//पॉली हाउस ने दी एक नई पहचान

पॉली हाउस ने दी एक नई पहचान

पॉली हाउस में खेती

लगभग  एक हजार वर्गमीटर में बने पॉली हाउस में 25 हजार की लागत से वैज्ञानिक पद्धति से खेती कर लगभग लाखों की आमदनी प्राप्त कर रहे हैं रोहतास जिले के नोखा प्रखंड के तरा गांव निवासी धनंजय कुमार सिंह उर्फ धनजी सिंह| पॉली हाउस में धनजी सिंह शिमला मिर्च, पालक, धनिया पत्ता व ब्रोकली आदि की खेती कर रहे हैं|

कृषि में नये सोच

धनंजय सिंह ने कृषि में नये सोच के साथ सरकार द्वारा अनुदानित एक हजार वर्गमीटर में एक पॉली हाउस का निर्माण किया है| उन्होंने कहा कि पॉली हाउस में साल के किसी भी समय कोई भी फसल की खेती की जा सकती है| इसकी निर्माण में दस लाख रुपये लागत आये है| इसमें 90 प्रतिशत राशि अनुदान के रूप में सरकार ने दिया है और 10 प्रतिशत राशि उन्होंने लगाया है|  धनजी सिंह ने बताया शिमला मिर्च, जो अभी 80 रुपये किलो बाजार में मिल रही है| इसकी खेती से काफी मुनाफा मिलता है| शिमला मिर्च के पौधे में तीन माह में फल लगने शुरू हो जाते हैं| पांच से छह माह में शिमला मिर्च बेच कर लाखों कमाया जा सकता है| इसके अलावा धनजी सिंह अपने पॉली हाउस में टमाटर, पालक, धनिया पत्ता व ब्रोकली (एक हरे रंग की गोभी) उगाते है| बाजार में ब्रोकली काफी महंगी मिलती है| यह सेहत के लिए काफी फायदेमंद है| इसके अलावा गुलदस्ता का फूल की भी खेती करते हैं, जो प्रति पीस दो से पांच रुपये में बिकता है|

बेहतर खेती

धनजी सिंह ने पहले वैज्ञानिकों की देखरेख में खेती की और अब वह जिले के पांच सदस्यीय प्रशिक्षण टीम में शामिल है| यह टीम किसानों को बेहतर खेती के टिप्स देती है| टीम में दिलीप कुमार, विजय बहादुर सिंह व जय प्रकाश सिंह भी शामिल हैं| धनंजय सिंह उर्फ धनजी सिंह को बेहतर खेती के लिए बिहार सरकार द्वारा पांच बार सम्मानित किया जा चुका है| साथ ही, किसानों को उन्नत खेती का प्रशिक्षण देने के लिए भी धनजी सिंह सम्मानित हो चुके हैं| धनजी सिंह ने बताया कि आज कल खेती का उन्नत तरीका है श्री विधि| वह श्री विधि से ही लहसुन,प्याज, गेहूं व अन्य फसलों की खेती करते हैं| उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तकनीक से खेती करने से खाद व पटवन के पानी का भी दुरुपयोग नहीं होता है| ग्रीन हाउस (हरित गृह) में कार्बन का अवशोषन होने के कारण पौधे की अच्छी वृद्धि होती और फल भी अधिक लगता है| इसमें तापमान को नियंत्रित करने के कई उपकरण लगाये गये हैं|

लेखक: संदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार|

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