/उत्तर प्रदेश में गन्ने की वैज्ञानिक खेती

उत्तर प्रदेश में गन्ने की वैज्ञानिक खेती

गन्ने की फसल चक्र

एक निश्चित भू-भाग पर निश्चित समय में भूमि की उर्वरता को बिना क्षति पहुंचाये, कम से कम व्यय करके क्रमबद्ध फसलें उगाकर अधिकतम लाभ अर्जित करने की प्रक्रिया को फसल चक्र कहते हैं।

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आदर्श फसल-चक्र वह है जो परिवार के सदस्यों एवं क्षेत्र के श्रमिकों को रोजगार के अधिकतम अवसर प्रदान कर सके तथा कृषि यंत्रों के आर्थिक दृष्टिकोण से लाभप्रद उपभोग के साथ ही कम से कम समय में अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित कर सके। गन्ना फसल के साथ उत्तर प्रदेश में प्रचलित कुछ आदर्श चक्र निम्न प्रकार है –

पश्चिमी क्षेत्र –

चाय-लाही-गन्ना-पेड़ी़+लोबिया(चारा), गेहूँ

धान-बरसीम-गन्ना-पेड़ी+लोबिया(चारा)

धान-गेहूँ-गन्ना पेड़ी-गेहूँ-मूंग

मध्य क्षेत्र –

धान-राई-गन्ना-पेड़ी-गेहूँ

हरी खाद-आलू-गन्ना-पेड़ी-गेहूँ

धान-गेहूँ-गन्ना-पेड़ी+लोबिया(चारा)

पूर्वी क्षेत्र –

धान-लाही-गन्ना-पेड़ी-गेहूँ

धान-गन्ना-पेड़ी-गेहूँ

धान-गेहूँ-गन्ना-पेड़ी+लोबिया(चारा)

गन्ने फसल के लिए खेत की तैयारी

दोमट भूमि जिसमें गन्ने की खेती सामान्यत: की जाती है, में 12 से 15 प्रतिशत मृदा नमी अच्छे जमाव के लिये उपयुक्त है। यदि मृदा नमी में कमी हो तो इसे बुवाई से पूर्व पलेवा करके पूरा किया जा सकता है। ओट आने पर मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई तथा 2-3 उथली जुताइयॉं करके खेत में पाटा लगा देना चाहिये। खेत में हरी खाद देने की ​स्थिति में खाद को सड़ने के लिये पर्याप्त समय (लगभग एक से डेढ़ माह) देना चाहिये।

बुवाई का समय

गन्ने के सर्वोत्तम जमाव के लिये 30-35 डिग्री से0 वातावरण तापक्रम उपयुक्त है। उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में तापक्रम वर्ष में दो बार ​सितम्बर-अक्टूबर एवं फरवरी, मार्च आता है।

बुवाई का समय

  1. शरद  15 सितम्बर से अक्टूबर
  2. बसन्त
  • पूर्वी क्षेत्र 15 जनवरी से फरवरी
  • मध्य क्षेत्र 15 फरवरी से मार्च
  • पश्चिमी क्षेत्र 15 फरवरी से मार्च
  • विलम्बित समय अप्रैल से 16 मार्च

गन्ने की उपज विधि

  1. खेत की तैयारी-पलेवा के बाद 3-4 जुताई।
  2. गन्ने की उपयुक्त जातियों जैसे को0शा0 767, 88216, 88230, 95255, 94257 व को0शा0 94270 को चुनें।
  3. स्वस्थ गन्ने का ऊपरी भाग बोयें।
  4. बीजोपचार – बीज गन्ने को 4-6 घण्टे पानी में भिगोकर तथा पारायुक्त रसायन में डुबो लें।
  5. गन्ने की पंक्तियों के बीच दूरी 60 से0मी0 रखें।
  6. बुवाई के समय उपयुक्त नमी रखें व अन्धी गुड़ाई करें।
  7. नेत्रजन के प्रयोग में विलम्ब नहीं, आधी मात्रा बुवाई के समय शेष आधी जमाव होने पर ​सिंचाई के 2-3 दिन बाद।
  8. सही समय पर हल्की व बार-बार 10-15 दिन के अन्तर पर ​सिंचाई।
  9. फसल सुरक्षा, गुड़ाई व बंधाई समय पर।

पंक्तियों के मध्य की दूरी एवं बीज

सामान्यत: पंक्ति से पंक्ति के मध्य 90 से0मी0 दूरी रखने एवं तीन आंख वाले टुकड़े बोने पर लगभग 37.5 हजार टुकड़े अथवा गन्ने की मोटाई के अनुसार 40 से 60 कुन्तल बीज गन्ना प्रति हेक्टयर की दर से प्रयोग किया जाता है। पंक्तियों के मध्य की दूरी 60 से0मी0 रखने तथा तीन आंख वाले टुकड़े लेने पर इनकी संख्या लगभग 56.25 हजार प्रति हेक्टयर हो जाती है।

पंक्तियों के मध्य की दूरी 90 सेंटीमीटर

यह सामान्य परि​स्थितियों एवं गन्ने के साथ अन्त: फसल लेने की दशा में सर्वाधिक उपयुक्त दूरी है।

पंक्तियों के मध्य की दूरी 60 से0मी0

विलम्ब से गन्ना बोवाई की दशा में, असिंचित एवं कम सिंचाई की उपलब्धता में, कम  नेत्रजन दिये जाने की दशा में तथा अधिक ठण्ड वाले क्षेत्रों के लिये उपयुक्त हैं।

बीज गन्ना

सामान्यत: स्वीकृत पौधशालाओं से संस्तुत उन्नतशील गन्ना प्रजातियों का रोग व कीटमुक्त, शत-प्रतिशत शुद्ध 12 माह की आयु की फसल से बीज का चुनाव किया जाता है किन्तु वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि गन्ने के 1/3 ऊपरी भाग का जमाव अपेक्षाकृत अच्छा होता है तथा 2 माह की फसल की तुलना की में 7-8 माह की फसल से लिये गये बीज का जमाव भी अपेक्षाकृत अच्छा होता है। बोने से पूर्व गन्ने के दो अथवा तीन ऑंख वाले टुक्ड़े काटकर कम से कम 2 घण्टे पानी में डुबो लेना चाहिये, तदुपरान्त किसी पारायुक्त रसायन (एरीटान 6 प्रतिशत या बैगलाल 3 प्रतिशत) के क्रमश: 0.25 या 0.5 घोल में शोधित कर लेना चाहिये। बीज शोधन के लिये बावस्टीन 0.1 प्रतिशत घोल का भी प्रयोग किया जा सकता है।

गन्ने की बुवाई

सामान्यतः आदर्श परिस्थितियों में तीन ऑंख वाले पैडे कूडों अथवा नालियों में इस प्रकार डाले जाते हैं कि प्रति फुट कम से कम ऑंख समायोजित हो जाये। अपेक्षाकृत अच्छे जमाव के लिये दो ऑंख वाले पैडे प्रति फुट तीन ऑंख की पर से भी प्रयोग किये जा सकते हैं। बुवाई के उपरान्त नाली में पैडो के ऊपर गामा बी०एच०सी० 20ई.सी. 6.25लीटर या क्लोरपाइरीफस 20 प्रतिशत घोल 5 लीटर को 1875 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर हजारे से छिड कना चाहिए अथवा फोरेट 10 जी.25 कि०गो० या सेविडाल 4:4जी. 25कि०ग्रा० या लिण्डेन 6 जी.20 कि०ग्रा०/हे० की दर से पैड ो के ऊपर प्रयोग करना चाहिए। नालियों को फावड या देशी हल से तुरन्त पाट कर खेत में पाटा लगा देना चाहिए। इससे दीमक व अंकुरवेधक नियंत्रित होते हैं।

अन्धी गुड़ाई

समतल विधि से गन्ना बुवाई के एक सप्ताह में अथवा यदि वर्षा हो जाये अथवा शीघ्र जमाव के लिये हल्की सिंचाई की गयी हो तो अंधी गुड़ाई आवश्यक है। ध्यान रहे कि अंधी गुड़ाई की गहराई अधिकतम 4-5 से0 मी0 से अधिक न हो।

गन्ने की बुवाई की विधियॉं

समतल विधि

इस विधि में 90 से०मी० के अन्तराल पर 7-10 सें०मी० गहरे कुंड डेल्टा हल से बनाकर गन्ना बोया जाता है। वस्तुतः यह विधि साधारण मृदा परिस्थितियों में उन कृषकों के लिये उपयुक्त हैं जिनके पास सिंचाई, खाद तथा श्रम के साधन सामान्य हों। बुवाई के उपरान्त एक भारी पाटा लगाना चाहिये।

नाली विधि

इस विधि में बुवाई के एक या डेढ़ माह पूर्व 90 से०मी० के अन्तराल पर लगभग 20-25 से०मी० गहरी नालियॉं बना ली जाती हैं। इस प्रकार तैयार नाली में गोबर की खाद डालकर सिंचाई व गुडई करके मिट्‌टी को अच्छी प्रकार तैयार कर लिया जाता है। जमाव के उपरान्त फसल के क्रमिक बढ वार के साथ मेड की मिट्‌टी नाली में पौधे की जड पर गिराते हैं जिससे अन्ततः नाली के स्थान पर मेड तथा मेड के स्थान पर नाली बन जाती हैं जो सिंचाई नाली के साथ-साथ वर्षाकाल में जल निकास का कार्य करती है। यह विधि दोमट भूमि तथा भरपूर निवेश-उपलब्धता के लिये उपयुक्त है। इस विधि से अपेक्षाकृत उपज होती है, परन्तु श्रम अधिक लगता है।

दोहरी पंक्ति विधि

इस विधि में 90-30-90 से०मी० के अन्तराल पर अच्छी प्रकार तैयार खेत में लगभग 10से०मी० गहरे कूंड बना लिये जाते हैं। यह विधि भरपूर खाद पानी की उपलब्धता में अधिक उपजाऊ भूमि के लिये उपयुक्त है। इस विधि से गन्ने की अधिक उपज प्राप्त होती है-

गुड़ाई

गन्ने में पौधों की जड़ों को नमी व वायु उपलब्ध कराने तथा खर-पतवार नियंत्रण के दृष्टिकोण से गुड़ाई अति आवश्यक है। सामान्यत: प्रत्येक सिंचाई के पश्चात एक गुड़ाई की जानी चाहिए। गुड़ाई करने से उर्वरक भी मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाता है। गुड़ाई के लिए कस्सी/ फावड़ा/कल्टीवेटर का प्रयोग किया जा सकता है।

सूखी पत्ती बिछाना

ग्रीष्म ऋतु में मृदा नमी के संरक्षण एवं खर-पतवार नियंत्रण के लिए गन्ने की पंक्तियों के मध्य गन्ने की सूखी पत्तियों की 8-10 से.मी. मोटी तह बिछाना लाभदायक होता है। फौजी कीट आदि से बचाव के लिये सूखी पत्ती की तह पर मैलाथियान 5 प्रतिशत या लिण्डेन धूल 1.3 प्रतिशत का 25कि०ग्रा०/हे० या फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत धूल को 25 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेयर बुरकाव करना चाहिए। वर्षा ऋतु में सूखी पत्ती सड कर कम्पोस्ट खाद का काम भी करती है। सूखी पत्ती बिछाने से अंकुरवेधक का आपतन भी कम होता है।

गन्ने में खर-पतवार नियंत्रण

एक बीज पत्रीय खर पतवार

सेवानी, खरमकरा, दूब,मोथा जनकी, कांस एवं फुलवा आदि।

द्विबीज पत्रीय खर-पतवार

मकोय, हिरनखुरी, महकुवा, पत्थरचटटा, बड़ी दुदधी, हजारदाना, कृष्णनील, नर, नील कमली, मुमिया, तिनपतिया, जुगली जूट, बथुआ, खारथआ व लटजीरा आदि। खर पतवार से पड ने वाला विपरीत प्रभाव मुखयतः ग्रीष्मकाल (मध्य जून) तक ही होता है। तदोपरान्त यह नगण्य हो जाता है। सर्वाधिक हानिकर प्रभाव गन्ने के ब्यांत काल (अप्रैल-जून) में पडता है प्रयोगों से से सिद्ध हुआ है कि खरपतवार प्रतिस्पर्धा के कारण गन्ने की उपज 40 प्रतिशत तक कम हो जाती है। खरपतवार नियंत्रण हेतु निम्नलिखित विधियां अपनाई जा सकती है।

यांत्रिक नियंत्रण

गन्ने के खेत को कस्सी/कुदाली/फावड /कल्टीवेटर आदि से गुडई करके खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। बुवाई के एक सप्ताह के अन्दर अंधी गुडई तथा प्रत्येक सिंचाई के बाद एक गुडई ओट आने पर करनी चाहिए श्रमिकों की कमी की स्थिति में गन्ने की बढवार के प्रारम्भ में दो बैलों अथवा ट्रैक्टर चलित कल्टीवेटर द्वारा अप्रैल जून में गुडई करनी चाहिए।

सूखी पत्ती बिछाना

जमाव पूरा हो जाने के उपरान्त मैदानी क्षेत्रों में गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य 8-12 से०मी० सूखी पत्तियों की तह तथा तरायी क्षेत्रों 10-15 से०मी० मोटी तह बिछानी चाहिए। ध्यान रहे कि कीट एवं प्रभावित खेत से सूखी पत्ती नहीं लेना चाहिए। सावधानी के तौर 25 कि०ग्रा० मैलाथियान 5 प्रतिशत धूल या लिण्डेन 1.3प्रतिशत धूल या फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत धूल का प्रतिहेक्टेयर की दर से सूखी पत्तियो पर धूसरण करना चाहिए।

गन्ने की खेती में दवा का प्रयोग

  1. सिमैजीन (50 डब्लू) रू. 2.24 कि०ग्रा०/हेक्टेयर एवं 2.4-डी.2.24 कि०ग्रा०/हे० की दर से जमाव पूर्व व जमाव के उपरान्त प्रयोग करें।
  2. आईसेप्लेनोटाक्स (67 🙂 रू. मोथा एक बीजपत्रीय खरपतवारों के प्रभावी सुनियंत्रण हेतु 3 कि०ग्रा०/हे० की दर से जमाव पूर्व व पश्चात छिड़कना चाहिये।
  3. एट्राजीन व 2-4 रू. एट्रजीन 2.24 कि०ग्रा०/हे० जमाव पूर्व तथा 2-4-डी-2.24 कि०ग्रा०/हे० जमाव पश्चात छिडकने से अधिकांश एकबीजपत्रीय व द्विबीजपत्रीय नष्ट हो जाते हैं।
  4. 2-4-डी-2.24 (80): सोडियमसाल्ट) रू. शरदकालीन गन्ने मे चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु 2-4-डी-2.24 कि०ग्रा० प्रति हे० की दर से जमाव पश्चात छिडकना प्रभावशाली माना गया है।

रासायनिक/यांत्रिक नियन्त्रण

गन्ने के जमाव पूर्व सिमैजीन 2.24 कि०ग्रा०/हे० एवं गन्ने के सक्रिय ब्यांतकाल में अर्थात मई के अन्तिम सप्ताह में गुडाई के उपरान्त इतनी ही सिमैजीन का छिड़काव करने से अकेले रसायन के छिडकाव करने की तुलना में अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

रसायनों के छिड़काव में विशेष सावधानियॉं

  1. रसायन की संस्तुत मात्रा को 1125 लीटर पानी घोलना चाहिये।
  2. जमाव पूर्व रसायन प्रयोग करने से पहले गन्ने की एक अच्छी गुड ई कर देनी चाहिये।
  3. रसायन छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी हो।
  4. जमाव पूर्व एवं पश्चात खरपतावार नियन्त्रण रसायनों का छिडकाव, गन्ना बुवाई के उपरान्त क्रमशः 7-15 दिन व 50-65 दिन के अन्दर करना चाहिये।
  5. मिश्रित खेती की दशा में अन्य संवेदनशील फसलों को बचाने के उद्देश्य से खरपतवार नियंन्त्रक रसायनो का छिडकाव नहीं करना चाहिये।

मिट्‌टी चढना

गन्ने के थानो की जड पर मिट्‌टी चढने से जड़ों का सघन विकास होता है। इससे देर से निकले कल्लों का विकास रूक जाता और वर्षा ऋतु में फसल गिरने से बच जाती है। मिट्‌टी चढने से स्वतः निर्मति नालियॉं वर्षा में जल निकास का कार्य भी करती है। अतः अन्तिम जून में एक बार हल्की मिट्‌टी चढना तथा जुलाई में अन्तिम रूप से पर्याप्त मिट्‌टी चढकर गन्ने को गिरने से बचाकर अच्छी फसल ली जा सकती है।

गन्ने फसल की बॅंधाई

अधिक उर्वरक दिये जाने तथा उत्तम फसल प्रबन्ध के कारण फसल की बढ़वार अच्छी हो जाती है, किन्तु जब गन्ने 2.5 मीटर से अधिक लम्बे हो जाते हैं तो वे वर्षाकाल में गिर जाते हैं जिससे उसके रसोगुण पर विपरीत प्रभाव पड जाता है। अतः गन्ने के थानों को गन्ने की सूखी पत्तियों से ही लगभग 100 से०मी० ऊॅंचाई पर जुलाई के अन्तिम सप्ताह में तथा दूसरी बॅंधाई अगस्त में पहली बॅंधाई से 50 से०मी० ऊपर तथा अगस्त के अन्त में एक पंक्ति के दो थान व दूसरी पंक्ति के एक थान से और इस क्रम को पलटते हुये त्रिकोणात्मक बॅंधाई करनी चाहिये।

सर्पिलाकार बॅंधाई

इस विधि में गन्ने के प्रत्येक थान के दो ओर सूखी व हरी पत्त्यिों को मिलाकर दो रस्सी बनाई जाती है, जिनके दिशाक्रम को उलटते हुये एक ही पंक्ति से आगे के सभी थान इस प्रकार बांध दिये जाते हैं जैसे किसी रस्सी को बुनावट में वरतल के मध्य पूरा थान फंसा हो। चूंकि इस बंधाई में एक पंक्ति का दूसरी पंक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसलिये खेत में हवा आसानी से आर-पार हो जाती है तथा पंक्ति के सभी थान एक दूसरे से बंध जाते हैं। फसल की अच्छी बढ तवार होने पर यह बॅंधाई आवश्यकतानुसार विभिन्न ऊचाइयों पर दो या तीन जगह की जा सकती है।

फसल की सिंचाई

उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में गन्ना फसल को 1500 से 1750 मि०ली० पानी की आवश्यकता होती है जिसका औसतन 50 प्रतिशत वर्षा से प्राप्त होता है, शेष 50 प्रतिशत सिंचाई से पूरा किया जाता है। प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में 4-5 तथा पशिचमी क्षेत्र में 6-7 सिंचाई (2 सिंचाई वर्षा उपरान्त) करना लाभप्रद पाया गया है। नमी की कमी की दशा में बुवाई के 20-3- दिन के बाद एक हल्की सिंचाई करने से अपेक्षाकृत अच्छा जमाव होता है। ग्रीष्म ऋतु में 15-20 दिनों के अन्तर पर सिंचाई करते रहना चाहियेैं। वर्षाकाल में गन्ने की बढ़तवार होती है। अतः 20 दिन तक वर्षा न होने पर एक सिंचाई करना उपयोगी पाया गया है। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल की सामान्य एवं समुचित सिंचाई के लिये लगभग 200000 गैलन (88.9 ह.मि.ली.) पानी की आवश्यकता होती है। खेत में सतह से 8.9 से०मी० ऊपर तक पानी होने से वह मात्रा पूरी हो जाती है।

सीमित सिंचाई साधनों की स्थिति में यदि एक सिंचाई सम्भव हो तो मई माह में, यदि दो सिंचाई सम्भव हो तो क्रमशः अप्रैल, मई व जून माह में करनी चाहिये, इससे सर्वाधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। सूखी पत्ती बिछाकर नमी को सुरक्षित रखना उपज के दृष्टिकोण से लाभप्रद पाया गया है।

उर्वरक का प्रयोग

गन्ना फसल के लिये आवश्यक पोषक तत्वों में  नेत्रजन का प्रभाव सर्वविदित है। पोटाश और फास्फोरस का प्रयोग मृदा के उपरान्त कमी पाये जाने पर ही किया जाना चाहिये। अच्छी उपज के लिये गन्ने में 150 से 180 कि०ग्रा०/हे. प्रयोग करना लाभप्रद पाया गया है।  नेत्रजन की कुल मात्रा का 1/3 भाग व कमी होने की दशा में 60-80 कि०ग्रा० फास्फोरस एवं 40 कि०ग्रा० पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के पूर्व कूडों में डालना चाहिये।  नेत्रजन के शेष 2/3 भाग को दो हिस्सों में बराबर-बराबर जून से पूर्व ब्यांतकाल में प्रयोग करना चाहिये।

मृदा की भौतिक दशा सुधारने, मृदा से हयूमस स्तर बढ़ाने व उसे संरक्षित रखने, मृदा में सूक्ष्म जीवाणु गतिविधियों के लिये आदर्श वातावरण बनाये रखने के साथ ही निरन्तर फसल लिये जाने, रिसाव व भूमि क्षरण के कारण मृदा में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से हरी खाद, एफ.वाइ.एम. कम्पोस्ट, सडी प्रेसमड आदि का प्रयोग किया जाना चाहिये। इस प्रकार जैविक खाद देने से गन्ना फसल के लिये आवश्यक पोषक तत्वों की अधिकांश मात्रा की पूर्ति की जा सकती है। मृदा में जैविक तत्वों की पूर्ति के लिये हरी खाद पूरक है। हरी खाद के लिये शीघ्र बढ ने वाली दलहनी फसलों जैसे सनई, ढैंचा, लोबिया आदि को चुनना चाहिये तथा खड़ी फसल के औसत बढ तवार के उपरान्त (45 से 60 दिन परद्ध खेत में पलटकर मिट्‌टी में पूरी तरह सड ने देना चाहिये। हरी खाद विशेषतः जब दलहनी फसलों के माध्यम से दी जाती है तो मृदा में यह जैविक तत्वों के साथ ही  नेत्रजन की वृद्धि भी करती है। मृदा में जैविक तत्वों की पूर्ति के लिये हरी खाद पूरक है। हरी खाद के लिये शीघ्र बढ ने वाली दलहनी फसलों जैसे सनई, ढैंचा, लोबिया आदि को चुनना चाहिये तथा खड़ी फसल के औसत बढतवार के उपरान्त (45 से 60 दिन परद्ध खेत में पलटकर मिट्‌टी में पूरी तरह सड ने देना चाहिये।

हरी खाद विशेषतः जब दलहनी फसलों के माध्यम से दी जाती है तो मृदा में यह जैविक तत्वों के साथ ही  नेत्रजन की वृद्धि भी करती है। दलहन की जड में बैक्टीरिया वातावरण से  नेत्रजन लेकर उसे पौधे के उपयोग में लाये जाने योग्य  नेत्रजन में परिवर्तित कर देते हैं। हरी खाद के रूप में उपयोग हेतु एक हेक्टयर क्षेत्रफल में उगाई गई फसल में 8 से 25 टन तक हरी खाद मिलती है जो मृदा में पलटने के उपरान्त लगभग 60 कि०ग्रा०  नेत्रजन/हे. दे देती है। हरी खाद से प्राप्त यह  नेत्रजन की मात्रा 10 टन एफ.वाई.एम. प्रति हेक्टयर देने पर प्राप्त होने वाली मात्रा के समकक्ष होती है। यदि भूमि में सूक्ष्म तत्वों जस्ता, लोहा, मैग्नीशियम, गन्धक आदि की कमी हो तो उनका प्रयोग भी संस्तुत मात्रा के अनुसार किया जा सकता है।

गन्ने के साथ अन्तः फसल

गन्ना के साथ अन्तः खेती के लिये उन्हीं फसलों का चुनाव करना चाहिये जिनमें तृद्धि प्रतिस्पर्धा न हो तथा जिनकी छाया से गन्ना फसल पर विपरीत प्रभाव न पड़े। फसलों के उचित जातीय चयन और उन्नत कृषि तकनीकी अपनाकर ही अन्तः खेती फसल प्रणाली से भरपूर लाभ लिया जा सकता है। कृषि निवेशों की उपलब्धता के अनुसार आलू, लाही, राई, गेहॅं, मटर (फली) मसूर, प्याज, लहसुन आदि शरदकालीन गन्ने के साथ तथा उर्द, मूंग, लोबिया (चारा) और भिण्डी आदि बसन्तकालीन गन्ने के साथ दो पंक्तियों के मध्य अन्तः फसल के रूप में बोई जा सकती है। शरदकालीन एकाकी गन्ने एवं क्रमागत दो फसलों जैसे-आलू-गन्ना, मटर-गन्ना, गेहूं-गन्ना और लाही गन्ना की अपेक्षा गन्ना+आलू,एक पंक्ति, गन्ना+मटर(फली) 3पंक्ति गन्ना+गेहूं (2-3पंक्ति) एवं गन्ना लाही (२पंक्ति) लेना आर्थिक दृष्टिकोण से अधिक लाभप्रद पाया गया है। शरदकालीन गन्ने के साथ शरदकालीन सब्जियों एवं मसालों की अन्तःखेती भी लाभप्रद पाई गई है। गन्ना+लहसुन अन्तः फसल प्रणाली में अन्तः फसल के अतिरिक्त गन्ना फसल की उपज एकाकी गन्ना की तुलना में लगभग 8-10 प्रतिशत अधिक प्राप्त होती है।

पेड प्रबन्ध

गन्ने की पेड फसल लेना आर्थिक दृष्टिकोण से काफी लाभदायक है क्योंकि बावग फसल की तुलना में इसमें खेत की तैयारी, बीज तथा बुवाई का खर्च बच जाता है। पेडी की उत्पादकता बावग के समकक्ष तक बढाई जा सकती है। यदि बावग की कटाई भूमि सतह से समय पर कर ली जाय, भरपूर खाद व पानी दिया जाय और रिक्त स्थानों की भराई कर ली जाय।

गन्ने की सफल पेड़ी के लिये आवश्यक कारक –

  1. पेड के लिये अच्छी बावग फसल होना।
  2. भूमि की सतह से बावग गन्ने की कटार्ई।
  3. नीचे की आंखों अथवा ठूंडों से अच्छा जमाव प्राप्त करने हेतु ठूंठों की छंटाई।
  4. रिक्त स्थानों का भराव व समय से सिंचाई।
  5. भरपूर खाद।
  6. बावग फसल की समय से कटाई।
  7. उचित समय फसल सुरक्षा उपाय।
  8. अच्छी पेड क्षमता वाली गन्ना जाति का चयन।

बावग फसल की कटाई एवं सूखी पत्ती का जलाना

उन्नतशील गन्ना जातीयों जैसे को०शा० 88230, 8436, 95255, 96268, 88296, 90269, 92263, 94257, 94270, 95222, 97264 को०से० 92423, 95422 व यू०पी० 39 के बावग गन्ने की मेडें गिराने के उपरन्त फरवरी, मार्च में भूमि की सतह से काटने पर (नवम्बर+दिसम्बर) शरदकालीन में काटी गई फसल की तुलनामे अच्छी पेडी होती है। यद्यपि अप्रैल-मई के बाद काटी गई फसल की पेडी अच्छी नहीं होती है फिर भी यह शरदकाल में काटी गई बावग की पेडी से अच्छी उपज देती है। पौधा गन्ना की कटाई भूमि की सतह से ही करनी चाहिये ताकि ठूंठों की अग्रभाग की कोई ऑंख ऊपर न रहने पाये। उपयुक्त समय से कटाई करने की दशा में पेडी के पहले से निकले बडे कल्लों को भी काट देना चाहिये जिससे पेडी की वृद्धि में समरूपता रहे। बावग गन्ने की देर से कटाई की स्थिति में पहले से निकले कल्लों को छोडना लाभकारी पाया गया है। कीट एवं रोगो से बचाव के लिये बावग की कटाई के तुरन्त बाद खेत में सूखी पत्ती को समरूप बिखेर कर जला देना चाहिये।

मेड़ गिराना, ठूंठों की छंटाई सिंचाई एवं खाद

सूखी पत्ती जलाने के बाद 24 घण्टे के अन्दर पानी लगा देना चाहिये तदोपरान्त मेंडे गिराना चाहिये। पेड के समरूप फुटाव के लिये भूमि की सतह से ठूंठों की छंटाई करना आवश्यक है। यह कार्य किस तेजधार वाले औजार से करना चाहिये ताकि ठूंठ उखड ने न पाये और अनावश्यक रूप से उनके टुकडे-टुकडे न हो जाये। खेत मे यदि उपयुक्त नमी हो तो बावग की कटाई के तुरन्त बाद मेडे गिराकर ठूंठों की छटाई कर देनी चाहिये जिससे स्वतंत्र एवं समरूप फुटाव हो सके। मेडों के किनारों को देशी हल से जोत देना चाहिये ताकि पुरानी जडें नष्ट हो जाये एवं जडे विकसित हो सके।

अच्छी पेड फसल लेने के लिये प्रारम्भ में  नेत्रजन की अधिक मात्रा देनी आवश्यक है। मेड गिराने समय कि०ग्रा०  नेत्रजन/हेक्टयेर मेडों के दोनो ओर देशी हल से बनाई गई नालियों में तथा शेष 90 कि०ग्रा०  नेत्रजन मई माह में देनी चाहिये। पंक्तियो के मध्य गहरी जुताई करने से मृदा की दशा भी अच्छी हो जाती है तथा पुरानी जड भी नष्ट हो जाती है।

सिंचाई

ग्रीष्म ऋतु में 15-20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिये। कम वर्षा अथवा खण्ड वर्षा वाले क्षेत्रों में मानसून काल में तथा मानसून के उपरान्त भी सिंचाई करते रहना चाहिये।

रिक्त स्थानों की भराई

पौधों की संख्या रखने के उद्देश्य से पालीबैग विधि तैयार पौधे अथवा पूर्व-अंकुरित टुकडों अथवा विकसित थानों से रिक्त स्थानों का भराव सिंचाई के समय करना चाहिये। रिक्त स्थानों वाली फसल निशिचत रूप से कम उपज देती है। यदि दो थानों के मध्य 45 से०मी० की दूरी हो तो उसे खाली समझकर अवश्य भर देना चाहिये।

कर्षण क्रियायें

खेत को खर-पतवार से मुक्त रखने एवं मृदा नमी संरक्षण के उद्देश्य से प्रत्येक सिंचाई के बाद गुड़ाई करना चाहिये। सूखी पत्ती बिछाकर खरपतवार नियंत्रण साथ ही नमी भी सुरक्षित की जा सकती है। फसल को गिरने से बचाने के लिये गन्ने के बढ वार अनुसार जुलाई, अगस्त में मिट्‌टी चढ़ना, प्रत्येक थान को दो ऊॅंचाईयों पर बांधन एवं अगस्त के अन्तिम सप्ताह में त्रिकोणात्मक बंधाई करना आवश्यक है।

कटाई

चूंकि पौधा फसल की तुलना में पेडी शीघ्र पक जाती है, अतः जहॉं तक सम्भव हो नवम्बर में ही मेडे गिराने के बाद पेडी की कटाई प्रारम्भ कर देनी चाहिये।

अतिशीतकाल में पेडी

शरदकालीन में काटी गई बावग फसल में कम फुटाव के कारण पेडी अच्छी नहीं होती। अतः जिन खेतों में पेडी रखना हो उसकी बावग फसल फरवरी से पहले नहीं काटनी चाहियें। यदि फरवरी से पहले काटनी पडे तो कटाई के उपरान्त 20 से०मी० मोटी सूखी पत्तियों की परत ठूंठों के ऊपर बिछा देनी चाहिये।

गुड़ उत्पादन हेतु गन्ने की उन्नतिशील जातियॉं

उत्तम किस्म का गुड प्राप्त करने हेतु गुड बनाने के प्रारम्भिक काल (अक्टूबर-नवम्बर) में को०शो० 88230 को०शो० 8336, को०शा० 96258, को०शा० 95268 तथा उसके उपरान्त गुड बनाने हेतु को०शा० 767, 8432, 95222, 90269, 92263, 94257, 94270, 97264 को०से० 92423, 95422 व यू०पी० 39 जातियों का चयन किया जाना चाहिये।

गुड बनाने में ध्यान योग्य बातें

  1. सामान्यतः 150 कि०ग्रा०/हे०  नेत्रजन से ऊपर दिये गये गन्ने से उत्तम किस्म का गुड नहीं बन पाता।
  2. पेड व शरदकाल में बोये गन्ने से उत्तम गुड बनता है।
  3. गिरे गन्ने, चूहों, सुअरों व गीदड से खाये हुये बीमारीयुक्त व की कीड प्रभावित गन्ने से उत्तम गुड नहीं बन पाता है ।
  4. रसशोधकों में देवला, भिन्डी, सेमल की छाल, फालसा की दाल या सुखालाई की छाल का क्रमशः 150, 200, 250, 255 व 200 ग्राम प्रति कुन्तल के हिसाब से प्रयोग व रासायनिक पदार्थों जैसे -सोडियम हाईड्रोसल्फाइड, सोडियम कार्बोनेटव सुपर फास्फेट, चने का पानी व सज्जी आदि क्रमशः 40-45 ग्राम, 10-15 ग्राम, 500 मि०ली० व 1.5 लीटर प्रति 4 कुन्तल रस के शोधन के लिये उपयुक्त होता है।
  5. फरवरी-मार्च में तैयार किये गुड को ही भण्डारित करना चाहिये।

गुड़ का अच्छा परता कैसे लें?

गुड का अच्छा (रिकवरी) पाने के लिये किसान एवं गुड उत्पादक निम्नलिखित बातों पर ध्यान दें –

  1. पेराई के पहले कोल्हू के सभी बेलनों की सफाई, खांचें (ग्रूव) गियर एवं बैरिंग सहीं कर लें।
  2. कोल्हू के रस निष्कसन क्षमता की जॉच कर लें। बैल चलित कोल्हू से लगभग 65 एवं पावल चालित कोल्हू से लगभग 70 प्रतिशत तक रस निकाला जा सकता है।
  3. यदि कोल्हू उत्पादक को संस्तुति उपलब्ध न हो तो अगले बैलनों के बीच 6 मि.मी. एवं पिछले बेलनो के बीच 1 मि.मी. की दूरी रखें।
  4. क्षमतानुसार गन्ने का संतुलित भरण (फीडिंग) करें। कोल्हू को अनावश्यक कसने एवं गन्ना कम लगाने से कोल्हू जल्द खराब होता है। कोल्हू के स्नेहन (लुब्रीकेशन) का ध्यान रखें।

स्रोत: गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार Source

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