//प्रमुख तिलहनी फसलों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

प्रमुख तिलहनी फसलों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

तिलहन फसलों की श्रेणी में कई तरफ की फसले आती हैं. इन सभी तरह की फसलों के उत्पादन से किसान भाइयों को अच्छा ख़ासा लाभ प्राप्त होता है. क्योंकि तिलहन फसलों का बाजार भाव बाकी की फसलों से अधिक पाया जाता है. तिलहन फसलों की उपज रबी और खरीफ दोनों मौसम में ही की जाती है. इन सभी फसलों को अलग अलग जगहों के आधार पर मौसम के अनुसार उगाया जाता है. लेकिन कभी कभी इन फसलों में कुछ ऐसे रोग लग जाते हैं जिनकी वजह से फसलों में काफी ज्यादा नुक्सान देखने को मिलता है. इसलिए फसल से उत्तम पैदावार लेने के लिए इन रोगों की रोकथाम शुरुआत में करना काफी अच्छा होता है.

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प्रमुख तिलहनी फसलों में लगने वाले रोग

आज हम आपको रबी और खरीफ दोनों मौसम में उगाई जाने वाली कुछ प्रमुख तिलहन फसलों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम के बारें में बताने वाले हैं.

सरसों में प्रमुख रोग

सरसों रबी के मौसम में उगाई जाने वाली प्रमुख तिलहन फसल है. जिसको बड़ी मात्रा में उत्तर भारत में ही उगाया जाता है. सरसों की फसल में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं.

सफेद गेरूई

सरसों की फसल में लगने वाले सफ़ेद गेरुई रोग को कई जगहों पर धोलिया रोग के नाम से भी जाना जाता है. जो मौसम में तापमान के असामान्य रूप बढ़ने और घटने पर लगता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों की निचली सतह पर सफ़ेद रंग के धब्बे बन जाते हैं. जिससे पौधों की पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती है. और पौधे विकास करना बंद कर देते हैं. इस रोग के लगने से पौधों की शाखाएं विकृत आकार धारण कर लेती हैं. जिससे पौधों में फलियाँ नही बन पाती हैं. जिसका सीधा असर पौधों की पैदावार पर देखने को मिलता हैं.

रोकथाम के उपाय

  1. सरसों के पौधों में इस रोग की रोकथाम के लिए शुरुआत में बीजों को मेटालेक्सिल से उपचारित कर उगाना चाहिए.
  2. इसके अलावा प्रमाणित बीजों का चयन कर उचित समय पर उगा देना चाहिए.

पत्र लांक्षण

सरसों के पौधों में पत्र लांक्षण रोग का प्रभाव पौधों की पत्तियों पर देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर छोटे छोटे पीले भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. और रोग के बढ़ने पर इन धब्बों का आकार बड़ा हो जाता है. जिससे पौधे विकास करना बंद कर देते हैं. और पौधों पर बनने वाली फलियों की संख्या भी कम पाई जाती है.

रोकथाम के उपाय

  1. पत्र लांक्षण रोग की रोकथाम के लिए शुरुआत में बीजों का दो प्रतिशत थिरम दवा से उपचारित कर उगाना चाहिए.
  2. खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर पौधों पर 0.2 प्रतिशत मैंकोजेब एम – 45 की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर पौधों पर छिडकना चाहिए.
  3. 0.2 प्रतिशत मैंकोजेब एम – 45 के अलावा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और रिडोमिल दावा की उचित मात्रा का इस्तेमाल करना भी अच्छा होता है.

हरदा

सरसों के पौधों में लगने वाला ये एक कीट रोग हैं. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर छोटे छोटे पीले, नारंगी धब्बे दिखाई देने लगते हैं. इस रोग के बढ़ने पर पौधों के तने पर भी काले रंग के लम्बे धब्बे दिखाई देने लगते हैं. जिससे पौधे की पत्तियां समय से पहले ही सूखकर गिरने लगती है. और कुछ दिनों बाद पौधा भी सूखकर नष्ट हो जाता है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर 0.2 प्रतिशत मैंकोजेब एम – 45 की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.
  2. इसके अलावा रोग रहित किस्मों के बीजों का चयन कर उन्हें उगाना चाहिए.

लाही ( तोरिया ) में प्रमुख रोग

लाही की खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के आसपास वाले राज्यों में अधिक की जाती है. लाही की खेती किसान भाई क्रेंच क्रॉप के रूप में करते हैं. इसके पौधों में भी कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जिनकी रोकथाम उचित समय पर ना की जाये तो पौधों में काफी नुक्सान देखने को मिलता है.

मोयला

लाही के पौधों में दिखाई देने वाला मोयला रोग कीटों की वजह से फैलता है. इस रोग के कीट पौधों की पत्तियों पर रहकर उनका रस चूसकर उनका विकास रोक देते हैं. जिससे पौधों पर फलियाँ काफी कम मात्रा में बनती हैं. और पौधे भी अच्छे से विकास नही कर पाते हैं.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर रोग दिखाई देने के तुरंत बाद मिथाइल पैराथियॉन, कार्बेरिल या मैलाथियान चूर्ण की उचित मात्रा का भुरकाव कर देना चाहिए.
  2. इनके अलावा क्लोरोपायरीफॉस और डायमिथोएट कीटनाशकों की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर पौधों पर छिड़कना चाहिए.

छाछया रोग

लाही के पौधों पर दिखाई देने वाला छाछया रोग फफूंद की वजह से फैलता है. इस रोग के लगने पर शुरुआत में पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. जिनका आकार रोग बढ़ने के साथ साथ बढ़ने लगता है. और कुछ दिनों बाद सम्पूर्ण पौधे की पत्तियों पर सफ़ेद रंग का पाउडर जमा हो जाता है. जिससे पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देते हैं. और पौधों का विकास रुक जाता है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए गंधक चूर्ण की 20 किलो मात्रा का भुरकाव रोग दिखाई देने पर पौधों पर करना चाहिए.
  2. इसके अलावा रोगग्रस्त पौधों पर घुलनशील गंधक या कैराथियॉन की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.
  3. प्राकृतिक तरीके से रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम के आर्क का छिडकाव करना चाहिए. और रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए.

तिल में प्रमुख रोग

तिल की खेती ज्यादातर जगहों पर खरीफ के मौसम में की जाती है. तिल की खेती सहफसली फसल के रूप में भी की जाती है. इसके पौधों में कई तरह के कीट और जीवाणु जनित रोगों का आक्रमण ज्यादा देखने को मिलता है. जिनकी रोकथाम करना जरूरी होता है.

फली छेदक रोग

तिल के पौधों में फली छेदक रोग कीट की वजह से फैलता है. इस रोग का सबसे ज्यादा असर पौधे की पैदावार पर देखने को मिलता है. इस रोग के कीट पौधे की फलियों में छेद कर इसके अंदर से दानों को खाकर खराब कर देते हैं. रोग बढ़ने पर पौधे की फलियाँ अधिक मात्रा में खराब हो जाती है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए क्यूनालफॉस की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर रोग दिखाई देने पर करना चाहिए.
  2. इसके अलावा पौधों पर कार्बेरिल या सेवीमोल की उचित मात्रा का छिडकाव करना भी उचित रहता है.
  3. प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए पौधों नीम के तेल का छिडकाव फलियों के बनने के 10 दिन पहले से 15 दिन के अंतराल में दो से तीन बार करना चाहिए.

गाल मक्खी

तिल के पौधों में गाल मक्खी रोग कीट की वजह से फैलता है. इस रोग के गिडार का रंग सफेद मटमैला दिखाई देता है. जिसका प्रभाव पौधों पर फूल आने के वक्त ज्यादा देखने को मिलता है. इस रोग के लगने से पौधों को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचता है. इस रोग के लगने पर बनने वाले फूल गाठों का रूप धारण कर लेते हैं. जिससे पौधों पर फलियाँ नही बन पाती.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफास या कार्बेरिल की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर 15 दिन के अंतराल में दो बार करना चाहिए.
  2. प्राकृतिक तरीके से नियंत्रण के लिए पौधों पर फूल बनने के साथ से ही नीम आर्क का छिडकाव करना चाहिए.

फिलोड़ी

तिल के पौधों में फिलोड़ी रोग का प्रभाव पत्ती मरोडक कीट की वजह से अधिक फैलता है. पौधों पर इस रोग का प्रभाव फूल खिलने के दौरान अधिक देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों पर दिखाई देने वाले फूल पत्तियों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं. और पौधे की लम्बाई बढ़ जाती है. इसके अलावा पौधों पर शखाएं अनियंत्रित दिखाई देने लगती हैं. और पौधों के ऊपरी भाग पर गुच्छे दिखाई देने लगते हैं. इस रोग के लगने से पौधों पर या तो फलियाँ बनती ही नही है. और अगर बनती हैं तो बहुत कम मात्रा में बनती हैं. जिनका विकास नही हो पाता है. जिसका सीधा असर पौधों की पैदावार पर पड़ता है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर पत्ती मरोडक कीट की रोकथाम शुरुआत में ही कर देनी चाहिए.
  2. खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर मैटासिस्टाक्स की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

पर्ण कुचन

तिल के पौधों में लगने वाला पर्ण कुचन रोग विषाणु जनित रोग है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियां गहरी हरी दिखाई देने लगती हैं. जो आकार में काफी छोटी दिखाई देती है. और नीचे की तरफ झुकी हुई होती हैं. पौधों पर इस रोग का प्रभाव सफेद मक्खियों की वजह से अधिक दिखाई देता है. इस रोग के लगने से पौधों का आकार भी छोटा दिखाई देने लगता है. रोग बढ़ने पर पौधे फलियों के आने से पहले ही सूखकर नष्ट हो जाते हैं.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मिथाइल डिमेटान की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.
  2. इसके अलावा थायोमेथोक्साम 25 डब्लू जी या एसिटायोप्रिड़ 20 एस पी की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.
  3. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर सफ़ेद मक्खी रोग का नियंत्रण शुरुआत में ही कर देना चाहिए.

कुसुम में प्रमुख रोग

कुसुम की खेती तिलहन फसल के रूप में की जाती है. कुसुम के तेल का इस्तेमाल कई तरह से किया जाता है. कुसुम की खेती किसानों के लिए अधिक लाभदायक मानी जाती है. इसके पौधों पर भी कई तरह के रोग देखने को मिलते है. जिसका असर पौधों की पैदावार पर देखने को मिलता है.

गेरुई रोग

कुसुम के पौधों में गेरुई रोग का प्रभाव मौसम में होने वाले अनियंत्रित परिवर्तन की वजह से दिखाई देता है. इस रोग के लगने से पौधे की पत्तियों के किनारों पर पीले भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. रोग बढ़ने पर पौधों का विकास रुक जाता है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए मैंकोजेब या जिनेब की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर पौधों पर छिडकना चाहिए.

फल छेदक

कुसुम के पौधों में फल छेदक रोग का प्रभाव फूल खिलने के बाद दिखाई देता है. इस रोग के कीट का लार्वा पौधे की कलियों के अंदर जाकर उसकी कलियों को नष्ट कर देता है. जिसका सीधा असर पौधों की पैदावार पर दिखाई देता है. रोग बढ़ने से पूरी पैदावार भी नष्ट हो जाती हैं.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए डेल्टामेथ्रिन या इंडोसल्फान की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर रोग दिखाई देने के तुरंत बाद कर देना चाहिए.
  2. प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए पौधों पर नीम के तेल या नीम के आर्क का छिडकाव 10 दिन के अंतराल में दो बार करना चाहिए.

भभूतिया रोग

कुसुम के पौधों में भभूतिया रोग फफूंद की वजह से फैलता है. रोग लगने पर शुरुआत में पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद भूरे रंग के छोटे धब्बे दिखाई देने लगते हैं. लेकिन रोग बढ़ने के साथ साथ इन धब्बों का आकार भी बढ़ने लगता है. और कुछ दिनों बाद सम्पूर्ण पौधे की पत्तियों पर सफ़ेद रंग का पाउडर जमा हो जाता है. जिससे पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देते हैं. और पौधों का विकास रुक जाता है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर गंधक चूर्ण की 20 किलो मात्रा का भुरकाव रोग दिखाई देने पर करना चाहिए.
  2. प्राकृतिक तरीके से रोग रोकथाम के लिए पौधों पर नीम आर्क का छिडकाव करना चाहिए. और रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए.

सभी तिलहन फसलों में लगने वाले सामान्य रोग

कुछ ऐसे रोग हैं जो सभी तिलहन फसलों में दिखाई देते हैं. जिनकी रोकथाम के लिए सभी में सामान कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है.

दीमक

सभी तरह की तिलहन फसलों के पौधों में दीमक का प्रभाव किसी भी वक्त दिखाई दे सकता हैं. लेकिन बीजों के अंकुरण और फसल के पकने के दौरान इसका प्रभाव अधिक देखने को मिलता है. इस रोग के कीट पौधे की जड़ों पर आक्रमण कर पौधे को अंकुरित होने से पहले ही नष्ट कर देते हैं. जबकि अंकुरित पौधे को जमीन की सतह के पास से काटकर नष्ट कर देते हैं. इस रोग के बढ़ने से पूरी फसल भी बर्बाद हो जाती है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए विवेरिया बैसियाना दवा की उचित मात्रा को गोबर में मिलाकर लगभग आठ से दस दिन बाद खेत में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए.
  2. नीम की खली की उचित मात्रा को खेतों में छिड़कर उसे मिट्टी में मिला देना चाहिए.
  3. जिस खेत में दीमक का प्रभाव अधिक दिखाई दे उसमें गोबर की खाद नही डालनी चाहिए.

आरा मक्खी

आरा मक्खी रोग का ज्यादा प्रभाव सरसों, लाही और पीली सरसों में देखने को मिलता है. इस रोग के कीट का लार्वा पौधे की पत्तियों को खाकर उन्हें नष्ट कर देता है. जिससे पौधों की पत्तियों में बड़े बड़े छिद्र दिखाई देने लगते हैं. रोग बढ़ने पर सभी पौधों की पत्तियों में छिद्र दिखाई देने लगते हैं. जिससे पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देते हैं. और साथ ही पौधों का विकास रुक जाता है.

रोकथाम के उपाय

  1. पौधों पर इस रोग के दिखाई देने के बाद बैसिलस थुरिंजिनिसिस की एक किलो मात्रा को 400 से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिडक देना चाहिए.
  2. इसके अलावा मैलाथियान, डाईक्लोरोवास और क्यूनालफास की उचित मात्रा को पौधों पर छिडकना भी लाभकारी माना जाता है.
  3. प्राकृतिक तरीके से नियंत्रण के लिए शुरुआत में खेतों की गहरी जुताई कर खेत को धूप लगने के लिए खुला छोड़ देना चाहिए.
  4. पौधों पर रोग दिखाई देने पर फेरोमेन ट्रैप को खेत में चार से पांच जगहों पर लगाना चाहिए.

बालदार सूडी

बालदार सूडी को कातरा के नाम से भी जाना जाता है. इस रोग के कीट की सूंडी पौधे की पत्तियों को खाकर पौधों को नुक्सान पहुँचाती हैं. इस रोग के कीट काले, पीले और चितकबरे दिखाई देते हैं. जिनके शरीर पर बहुत ज्यादा मात्रा में बाल पाए जाते हैं. इस रोग के बढ़ने पर पौधे बहुत जल्द ही पत्तियों रहित दिखाई देने लगते हैं. जिससे पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देते हैं.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफास, मिथाइल-ओ-डिमेटान या डाईमेथोएटकी उचित मात्रा को पानी में मिलाकर पौधों पर छिडकना चाहिए.
  2. प्राकृतिक तरीके से नियंत्रण करने के लिए पौधों पर एजार्डिरैक्टिन यानी नीम के तेल का छिडकाव 5 दिन के अंतराल में दो से तीन बार करना चाहिए.
  3. इसके अलावा सर्फ के घोल का दो से तीन छिडकाव पौधों पर करना चाहिए. और पौधों की रोपाई सही वक्त पर करनी चाहिए.

पत्ती सुरंगक कीट

पत्ती सुरंगक कीट का प्रभाव लगभग सभी तरह की तिलहन फसलों पर देखने को मिलता है. इस रोग का प्रभाव पौधों की पत्तियों पर ही देखने को मिलता हैं. इस रोग के कीट पौधों की पत्तियों के अंदर के हरे भाग को खा जाते हैं. जिससे पौधे की पत्तियों में सफ़ेद पारदर्शी सुरंगनुमा नालियाँ बन जाती हैं. इस रोग के बढ़ने से सभी पत्तियां पारदर्शी दिखाई देने लगती है. जो समय से पहले टूटकर गिर जाती हैं. जिससे पौधों का विकास रुक जाता है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर रोग दिखाई देने के तुरंत बाद मोनोक्रोटोफॉस 36 प्रतिशत एस एल की 500 मिलीलीटर मात्रा को 600 से 700 लीटर पानी में मिलाकर पौधों पर छिडक देना चाहिए.
  2. रोग लगे पौधे की पत्तियों को तोड़कर उन्हें नष्ट कर देना चाहिए. इसके अलावा रोग रहित किस्मों के बीजों का चयन करना चाहिए.

अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग

अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग सभी तरह की तिलहन फसलों में देखने को मिलता है. पौधों में यह रोग कवक की वजह से फैलता है. जिसका प्रभाव पौधों पर बहुत जल्द दिखाई देता है. इस रोग के लगने से पौधे की पत्तियों पर हल्के भूरे कत्थई रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. रोग के बढ़ने पर इन धब्बों का आकार बढ़ जाता है. जिससे पौधों की पत्तियों में बड़े बड़े छिद्र दिखाई देने लगते हैं. जिससे पौधे विकास करना बंद कर देते हैं.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए शुरुआत में बीज रोपाई से पहले उसे थिरम से उपचारित कर लेना चाहिए.
  2. खड़े पौधों में रोग दिखाई देने पर मैंकोजेब की लगभग दो किलो मात्रा को 700 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से पौधों पर छिडकना चाहिए.
  3. इसके अलावा कापर आक्सीक्लोराइड, जिरम और जिनेब की उचित मात्रा का छिडकाव करना भी लाभदायक होता है.
  4. पौधों की रोपाई के दौरान उनके बीच उचित सामान दूरी होनी चाहिए. और भूमि के शोधन के लिए ट्राइकोडर्मा बिरडी का छिडकाव रोपाई से पहले भूमि की जुताई के वक्त करना चाहिए.

चित्रित बग

तिलहन फसलों में चित्रित बग रोग कीट की वजह से फैलता है. इस रोग प्रभाव तापमान में होने वाले परिवर्तन की वजह से देखने को मिलता है. इसके कीट का रंग काला, नारंगी और लाल चित्तेदार दिखाई देता है. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों का रस चूसते हैं. जिससे पौधों की फलियों में दानो की संख्या काफी कम बनती है. और पौधे भी अच्छे से विकास नही कर पाते हैं.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए शुरुआत में पौधों पर रोग दिखाई देने पर डाईमेथोएट, मिथाइल-ओ-डिमेटान या मोनोक्रोटोफॉस की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.
  2. प्राकृतिक तरीके से नियंत्रण के लिए पौधों पर रोग दिखाई देने के बाद नीम के तेल का 5 दिन के अंतराल में दो से तीन बार छिडकाव करना चाहिए.

माहू

तिलहन फसलों में माहू का रोग मौसम में होने वाले अनियमित परिवर्तन की वजह से फैलता है. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों का रस चूसकर उन्हें नुक्सान पहुँचाते हैं. जिससे पौधे की पत्तियां पीली पड़कर गिरने लग जाती हैं. इस रोग के कीट आकार में छोटे दिखाई देते हैं. जो पौधों पर एक समूह के रूप में पाए जाते हैं. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों के साथ साथ पौधों के बाकी के कोमल भागों का रस चूसकर उनकी वृद्धि को रोक देते हैं. जिससे पौधा विकास करना बंद कर देता है.

रोकथाम के उपाय

  1. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफास या डाईमेथोएट की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.
  2. प्राकृतिक तरीके से नियंत्रण के लिए पौधों पर एजार्डिरैक्टिन की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.
  3. इसके अलावा रोग दिखाई देने पर खेत में 5 फेरोमेन ट्रैप को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में लगाना चाहिए.

ये तिलहन की प्रमुख फसलों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम के इस्तेमाल में आने वाले तरीके और कीटनाशक है. जिनके इस्तेमाल से किसान भाई अपनी फसलों को रोगमुक्त रखकर अच्छा उत्पादन ले सकता है.

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