/आलू की फसल में खरपतवार प्रबंधन

आलू की फसल में खरपतवार प्रबंधन

आलू के साथ उगने वाले खरपतवारों को खुरपी, हैंड हो अथवा कुदाली से भी नष्ट किया जा सकता है। खरपतवारों पर काबू पाने की यह सरल एवं प्रभावी विधि है परन्तु इस विधि में समय अधिक लगता है तथा प्रति इकाई क्षेत्र में खर्च भी अधिक होता है।

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मल्चिंग (सुखी पत्ती बिछाकर)

आलू की दो कतारों के बीच जहां खरपतवार अधिक उगते है, वहां पर 5-10 सेमी. मोटी सूखे पुवाल, सूखी घास, गन्ने की पत्तियाँ सूखी जल कुम्भी आदि बिछा देने से खरपतवारों को प्रकाश नहीं मिलता तथा खरपतवार पीले पड़कर सूख जाते है।

शाकनाशी रसायनों द्वारा

खरपतवार नियंत्रण की इस विधि में प्रति हेक्टेयर लागत भी कम आती है तथा समय की भारी बचत होती है, साथ ही साथ खरपतवारों का प्रारंभिक अवस्था में ही प्रभावी नियंत्रण हो जाता है। इसके अतिरिक्त खरपतवार के नियंत्रण से आलू में लगने वाले रोगों के जीवाणुओं के फैलने की संभावना भी कम हो जाती है। मुख्य रूप से प्रयोग होने वाले शाकनाशी रसायनों को तीन भागों में बांटा जा सकता है।

बोने से पहले प्रयोग किये जाने वाले शाकनाशी

इस वर्ग में आने वाले शाकनाशी रसायनों को आलू की बुवाई से पहले खेत में डालकर अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। इस समय भूमि में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है।

पेंडीमेथालिन (स्टाम्प/पेंडीगोल्ड/पेंडीलीन/धानुटाप/पेंडीहर्ब) इत्यादि

इस खरपतवारनाशी की 1.0 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की मात्रा बुवाई से पहले खेत में मिला देनी चाहिए। इस रसायन का प्रयोग बुवाई के बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व भी किया जा सकता है। इसके प्रयोग से चौड़ी तथा सकरी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रित हो जाते हैं।

फ्लूक्लोरालिन (बासालिन)

यह शाकनाशी तरल रसायन के रूप में उपलब्ध होता है। सूर्य के प्रकाश से इसके नष्ट होने की प्रबल संभावना रहती है। इसलिए इसे छिड़काव के बाद भूमि में अच्छी तरह मिला देते हैं। यह खरपतवारों की जड़ों द्वारा शोषित कर लिया जाता है तथा पूरे पौधे में चला जाता है। इस शाकनाशी की 0.75-1.0 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से एकवर्षीय चौड़ी पत्ती वाले तथा घास कुल के खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है।

बोने के बाद परन्तु उगने के पहले प्रयोग किये जाने वाले शाकनाशी

इन शाकनाशी रसायनों को बुवाई के बाद प्रयोग कर लेना चाहिए। इस समय खेत में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है।

एलाक्लोर (लासो)

यह शाकनाशी तरल एवं दानेदार दोनों ही रूपों में उपलब्ध होता है। इसकी 1.0-1.50 किग्रा. सक्रिय तत्व मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने से एकवर्षीय घास कुल के खरपतवारों की रोकथाम हो जाती है।

आइसोप्रोतटुरान (एरीलान, धानुलान, आइसोगार्ड, आइसोलान, टाऊरस, टोल्कान)

इस शाकनाशी रसायन की 0.50-0.75 किग्रा. सक्रिय तत्व की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने से एक वर्षीय चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे – बथुआ तथा घास कुल के खरपतवार जैसे गेहूं के मामा आदि का नियंत्रण हो जाता है।

लिनुरान (एफालान)

यह शाकनाशी भूमि में काफी समय तक अपना प्रभाव बनाये रखता है। इसके प्रयोग से बाद में उगने वाले खरपतवार भी नष्ट हो जाते हैं। इस रसायन की 0.50-0.75 किग्रा. सक्रिय तत्व की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने से सभी प्रकार के खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है।

मेट्रीब्यूजिन (सेंकार, टाटा मेट्री, लेक्सोन)

यह एक अत्यंत प्रभावशाली शाकनाशी है। इसके प्रयोग से सभी प्रकार के एकवर्षीय खरपतवार नष्ट हो जाते हैं, लेकिन कुछ खरपतवार जैसे जगंली मटर एवं अंकरी का प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाता। इसका प्रयोग 5-10 प्रतिशत आलू उगने पर भी किया जाता है। इस शाकनाशी की 0.50-0.75 किग्रा. सक्रिय तत्व की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से की जा सकती है। इसके प्रयोग के समय खेत में पर्याप्त नमी होना अति आवश्यक है।

एट्राजिन (एट्राफाफ, धानुजीन, सोलारों)

एक वर्षीय घास कुल, चौड़ी पत्ती वाले तथा मोथा को नष्ट करने के लिए यह एक प्रभावशाली रसायन है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसका प्रयोग आसानी से किया जा सकता है। इस शाकनाशी की 0.50 किग्रा. सक्रिय तत्व की मात्रा प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती हैं।

खरपतवार उगने के बाद प्रयोग किये जाने वाले शाकनाशी

पैराक्वाट (ग्रेमेक्सों)

इस शाकनाशी रसायन के 0.50 किग्रा. सक्रिय तत्व की मात्रा प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। इसका प्रयोग 5-10 प्रतिशत आलू उगने पर किया जाता है उस समय तक खरपतवार पूरी तरह से उग जाते हैं। इसके प्रयोग में यह ध्यान देना चाहिए कि खरपतवार अच्छी तरह से शाकनाशी द्वारा भींग जाये। इसे दोपहर के बाद प्रयोग करने से अच्छे परिणाम प्राप्त होते है। इसके प्रयोग के समय स्प्रेयर के साथ हुड लगाकर छिड़काव किया जता है ताकि नींदानाशी दवा कतारों में उगे खरपतवारों पर पड़े, न कि आलू की फसल पर।

2,4-डी (2,4-डी, एग्रोडोन-48, विडमार, टेफासाइड, ईर्विटाक्स)

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों तथा मोंथा के नियंत्रण के लिए यह एक कारगर रसायन है। इस शाकनाशी की 0.50 किग्रा. सक्रिय तत्व मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 5-10 प्रतिशत आलू उगने के बाद स्प्रेयर के साथ हुड लगाकर छिड़काव करने से आलू के प्रमुख खरपतवार जैसे – बथुआ, हिरन खुरी, जंगली चौलाई एवं मोंथा आदि का नियंत्रण हो जाता है।

एकीकृत खरपतवार प्रबंधन

खरपतवार नियंत्रण के विभिन्न तरीकों को साथ-साथ प्रयोग करने से न केवल एक विधि से नियंत्रण पर निर्भरता कम हो जाती है बल्कि खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण भी हो जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य खरपतवार नियंत्रण हेतु शाकनाशी की मात्रा को कम करना है, जिससे पर्यावरण पर होने वाले दुष्परिणाम से बचा जा सके तथा खाद्य पदार्थो में रसायन के अवशेष सीमित मात्रा में हो जा पायें। आलू में बुवाई के बाद एलाक्लोर 1.0 किग्रा. या पैराक्वाट 0.40 किग्रा. या मेट्रीब्यूजन 0.50 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करके बुवाई के 40 दिन बाद मिट्टी चढ़ा देने से जहां एक ओर खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण हो जाता है, वहीं दूसरी ओर आलू की पैदावार एवं गुणवत्ता में भी बढ़ोतरी हो जाती है।

नोट : शाकनाशी रसायनों की आवश्यक मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से फ़्लैट फैन नोजल का प्रयोग करते हुए समान रूप से छिड़काव करना चाहिए।

स्त्रोत: कृषि विभाग, भारत सरकार

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