के घोल को 700 ब्रिक्स टी.एस.एस. तक सान्द्रित करके उसमें फलों को डुबो देते हैं। इस प्रक्रिया को तीन या चार बार दोहराते हैं। अंत में तैयार मुरब्बे को साफ़-सुथरे जार में 70-720 ब्रिक्स ताले शर्करा के घोल के साथ डिब्बा बंदी कर देते हैं।

मुरब्बा बनाने की एक विधि का मानकीकरण लखनऊ में किया गया है। इस विधि में 4-6 मिनट तक खौलते हुए 2 प्रतिशत सोडियम हाइड्रोक्साइड के घोल में, तदुपरान्त 1 ग्राम फिटकारी प्रति लीटर के हिसाब से इस घोल में मिलाकर एक मिनट तक गर्म करते हैं। इसके बाद पानी को निथार लेते हैं तथा फलों को बहते हुए पानी में अच्छी तरह धोते हैं, जब तक फलों का छिलका पूरी तरह से साफ़ न हो जाये। फिर फलों को 20 मिनट तक 2 प्रतिशत साईंट्रिक अम्ल के घोल में रखते हैं। पुन: पानी को निथार कर फलों की सतह को सुखा लेते हैं। इन फलों को खौलते हुए अम्लीकृत शर्करा के घोल 800 ब्रिक्स एवं 0.7 प्रतिशत खटास में डाल कर जार में भर देते हैं। दो दिनों बाद शर्करा के घोल को 800 ब्रिक्स तक पुन: शर्करा मिला कर गर्म कर सान्द्रित कर लेते हैं। इस प्रक्रिया की दो बार पुनरावृत्ति करके मुरब्बे को साफ़-सुथरे जार में भर कर सील कर देते हैं।

शर्करा के घोल में आँवला की फाँके

यह एक नया उत्पाद है। उत्पाद इसमें आँवले में विद्यमान पौष्टिक गुणों को अधिक मात्रा में संरक्षित किया जाता है जो कि मुरब्बा बनने की जटिल प्रक्रिया के दौरान नष्ट हो जाते हैं। फलों को खौलते पानी में 6-8 मिनट तक रखते हैं। फिर ठंडा करके, फाँके अलग कर ली जाती है। इसके बाद इन फांकों को 0.5 प्रतिशत खटास युक्त विभिन्न सान्द्रन वाले (50, 60, एवं 700 ब्रिक्स) शर्करा के घोलों में, घंटे प्रत्येक में क्रमश: रखते है। अंत में शर्करा के घोल को चीनी मिला कर एवं खौला कर, 700 ब्रिक्स तक सान्द्रिक कर लेते है इन फांकों को इस घोल में मिला कर साफ़-सुथरे जार में बंद कर लेते हैं।

कैंडी

फलों को अच्छी तरह से पानी से धोने के उपरांत उन्हें खौलते पानी में 6-8 मिनट तक गर्म करते हैं। फिर ठंडा करने के बाद फलों से फाँके अलग कर ली जाती है। इन फांकों को 600 ब्रिक्स एवं 0.7 प्रतिशत अम्लीय घोल (1:1.5) के अनुपात में रात भर डुबो कर रखते हैं ताकि परसरणी विधि द्वारा फांकों में शर्करा तथा अम्ल को रिसाया जा सके। दूसरे दिन फांकों को घोल से निकाल कर घोल को गर्म कर एवं उसमें शर्करा मिला कर उसकी सांद्रता 700 ब्रिक्स तक लाते हैं। टुकड़ों को पुन: रात भर भिगो देते हैं। दूसरे दिन शर्करा के घोल से निकाल कर टुकड़ों को गुनगुने पानी में धो लेते हैं ताकि फांकों की सतह पर लगी शर्करा घुल जाय। फिर फांकों को 600 ब्रिक्स  तापमान पर विद्युत् चालित निर्जलीकरण यंत्र में 8-10 घंटों तक रख कर सुखा लेते हैं। इन सूखी फांकों में जल की मात्रा 10 प्रतिशत तक होनी चाहिए। इस प्रकार तैयार फांके ‘कैन्डी’ कहलाती हैं और उन्हें पालीथिन की थैलियों में अथवा जार में भर कर भंडारित करते हैं।

चूर्ण

आँवले के फल से अलग की गई फांकों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर उन्हें विद्युत् चालित यंत्र में 600 सेंटीग्रेट पर 8-10 घंटे सुखाते हैं। तदुपरान्त उनकों पीस कर चूर्ण बना लेते हैं। आँवले का चूर्ण बनाने हेतु प्रति 100 ग्राम चूर्ण में 8 ग्राम साधारण नमक, 16 ग्राम काला नमक, 15 ग्राम चीनी, 3 ग्राम साइट्रिक अम्ल, 2 ग्राम पिसी काली मिर्च, 1 ग्राम हींग, 1 ग्राम भुना पिसा जीरा, 1 ग्राम पिसी सौंफ, 1.5 ग्राम सोंठ एवं 0.5 ग्राम अजवायन मिलते हैं। अजवायन के स्थान पर 2-5 ग्राम पिसे पुदीना की पत्ती को भी मिला सकते हैं। तैयार चूर्ण को सूखे जार में हवा अवरोधी अवस्था में भंडारित कर लेते हैं।

स्त्रोत: समेति, कृषि विभाग , झारखण्ड सरकार

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