//जलाशय में पेन एवं केज कल्चर

जलाशय में पेन एवं केज कल्चर

भूमिका

पेन व् पिंजरा दोनों ही ऐसे घेरे हैं जिनमें जीवजातों को एक निर्दिष्ट स्थान पर प्रतिबंधित किया जा सके पर जल प्रवेश व निकासी में कोई अवरोध न हो । दोनों प्रकार की संरचनाओं में कुछ विशिष्ट भिन्नताएं हैं । पिंजरा एक ऐसी संरचना है जो चारों ओर से घिरा हुआ होता है, जबकि पेन संरचना में निचली सतह जल संसाधन की सतह की ओर खुली होती है । पिछले कुछ वर्षों में पिंजरा पालन विधि पूरे विश्व में प्रचलित हो रही है । पिंजरों को सामान्यत: निचली सतह से या फिर बाँध कर स्थापित किया जाता है । पेन पालन विधि जापान देश में शताब्दी की दूसरी दशक में विकसित की गई । इसके बाद इस विधि में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुए केवल बांस के पट्टों से बने मेश के स्थान पर नायलान या पोलीथिन मेष का उपयोग होने लगा । पेन की तुलना में पिंजरों को अधिक अपनाया जाता है क्योंकि ये काफी छोटे एवं उपयोग करने में आसान होते हैं । पिंजरों का उपयोग न केवल बड़ी मछलियों के उत्पादन के लिए किया जा सकता है बल्कि बीज उत्पादन एवं प्रजनन के लिए भी किया जा सकता है । पेन पालन प्रणाली अधिकतर स्थिर जन निकायों में ही अपनायी जाती है जब कि पिंजरों को नादिय प्रवाह एवं झरनों में भी लगाया जाता है ।

पेन व पिंजरा पालन प्रणाली का वर्गीकरण

पेन व् पिंजरा पालन प्रणाली मोटे तौर पर तीन प्रकार की होती है जैसे – विस्तृत पालन, अर्थ-गहन पालन एवं गहन पालन । यह वर्गीकरण पूरक आहार पर निर्भर है । विस्तृत पालन प्रणाली में मछलियों को कोई पूरक आहार नहीं दिया जाता है । यहाँ मछलियाँ पूरी तरह से घेरे में उपलब्ध प्राकृतिक आहार पर ही निर्भर रहती है । अर्ध-गहन प्रणाली में प्राकृतिक आहार के साथ स्थानीय रूप से उपलब्ध पौधों या कृषि सह-उत्पादों से बनी कम प्रोटीनवाला (>10%) पूरक आहार दिया जाता है । गहन पालन प्रणाली में मछलियों को 20% से अधिक प्रोटीनवाला पूरक आहार दिया जाता है । विस्तृत एवं अर्थ-गहन पालन प्रणालियाँ प्लवकभोजी, अपर्द्दभोजी या नितल जीवों को खानेवाली प्रजातियों के लिय ही उपयुक्त है । आहार में अधिक प्रोटीन मान करनेवाली प्रजातियों के लिए ही उपयुक्त हैं । आहार में अधिक प्रोटीन मांग करनेवाली प्रजातियों का पालन गहन पालन प्रणाली के अंतर्गत किया जाना चाहिए । पेन के घेरों में सामान्यत: गहन पालन प्रणाली नहीं अपनायी जाती है चूँकि इस प्रणाली में मछलियों की पहुँच नितल जीवों एवं अपरदद पदार्थों तक होती है । इसके अलावा उच्च मूल्यवाली प्रजातियों के उत्पादन में ही गहन पालन प्रणाली को अपनाया जाता है क्योंकि आहार पर कुल परिचालन लागत का 40-60% खर्च होता है ।

पेन व पिंजरा पालन प्रणाली से लाभ

यधपि प्रारंभ में पेन व पिंजरों के निर्माण में अधिक लागत आती है परन्तु इनका परिचालन लागत कम होता है । पेन व पिंजरा पालन प्रणाली से निम्नलिखित लाभ होते हैं –

  1. भूमि की आवश्यकता नहीं होती ।
  2. जल संसाधनों में तेजी ।
  3. मत्स्य उत्पादन में तेजी ।
  4. विकास हेतु पूरक आहार का उचित उपयोग ।
  5. परभक्षी एवं स्पर्धा करनेवाली प्रजातियों पर पूर्ण नियंत्रण ।
  6. नित्य किए जानेवाले पर्यवेक्षण से बेहतर प्रबंधन एवं मत्स्य रोग व् अन्य समस्याओं की तुरंत पहचान ।
  7. मछलियों को अन्य कार्यों के लिए छूने या पकड़ने की आवश्यकता न होने के कारण मृत्यु दर में कमी ।
  8. उपज प्राप्ति सरल एवं इच्छानुसार ।

कहा जाता है कि प्लवकभोजी प्रजातियों के पालन एवं उपज प्राप्ति से सुपोषि जल स्वच्छ हो जाता है ।

पेन व पिंजरा पालन प्रणाली से हानि

घेरों की स्थापना से पर्यावरण पर कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं । पिंजरों में पूरक आहार उर्वरक आदि के उपयोग से मत्स्य पालन करने से जल निकाय में सुपोषण में वृद्धि हो जाती है । जब जल निकाय की धारण क्षमता की परवाह किये बिना बड़ी संख्या में पेन एवं पिंजरों को स्थापित कर दिया जाता है तो जल में घुलित आक्सीजन कम हो जाती है फलस्वरूप मछलियों की मृत्यु होने की सम्भावना बढ़ जाती है । इस प्रणाली से अन्य हानियाँ निम्नलिखित हैं ।

  1. खराब मौसम का तुरंत असर ।
  2. पिंजरों में जल की आवा-जाही पर्याप्त नहीं होती ।
  3. दुर्गन्ध तेजी से फैलता है, अत: नित्य सफाई की आवश्यकता ।
  4. पूरी तरह कृत्रिम आहार पर निर्भरता एवं पिंजरों व् पेन के दीवारों से आहार का निकल जाना ।
  5. बाहर से छोटी मछलियों घेरों में घुसकर भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा एवं बीमारियां फैला सकती है ।
  6. मछलियों की चोरी आसानी से हो सकती है ।
  7. मजदूरी की चोरी आसानी से हो सकती है ।
  8. जल निकाय में अन्य मछलियों के प्रजनन स्थल नष्ट हो जाते हैं ।

यह आम धारणा होती है की घेरों की स्थापना से नौका संचालन में अवरोध उत्पन्न हो जाते हैं । उपयुक्त क्षेत्रों में घेरों के निर्माण हेतु स्थान के चुनाव के दौरान इस समस्या पर ध्यान दिया जा सकता है ।

स्त्रोत: मत्स्य निदेशालय, राँची, झारखण्ड सरकार

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