//झारखण्ड में वन वृद्धि

झारखण्ड में वन वृद्धि

वन वृद्धि-पौधशाला तकनीक

  • स्थल चयन

नई पौधशाला के लिए स्थल चयन बहुत सावधानी से करें । आपको काफी मात्रा में हर समय जल उपलब्ध रहना चाहिए। यह सुनिश्चित करें कि गर्मियों में भी काफी मात्रा में जल उपलब्ध रहें, क्योंकि उस समय पौधशाला को अधिक जल के जरूरत पड़ती है। पौधशाला का निर्माण उस स्थल के निकट बहुत अच्छा होता है, जहाँ वन लगाना हो। यदि पौधशाला वन क्षेत्र के निकट नहीं हो तो एक अच्छी सड़क के किनारे बनाना चाहिए। तब आप नवजात पौधों का परिवहन आसानी से वन क्षेत्र तक कर सकते है। पौधशाला वैसी जगह बनाना अच्छा होता है, जहाँ से गाँव वाले देख सकें, उदाहरण के लिए हाट के निकट या सड़क के किनारे। जब लोग पौधशाला देखेंगे तो वे पौधा लगाने के लिए उत्सुक होंगे। इस तरह पौधशाला प्रसार कार्य में सहायता करेंगी।

पौधशाला के लिए आपको अधिक मिटटी की जरूरत होगी, विशेषकर जब पौधा उगाने का काम आप किसी पात्र में करते हैं, प्रत्येक वर्ष अत्यधिक मिटटी जरूरत पड़ेगी। इससे यह पता चलता है कि अच्छी मिटटी वाले स्थल में या सड़क किनारे पौधशाला बनाने का विचार क्यों उत्तम माना जाता है। अपनी पौधशाला के लिए सर्वथा अच्छी मिटटी का प्रयोग करें। यदि मिटटी चिकनी हो तो उसमें रेत मिला दें। ऐसी स्थिति में रेत की उपलब्धता वाले स्थल पर पौधशाला बनाये, जैसे नदी के किनारे। मिटटी की गहराई मापने के लिए मिटटी मापक बरमा बहुत उपयोगी होता है।

यदि संभव हो तो अपनी पौधशाला साधारण ढलान (करीब 5 डिग्री) पर बनाये। ऐसा इसलिए कि साधारण ढलान पर जल का निकास सुगम होता है और क्यारी बनाने में भी आसानी होती है। साधारण ढलान पर काम करने में चौरस जमीन की तरह आसानी होती है। समतल जमीन पर अधिक वर्षा के समय समस्या उत्पन्न हो जाती है। फिर भी यदि चौरस जमीन पर पौधशाला बनाना हो तो पौधशाला के लंबे हिस्से में पूरब-पश्चिम की ओर क्यारियाँ बनाएँ। यह निर्णय करें कि प्रति हेक्टेयर कितने पौधे होंगे। उनकी संख्या पौधों के आपसी अंतर के अनुसार निम्नवत बदल जायेगी।

पौधों का आपसी अनत (मीटर)

प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या

1.0 x 1.0

10,000

1.5 x 1.5

4,444

2.0 x 2.0

2,500

2.5 x 2.5

1,600

3.0 x 3.0

1,111

5.0 x 5.0

400

  • स्थल तैयार करना

यदि संभव हो तो स्थल को साफ़ कर जाड़े में उसमें आग लगा दें, फिर उसे जोत लें। सभी तरह के ढूठो, जड़ों घासों की गहरी जड़ों और पत्थरों को हटा दें। इस काम को बरसात के अंत में जब मिटटी मुलायम रहती है, कर लेने का प्रयास करें। चबूतरा आदि जो बनाने की जरूरत महसूस करें, उसे उसी समय ठीक से बना लें। अब स्थल को एक मौसम के लिए परती छोड़ दें। जितनी जल्दी संभव हो, नाली बना लें इस तरह आप नवनिर्मित पौधशाला को अचानक भारी वर्षा से होने वाले नुकसान से बचा लेंगे। पगडंडी के दोनों ओर नाली बनाये और उन्हें मुख्य नाली से जोड़ लें। यह सुनिश्चित करें कि नाली थोड़ी ढालू हो। सीढ़ीनुमा नाली बनाना बहुत अच्छा रहेगा। इससे मिटटी कम क्षरित होती है।

बीज की क्यारियाँ और पॉलीबैग की क्यारियाँ

आप, लकड़ी, ईट, पत्थर, बाँस या सादा टार से क्यारियाँ बना सकते है। उसी सामग्री का उपयोग करें, जो स्थानीय तौर पर उपलब्ध हो। 1.2 मीटर या कम चौड़ी क्यारियाँ बनाये। यदि 1.2 मीटर से अधिक चौड़ी क्यारियाँ बनायेंगे तो बीच के पौधों को सींचने एवं निकाई में कठिनाई होगी।

वृक्ष की बहुत सी प्रजातियों को बचाने के लिए छाजन बनाना जरूरी है। चौड़ी पत्तियों वाली प्रजातियों के लिए, विशेषकर पाला-तुषार से बचाने हेतु छाया की जरूरत पड़ती है। आप पुआल से छाजन बना सकते है। धूप और पाला से बचाने के लिए पुआल पूर्ण सक्षम है। धान के पुआल की अपेक्षा गेहूँ के पुआल का छाजन अधिक अच्छा होता है।

मवेशी के कारण किसी पौधशाला को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए घेरना बहुत जरूरी है। जहाँ तक संभव हो, स्थानीय सामग्री का उपयोग करें। झाड़ी और बांस का घेरा काफी है, विशेषकर यदि आप बाड़ भी लगा रहे हो। यदि आपको पत्थर मिल सके तो पत्थर की दीवार बहुत अच्छी होती हैं, क्योंकि यह मजबूत होती है और अधिक दिनों तक चलेगी। यदि आप कंटीली तार उपयोग में लाये तो कम से कम इसका सात घेरा बनाएँ, जो स्तंभ में छेद कर लगाया गया हो।

  • बीज की गुणवत्ता है जरूरी

अच्छे बीज से अच्छे पौधे उत्पन्न होते हैं। अच्छा बीज सीधा और बलवान पौधा उत्पन्न करेगा। टेढ़ा या बौना वृक्ष के बीज से उसी तरह के वृक्षों का जंगल तैयार होगा। अच्छा और स्वस्थ दिखने वाले वृक्षों से ही बीज संग्रह करें।

यदि आपको बीज खरीदना हो तो एक विश्वसनीय व्यापारी से खरीदें। केवल प्रमाणित बीज ही खरीदें। आपको कितने बीज की आवश्यकता होगी, इसकी गणना के लिए यहाँ एक सूत्र दिया जा रहा है।

बीज की मात्रा किलोग्राम में = 125 x स.क्षे./श.भा. +अ

स. : प्रति हेक्टेयर लगाये जाने वाले पौधों की संख्या

क्षे. : वनरोपण का क्षेत्रफल

श. : पौधा अंकुरण का प्रतिशत

भा. : प्रति किलोग्राम बीजों की संख्या (बीज का भार)

अ. : खराब बीज के मामले में अतिरिक्त मात्रा।

हमेशा स्मरण रखें कि कुछ बीज नहीं जम पायेंगे, कुछ असफल हो जायेंगे, कुछ भण्डारण में नष्ट हो जायेंगे। इन सभी स्थितियों के लिए कुछ अतिरिक्त बीज रखें।

  • बीजों को छांटना और उपचारित करना

सबसे साधारण तरीका है फल को फटने तक धूप में सुखाना। उसके बाद रगड़ या पीट कर फल से बीज को अलग करें। गूदेदार फल से गूदा निकाल लें। बीज को छाया में सुखाये। सूखे बीज से फल का टुकड़ा या भूसा पूरी तरह साफ़ कर लें। कोई खोखला बीज हो तो उसे हटा दें। बीजों को छांटने का दूसरा तरीका है जल का प्रयोग करना। फल को जल में ढंक दें। कचरा और खाली बीज तैरने लगेंगे। अच्छे बीजों को छांटकर अच्छी तरह सूखा लें।

  • बीज भण्डारण

कुछ बीजों को भंडारित करने की जरूरत पड़ेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि सागवान, महोगनी और दाल वाले अधिकतर बीज तभी जमते हैं, जब उन्हें भंडारित किया जाता है जिसे निष्क्रिय काल कहते है। कुछ वर्ष अच्छे बीज नहीं भी हो तो ऐसे वर्ष आप वहीं बीज बोयेंगे, जिसे आपने दूसरे वर्षो में संग्रहित और भंडारित किया हो। बीज सूखाने का सबसे अच्छा तरीका है उसे छिछली ट्रे में धूप में रखें तथा बीज को कभी-कभी चलाते रहें।

जब बीज भण्डारण के लिए तैयार हो जाए तो उसे पात्र में रख लें। यदि आपके पास कम मात्रा में बीज हो तो दाबनेवाले ढक्कनदार बोतल या प्लास्टिक बैंग में रखे। यदि आपके पास अधिक मात्रा में बीज जो हो उसे टीन या बोरें में रखे। बीज को ऐसे पात्र में रखना, जिसमें हवा हो, सबसे अच्छा होता है। यदि आवश्यक हो तो बीज को कीटनाशक और फफूंदीनाशक दवाओं से उपचारित भी कर दें।

  • बीज की क्यारियाँ तैयार करना

अच्छी क्यारियाँ बीज के अंकुरण और अच्छे पौधों के उत्पादन में सहायक होगी। या सुनिश्चित करें कि क्यारियों की मिटटी मुलायम हो। यदि आवश्यक हो तो एक हिस्सा मिटटी में एक हिस्सा रेत मिला दें। यह सम्मिश्रण अच्छी क्यारियाँ बनाने में सहायक होगा। इससे अंकुरण के समय फूटने में भी सहायता मिलेगी। जब आप पौधा को उठाकर दूसरी जगह ले जाएंगे तो यह आपसी से भुरभुरा जाएगी। जिससे आपके पौधों के जड़ों को नुकसान नहीं पहुंचेगा।

  • बीज रोपण

बीज बोने का तरीका और समय उसकी प्रजाति पर निर्भर करता है। सभी मामलों में बीज समान गहराई में बोयें। कभी घना नहीं बोयें। यदि आप बीज के साथ उसकी दुगनी मात्रा में रेत मिला दें तो घने बीज-रोपण से बच जायेंगे। बीज एवं रेत को अच्छी तरह मिला लें। मिश्रण को क्यारियों की सतह पर सावधानीपूर्वक छितरा दें। बीज को रेत या महीन मिटटी से उसके आकार से दुगनी ऊँचाई तक ढंक दें।  बहुत छोटे बीजों, जैसे युक्लिप्टस, को बहुत कम ढंका जाता है। तब क्यारी को फिर धीरे से दबा दें इससे यह निश्चित हो जायेगा कि जब आप सिंचाई करेंगे तो बीज इधर-उधर नहीं होगा।

बड़े आकार के बीज जैसे (सागवान) एक-एक कर पंक्ति में बोयें। यह पंक्ति क्यारी की चौड़ाई में बनाएँ। पंक्ति में बीज बोने के लिए ड्रिलिंग यंत्र का प्रयोग करे। इसके लिए क्यारी की चौड़ाई का एक तख्ता लें। बीज के लिए तैयार क्यारी के ऊपर रखकर उसे दबाएँ। प्रजाति के अनुसार एक निश्चित बराबर दूरी (सागवान के लिए 10-15 सें.मी.) पर छेद कर बीज बो दें।

स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखंड सरकार

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