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करेला

उन्नत  किस्में

ग्रीन लांग, फैजाबाद स्माल, जोनपुरी, झलारी, सुपर कटाई, सफ़ेद लांग, ऑल सीजन, हिरकारी, भाग्य सुरूचि , मेघा – एफ 1, वरून – 1 पूनम, तीजारावी, अमन नं.- 24, नन्हा क्र. – 13 ।

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जलवायु

करेले के उत्पादन के लिए छत्तीसगढ़ की जलवायु जो कि गर्म एवं आर्द्र है, अति उपयुक्त है। करेले कि बढ़वार के लिए न्यूनतम तापक्रम 20 डिग्री सेंटीग्रेड तथा अधिकतम 35  – 40 डिग्री सेंटीग्रेड होना चाहिए।

बीज की मात्रा व नर्सरी

खेत में बनाये हुए हर थाल में चारों तरफ 4 – 5 बीज 2 – 3 से. मी. गहराई पर बो देना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु की फसल हेतु बीज को बोआई से पूर्व 12 – 18 घंटे तक पानी में रखते हैं। पौलिथिन बैग में एक बीज/प्रति बैग ही बोते है। बीज का अंकुरण न होने पर उसी बैग में दूसरा बीज पुन बोआई कर देना चाहिए। इन फसलों में कतार से कतार की दूरी 1.5 मीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 60 से 120 से. मी. रखना चाहिए।

करेला

बीज दर (कि. ग्रा.)

कतार से कतार (मीटर)

पौधे से पौधे की दूरी (मीटर)

नाइट्रोजन (कि.ग्रा.)

स्फूर (कि. ग्रा.)

पोटाश (कि. ग्रा.)

उपज क्विं/हेक्टे.

6.0-7.0

1.0 -2.0

0.5-.06

70

50

50

100-150

क्षेत्र की तैयारी

खेत में करेले की फसल लगाने के लिए सर्वप्रथम पौधों की कतार से कतार एवं पौधे की दूरी का ज्ञान होना आवश्यक है, जो कि तालिका में दिया हुआ है। कतार एवं पौधों के बीज की दूरी के हिसाब से उचित दूरी पर गोबर खाद 10 – 12 किलोग्राम डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर थाला बनाना चाहिए। हर एक थाले में बोवाई से पूर्व 2-3 ग्राम फ्यूराडॉन या फोरेट दानेदार दवा बिखेर कर अच्छी तरह से मिला देना चाहिए।

रोपाई की विधि

बीजों को नालियों के दोनों तरफ बुआई करते हैं। नालियों की सिंचाई करके मेड़ों पर पानी की सतह के ऊपर 2-3 बीज एक स्थान पर इस प्रकार लगाये जाते हैं कि बीजों को नमी कैपिलटी मुखमेंट से प्राप्त हो। अंकुर निकल आने पर आवश्यकतानुसार छंटाई कर दी जाती है। बीज बोने से 24 घंटे पहले पानी में भिगोकर रखें, जिससे अंकुरण में सुविधा होती है।

खाद एवं उर्वरक

उर्वरक देते समय ध्यान रखें की नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा स्फूर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोवाई के समय देना चाहिए। शेष नाइट्रोजन की आधी मात्रा टाप ड्रेसिंग के रूप में बोवाई के 30-40 दिन बाद देना चाहिए। फूल आने के समय इथरेल 250 पी. पी. एम. सांद्रता का उपयोग करने से मादा फूलों की संख्या अपेक्षाकृत बढ़ जाती है, और परिणामस्वरूप उपज में भी वृद्धि होती है। 250 पी. पी. एम. का घोल बनाने हेतु (0.5 मी. ली.) इथरेल प्रति लिटर पानी में घोलना चाहिए करेले की फसलों को सहारा  देना अत्यंत आवश्यक है।

सिंचाई

फसल की सिंचाई वर्ष आधारित है। साधारणत: प्रति 8-10 दिनों बाद सिंचाई की जाती है।

निंदाई गुड़ाई

प्राथमिक अवस्था में निंदाई – गुड़ाई करके खेत को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। वर्ष ऋतु में इस फसल को डंडों या मचान पर चढ़ाना चाहिए। करेले की फसल ड्रीप इरिगेशन पर भी ले सकते है।

फल तुड़ाई

सब्जी के लिए फलों को साधारणत: उस समय तोड़ा जाता है, जब बीज कच्चे हों। यह अवस्था फल के आकार एवं रंग से मालूम की जा सकती है। जब बीज पकने की अवस्था आती हैं, तो फल पीले – पीले होकर रंग बदल लेते हैं।

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

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