//नारियल की खेती

नारियल की खेती

भूमिका

नारियल पेड़ (कोकोस न्यूसीफेरा लिन) दुनिया का सर्वाधिक उपयोगी पेड़ है। इसका प्रत्येक हिस्सा किसी न किसी रूप में मानव का लिए उपयोगी है। अत: इसे प्यार से कल्पवृक्ष यानी स्वर्ग का वृक्ष कहा गया है। नारियल का गरी सुखाकर प्राप्त किया जाने वाला खोपड़ा वनस्पतिक तेल का सर्वोत्तम स्रोत है जिसमें 65 से 70 प्रतिशत तेल निहित है।

जलवायु और मृदा

नारियल पेड़ विभीन प्रकार की जलवायु एवं मृदा परिस्थितियों में बढ़ते पाया जाता है। यह निश्चय ही एक उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का पौधा है जो अधिकांशत: 20 डिग्री उत्तर 20 डिग्री दक्षिण अक्षान्तर के बीच बढ़ता है। तथापि प्रति वर्ष 2000 मि. मी. की वर्षा अच्छी तरह मिलें तो यह नारियल की बढ़वार एवं अधिकतम उत्पादन के लिए अनुकूल है।

नारियल दोमट,मखराली,तटीय रेत,जलोढ़, मटियारी जैसे विभीन्न प्रकार के मृदाओं में और कच्छारी निम्न भूमि के मृदा में उगाया जाता है। उचित जलनिकासी व्यवस्था, अच्छी जलधारण क्षमता, 3 मीटर के भीतर जलाशय की उपलब्धता और सतह  से 2 मीटर के भीतर चट्टान या कोई ठोस वस्तु एवं न होना आदि ताड़ो के बेहतर बढ़वार और निष्पादन हेतु मृदा अनुकूल परिस्थितियाँ हैं।

विविध किस्में

नारियल के मुख्यत: दो किस्में हैं, लंबा और बौना।

लंबी प्रजातियों में व्यापक तौर पर पश्चिम तटीय और तटीय लंबा उगाए जाते हैं। बौनी प्रजातियाँ आकार में कम होता है और इसकी आयु भी लंबी प्रजातियों की अपेक्षा कम होता है।

लंबा x बौना (टी x डी) और बौना x लंबा

(डी. X टी) आदि दो प्रमुख संकर किस्में हैं।

केरल कृषि विश्वविद्यालय तथा तमिलनाडू कृषि विश्वविद्यालय तथा तमिलनाडू कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित विभीन्न प्रकार की 10 संकर प्रजातियाँ हैं और वणिज्यिक खेती के लिए विमोचित की गई हैं। अच्छी प्रबंधन परिस्थितियों में इनसे उच्च पैदावार प्राप्त हो सकती है। खेती की जाने वाली अन्य लंबी प्रजातियाँ हैं लक्षद्वीप ऑर्डिनरी, अंडमान ऑर्डिनरी, फिलिप्पाइन्स, जावा, कोचीन–चाइना, क्प्पडम आदि।

रोपण सामग्रियाँ

चुने गए बीजफलों से उगाए जाने वाले पौधों के जरिए नारियल बढ़ावा जाता है। सामान्यतया 9 से 12 महीने आयु वाले बीजपौधे रोपण के लिए उपयोग किए जाते हैं। 9 से 12 महीने आयु वाले उन पौधों को चुनना चाहिए जिनमें 6 से 8 पत्ते हो तथा जिनका गर्दनी घेरा 10-12 सें-मी. हो। बीज पौधों को चुनने का दूसरा मानदंड पत्तियों का जल्दी निकलना भी है।

स्थान का चयन

नीचे ठोस चट्टानों वाली ऊपरी मिट्टी, जल जमाव वाली निम्न भूमि और मटियारी मृदा आदि नारियल की खेती के लिए उचित नहीं हैं। रोपण करने से पहले वर्षा या सिंचाई के जरिए मृदा के लिए आवश्यक नमी प्रदान करना सुनिश्चित कर लेनी चाहिए।

भूमि की तयारी और रोपण

ढलान वाले क्षेत्रों में तथा लहरदार भूभागों में कोंटूर टेरसिंग या बांधो द्वारा भूमि की तैयारी की जाती है। निम्नवर्ती क्षेत्रों में जलीय स्तर से 1 मीटर ऊँचाई में टीला बनाकर रोपण के लिए स्थान तैयार किया जाता है। कृषि योग्य बनाए गए “कायल” क्षेत्रों में उन क्षेत्रों में पौध का रोपण किया जाता है।

कम जल जमाव वाले दोमट मिट्टी में 1 मी. X  1 मी. X 1 मी. आकार का गढ्डा रोपण के लिए उचित हैं। नीचे चट्टानों वाली मखरली मिट्टी में 1.2 मी. X 1.2 मी. आकार के बड़े गड्ढे बनाने चाहिए। रेतीले मिट्टी में गड्ढे का आकार 0.75 मी. X 0.75 मी. X 0.75 मी. अधिक नहीं होना चाहिए।

पौधों के बीच जगह छोड़ना रोपण का तरीका

पौधों के बीच  जगह छोड़ना रोपण का तरीका और मृदा का प्रकार आदि पर निर्भर है। रेतीली और मखरली मृदाओं में विभिन्न रोपण प्रणालियों के अधीन पौधों के बीच निम्नलिखित स्पेसिंग अनुशंसित –

1. त्रिकोणीय                       7.6 मीटर

2. चौकोर आकार                   7.6 X 7.6 मी., 8 X 8 मी., 9 X 9 मी.

3. एकल                          कतारों में 6.5 मी. – दो कतारों के बीच 9 मी.

4. डबिल हेज                      कतारों में 6.5 मी. – दो कतारों के बीच 9 मी.

रोपण का समय

दक्षिण पश्चिम मानसून की शुरूआत के समय बीज पौधों का प्रतिरोपण किया जा सकता है। यदि सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध हो तो मानसून शुरू होने के एक महीने पहले पौधे लगाने चाहिए जो की  भारी वर्षा शुरू होने से पहले यह अच्छी तरह बढ़ने लगे। उत्तर–पूर्वी मानसून शुरू होने के पहले भी रोपण किया जा सकता है। निम्नवर्ती इलाकों में मानसून के समय बाढ़ आने की संभावना के मद्देनजर मानसून समाप्त होने के बाद रोपण किया जा सकता है।

रोपण

रोपण के पहले गड्ढों में 50 से 60 सें.मी. की गहराई तक ऊपरी मृदा और गोबर पाउडर/कम्पोस्ट से भर देना चाहिए। फिर इसके अंदर बीच में एक छोटा गड्ढा बनाकर उसमें बीजफलों से संलग्न पौधा लगाएं। बीजफल पूरी तरह छोटे गड्ढे के अंदर आने चाहिए। फिर गड्ढा मिट्टी से भरें। जल जमाव रोकने के लिए मिट्टी को अच्छी तरह दबाएँ। यदि सफेद चींटी का प्रकोप हो तो रोपण से पहले छोटे गड्ढे के अंदर सेविडोल 8जी (5ग्राम) डाल दें।

मखरली मृदा वाले क्षेत्रों में मिट्टी की स्थिति सुधारने के लिए 2 कि. ग्राम साधारण नमक डाल दें। प्रत्येक गड्ढे में 25 से 30 नारियल छिलका गाड़ना नमी संरक्षण के लिए सहायक होता है

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