//पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में धान की सीधी बुआई के लिए शस्य क्रियाएँ

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में धान की सीधी बुआई के लिए शस्य क्रियाएँ

परिचय

धान की सीधी बुआई एक ऐसी तकनीक है जिसमें धान की रोपाई न करके धन को सीधा मशीन से  में बोया जाता है।

खेत की तैयारी एवं बुआई की विधि

खेत की समतलीकरण

उपयुक्त जमाव के लिए खेत का समतल होना आवश्यक है अता खेत के समतल होने से सिंचाई के समय में बचत के साथ ही पैदावार भी बढ़ती है। खेत को लेजर लैंड लेवलर से समतल कराना चाहिए। अगर लेजर लैंड लेवलर उपलब्ध नहीं है तो खेतको परंपरागत  विधि से समतल किया जा सकता है। (करहा, उचित जुताई तथा उसके बाद पाटा     लगाकर समतल करना)।

बुआई की विधि

सीधी बुआई की दो विधियाँ हैं –

क.   नम विधि – इस विधि में बुआई से पहले एक गहरी सिंचाई करते हैं और जब खेत जुताई करने योग्य होता है तो खेत को तैयार करते हैं (दो से तीन जुताई + एक पाटा ) और उसके तुरंत बाद सीड ड्रिल द्वारा बुआई करते हैं। बुआई करते समय हल्का  पाटा लगाते हैं जिससे बीज अच्छी तरह से मिट्टी से ढक जाये। इस विधि से बुआई शाम के समय करनी चाहिए जिससे नमी का कम से कम ह्रास हो। इस बिधि का प्रयोग करने से नमी संरक्षित रहती है।

ख.   सूखी विधि – इस विधि से धान की सीधी बुआई के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करते हैं (दो से तीन जुताई + एक पाटा)। इसके बाद मशीन से बुआई कर्फ़ देते हैं और जमाव के लिए सिंचाई लगाते हैं (या वर्षा का इंतजार करते हैं)। दी एक सिंचाई पर सही जमाव नहीं आता तो तुरंत 4 – 5 दिन के अंदर दूसरी सिंचाई कर देनी चाहिए।

कौन सी विधि अपनानी है – यह मौसम एवं संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। अगर किसान के पास सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हैं और वर्षा प्रारंभ होने से पहले बुआई करना चाहता है तो नम विधि द्वारा बुआई करना अच्छा रहता है। इस विधि का प्रयोग करने से फसल में दो – तीन सप्ताह तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, साथ ही खरपतवारों की समस्या में भी कमी आती है।

बुआई के लिए मशीन

जीरो टिलेज कम फर्टिलाइजर ड्रिल (जीरो टिलेज मशीन) या सीड ड्रिल का प्रयोग कर सकते हैं। धान की बुआई के लिए इन्क्लाइंट प्लेट वाली मशीन अधिक उपयुक्त होती है। यदि पावर टिलर चालित सीडर या दो पहिया चालित ट्रैक्टर वाली सीड उपलब्ध है,  तो उसका प्रयोग कर सकते हैं।

बुआई का समय

धान की सीधी बुआई के उपयुक्त समय 20 मई से 30 जून तक होता है। सही समय मानसून आने से 10 – 15 दिन से पीला है या मई का आखिरी सप्ताह से लेकर मध्य जून तक हैं।

प्रजातियाँ

बुआई का समय

लंबी अवधि वाली (145 से 155 दिन)

20 मई से 20 जून

माध्यम अवधि वाली (130 से 135 दिन)

25 मई से 30 जून

छोटी अवधि वाली (115 से 120 दिन)

01 जून से 30 जून

यदि 30 जून के बाद बुआई करनी है तो कम अवधि वाली प्रजातियों का चयन करना चाहिए।

बीज दर

प्रजातियों का 10 से 12 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ आवश्यक होता है। संकर धान लगाने पर बीज की मात्रा 8 किलोग्राम प्रति एकड़ प्रयोग करते हैं।

गहराई

बुआई करते समय गहराई 2 से 3 सेमी होनी चाहिए। (गहराई 3 सेमी से अधिक नहीं होनी चाहिए) तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 18 से 20 सेमी होनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रित करने के लिए यदि वीडर का प्रयोग करते हैं तो पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 सेमी होनी चाहिए।

बीज की गुणवत्ता

हमेशा प्रमाणित बीज ही प्रयोग करें।

बीज उपचार

बीज उपचार के लिए बीज को पानी तथा फफूंदीनाशक के घोल में मिलाकर 12 से 24 घंटे के लिए भिगोते हैं(बावस्टीन या एमिसान 1 ग्राम/किग्रा. धान का बीज + स्टेप्टोसाइक्लिन 0.1 ग्राम/किल ग्रा. की दर से प्रयोग करें) बीज उपचार के लिए पानी की मात्रा बीज की मात्रा के बराबर होनी चाहिए। बीज को 24 घंटे बाद फफूंदीनाशक घोल में से निकाल छाया में 1 से 2 घंटा सूखाते हैं। भिंगोये हुए बीज केवल नम विधि द्वारा बुआई करने पर ही प्रयोग कर सकते हैं और मशीन इन्क्लाइंड प्लेट वाली ही प्रयोग करनी चाहिए। भिगोये हुए बीज सूखी बिधि द्वारा बुआई करने पर प्रयोग नहीं करना चाहिए और न ही जिस मशीन में फ्लूटेड रोलर टाइप सीड मीटरिंग सिस्टम हो उस दशा में बीज उपचार निम्न तरीके से करें।

सूखे की दशा में इमिडाक्लोरोपिड (गोचो – 350 एससी 3 मिली/किग्रा. बीज) और ट्यूबकोनाजोल (रैक्सिल – ईजी 1 मिली/किग्रा बीज) उपचारित करें। उपचारित करने के लिए रसायन को 15 मिली पानी/किग्रा. की दर से उपचरित करें।

प्रजातियों का चयन

धान कटाई के बाद गेहूं की समय से बुआई एवं सिंचाई की बचत के लिए कम समय में पकने वाली या संकर धान का प्रयोग करना चाहिए। यद्यपि लंबी अवधि वाली प्रजातियों का फायदा है जहाँ जल निकास की उचित व्यवस्था हो जिससे की कटाई जल्दी हो जाये। पूर्वी गंगा सिंधु के मैदानों के लिए उपयुक्त प्रजातियाँ एवं संकर धान निम्न हैं –

  • लम्बी अवधि वाले धान – बीपीटी 5204 (सांभा मद्सूरी),एमटीयू 7029 (नाटा महसूरी), राजेन्द्र मडसूरी – 1 मोती, स्वर्णा सब – 1 (बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए) एवं राजश्री
  • माध्यम अवधि वाले धान – एराइज 6 444, पीएचबी – 71 एराइज प्राइमा, एराइज धानी, डी.  आर. एच. 748, आर एच. 1531 यू. एस. 312 27 पी. 31 एवं एन के 5251 ए आदि। प्रजातियाँ – राजेन्द्र स्वेता, राजेन्द्र सुभाषिनी, एम. टी. यू. 1001 एवं एन. डी. आर – 359
  • छोटी अवधि वाले धान – सरयू – 52, राजेन्द्र भगवती, पी आर. एच – 10, एराइज – 61 29, एराइज तेज, आर. एच – 257, डी. आर. एच – 2366, डी. आर.एच – 834, पी. ए. सी – 807, सहभागी धान एवं अभिषेक (सूखा प्रभावित के लिए) आदि।

खरपतवार प्रबंधन

यांत्रिक

नम विधि से बुआई करने पर खरपतवार एवं जंगली धान की समस्या कम होती है। क्योंकि बुआई से पहले सिंचाई करने से खरपतवारों का जमाव आ जाने से या तो हल्की जुताई कर या खरपतवापनाशी (ग्लाईफोसेट या पैराक्वाट) का प्रयोग कर इनको मार सकते हैं।

रासायनिक नियंत्रण

धान की सीधी बुआई में जमाव पूर्व और जमाव के बाद खरपतवारनाशी का प्रयोग प्रभावी पाया गया है।

  • जमाव पूर्व खरपतवारनाशी – पैंडीमैथालिन 30 ईसी (1.3 लीटर/एकड़) प्रेटिलाक्लोर सेफनर सहित 30.7 ईसी (सोफित 650 मिली/एकड़ की दर से  या औग्जीडायरजिल  80 डब्ल्यू पी. 45 ग्राम/एकड़ प्रयोग करें)। प्रयोग का समय – नम विधि द्वारा बुआई करने पर बुआई के दिन ही छिड़काव करना चाहिए। सूखी विधि द्वारा बुआई करने पर सिंचाई के 1 से 3 दिन के अंदर छिड़काव कर देना चाहिए। छिड़काव के लिए 150 से 200 लीटर पानी प्रति एकड़ प्रयोग करना चाहिए।
  • जमाव के बाद खरपतवारनाशी- खरपतवारों के अनुसार किसी एक का प्रयोग करें। नरकट, घास और चौड़ी पत्ती वाले घासों को नियंत्रित करने के लिए बिस्पाइरिबैक सोडियम 10 एस एल (100 मिली/एकड़) या बिस्पाइरिबैक सोडियम 10 एस. एल + इथाराजोस्ल्यूरान (100 मिली + 80 ग्राम) या फिनोक्सप्रोप पीइथाइलस्पेनर सहित + इथाक्सीसस्ल्फ्यूरिबैक 500 मिली + 48 ग्राम/एकड़। यदि मोथा अधिक है तब बिस्पाइरिबैक सोडियम 10 एस एल पाइराजोसल्फ्यूरान और यदि मकड़ा और कौवा घास अधिक है तब फिनोक्सप्रोप पी इथाइल स्पेनर सहित + इथा क्सीसल्फ्यूरान का प्रयोग करें।
  • छिड़काव का समय और विधि – बुआई के 15 से 25 दिन बाद जब खरपतवार 3 से 4 पत्ती के हों – 120 से 150 लीटर पानी का छिड़काव करें। समान रूप से छिड़काव करने के लिए 3 बूम वाला नौजिल जिसमें फ़्लैट फैन नोजिल लगे हों का प्रयोग करें।
  • हाथ से निराई – खरपतवारनाशियों में प्रतिरोधकता रोकने के लिए खेत में बचे हुए खरपतवारों को हाथ से निराई का निकाल देना चाहिए।

पोषक तत्व प्रबंधन

धान – गेहूं फसल प्रबंधक से आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा की गणना कर सकते हैं।

बुआई के समय – 50 किग्रा डीएपी या 75 किग्रा एन पी के (12:32:16) एवं 10 किग्रा एम ओ पी बुआई के समय देना चाहिए।

यूरिया छिड़काव – 3 बार में देना चाहिए

  • 15 किग्रा. बुआई के 15 दिन बाद
  • कल्ले निकलते समय – कम एवं माध्यम अवधि की प्रजातियों में 35 किग्रा. यूरिया प्रति एकड़ की दर से व लम्बी अवधि की प्रजातियों के लिए 45 किग्रा प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें।
  • बाली निकलने से पूर्व – कम एवं माध्यम अवधि की प्रजातियों में 35 किग्रा. यूरिया प्रति एकड़ की दर से व लम्बी अवधि की प्रजातियों के लिए 45 किग्रा. प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें।

कल्ले निकलने का समय एवं पेनिकल इनिसिएशन का समय यह प्रजातियों की अवधि पर निर्भर करता है। कम अवधि की प्रजातियों 115 – 120 में कल्ले निकलने का समय बुआई के 30 – 35 दिन बाद, एवं पेनिकल इनिसिएशन का समय  बुआई का 43 – 47 दिन बाद, माध्यम अवधि 130 – 135 की प्रजातियों में कल्ले निकलने का समय बुआई के 35 – 40 दिन बाद, एवं पेनिकल इनिसिएशन का समय बुआई का 60 – 65 दिन बाद, एवं पेनिकल इनिसिएशन का समय बुआई के 75 – 80 दिन बाद होता है।

सूक्ष्म तत्वों की कमी दिखाई देने पर (आयरन और जिंक) – 1 प्रतिशत यूरिया + 0.5 प्रतिशत जिंक + 0.5 प्रतिशत फैरस सल्फेट के घोल के 2 से 3 बार एक सप्ताह के अंतर पर छिड़काव करें।

सिंचाई प्रबंधन

नम विधि से बुआई करने पर पहली सिंचाई बुआई के 10 से 21 दिन बाद मौसम की दशा के अनुसार करनी चाहिए। यदि बारिश नहीं होती तो आगे की सिंचाई एक सप्ताह के अन्तराल पर करनी चाहिए।

सूखी विधि से बुआई करने पर पहली सिंचाई बुआई के 4 से 5 दिन बाद कर देनी चाहिए। वर्षा न होने पर नम विधि द्वारा बोये गये धान के समान ही सिंचाई करनी चाहिए। क्रांतिक अवस्था पर जैसे कि बाली निकलते समय और दाना भरते समय पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। चिकनी मिट्टी में दरारें पड़ना सिंचाई की आवश्यकता को दर्शाता है अत: उस समय सिंचाई लगा देनी चाहिए।

स्त्रोत: बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन

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