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जलवायु

अदरक की खेती गर्म और आर्द्रता वाले स्थानों में की जाती है। मध्यम वर्षा बुवाई के समय अदरक की गाँठों (राइजोम) के जमाने के लिये आवश्यक होती है। इसके बाद थोड़ी ज्यादा वर्षा पौधों को वृद्धि के लिये तथा इसकी खुदाई के एक माह पूर्व सूखे मौसम की आवश्यकता होती हैं। अगेती बुवाई या रोपण अदरक की सफल खेती के लिये अति आवश्यक है।1500-1800 मि.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती अच्छी उपज के साथ की जा सकती है। परन्तु उचित जल निकास रहित स्थानों पर खेती को भारी नुकसान होता है। औसत तापमान 25 डिग्रीसेन्टीग्रेड, गर्मियों में 35 डिग्रीसेन्टीग्रेड तापमान वाले स्थानों पर इसकी खेती बागों में अन्तरवर्तीय फसल के रूप में की जा सकती हैं ।

भूमि

अदरक की खेती बलुई दोमट जिसमें अधिक मात्रा में जीवांश या कार्बनिक पदार्थ की मात्रा हो वो भूमि सबसे ज्यादा उपयुक्त रहती है। मृदा का पी़एच. मान 5.6 ये 6.5 अच्छे जल निकास वाली भूमि सबसे अच्छी अदरक की अधिक उपज के लिए रहती है। एक ही भूमि पर बार-बार फसल लेने से भूमि जनित रोग एवं कीटों में वृद्धि होती है। इसलिये फसल चक्र अपनाना चाहिए । उचित जल निकास ना होने से कन्दों का विकास अच्छे से नही होता ।

खेती की तैयारी

मार्च-अप्रैल में खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद खेत को खुला धूप लगने के लिये छोड़ देते हैं। मई के महीने में डिस्क हैरो या रोटावेटर से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बना लेते हैं। अनुशंसित मात्रा में गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट और नीम की खली का समान रूप से खेत में डालकर पुनः कल्टीवेटर या  देशी हल से 2-3 बार आड़ी-तिरछी जुताई करके पाटा चला कर खेत को समतल कर लेना चाहिये। सिचाई की सुविधा एवं बोने की विधि के अनुसार तैयार खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बाँट लेना चाहिये। अंतिम जुताई के समय उर्वरकों को अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करना चाहिये। शेष उर्वरकों को खड़ी फसल में देने के लिये बचा लेना चाहिये।

बीज (कंद) की मात्रा

अदरक के कन्दों का चयन बीज हेतु 6-8 माह की अवधि वाली फसल में पौधों को चिन्हित करके काट लेना चाहिये अच्छे प्रकन्द के 2.5-5 सेमी. लम्बे कन्द जिनका वजन 20-25 ग्राम तथा जिनमें कम-से-कम तीन गाँठें हों प्रवर्धन हेतु कर लेना चाहिये । बीज उपचार मैंकोजेव फफूँदी से करने के बाद ही प्रर्वधन हेतु उपयोग करना चाहिये।

बुआई का समय

अदरक की बुवाई दक्षिण भारत में मानसून फसल के रूप में अप्रैल-मई में की जाती जो दिसम्बर में परिपक्व होती है। जबकि मध्य एवं उत्तर भारत में अदरक एक शुष्क क्षेत्र फसल है। जिसके लिए अप्रैल से जून माह तक बुवाई योग्य समय है। सबसे उपयुक्त समय 15 मई से 30 मई है। 15 जून के बाद बुवाई करने पर कंद सड़ने लगते हैं और अंकुरण पर प्रभाव बुरा पड़ता है। केरल में अप्रैल के प्रथम सप्ताह पर बुवाई करने पर उपज 200% तक अधिक पाई जाती है। वहीं सिंचाई क्षेत्रों में बुवाई की सबसे अधिक उपज फरवरी के मध्य बोने से प्राप्त हुई तथा कन्दों के जमाने में 80% की वृद्धि ऑकी गयी। पहाड़ी क्षेत्रों में 15 मार्च के आस-पास बुवाई की जाने वाली अदरक में सबसे अच्छा उत्पादन प्राप्त हुआ।

बीज(कंद) की मात्रा

अदरक  के  कन्दों  का  चयन  बीज  हेतु  6-8  माह  की अवधि वाली फसल में पौधों को चिन्हित करके काट लेना चाहिये अच्छे प्रकन्द के 2.5-5 सेमी. लम्बे कन्द जिनका वनज 20-25 गर्म तथा जिनमें कम से कम तीन गाँठें हो प्रवर्धन हेतु कर लेना चाहिये। बीज उपचार मैंकोजेव फफूँदी से करने के बाद ही प्रर्वधन हेतु उपयोग करना चाहिये।

अदरक 20-25 कुंटल प्रकन्द प्रति हे. बीज दर उपयुक्त रहता हैं। तथा पौधों की संख्या 140000 प्रति हे. पर्याप्त मानी जाती हैं। मैदानी भागों में 15-18 कु.हे. बीजों की मात्रा का चुनाव किया जा सकता है। क्योंकि अदरक की लागत का 40-46% भाग बीज में लग जाता इसलिये बीज की मात्रा का चुनाव,प्रजाति, क्षेत्र एवं प्रकन्दों के आकार के अनुसार ही करना चाहिये ।

बोने की विधि एवं बीज व क्यारी अंतराल

प्रकन्दों को 40 सेमी. के अन्तराल पर बोना चाहिये। मेड़ या कूड़ विधि से बुवाई करनी चाहिये ।प्रकन्दों को 5 सेमी़ की गहराई पर बोना चाहिये। बाद में अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या मिट्‌टी से ढक देना चाहिये । यदि रोपण करना है तो कतार से   कतार 30 सेमी. और पौध से पौध 20 सेमी.पर करें।अदरक की रोपाई 15˟15 20˟40 या 25˟30 सेमी. पर भी कर सकते हैं । भूमि की दशा या जल वायु के प्रकार के अनुसार समतल कच्ची क्यारी, मेड-नाली आदि विधि से  अदरक की बुवाई या रोपण किया जाता है ।

समतल विधि

हल्की एवं ढालू भूमि में समतल विधि द्वारा रोपण या बुवाई की जाती हैं । खेती में जल निकास के लिये कुदाली या देशी हल से 5-6 सेमी. गहरी नाली बनाई जाती है जो जल के निकास में सहायक होती है। इन नालियों में कन्दों को 15-20 सेमी. की दूरी अनुसार रोपण किया जाता है। तथा रोपण के दो माह बाद पौधों पर मिट्टी चढ़ाकर मेडनाली विधि बनाना लाभदायक रहता है।

ऊंची क्यारी विधि

इस विधि में 1˟3 मी.आकार की क्यारीयों कों जमीन से 20 सेमी.ऊंची बनाकर प्रत्येक क्यारी में 50 सेमी.चौड़ी नाली जल निकास के लिये बनाई जाती है। बरसात के बाद यही नाली सिचाई के कसम में असती है। इन उथली क्यारियों में 30˟20 सेमी.की दूरी पर 5-6 सेमी.गहराई पर कन्दों की बुवाई करते हैं।भारी भूमि के लिये यह विधि अच्छी है।

मेड़ नाली विधि

इस विधि का प्रयोग सभी प्रकार की भूमियों में किया जा सकता है। तैयार खेत में 60 या 40 सेमी.की दूरी पर मेड़ नाली का निर्माण हल या फावड़े से काट के किया जा सकता है। बीज की गहराई 5-6 सेमी. रखी जाती है।

रोपण हेतु नर्सरी तैयार करना

यदि पानी की उपलब्धता नही या कम है तो अदरक की नर्सरी तैयार करते हैं। पौधशाला में  एक  माह अंकुरण के लिये रखा जाता है। अदरक की नर्सरी तैयार करने हेतु उपस्थित बीजों या कन्दों को गोबर की सड़ी खाद और रेत (50:50) के मिश्रण से तैयार बीज भौया पर फैलाकर उसी मिश्रण से ढंक देना चाहिए तथा सुबह-शाम पानी का छिड़काव करते रहना चाहिये। कन्दों के अंकुरित होने एवं  जड़ों से जमाव शुरु होने पर उसे मुख्य खेत में मानसून की बारिश के साथ रोपण कर  देना चाहिये ।

प्रकन्द बीजों को खेत में बुवाई, रोपण एवं भण्डारण के समय उपचारित करना आवश्यक है। बीज उपचारित करने के लिये (मैंकोजेब+मैटालैक्जिल) या कार्बोन्डाजिम की 3 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर के पानी के हिसाब से घोल बनाकर कन्दों को 30 मिनट तक डुबो कर रखना चाहिये । साथ ही स्ट्रप्टोसाइकिलन/ प्लान्टो माइसिन भी 5 ग्राम की मात्रा 20 लीटर पानी के हिसाब से मिला लेते हैं जिससे जीवाणु जनित रोगों की रोकथाम की जा सके ।

पानी की मात्रा घोल में उपचारित करते समय कम होने पर उसी अनुपात में मिलाते जाय और फिर से दवा की मात्रा भी । चार बार के उपचार करने के बाद फिर से नया घोल बनायें । उपचारित करने के बाद बीज कों थोड़ी देर उपरांत बोनी करें ।

छाया का प्रभाव

अदरक को हल्की छाया देने से खुला में बोई गयी अदरक से 25 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होती है। तथा कन्दों की गुणवत्ता में भी उचित वृद्धि पायी गयी है ।

फसल प्रणाली

अदरक की फसल को रोग एवं कीटों में कमी लाने एवं मृदा के पोषक तत्वो के बीच सन्तुलन रखने हेतु। अदरक को सिंचित भूमि में पान,हल्दी,प्याज, लहसुन, मिर्च अन्य सब्जियों, गन्ना, मक्का और  मूंगफली के साथ फसल को उगाया जा सकता है। वर्षा अधिक सिंचित वातावरण में 3-4 साल में एक बार आलू, रतालू, मिर्च, धनियॉ के साथ या अकेले ही फसल चक्र में आ सकती हैं । अदरक की फसल को पुराने बागों में अन्तरवर्तीय फसल के रूप में उगा सकते हैं ।

मक्का या उर्द के साथ अन्तरावर्ती फसल लेने में मक्का 5-6 किग्रा / एकड़+उर्द 10-15 किग्रा. / एकड़ बीज की आवश्यकता होती है। मक्का और उर्द अदरक की फसल को छाया प्रदान करती हैं । तथा मक्का 6-7 कु./एकड़ और उर्द 2 कु./एकड़।

पलवार

अदरक की फसल में पलवार बिछाना बहुत ही लाभदायक होता है। रोपण के समय इससे भूमि का तापक्रम एवं नमी का सामंजस्य बना रहता है। जिससे अंकुरण अच्छा होता है । खरपतवार भी नही निकलते और वर्षा होने पर भूमि का क्षरण भी नही होने पाता है। रोपण के तुरन्त बाद हरी पत्तियाँ या लम्बी घास पलवार के लिये ढाक,आम,केला या गन्ने के ट्रेस का भी उपयोग किया जा सकता है ।10-12 टन या सूखी पत्तियाँ 5-6 टन /हे. बिछाना चाहिये । दुबारा इसकी आधी मात्रा को रोपण के 40 दिन और 90 दिन के बाद बिछाते हैं, पलवार बिछाने के लिए उपलब्धतानुसार गोबर की सड़ी खाद एवं पत्तियाँ, धान का पूरा प्रयोग किया जा सकता है । काली पॉलीथीन को भी खेत में बिछा कर पलवार का काम लिया जा सकता हैं। निदाई, गुड़ाई और मिट्टी चढाने का भी उपज पर अच्छा असर पढ़ता है। ये सारे कार्य एक साथ करने चाहिए ।

निदाई,गुड़ाई तथा मिट्टी चढ़ाना

पलवार के कारण खेत में खरपतवार नही उगते अगर उगे हों तो उन्हें निकाल देना चाहिये, दो बार निदाई 4-5 माह बाद करनी चाहिये। साथ ही मिट्टी भी चढ़ाना चाहिए । जब पौधे 20-25 सेमी़ ऊंचे हो जाएं तो उनकी जड़ों पर मिट्टी चढ़ाना आवश्यक होता है। इससे मिट्टी भुरभुरी हो जाती है। तथा प्रकंद का आकार बड़ा होता है, एवं भूमि में वायु आगमन अच्छा होता हैं। अदरक के कंद बनने लगते हैं तो जड़ों के पास कुछ कल्ले निकलते हैं। इन्हे खुरपी से काट देना चाहिऐ, ऐसा करने से कंद बड़े आकार के हो पाते हैं ।

स्त्रोत: मध्यप्रदेश कृषि,किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग,मध्यप्रदेश

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