//फलों की खेती

फलों की खेती

फल फसलें

फल विटामिन एवं खनिज लवणों के उत्तम साधन है। फल सुमधुर स्वाद के कारण सभी को भाते हैं। फलों का चुनाव जलवायु एवं स्थान की उपलब्धता पर निर्भर करता है। परिनगरीय खेती एवं गृहवाटिका के लिए कुछ चुनिंदा फलों की खेती का विवरण संक्षेप में दिया जा रहा है।

आम

आम को फलों का राजा कहा जाता है। भारतवर्ष आम का प्रमुख उत्पादक देश है जो विशव का कुल 56 प्रतिशत आम पैदा करता है। आम की खेती का विवरण निम्न है :

किस्में

भारतवर्ष में आम की लगभग 1000 प्रजातियाँ पाई जाती है जिनमें से कुछ प्रजातियाँ नीचे दी जा रही है।

(क) देशी प्रजातियाँ : लंगड़ा, दशहरी, चौसा, फजली, पिैरी अलफांसो, गुलाबखारा तथा बॉम्बेग्रीन।

(ख) संकर प्रजातियाँ : आम्रपाली, मल्लिक, पूसा, सिन्धु इत्यादि।

भारतीय कृषि अनुसंधान, नई दिल्ली द्वारा आम की कई किस्मों का विकास किया गया है। सन्‌ 1979 में विकसित बौनी किस्म आम्रपाली काफी प्रचलित है। इसी तरह सन्‌ 2002 में संस्थान द्वारा विमोचित आम की किस्मों (पूसा सूर्या (चयन) तथा पूसा अरूणिमा) की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। संस्थान द्वारा विकसित किस्मों का विवरण निम्न है।

आम्रपाली : यह किस्म दशहरी एवं नीलम के संकरण से सन्‌ 1979 में विकसित की गई है। पौधे बौने था नियंमित फलन देते हैं। यह संकर किस्म अधिक बौनी होने के कारण सघन बागवानी हेतु अत्यन्त उपयुक्त है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में 2.5 ग 2.5 मी. की दूरी पर इस किस्म के 1600 पौधे लगाए जा सकते हैं। यह किस्म देर से पकती है। फल मध्यम आकार के अधिक सूबेदार तथा मिठास से भरपूर होते हैं। इस किस्म् में कैरोटीन की काफी अधिक मात्रा पाई जाती हे। इस किस्म को प्रसंस्करण हेतु काफी उपयोगी पाया गया है।

मल्लिका : आम की यह किस्म नीलम तथा दशहरी के संकरण से विकसित की गई है। इसके पौधे ओजस्वी तथा नियमित फलन देने वाले होते हैं। यह किस्म उत्तर भारत में उनती प्रचलित नहीं हैं जितनी दक्षिण भारत में हैं। आन्ध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में इसकी व्यावसायिक खेती बढ़ रही है। फल मध्यम आकार (300-350 ग्रा.) के होते हैं तथा इनमें गूदे का प्रतिशत (74.9 प्रतिशत) अधिक होता है। यह किस्म प्रसंस्करण हेतु उपयुक्त पाई गइ्र है। हमारे देश से इस वर्ष इस किस्म के फलों का निर्यात अमेरिका तथा खाड़ी देशों में किया गया है।

पूसा सूर्या : इस किस्म का विकास आयातित किस्म ‘एल्डन’ में चयन द्वारा किया गया है। पूसा सूर्या धरेलू एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार हेतु बहुत उपयुक्त है। यह प्रतिवर्ष फल देने वाली किस्म है जिसके पौधे मध्यम आकार के होते हैं। इसके फल देरी से पकते हैं तथा आकर्षक पीले रंग व गुलाबी आभा लिए होते हैं। फल का आकार मध्यम (270 ग्रा.) मिठासयुक्त (18.5 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) तथा भण्डारण क्षमता 8-10 दिनों तक होती है।

पूसा अरूणिमा : यह किस्म आम्रपाली एवं सेन्सेशन किस्मों के संकरण से विकसित की गई है। इसके पौधे मध्यम आकार के तथा नियमित फलन देने वाले होते हैं। यह किस्म देर से पकती हैं तथा तुड़ाई अगस्त के प्रथम सप्ताह में की जाती है। फल मध्यम आकार (250 ग्रा.) तथा आकर्षक लाल रंग के होते हैं जिनमें मध्यम मिठास (19.5 प्रतिशत कुल धुलनशील ठोस पदार्थ) होता है। पकने के बाद सामान्य दशा में लगभग 10-12 दिनों तक फल खराब नहीं होते एवं उनकी गुकवत्ता बनी रहती है। यह किस्म घरेलू एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार हेतु उपयुक्त पाई गई है।

नर्सरी तैयार करना : आम का प्रवर्धन  मुख्य रूप से बीज और कायिक विधियों द्वारा किया जाता है। जिनका संक्षिप्त विवरण निमन प्रकार है :

(क) बीज द्वारा नर्सरी तैयार करना

बीज से पौध तैयार करने के लिए पके हुए फलों से गुठलियाँ निकालकर अच्छी तरह साफ करके इन्हें 15-20 सें.मी. ऊँची क्यारियों में 4-5 सें.मी. की दूरी पर बो देते हैं। ध्यान रहे कि गुठलियाँ बोने की गहराई 3-4 सें.मी. से ज्यादा न रहे।

(ख) कायिक विधियों द्वारा नर्सरी तैयार करना

कयिक विधियों में वीनियर कलम बंधन, कोमल शाखा कमल बंधन तथा गुठली भेट कलम मुख्य  विधियाँ हैं।

सस्य क्रियाएँ : आम के रोपक हेतु 1x1x1 मी. आकार का गड्‌ढा बनाते हें जिनको रोपक से पहले सड़ी हुई गोबर की खाद से भर देते हैं। बाद में 73 ग्रा. नत्रजन, 18 ग्रा. फॉस्फोरस तथा 66 ग्रा. पोटाश प्रतिवर्ष दस वर्षों तक देते हैं, इसके पश्चात 730 ग्रा. नत्रजन, 180 ग्रा. स्फोरस तथा 680 ग्रा. पोटाश दो बार में दिया जाता है। यह पहली बार जून-जुलाई में तथा दूसरी बार अक्टूबर में दिया जाता है।

आम की फसल को नियमित अंतराल पर पानी देना चाहिए। फल आने के समय दस दिन के अंतराल पर पानी देने से अक्ष्छी उपज मिलती है। आम में अच्छी फलन लेने के लिए पुष्प आने के करीब दो महीने पहले से पानी देना बन्द कर देते हैं। फिर सरसों के आकार के जब फल बन जाए तब नियमित अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। नर्सरी के दौरान प्रत्येक पन्द्रह दिनो पर खरपतवार नियंत्रण हेतु निराई गुड़ाई करते हैं या 2.25 कि.ग्रा./हेक्टेयर की दर से बुवाई के तुरन्त बाद छिड़काव करना लाभप्रद होता है।

तुड़ाई एवं उपज : आम की तुड़ाई डण्ठल सहित सावधानी पूर्वक करते हैं जिससे कि फलों को तुड़ाई के समय चोट न पहुँचे । इसके लिए तुड़ाई करने वाले यंत्र का भी प्रयोग कर सकते हैं। जिससे कि फलों की भण्डारण क्षमता अधिक होती है तथा फल सड़ते नहीं हैं । आम की उपज भारत वर्ष में 8 टन/हेक्टेयर होती है।

कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी

1.   पूर्ण परिपक्वता पर तुड़ाई उपरांत छंटाई कर तीन श्रेणियों, जैसे एक्स्ट्रा (551 से 800 ग्राम), ग्रेड-1 (351 से 550 ग्राम) व ग्रेड-2 (200 से 350 ग्राम) में वर्गीकृत करें।

2.   छिद्रयुक्त व आकर्षक गत्ते के डिब्बों/बक्सों में पैक करें।

3.   फलों को अधिक  समय  तक  उपलब्ध  करवाने हेतु 10-12 डिग्री से. तापमान व 85-90 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता  पर 10-12 दिनों तक भण्डारित करें।

4.   कच्चे फलों से अचार व पके आम से स्कवैश, चटनी या पापड़ आदि उत्पाद बनाएँ।

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

रोग

लक्षण

नियंत्रण

चूर्णिल आसिता (ओइडियम मैंगिफेरेई)

इस रोग से प्रभावित मंजरियों और  नई  पत्त्यिों पर  सफेद या धूसर चूर्णिल वृद्धि दिखाई पड़ती है।  कभी-कभी  पूरी फसल नष्ट हो जाती है।

भोर निकलने के समय कैराथेन (0.1 प्रतिशत) के तीन छिड़काव 15-20 दिनों के अंतराल पर करने चाहिए।

स्याम वर्ण

पत्तियों  पर  भूरे  या  काले गोल या अनियमिताकार धब्बे पाए  जाते  हैं।  पत्तियों की वृद्धि रूक जाती है।

* रोगग्रसित टहनियों की छंटाई करें और बाग में गिरी पत्तियों और फलों को हटाकर जला दें।

* मंजरी पर संक्रमक को रोकने के लिए कार्बेन्डाजिम 0.1प्रतिशत) या ब्लाइटोक्स (0.05 प्रतिशत) का 15 दिनों के अन्तराल पर दो बार छिड़काव करें।

अमरूद

अमरूद एक अन्यन्त लोकप्रिय फल है। इसमें पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। पोषक तत्वों की दृष्टि से अमरूद न केवल सेब बल्कि कुद हद तक आम जैसे लोकप्रिय फल से भी बेहतर और पौष्टिक होता है।

किस्में : लखनऊ-49, इलाहाबाद सफेदरा, चित्तीदार, सफेद जाम, कोहीर सफेदा, हरीझा, अर्का अमूल्य, हिसार ललित, ललित इत्यादि।

नर्सरी तैयार करना : अमरूद के पौधे बनाने हेतु दोनों लैंगिक (बीज से मूलवृंत उगाना) व अलैंगिक विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं जिका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया जा रहा है।

बीज द्वारा प्रवर्धन : बुवाई से पूर्व बीजों को हाइड्रोक्लोरिक अम्ल में तीन मिनट तक उपचारित करना चाहिए हिससे कि जमाव 90 प्रतिशत तक होता है। दो सप्ताह के भीतर बीजों का अंकुरण होने लगता है। जब पौधों की ऊँचाई 25-35 सें.मी. हो जाए तो उन्हें दूसरी जगह लगा देते हैं।

वानस्पतिक प्रवर्धन : उत्तर भारत में इनार्चिग (मेट कलम) सबसे प्रचलित विधि है इसके लिए एक साल पुराने बीजू पौधों को चुन लिया जाता है और मातृ पौधों के पास ले जाते हैं। इसके अलावा वीनिया ग्राटिग, गूटी दाब तथा ढूठ दाब (स्ट्रलिंग) विधियाँ नर्सरी तैयार करने में अधिकांशतः अपनाते हैं।

सस्य क्रियाएँ : बाग लगाने से पहले खेत की जुताई करके उसे सममतल कर लेना चाहिए। इसके बाद में 1x1x1 मी. के गड्‌ढे़ 7×7 मी. की दूरी पर खोदते हैं। गड्‌ढे़ में 30 कि.ग्रा. अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद, 2.5 कि.ग्रा. सुपर फॉस्फेट व 1.5 कि.ग्रा. पोटेशियम सल्फेठ खुदी हुई मिट॒टी में मिलाकर गड्‌ढों में भरकर सिंचाई कर देते हैं। जुलाई-अगस्त में अमरूद के पौधों को इन्हीं गड्‌ढों में लगाते हैं।

उर्वरण व खाद : अमरूद की करीब 600 ग्रा. नत्रजन, 300 ग्रा. फास्फोरस तथा 400 ग्रा. पोटाश की प्रति पेड़ की दर से जरूरत होती है।  नाइट्रोजनयुक्त उर्वरण (यूरिया) की आधी मात्रा जुलाई में और आधी मात्रा सितम्बर-अक्टूबर में तथा पोटाशयुक्त (पोटेशियम सल्फेट) उर्वरकों की पूरी मात्रा जुलाई में देनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण : अमरूद के बाग में 2-3 निराई करनी चाहिए या 2.4-डी रसायन को 2 किग्रा./हेक्टेयर की दर से एक छिड़काव करें जिससे कि खरपतवार नियंत्रित रहते हैं।

तुड़ाई एवं उपज : अमरूद का पौधा 4 वर्ष पश्चात फल देना शुरू कर देता है। अमरूद की तुड़ाई मई-जून को छोड़कर पूरे साल की जाती है। दस साल के पौधे से लगभग 100 किग्रा. फलों की प्रति वर्ष तुड़ाई की जाती है।

कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी

  • जब फल गहरा हरा रंग छोड़कर पीले या हल्के पीले रंग के हो जाएं तो उनकी तुड़ाई करें।
  • छंटाई करके पैकिंग करें।
  • 8 से 10 डिग्री से. तापमान व 80-90 प्रतियात सापेक्ष आर्द्रता पर एक महीने तक भण्डारित करें।
  • पके फलों से शर्बत, जैली या कार्डियल जैसे उत्पाद तैयार करें।

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

रोग

लक्षण

नियंत्रण

म्लानी (फ्यूजेरियम प्रजाति)

पत्तियाँ  भूरे   रेंग   की  हो   जाती  है और  पेड़   मुरझा जाता है।  प्रभावित  पेड़ों  की  डालियाँ  एक-एक  कर के सूखने लगती है।

* बाग  लगाने  से  पहले खेतों  को फार्मेल्डिहाइड (2  प्रतिशत) या ब्रॉसीकोल से उपचारित करें।

* दिखने पर बेविस्टीन (1 प्रतिशत) के 15 दिन के अन्तराल पी दो-तीन छिड़काव करें।

* जल निकास का उचित प्रबंधन करें।

एन्न्थ्राकनोज (कोलेडोट्रिकम ग्लेयोस्पोरिसाइडस)

* इस रोग का प्रकोप मुख्यतः फलों  पर  होता  है  परन्तु आक्रमण शाखओं पुष्पकलिकाओं और फूलों पर भी होता है।

* रोगी पेड़ ऊपर से सूखना प्रारंभ कर देते हैं।

* प्रभावित  फलों  फलों  व अन्य भागों को काटकर जला देना चाहिए|

आम व अमरूद के कीट प्रकोप एवं प्रबंधन

आम का फुदका

इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों ही पौधों के कोमल भागों से रस चूसकर हानि पहुँचाते हैं। पौधों में फल कम लगते हैं। इनका आकार छोटा होता है तथा टहनियों से गिर जाते हैं। इसके अलावा कीटों के मधुबिन्दु पर काली फफूंद आ जाने से पौधों की भोजन बनाने की क्षमता कम हो जाती है।

प्रबंधन

1. सर्दियों में पेड़ों की कटाई-छंटाई करें ताकि टहनियों ततक धूप व हवा पहुँचती रहे।

2. नाइट्रोजन खाद व सिंचाई का अधिक इस्तेमाल न करें।

3. एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लिटर या डाइमेथेएट 30 ई.सी. 2मि.लि./लिटर या इनिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.लि./3लिटर का छिड़काव करें।

4. सर्दियों में पौधों के तनों पर  कीटनाशियों  का छिड़काव लाभदायक होता है क्योंकि तब ये कीट तनों पर उपस्थित होते हैं।

2. आम की मीली बग

इस कीट के शिशु बढ़ते हुए प्ररोहों व फूलों के गुच्छों से रस चूसकर फसल को हानि पहुँचाते हैं।

अधिक  प्रकोप  की अवस्था में  फूल सूख जाते हें तथा कोई फल नहीं लगते। इसके अतिरिक्त कीटों के मधु बिन्दु पर काली फफूंद आने से पौधों के भोजन बनाने की क्षमता कम हो जाती है।

प्रबंधन

1.   दिसम्बर में पौधों के तने के चारों ओर भूमि की खुदाई करें ताकि कीट के अंडे नष्ट हो जाएँ।

2.   दिसम्बर में भूमि से 1 मीटर की ऊँचाई पर पौधों के तने पर अल्काथीन की 15-20 सें.मी. चौड़ी पट्टी बांध दें ताकि कीट के शिशु ऊपर न चढ़ पाएँ।

3.   पटटी के नीचे एकत्रित कीटों को एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.ली./लिटर या क्विनलफॉस 25 ई.सी. 2.5 मि.लि./लिटर के छिड़काव से नष्ट कर दें।

फल मक्खी

इस कीट के केवल शिशु ही फसल को हानि पहुँचाते हैं।  मादा मक्खी फलों में अंडे देती है तथा शिशु अंडों से निकलने के तुरंत बाद अंदर ही अंदर फल के गूदे को खा जाते हैं।

प्रबंधन

1. गिरे हए व प्रकोषित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।

2. पौधों के नीचे भूमि की खुदाई-छिलाई से इस कीट के प्यूपा नष्ट हो जाते हैं।

3. मक्खियों को आकर्षित कर मारने के लिए मीठे जहर, जो कि एन्डोस्लफान 35 ई.सी. 2मि.लि./लिटर पानी तथा 1 प्रतिशत गुड़ या चीनी (10 ग्राम/लिटर) से बनाया जा सकता है, का पौधों में छिड़काव करें।

4. फल मक्खी के नरों को आकर्षित कर पकड़ने के लिए ”मिथाइल यूजीनोल” पाश का इस्तेमाल करें।

4. छाल खाने वाली

इस कीट की इल्लियाँ तने की छाल खाती हैं तथा जाला बनाकर उसके अंदर रहती हैं। बाद में

ये तने या मुख्य शाखा में छेदकर सुरंग बना देती है।

प्रबंधन

1. छेदों में नुकीली तार डालकर इल्लियों को नष्ट कर दें।

2. छेदों से जालों को हटाकर इसमें पेट्रोल या मिट॒टी के तेल या डाइक्लोरवास में डुबोई रूई ठूस दें तथा इन्हें ऊपर से गीली मिट॒टी से बंद कर दें।

किन्नो

विदेश से मंगाई गई संकर किस्म किन्नो राजस्थान, पंजाब, हरियाना, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जाती है।

नर्सरी तैयार करना : किन्नो का प्रवध्रन बीज द्वारा नहीं किया जाता है। इसका प्रवर्धन मुख्यतः कायिक विधि द्वारा किया जाता है जिसमें कलिकायन मुख्य विधि है। कलिका केवल उच्च गुक वाले पौधे से ही लेनी चाहिए तथा यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह पौधा किसी भी बीमारी से ग्रसित न हो। अच्छी बढ़वार के लिए एक वर्ष  पुराने  तथा  2.5 से.मी.  मोटाई  वाले मूलवृंत पर लगभग 15-20 सें.मी. की ऊँचाई पर कलिकायन करना चाहिए। कलिका को मूलवृंत पर प्रत्यारोपित करके पॉलीथीन की पट्टी से ठीक से बाँध देना चाहिए।

सस्य क्रियाएँ : नर्सरी से पौधों को पिण्डी सहित खोद लेना चाहिए तथा पत्तियों की छंटाई कर देनी चाहिए जिससे वाष्पन कम हो जाए तथा पौधों के सूखने की संभावना न रहे। जिस खेत में किन्नो लगाना हो, उसे सममतल बनाकर उचित दूरी के अनुसार 1ग1ग1 मीटर माप के गड्‌ढे मई के महीने में खोद लेने चाहिए। गड्‌ढे कुछ दिनों के लिए खुले छोड़ने चाहिए। उसके बाद आधी मिट॒टी तथा गोबर की बराबर मात्रा मिलाकर गड्‌ढों को पुनः भर ेना चाहिए। नींबू वर्गीय फलों के वृक्षों को मार्च-अप्रैल या जुलाई-अगस्त में लगाना चाहिए। किन्नो की सधन बागवानी के लिए ट्रायर मूलवृंत का प्रयोग करना चाहिए।

उर्वरण व खाद : किन्नों फलवृक्षों को अधिक मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। गोबर की खाद या जैविक खाद की पूरी मात्रा का प्रयोग दिसम्बर के अन्तिम पखवाडे़ में करना चाहिए। जबकि नत्रजन तथा पोटाश उर्वरकों की आधी मात्रा फरवरी-मार्च तथा आधी मात्रा जून-जुलाई में डालनी चाहिए। फॉस्फोरस की पूरी मात्रा फरवरी-मार्च में देनी चाहिए। एक वर्ष के पौधे के लिए 20 कि.ग्रा. गोबर की खाद, 250 ग्रा. अमोनियम सल्फेट, 250 ग्रा. सुपर फॉस्फेट तथा 250 ग्रा. पोटेशियम सल्फेट की आवश्यकता होती है। पौधे की आयु के अनुसार खाद एवं उर्वरण बढ़ाते जाते हैं।

खरपतवार नियंत्रण : नर्सरी तथा बागवानी में खरपतवार मुख्य समस्या है। अधिकांश खरपतवारों को हाथों द्वारा उखाड़ दिया जाता है। इसके अलावा खरपतवारनाशी डाइयूरान का 5 कि.ग्रा./है. की दर से छिड़काव करते हैं।

तुड़ाई एवं उपज : किन्नो के फल मध्य दिसम्बर से जनवरी में पकते हैं लगभग नौ महीने बाद फल पककर तैयार होते हैं। किन्नो में साधारणतः 250-350 फल प्रति पेड़ लगते हैं।

कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी

  • सही रंग आने पर तुड़ाई के बाद श्रेणीकरण करके मोमीकरण करें।
  • मोमयुक्त फलों की गत्ते के छिद्रयुक्त डिब्बों में पैकिंग करें।
  • शीत भण्डारण में 10 डिग्री से.  तापमान व 85-90  प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता पर 60-70 दिनों तक भण्डारित करें।
  • पूरी तरह से पके हुए फलों से रस तैयार करें।

कागजी नींबू

संतरा और स्वीट औरेंज के बाद कागजी नींबू तीसरा सबसे महत्वपूण्र उगाया जाने वाला फल है। भारत का विशव में कागजी नींबू पैदा करने में पहला स्थान है। इस समूह के फल विटामिन तथा प्रति-ऑक्सीकारकों से भरपूर होते हैं।

किस्में : कागजी कला, पन्त लेमन-1, प्रमालिनी, विक्रम, चक्रधर, पी.के.एम.-1, सेलेक्सन-49, सीडलेस लाइम इत्यादि।

नर्सरी तैयार करना : नींबू वर्गीय पौधों के प्रवर्धन की अनेक सिधियाँ हैं उनमें से कुछ मुख्य व्यावसायिक विधियों का विवरण निम्न है।

बीज द्वारा नर्सरी तैयार करना : कागजी नींबू की मुख्यतः बीज द्वारा पौध तैयार की  जाती है।  जोकि  मूलवृंत के रूप में प्रयोग किए जाते हें। बीज द्वारा तैयार पौध में विषमता पाई जाती है जिससे समान प्रकार के फल तथा अच्छी उपज नहीं मिलती है। बुवाई से पहले बीजों को बेन्जाइल ऐडनीन (10 पी.पी.एम.) या निब्रेलिक उम्ल (40 पी.पी.एम.) में 12 घण्टे तक उपचारित करना चाहिए।

कायिक प्रवर्धन द्वारा नर्सरी तैयार करना : कागजी नींबू का पंवर्धन कृंतन, गूटी विधि और कलिकायन द्वारा किया तजा सकता है। कायिक प्रवर्धन में कलिकायन बहुत प्रचलित तथा उपयोगी विधि है।

सस्य क्रियाएँ : कागजी नींबू की रोपक देरी 4-6 मी. तक होती है। सघन बागवानी के लिए 3×3 मी. की दूरी रखते हैं। पौध रोपाई के लिए मई के महीने में 90-100 सें.मी.3 आकार के गड्‌ढे खोद लें तथा जून में इस गड्‌ढे की ऊपर सतह पर की मिट॒टी में उतनी ही मात्रा गोबर की खाद मिलाकर जून के महीने में भर दें। कागजी नींबू का रोपक मानसून के समय (जून-अगस्त) करते हैं। गड्‌ढे को भरने के लिए सड़ी गोबर की खाद और बोन मील के मिश्रक का प्रयोग भी करते हें।

उर्वरण व खाद : नाइट्रोजन की पूर्ति गोबर की सड़ी हुई खाद अथवा कम्पोस्ट (25 प्रतियात), खली (25 प्रतिशत) तथा रासायनिक उर्वरण (50 प्रतिशत) से होती है जबकि फॉस्फोरस और पोटाश की पूर्ति सुपर फॉस्फेट तथा सल्फेट ऑफ पोटाश से करना चाहिए। खाद तथा उर्वरण पौधों के मुख्य तने से 20-30 सें.मी. जगह छोड़कर डालने चाहिए एवं पूर्ण विकसित पौधे को करीब 300 ग्राम नत्रजन 250 ग्राम फास्फोरस एवं 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है।

खरपतवार नियंत्रण : खरपतवार नियंत्रण को थाला से हटा देना चाहिए जिससे कि पौधे की बढ़वार लगातार होती रहे। नींबू वर्गीय बाग में मुख्यतः मानोयूरान अथवा डायूरान का 2 कि.ग्रा. 500 लिटर पानी में मिलाकर छिड़काव करते हैं।

तुड़ाई एवं उपज : कागजी नींबू की तुड़ाई उत्तर भारत में जून-जुलाई में की जाती है। तुड़ाई के लिए कैंची का प्रयोग करते हैं जिससे कम से कम हानि हो। कागजी नींबू की उपज लगभग 300-500 फल प्रति पेड़ प्रति वर्ष आंकी गई है।

तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकी

  • जब फलों का हरा रंग पीले रंग में परिवर्तित होना शुरू हो जाए तो तुड़ाई करें।
  • छंटाई के बाद टोकरियों या जूट के बोरों में पैक करके मंडी भेजें।
  • 10 डिग्री से. तापमान व 8590 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता पर 40-50 दिनों तक भण्डाारित करें।
  • फलों से अचार, स्कवैश तथा छिलके से तेल तैयार करें।

किन्नो व कागजी नींबू के प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

रोग

लक्षण

नियंत्रण

सिट्रस कैंकर (जीवाणु) (जैंथेनोमास ऑक्सोनोपोडिस सीट्रिक)

पत्ते, टहनियाँ, कांटे तथा फल प्रभावित होते हैं। पहले हल्का  पीला दाग दिखता है जो बाद  में भूरे रंग का और बनावट में खुरदरा हो जाता है।

* गिरी हुई पत्तियों  को इकट्ठा करके नष्ट करें तथा रोगग्रस्त टहनियों को छांट देना चाहिए।

* बरसात के पहले बोर्डों मिश्रण  (5 :5 : 50 कॉपर सल्फेट : चूना : पानी) का छिड़काव करें|

* स्ट्रैप्टोसाइक्लीन  (3 ग्राम 100 पानी में) और नीम की  खली  के  घोल (1 किलो 15 लिटर पानी में) का छिड़काव करें।

गोंदार्ति (कवक)

तनों, जड़ों, पत्तियों और फलों पर कवक आक्रमण करती है| 

* पौधे को कम पानी या अच्छी जल निष्कासन वाली जगह पर लगाएँ।

* पौधों की जड़ों को कैप्टान (0.02 प्रतिशत) के घोल में 10-15 मिनट तक डुबोए।

ट्रिस्टेजा (विषाणु)

पत्तियाँ पीली होकर गिर जाती हैं। पत्तियों के गिरने के बाद टहनियाँ ऊपर की तरफ से सूखना व मरना प्रारंभ करती है।

* बीजांडकारी पौधों का प्रयोग करें।

* रोगवाहक माहू को टहनियाँ ऊपर की तरफ से कीटनाशी द्वारा नियंत्रित करें |

हरितन रोग (जीवाणु)

पत्तियों के पीले भाग मे कहीं – कहीं द्वीप दिखाई पड़ते हैं | पत्तियों का छोटी व मोटी हो जाना पेड़ का सीधा ऊपर की तरफ बढना  और गिर जाना अन्य लक्षण हैं |  यह प्रभावित सांकुर डाली और रोगवाहक कीट स्ट्रिस सिल्ला द्वारा फैलता है |

* रोगी पौधों को उखाड़ जला दें।

* सिल्ला कीट की रोकथाम कीटनाशियों से करें।

* लेडरमाइसनि एवं बैविस्टिन को बराबर अनुपात में  मिलाकर  (500 + 500 ग्राम को प्रति 10  लाख  भाग  पानी  में मिलाकर)  10 दिन के अन्तर    पर 2 से 3 छिड़काव करें।

किन्नो व कागजी नींबू के कीट प्रकोप एवं प्रबंधन

1.   नींबू का सिल्ला

यह नींबू जाति के सभी फलों का एक प्रमुख कीट है। इस कीट के शिशु व वयस्क नई टहनियों तथा पत्तों से रस चूसते हैं जिससे ये धीरे-धीरे पीले पड़कर सूख जाते हैं।

सिल्ला के नियंत्रण के लिए मेथाइल डेमिटोन 25 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या डाइमेथेएट 30 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या इमिडक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.लि./4 लिटर पानी की दर से छिउक़ाव करें।

2. पत्ती सुरंगक

इस कीट की सूंडियाँ मुलायम पत्तियों की दोनों सतहों पर चांदी की तरह चमकीली और टेढ़ी-‘मेढ़ी सुरंगें बनाती हें।

इस कीट की रोकथाम के लिए सिल्ला के लिए सुझाए गए कीटनाशियों का प्रयोग करें।

सफेद व काली पक्खी (व्हाइट एंड ब्लैक फलाई)

इन कीटों के शिशु व वयस्क दोनों ही मुलायम पत्तियों से रस चूसते हैं जिससे ये पीली होकर मुड़ जाती हैं तथा सूखकर गिर जाती हैं। कीटों के मधुबिन्दु पर काली मोल्ड आने से इनकी भोजन बनाने की क्षमता कम हो जाती है।

प्रबंधन

1. बाग में पौधे घने न लगाएँ व पानी का निकास सही रखें।

2. एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या डाइमेथेएट 30 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.लि./4 लिटर पानी की दर से छिड़काव करें।

तितली (लैमन बटरफलाई)

इस कीट की सूंडियाँ कोमल पत्तियों को किनारों से मध्य शिरा तक खाकर क्षति पहुँचाती है। नर्सरी तथा छोटे पौधों पर इसका अधिक प्रकोप होता है।

प्रबंधन

1. सूंडियों व प्यूपा को हाथ से पकड़ कर नष्ट कर दें।

2. नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या बी.टी. 1 ग्राम/लिटर या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.ली./4 लिटर या एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर से छिड़काव करें।

छाल खाने वाली सूंडी

इसका विवरण आम के अंतर्गत देखें।

दीमक

दीमक या तो जमीन में पौधों की जड़ों को खाकर तने को खोखला करते हुए ऊपर की ओर बढ़ते हैं अथवा वेड़ों की बाहरी सतह पर मिट॒टी की सुरंग में रहकर छाल को खाते हैं।

प्रबंधन

1. खेत को साफ रखें व ठूंठ सड़ी-गली घास व सूखी लकड़ी आदि खेत में न रहने दें।

2. वृक्षों के आसपास गहरी जुताई करें व पानी दें जिससे दीमक का प्रकोप कम हो जाता है।

3. गोबर की हरी व कच्ची खाद प्रयोग में न लाएँ।

4. जहाँ तक हो सके पुरानी दीमक को नष्ट कर दें।

5. पौधे लगाने से पहले क्लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. 1-2 मि.लि./गड्‌ढा सिंचाई के साथ प्रयोग करें। लगे हुए पौधों में भी समय-समय पर क्लोरपायरीफॉस प्रयोग करते रहें।

पपीता

पपीता भारत वर्ष में पूरे साल पैदा होता है। यह एक सर्वंिलंगी पौधा है तथा इसमें नर, उभयलिंगी और मादा पौधे पाए जाते हैं। इसको उगाने के लिए कम जगह की आवश्यकता होती है तथा इसमें एक वर्ष में ही फल आना शुरू हो जाते हैं।

किस्में : पूसा डेलीसियस, पूसा मैजिस्टी, पूसा जायन्ट, पूसा ड्‌वार्फ, पूसा नन्हा, सूर्या, हनीड्‌यू, कुर्ग हनीड्‌यू, वाद्गिांगटन, कोयम्बटूर-1, कोयम्बटूर-2, कोयम्बटूर-3, कोयम्बटूर-5, कोयम्बटूर-6, कोयम्बटूर-7, सोलो इत्यादि।

नर्सरी तैयार करना : पपीते का प्रवर्धन बीज द्वारा किया जाता है। एक हैक्टेयर खेत में पौध लगाने के लिए लगभग 250-300 ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। पपीते की नर्सरी के लिए 10 सें.मी. ऊँची, 3 मी. नमबी तथा 1 मी. चौड़ी क्यारी बनानी चाहिए। पपीते की पौध को पॉलीथीन के थैलों में भी तैयार किया जा सकता है। नर्सरी हेतु अथवा पॉलीथीन के थैलों में भरने हेतु बालू, मिट॒टी तथा गोबर की सड़ी हुई खाद की समान अनुपात में मिलाकर मिश्रक तैयार करना चाहिए। बुवाई से पहले बीज को मीनोसान 0.1 प्रतिशत की दर से उपचारित करते हैं जिससे डैम्पिंग ऑफ कम होता है।

सस्य क्रियाएँ : रोपक करने से पहले भूमि की अघ्छी तरह जुताई करके सममतल बना लेते हैं। पौधे लगाने के लिए 60*60*60 सें.मी. आकार का गड्‌ढा तैयार करना चाहिए। एक गड्‌ढे में 20 कि.ग्रा. सड़ी हुइ्र गोबर की खाद, 1 कि.ग्रा. नीम खली तथा 1 कि.ग्रा. बोन मील की आवश्यकता होती है। पपीते का रोपक मुख्यतः फरवरी-मार्च में किया तजाता हे इसके अलावा मानसून तथा शीतकाल में भी रोपक कर सकते हैं। पपीते में पौधों की संघनता किस्म, भूमि तथा जलवायु पर निर्भर करती है। पौधे से पौधे तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 2.1 ग 2.1 मी. अधिकांशतः किस्मों में रखी जाती है ओर पूसा नन्हा के लिए 1.2 ग 1.2 मी. का प्रयोग करते हैं। जहाँ हवाएँ तेज चलती है तथा पत्तियों का नुकसान होता है वहाँ पपीते के बगानों के चारों तरफ हवा रोधक पौधे लगाना चाहिए। द्विलिंगी किस्मों के पपीते के बागों में 10:1 के अनुपात में मादा तथा नर पौधे रखना चाहिए। पपीते की अच्छी उपज, बढ़वार तथा गुकवत्ता के लिए र्प्याप्त सिंचाई करना आवश्यक होता है।

उवंरण व खाद : पपीते की फसल बागवानी के लिए खाद एवं उर्वरण की समुचित मात्रा की आवश्यकता होती है। सामान्यतः पपीते के पौधों को नत्रजन 200-250 ग्रा., 200-250 ग्रा. फॉस्फोरस तथा 200-250 ग्रा. पोटाश 4 से 6 बराबर भागों में विभक्त करके देते हैं।

खरपतवार नियंत्रण : पपीते की अच्छी बढ़वार के लिए 2-3 निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है तथा लूक्लोरेलिन 2.0 ग्रा./है. की दर से छिड़काव करना चाहिए।

तुड़ाई एवं उपज : पपीते के फल पूरी तरह से पकने के बाद ही तुड़ाई करते हैं तथा इसकी उपज 30-45 फल/पौधा होती है। लेभग 60-75 टन/है. उपज भी मिलती है।

तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकी

1. जब फलों का रंग हरे से पीले में परिवर्तित होना शुरू हो जाए तो तुड़ाई करें।

2. आकार व रंग के आधार पर वगी्रकृत कर गत्ते के बक्सों में पैक करेंं।

3. 10-12 डिग्री से. तापमान व 80 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता पर 15-20 दिनों तक भण्डारित करें।

4. कच्चे पपीते से पर्पन निकालें।

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

रोग

लक्षण

नियंत्रण

तना विगलन (पाईथियम प्रजाति)

इससे संक्रमित पौधों के स्तंभ मूल  क्षेत्र पर डाल पतली हो जाती हैं| ग्रसित पौधों की पत्तियाँ मुरझाकर पीली पड़ कर गिरने लगती है। तने के सड़ने के कारण पौधा गिर जाता है।

* संक्रमित  पौधों  को उखाड़ कर जला देना चाहिए।

* रोगी भाग पर बोर्डो लेप लगाना चाहिए तथ  इसके चारों ओर  5 : 5 : 50 सान्द्रता वाले बोर्डो मिश्रक द्वारा भूमि को उपचारित  करना चाहिए। 

आद्र्र विगलन रोग

ग्रसित पौध का तना जमीन के पास सडने लगता है तथा पौध बाद मे मुरझाकर गिर जाती है |   

* बीज बोने से पहले मिट॒टी को फारमेल्डिहाइड (2.5 प्रतिशत) के घोल से निर्जर्मीकृत करना चहिए।

* बीजों को थीरम, एग्रोसन या

कैप्टान नामक फंफूदीनाशक

दवाओं से 1 : 500 की दर से

उपचारित करना चाहिए।

मोजैक

ग्रसित पौधे छोटे रह जाते हैं। पत्तियाँ मुड़ जाती है। नई पत्तियाँ आकार में छोटी तथा चितकबरी हो जाती हैं|  

मैलाथियान (0.10 प्रतिशत) या

मेटासिस्टकक्स (0.5 प्रतिशत) का 10-15  दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।

पर्ण कुंचन

रोगी पत्तियाँ छोटी, सुर्रीदार व

विकृत हो जाती हैं। पत्तियाँ नीचे की तरफ मुड़ कर एक प्यालेनुमा आकृति बना लेती हैं। पत्तियों के पर्णवृंत टेढे़-मेढे़ हो जाते हें|

कीटनाशक मेटासिस्टॉक्स 0.1 प्रतिशत) का छिड़काव करना चाहिए। रोग  प्रभावित  पौधों को बागों से निकाल देना चाहिए।

कीट प्रकोप एवं प्रबंधन

1. लाल मकड़ी माइट (रेड स्पाइडर माइट)

लाल मकड़ी माइट पत्ती व फलों से  रस चूसती है  जिससे  पत्ते पीले पड़ जाते हैं व फलों की सतह खुरदरी भूरे रंग की जाती है। फलों पर ध्ब्बे भी बन जाते हैं।

इस कीट के नियंत्रण के लिए कैल्थेन  18.5 इ्र.सी. 2-3 मि.लि. /लिटर या आबामेक्टिन 1.9 ई.सी. 1 मि.लि./2 लिटर या मेथइल डेमिटोन 25 ई.सी. 2 मि.लि./ लिटर का छिड़काव करें।

2. फल मक्खी (फ्रूट फलाई)

फल सब्जी तुड़ाई से पहले पके हुए फलों को नुकसान पहुँचाती हैं। इस कीट के नुकसान के लक्षण व प्रबंधन आम के न्तिर्गत दर्शाए गए  हैं।

3. सूत्रकृमि (नेमाटोड)

पपीते की फसल को जड़गांठ (रूट नॉट) एवं रीनिुॉर्म काफी नुकसान पहुँचाते हैं। ग्रसित पौधों की जड़ों में मांठें बनने से पौधे बौने रह जाते हैं व पत्ते पीले होकर सूख जाते हैं।

प्रबंधन

1. पपीते की सूत्रकृमि प्रतिरोधी किस्म जैसे ”पूसा मजेस्टी” लगाएँ।

2. कार्बोफ्‌चूरॉन 3 जी 3-4 ग्राम/पौधा प्रयोग करें।

4. रस चूसने वाले कीट

चेपा (एफिड) व सफेद मक्खी (व्हाइट फलाई) रस खूसकर पौधों को नुकसान पहुँचाते हैं। लेकिन ज्यादा नूकसान इनके द्वारा वाइरस बीमारियाँ फैलाने से होता है।

इन कीटों की रोकथाम के लिए डाईमेथोएट 30 ई.सी. 1 मि.लि./ लिटर या मेथाइल डेमिटोन 25 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या इमिडाक्लोप्रिड. 17.8 एस.एल. 1 मि.लि./3 लिटर पानी की दर से छिड़कें।

स्ट्राबेरी

स्ट्राबेरी एक स्वादिष्ट, लुभाने  वाला तथा  पौष्टिक फल है। इसमें विटामिन सी तथा लोहा बहुतायत  में होते हें। यह फल साधारणतः  हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र में पैदा किया जाता है।

किस्में : चान्डलर, गुरिल्ला, टियोगा, सीस्कैप, स्वीटचार्ली, डाना, टोरे, सेल्वा, बेलरूपी, फर्न, पजारो इत्यादि।

नर्सरी तैयार करना : स्ट्राबेरी का प्रवर्धन मुख्य रनर (लता को पकड़ने वाली नोक) द्वारा किया जाता है जाकि कायिक प्रवर्धन का एक भाग है। एक पौधे से 7-10 रनर प्राप्त होते हैं। बड़े स्तर पर प्रवर्धन के लिए सूक्ष्म प्रवर्धन (ऊतक प्रवर्धन) का प्रयोग करते हैं। इस विधि से पूरे वर्ष पौधे प्राप्त करते हैं।

सस्य क्रियाएँ : भूमि को तैयार करना स्ट्रबेरी की खेती के लिए जरूरी होता है। भूमि को जोतकर सममतल बनाते हैं। रनर का रोपक समय सितम्बर-अक्टूबर है। रोपक करते समय यह ध्यान रहे कि रनर स्वस्थ,, कीट एवं बीमारी रहित होने चाहिए। चार तरीके से इसका रोपक करते हैं, जैसे- मैटिड से, स्पेस्ड से, हिल तथा प्लास्टिक फिल्म।

उर्वरण व खाद : भिन्न-भिन्न खद एवं उर्वरण की दर अलग-अलग राज्यों के लिए निर्धारित की गई है जिसमें हिमाचल प्रदेश  के लिए खाद व उर्वरण को इस प्रकार निर्धारित किया गया है : 50 टन सड़ी हुई गोबर की खाद, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश को भूमि तैयार करने समय डालते हैं। नत्रजन (80 कि.ग्रा.) को दो भागों में बांटका एक भाग को सितम्बर और दूसरे भाग को फुल आते समय देना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण : खरपतवार नियंत्रण के लिए 3-4 निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है। ड्‌यूरान रसायन 5 कि.ग्रा./है. का एक छिड़काव फसल की गुड़ाई के बाद करें।

तुड़ाई एवं उपज : स्ट्राबेरी की तुड़ाई फलों के आधे से तीन चौथाई भाग के रंग बदलने के पश्चात् करते हैकं। फलों का पकना गर्म मौसम में शीध्र होता है। फल की तुड़ाई डण्ठल सहित सुबह के समय करते हैं। इसकी उपज 90 क्विंटल/है. आंकी गई है। अच्छे उव्ररण प्रबंध द्वारा इसकी उपज 175-200 क्विंटल/है. तक होती है।

तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकी

  • फलों की सतह का 2/3 हिस्सा लाल रंग का होने पर तुड़ाई करे।
  • छंटाई करके फलो को प्लास्टिक की पन्नेट (200 ग्राम) में पैक करें।
  • पन्नेट को सिंगल लेयर सीएफबी बॉक्य में रखें।
    • फलों को शीत गृह मे 4-5 डिग्री से. तापमान व 85-90 प्रतिशत आर्द्रता पर 20-25 दिन के लिए भण्डारित करें।
    • फलों से जैम, जेली, आईसक्रीम आदि उत्पाद तैयार करें।

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

रोग

लक्षण

नियंत्रण

फल गलन व सड़न रोग

शुरू में पकते हुए फलों पर भूरे मुलायम धब्बे पड़ते हैं जो धीरे-धीरे बढ़ते रहते हैं और परिणाम स्वरूप् पूरे फल सड़ जाते हैं।    

* फलों को मिट॒टी के संपर्क में आने बचाएँ|

* फूलों के खिलने पर कार्बेन्डाजिम (0.05 प्रतिशत) का छिडकाव करें|  

मुरझान

शुष्क मौसम में फूल, पत्तों एवं फलों के डंठल गहरे लाल होने लगते हैं और पौधा धीरे-धीरे सूख जाता है।

* पौधे लगाने से पहले उन्हें किसी कॉपरयुक्त कवकनाशी से

उपचारित करें।

कीट प्रकोप एवं प्रबंधन

1. लाल मकड़ी माइट (रैड स्पाइडर माइट)

ये लाल रंग के माइट पत्तों की निचली सतह से रस चूसते हैं जिससे पत्तों पर धब्बे बन जाते हैं तथा उनकी वृद्धि रूक जाने से उपज कम हो जाती है।

2. थ्रिप्स

थ्रिप्स पौधे के पत्तों व फलों से रस चूसकर हानि पहुँचाते हैं। इनसे फसल के बचाव के लिए एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लिटर या डाइमेथेएट 30 ई.सी. 1 मि.लि./लिटर का छिड़काव करें।

3. पत्ती सूत्रकृमि (लीफ नेमाटोड)

यह सूत्रकृमि पौधे के नए फलों को नुसान पहुँचाता है जिससे ये टेढे़-मेढे़ हो जाते हैं तथा इन पर स्लेटी रंग के धब्बे बन जाते हें। पौधों की वृद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ने से ऊपर  काफी कम हो जाती है।

प्रबंधन

1. खेत की मिट॒टी का निर्जर्मीकरण करें।

2. रोपाई से पहले पौधे को 5 मिनट के लिए इसाजोफॉस 50 ई.सी. के 2 प्रतिशत घोल में डुबोएँ।

स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार; ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान

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