//बिहार में बाँस की वैज्ञानिक खेती व राष्ट्रीय बाँस मिशन

बिहार में बाँस की वैज्ञानिक खेती व राष्ट्रीय बाँस मिशन

परिचय

बाँस प्रकृति की अद्भुत देन है। संख्या तथा विविधता की दृष्टि से किसी उगाए जाने वाले पादप के इतने उपयोग नहीं होते जितने बाँस के होते हैं। बाँस की मानव जीवन में सदैव महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बाँस विशाल घासों कुल का पौधा है जिसमें कल्में भूमिगत राईजोम से उत्पन्न होती है। यह झाड़ीनुमा होता है, जिसकी प्रकृति वृक्ष की तरह होती है। इस धरती पर यह सबसे तीव्र गति से बढ़ने वाला पौधा है। बाँस को काष्ठीय रूप में वर्गीकृत किया जाता है। ज्यादातर पोरी (इंटरनोड्स) के साथ हौलो – कल्म तथा कल्म नोड्स पर शाखाएं होती है। बाँस की आनुवंशिक विविधता की सम्पन्नता के संदर्भ में भारत विश्व का दूसरा देश है यहां 75 वंशक्रमों (जेनेरा) के तहत कुल 136 प्रजातियां पाई जाती है। इसकी परिधि में वन क्षेत्र का लगभग 8.96 मिलियन हैक्टेयर आता है जो देश के कुल वन क्षेत्र के 12.8 प्रतिशत के समतुल्य है। वनीय क्षेत्र में इसे खराब प्रबंधन, कम उत्पादकता तथा अत्यधिक दोहन के कारण नुकसान होता है। यद्यपि हाल के वर्षों में विकास के एक प्रमुख घटक तथा निर्धन ग्रामीणों के जीवन निर्वाह में सुधार के लिए एक प्रभावशाली तरीके के तौर पर बाँस के बारे में जागरूकता में बढ़ोतरी हुई है। इस पेड़ के 1500 से ज्यादा उपयोग दर्ज हैं (पालना – झूला से लेकर ताबूत तक) तथा इसमें रोजगार तथा आय सृजन और गरीब ग्रामीणों के पोषण स्तर में सुधार की व्यापक सम्भावनाएं मौजूद हैं। बाँस तीन प्रकार के है –

  • संधिताक्षी (सिम्पोडियल) लम्बी ग्रीवा सहित संधिताक्षी (मैकोलान्ना बेसीफेरा),
  • एकलाक्षी (मोनोपोडीयल) एवं
  • एम्फोडियल ।

वाणिज्यिक प्रयोजन हेतु राष्ट्रीय बाँस मिशन द्वारा दस प्रमुख प्रजातियों की पहचान की गई हैं जिसमें निम्नलिखित शामिल है-

  • बम्बूसा बम्बोस
  • बी० बैलकोआ
  • बी० न्यूटेन्स
  • बी० टूल्ज
  • डेन्ड्रोकैलामस स्ट्रीक्टस
  • डी० हैमीलटोनी।
  • डी० ऎस्पर।
  • डी० गीगान्टीयस
  • मैलोकैना बेसीफेरा
  • ओकलेंज ट्राबनकोरिका ।

बिहार में बाँस का प्रमुख उपयोगकर्ता मकान निर्माण, कुटीर उद्योग एवं हस्तशिल्प है। इसके अलावा बाँस अनेक पारम्परिक कुटीर उद्योगों की सहायता भी करता है जिसमें हस्तशिल्प, सुगंधित अगरबत्ती तथा अन्य संबंधित वस्तुओं का उत्पादन शामिल है।

लकड़ी के स्थान पर बॉस उत्पाद

यद्यपि आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा बनाए गए बाँस उत्पादों, लकड़ी उत्पादों, विशेष रूप से सख्त, लकड़ी उत्पादों की तरह इस्तेमाल किए जाने के लिए पूरी तरह उपयुक्त है। सख्त लकड़ी की प्रजातिया जैसे टीक, साल, बांजु (ओक), मैफिल, माईकेला डीपटीरोकारपस आदि को परिपक्व होने में 80 वर्ष से भी ज्यादा समय लगता है जबकि बाँस को परिपक्व होने में 4 वर्ष का समय लगता है। इस प्रकार जब हम बाँस उत्पादों का उपयोग करते हैं उस समय हम कुछ हद तक लकड़ी का प्रतिस्थापन करते हैं जिसमें हम अपने वनों की सुरक्षा करते हैं जो हमारी घरती को अगली पीढ़ी के लिए हरा-भरा और स्वच्छ बनाते हैं।

राष्ट्रीय बाँस मिशन

देश में घरेलू एवं निर्यात बाजारों के लिए मूल्यवर्धित प्रसंस्कृत बाँस उत्पादों को उत्पादन का आधार बनाना आवश्यक है। गुणवत्तापूर्ण सामग्री की आपूर्ति के लिए बाँस क्षेत्र के तीव्र विकास हेतु समुदायों, गैर सरकारी संगठन, किसानों एवं उद्यमियों को प्रोत्साहन किया जाना है। इसके साथ अर्थव्यवस्था एवं समाज के बीज समेकित परस्पर समन्वय स्थापित किया जाना हैं जिससे पर्यावरण अनुकूल उत्पाद एवं विपणन नेटवर्क को मजबूती प्रदान किया जा सके। उपभोक्ताओं को सस्ते मुल्य पर गुणवत्ता वाले उत्पादों की पर्याप्त रूप से उपलब्धता सुनिश्चित हो, जिसके लिए वाणिज्यिक रोपण पर विशेष जोर देने के साथ-साथ टिकाऊ विकास को बढ़ावा देना, रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन के बाँस मिशन कार्यक्रम को प्रारम्भ किया गया है। राष्ट्रीय बाँस मिशन केन्द्र द्वारा प्रायोजित स्कीम है। जिसमें केन्द्र सरकार का शत-प्रतिशत अंशदान है। इस स्कीम को कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली के अन्तर्गत कार्यरत बागवानी प्रभाग द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है। राज्य में कृषि विभाग के उद्यान निदेशालय अन्तर्गत बिहार बागवानी विकास सोसायटी के अधीन राज्य बाँस मिशन का कार्यान्वयन किया जा रहा है।

राज्य में राष्ट्रीय बाँस मिशन शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता से वित्तीय वर्ष 2006-07 से शुरू की गई है। बॉस मिशन वन क्षेत्र में वन एवं पर्यावरण विभाग और गैर वन क्षेत्र में कृषि विभाग की सहायता से चलायी जा रही है जहाँ नोडल विभाग कृषि है। वन क्षेत्र में योजना का क्रियान्वयन वन विकास एजेन्सी एवं गैर वन क्षेत्र में जिला बाँस विकास एजेन्सी की सहायता से किया जा रहा है। गैर वन क्षेत्र में बाँस मिशन, राज्य के 16 (सोलह) जिलों यथा मुंगेर, बाँका, जमुई, नालन्दा, मुजफ्फरपुर, प० चम्पारण, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, कटिहार, किशनगंज, अररिया, मधेपुरा, पुर्णियाँ, सीतामढ़ी एवं शिवहर में चलायी जा रही है। राज्य बाँस मिशन को कार्यान्वित करने के लिए राज्य स्तरीय स्टीयरिंग कमिटी का गठन किया गया है, जिसके पदेन अध्यक्ष प्रधान सचिव कृषि है एवं प्रधान सचिव, वन एवं पर्यावरण पदेन उपाध्यक्ष हैं। निदेशक, राज्य बॉस मिशन सदस्य सचिव हैं। जिला स्तर पर जिला बॉस विकास एजेन्सी (डी.बी.डी. ए.) का गठन किया गया है। जिला पदाधिकारी इस एजेन्सी के पदेन अध्यक्ष, उप विकास आयुक्त पदेन उपाध्यक्ष एवं जिला उद्यान पदाधिकारी सदस्य सचिव बनाए गए हैं।

मिशन के उद्देश्य

  • क्षेत्र आधारित क्षेत्रीय रूप से विभेदीकृत रणनीतियों द्वारा बाँस क्षेत्र की व्यापक वृद्धि को बढ़ावा देना;
  • वन तथा गैर-वन क्षेत्रों दोनों में बाँस के तहत आने वाले क्षेत्र को बढ़ाने के साथ-साथ पैदावार बढ़ाने के लिए उचित किस्मों की वृद्धि,
  • बॉस आधारित हस्तशिल्प के विपणन को बढ़ावा देना;
  • बाँस के विकास के लिए स्टेकहोल्डरों के बीच अभिसरण और सहयोग को स्थापित करना;
  • पारम्परिक विवेक तथा आधुनिक वैज्ञानिक जानकारी के सीवनहीन ब्रांड द्वारा विकास और प्रसार प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना;
  • कुशल तथा अकुशल व्यक्तियों विशेष रूप से बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित करना।

रणनीति

उपरोक्त उद्देश्यों को हासिल करने के लिए मिशन द्वारा निम्नलिखित रणनीतियों को अंगीकृत किया जायगा –

  • उत्पादकों/निर्मताओं को उचित लाभ सुनिश्चित करने के लिए विशिष्ट अवधारणा को अपनाना जिसमें उत्पादन और विपणन शामिल हैं;
  • उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) को बढ़ावा देना;
  • खेती योग्य भूमि (वन एवं गैर-वन क्षेत्रों में) और उत्पादकता वृद्धि;
  • सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में सभी स्तरों पर अनुसंधान एवं विकास एजेन्सियों के बीच प्रतिभागिता, अभिसरण तथा सहयोग को बढ़ावा देना और एक समेकित अवधारणा को अपनाना;
  • किसानों को सहायता तथा पर्याप्त लाभ को सुनिश्चित करने के लिए सहकारी और स्वयंसेवी दलों को बढ़ावा देना;
  • क्षमता निर्माण तथा मानव संसाधन विकास को सरल बनाना;
  • किसानों को उत्पाद के लिए पर्याप्त लाभ प्राप्त करने और जहां तक संभव हो दलाल/मध्यस्थ को समाप्त करने की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय, राज्य तथा उप राज्य ढांचे को स्थापित करना।

राष्ट्रीय बाँस मिशन के मुख्य घटक

  • बाँस विकास के लिए अनुसंधान एवं विकास
  • बाँस की पौध उगाने के लिए नई नर्सरियों की स्थापना
  • वन तथा गैर–वनीय क्षेत्रों में वाणिज्यिक आधार पर उच्च पैदावार वाले बॉस रोपण को बढ़ाना
  • जराजीर्ण बाँस रोपण, कीटनाशी तथा बाँस के रोग प्रबंधन का सुधार
  • हस्तशिल्प, बाँस विपणन तथा निर्यात
  • किसानों और कार्मिकों की क्षमता निर्माण तथा मानव संसाधन विकास
  • बाँस के लिए बाँस बाजारों तथा नई विपणन रणनीतियों की स्थापना
  • सतर्क निगरानी, मूल्यांकन और रिपोर्टिंग, डेटाबेस सृजन, संकलन और विश्लेषण

राष्ट्रीय बाँस मिशन अन्तर्गत प्रस्तावित वित्तीय लाभ

राष्ट्रीय बाँस मिशन अन्तर्गत प्रस्तावित वित्तीय लाभ का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

  • नर्सरी तैयार करने के लिए

सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा केन्द्रीयकृत नर्सरी के लिए रू०2.73 लाख और निजी क्षेत्र द्वारा रू० 0.68 लाख, निजी क्षेत्र द्वारा किसान/महिला नर्सरी के लिए 0.067 लाख।

  • वाणिज्यिक रोपण

सरकारी क्षेत्र द्वारा लागत का शत्-प्रतिशत अर्थात रू० 25,000/हैक्टेयर तथा निजी क्षेत्र अर्थात किसानों द्वारा बाँस रोपण पर कुल लागत रू० 16,000/हैक्टेयर का 90 प्रतिशत अर्थात रू० 14,400 दो किस्तों में देय है।

  • उपरोक्त के अलावा रोपण से संबंधित अनुसंधान एवं विकास, रोपण सामग्री का प्रमाणीकरण आदि पर शत्-प्रतिशत सहायता और किसानों/प्रखण्ड स्तर के कार्यक्रम आदि को प्रशिक्षण देने के लिए सीमित अनुदान दिया जाएगा। इसके साथ ही जागरूकता सृजन/प्रौद्योगिकी सृजन और इस प्रकार के कार्यों के लिए राज्य स्तर/ जिला स्तर के सेमिनार के आयोजन हेतु राशि आवंटित की गई है।

राज्य बाँस मिशन से संबंधित कार्यकलापों को वन विभाग के संबंधित सर्किल/ वन विकास एजेन्सियों या जिलों के जिला बाँस विकास समिति द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा। इस संबंध में प्रस्ताव इस प्रयोजन हेतु पहले से गठित राज्य स्तर की उच्च स्तरीय समिति द्वारा प्रस्तुत होना चाहिए।

बाँस की नर्सरी तैयार करना

बाँस संचरण की अनेक विधियां हैं, विशेष रूप से नर्सरी स्तर पर बाँस नर्सरी व्यापार एक प्रासंगिक व्यवसाय है और बैंक भी इसमें वित्तीय सहयोग करने को तैयार हैं। निम्नलिखित ऐसी विधियां दी गई हैं जिनके द्वारा वाणिज्यिक आधार पर आगामी रोपण के लिए एक नर्सरी में बाँस का संचरण किया जा सकता है।

बाँस का संवर्धन

  1. लिंग पुनरूत्पादन।(बीजों द्वारा)
  2. अलैंगिक पुनरूत्पादन (उभिज्ज द्वारा)।

लिंग पुनरूत्पादन।(बीजों द्वारा)

  • राईजोम/ऑफसैट
  • कटिंग
  • मैक्रो परिष्करण।
  • लेयरिंग
  • ऊतक संवर्धन ।

कटिंग

(क) कलम

(ख) शाखा

पारम्परिक और गैर-पारम्परिक तरीकों से बांस को लगाया जा सकता है-

पारम्परिक तरीके

(क) बीजों द्वारा लगाना।

(ख) राईजोम/ऑफ-सैट रोपण द्वारा लगाना।

बाँस को लगाने की पारम्परिक विधियां बीज और उभिज्ज तरीकों पर आधारित हैं। कुछ विशेष अवधि के दौरान बीज की उपलब्धता कम हो जाती है लेकिन बाँस-फूल (बम्बू फ्लावर) हर समय उपलब्ध रहता है। ज्यादातर बाँस के फूल 10 से लेकर 60 वर्ष से भी ज्यादा लम्बे समय तक बने रहते हैं जो विभिन्न प्रजातियों पर निर्भर करते हैं। सामान्यतः चरणीय पुष्पण यूथवृत्ति वाला होता है और पुष्पण के बाद बाँस के सम्पूर्ण खिले हुए फूल समाप्त हो जाते हैं।

गैर पारम्परिक तरीके

(क) जड़ को काट कर लगाना।

(ख) कल्म कटिंग द्वारा लगाना।

(ग) शाखाओं की कटिंग द्वारा लगाना।

(घ) व्यापक परिष्करण द्वारा लगाना ।

(ङ) दाब–कल्म तथा सूक्ष्म विगलन द्वारा लगाना।

(च) ऊतक संवर्धन द्वारा लगाना।

बाँस नर्सरी

स्थान चयन

बाँस नर्सरी तैयार करने के लिए चयनित किया जाने वाला स्थान आने-जाने के लिए सुगम्य होना चाहिए तथा जल स्रोत भी नजदीक होना चाहिए और रोपण सामग्री का स्रोत भी नजदीक होना चाहिए जिससे व्यय तथा अन्य तकनीकी कठिनाईयों से बचा जा सके। स्थान चुनते समय इसे उचित रूप से योजनाबद्ध किया जाए जो इसके आकार और बनावट पर आधारित होगा। योजना बनाते समय संवर्धन, अनुमानित वार्षिक उत्पादन क्षमता, व्यापक परिष्करण, अपेक्षित क्यारियां सिंचाई सुविधाएं, ओवरहैड टैंक तथा समानरूपी घटकों के बारे में आश्वस्त हो जाना चाहिए। परिवहन और बाजार पहलुओं पर भी सावधानीपूर्वक ध्यान दिया जाए।

नर्सरी तैयार करने का मौसम

नर्सरी तैयार करने का मौसम भी व्यापार की व्यवहारिकता को प्रभावित करता है। यद्यपि जहां तक नर्सरी तैयार करने, वृद्धि और मृत्युदर का संबंध है राज्य के इस हिस्से में मार्च का महीना बेहतर मौसम का है। विशेष रूप से किसी भी उभिज्ज संचरण तरीके जैसे कल्म-कर्तन, शाखा कर्तन, दाब–कल्म आदि के द्वारा। यद्यपि इस कार्य को अधिक मृत्युदर के साथ पूरे वर्ष किया जा सकता है।

बाँस नर्सरी के लिए बेहतर मृदा विशेषताएं

उभिज्ज संचरण के लिए बेहतर मृदा लगभग 6.5 से 7.5 की पीएच मात्रा युक्त दोमट मिट्टी है। भूमि का टुकड़ा उच्च भूमि वाला होना चाहिए जिसमें भूमि का टुकड़ा बिना किसी जल अवरूद्धता या उचित जल निकासी वाला होना चाहिए। अन्य नर्सरी की तरह कुल छायादार वृक्ष बेहतर स्थान बनाते हैं।

राष्ट्रीय बाँस मिशन के तहत नर्सरी के प्रकार

1. केन्द्रीकृत नर्सरी

इस प्रकार की नर्सरी की वार्षिक उत्पादन क्षमता कम से कम 50,000 रोपण समग्री का उत्पादन करने की होगी।

2. किसान नर्सरी/महिला नर्सरी

इनकी न्यूनतम वार्षिक उत्पादन क्षमता कम से कम 10,000 और 5,000 रोपण सामग्रियों की होनी चाहिए।

क. बीजों द्वारा संचरण

पुष्पण के बाद बनने वाले बीज को एकत्रित और स्वच्छ किया जा सकता है। स्वच्छ बीजों को विशेष भंडारण तकनीकों जैसे नियंत्रित नमी, न्यूनतम तापमान आदि के द्वारा 6 माह या एक वर्ष से ज्यादा समय के लिए भंडारित किया जा सकता है। बाँस बीजों को यदि बीज श्वसन, नियंत्रित तापमान आदि के लिए उचित वायु संचार के साथ भंडारण करके नहीं रखा जाता तो इसकी अंकुरण क्षमता दो माह की अवधि के बाद धीरे-धीरे कम हो जाती है। अन्यथा बीज को संग्रहण के बाद तुरंत उगा देना चाहिए। संग्रहित बीज को उचित तरह से साफ करके 1-2 घंटा धूप में सूखाया जाए और प्रसुप्ति को विखंडित करने के लिए 6-12 घंटे तक पानी में भिगोया जाए और बुवाई से पहले 10-20 मिनट पहले उचित रूप से जल निकासी की जाए। एक नर्सरी क्यारी को तैयार किया जाए जिसका आकार 10×1.5 मी० हो जिसकी गहरी जुताई या खनन किया जाए और इसे मृदा, रेत तथा पूर्ण एफ वाई एम 3:1:1 अनुपात के मिश्रण से भरा जाय। बुवाई से एक सप्ताह पहले नर्सरी क्यारी को कीटनाशी जैसे ऎल्ड्राईन तथा फहूंदनाशी जैसे दीमक से बचने तथा फफूद हमे के लिए बैविस्टीन के साथ मिश्रित करना चाहिए। प्रत्येक क्यारी के लिए 0.015 प्रतिशत एल्ड्रीन 40 ली० जिसे 0.5 एम एल० ऎल्ड्रक्स 30 ई० सी० प्रति ली० पानी मिलाकर तैयार किया गया और 0.05 प्रतिशत 30 ली० जैसे 1 ग्राम बैविस्टीन 50 डब्लू पी प्रति ली० पानी मिलाकर तैयार किया गया, का इस्तेमाल किया जाय। ऎल्ड्रीन की अनुपलब्धता के दौरान अन्य कीटनाशी जैसे क्लोरोपाईरीफौस 2 मिली० की दर से, प्रति ली० पानी या इंडोसल्फान- 35 ई० सी०, 2 मि० ली० की दर से प्रति ली० पानी के घोल का उपयोग प्रति क्यारी पर 40 ली० का छिड़काव किया जाय। बुवाई का कार्य ओवरहैड शेड में किया जाए जिसमें पत्तियों या बाँस विभाजन को सुरक्षित करने पर वरीयता दी जाए। 1 से०मी० गहराई तक फ्यूरो- अप के साथ पंक्ति में बुवाई की सलाह दी जाती है।

और इसे मिट्टी की पतली परत से ढ़क दिया जाए और दिन में एक बार हल्का पानी डाला जाए। 3-7 दिन के बाद बीज अंकुरण आरम्भ हो जाएगा और यह 15-25 दिन तक नियमित रहेगा। जब पौध 3-4 माह पुरानी हो जाए तो इसे पौलीपौट में हस्तांतरित कर दिया जाए और दिन में एक बार इसकी सिंचाई की जाए तथा सांयकाल में नियमित रूप से 1-2 सप्ताह तक सिंचाई को वरीयता दी जाए। पौली–पौट को विधिवत विगलित एफ वाई एम, मृदा और रेत मिश्रण के साथ 2: 3 : 1 अनुपात में भरा जाए।

ऑफ-सैट रोपण द्वारा संवर्धन

राईजोम या ऑफ-सैट द्वारा उभिज्ज संवर्धन एक प्राचीन तरीका है और इस क्षेत्र में इसका काफी इस्तेमाल होता है। यद्यपि यह पारम्परिक तरीका है और बाँस संवर्धन में संभवतः सबसे ज्यादा उपयोग में लाया जाने वाला तरीका है, विशेष रूप से छोटे और सुगम्य प्रवर्थ्य क्षेत्रों में यह सिर्फ कुछ कल्म को उगाने के लिए ही प्रायोगिक है। यह बेहतर होगा यदि ऑफ-सैट को वर्षा के मौसम से पहले रोपित किया जाए। सामान्यतया ऑफ-सैट रोपण में पतली परत वाली बाँस प्रजातियां कम सफल होती हैं और अलग-अलग प्रजातियों में काफी भिन्नताएं पाई जाती हैं। विशाल डायामीटर कल्म वाली बाँस की प्रजातियों के लिए रोपण हेतु विशाल राईजोम जरूरी है। 1-2 वर्ष पुराने ऑफ-सैट को 1.0-1.5 मी० ऊंचाई पर काट लिया जाए (3 से 5 नोड्स वाले जीवनक्षम शाखा कली) और इसे राईजोम के हिस्से के साथ इसकी जड़-प्रणाली सहित खोदकर निकाला जाए । राईजोम को इसकी ग्रीवा से काटकर सावधानीपूर्वक अलग किया जाए इसके कारण खुदाई के दौरान राईजोम के नुकसान में कमी आएगी। इस प्रकार का ऑफ-सैट बेहतर होगा और इसे वर्षा के मौसम से पहले विश्राम मौसम में रोपित किया जाए ताकि यह आसानी से जमने में सक्षम हो सकें और अनुकूल मौसम के दौरान इनकी वृद्धि हो सके। वर्षा के मौसम के अंत में नई बढ़वार आरम्भ होने के बाद लगाए गए ऑफ-सैट सामान्यतः जमने में सफल नहीं हो पाते। मातृ क्लम्प से निकालने के बाद ऑफ-सैट का शीघ्र प्रतिरोपण किया जाए और परिवहन आवागमन के दौरान इसे आर्द्रतायुक्त बोरी (गनी-बैग) में रखा जाए। खेत में कल्म के शीर्ष को पौलीथीन बैग से ढ़का जाए और सूखने से बचने के लिए निम्न सतह (कैविटी) में पानी भरा जाए।

कल्म-कर्तन द्वारा संवर्धन

कल्म या तने के खंडों का इस्तेमाल करते हुए उभिज्ज संवर्धन एक व्यवहारिक विकल्प है और अन्य तरीकों के मुकाबले में यह लाभकारी हैं। इसकी सफलता और निर्वाह की दर (40 प्रतिशत से 80 प्रतिशत) ऑफ-सैट की तुलना में अधिक है। इस विधि में कल्म-कर्तन के साथ-साथ जड़ निर्माण उत्पन्न के लिए बढ़वार नियामक रसायन भी शामिल है। आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बाँस की अधिकांश प्रजातियों के लिए इस विधि के परीक्षण को सफलतम पाया गया। इस विधि द्वारा उत्कृष्ट किस्मों का व्यापक स्तर पर प्रगुणन संभव है।

नर्सरी क्यारी तैयार करना

  • गहरी जुताई/ खनन द्वारा 10 मी० x 1.2 मी० की नर्सरी क्यारी तैयार करना तथा इसे मृदा, रेत तथा पूर्ण अपघटित मिश्रण के साथ एफ वाई एम के 2:1:1 अनुपात में भरा जाए।
  • रोपण से एक सप्ताह पहले दीमक और फफूद हमले से बचने के लिए नर्सरी क्यारी को पृथक रूप से कीटनाशी, ऐल्ड्रीन तथा फहूंदनाशक, बैविस्टीन के साथ मिला दिया जाए। प्रत्येक क्यारी के लिए प्रति लिटर पानी के साथ ऎल्डरैक्स 30 ई० सी० मिलाते हुए तैयार ऎल्ड्रीन तथा प्रति लिटर पानी के साथ 50 डब्लू पी० बैविस्टीन 1 ग्राम मिलाते हुए 0.15 प्रतिशत (.i) का 40 लीटर घोल का इस्तेमाल किया जाए। ऎल्ड्रीन उपलब्ध न होने वाली समयावधि के दौरान अन्य कीटनाशकों जैसे क्लोरोफाईरोफोस (डर्सबैन) 2 मि० लि० की दर प्रति लिटर या इंडोसल्फान- 35 ई० सी० 2 मि० लि० की दर प्रति लिटर प्रत्येक क्यारी में 40 लीटर घोल का इस्तेमाल किया जा सकता है।

ईंट और रेत से बनी नर्सरी

ईंट और रेत से बनी नर्सरी स्थायी प्रकार की होती है किन्तु इसमें अधिक निवेश होता है। इसमें तीव्र रूटिंग होता है। इस क्यारी को कछुए के आकार में कंक्रीट सीमेंट से तैयार किया जाता है। मोटा रेत एकत्र किया जाए जो जमीन पर बेकार पड़ा हो। इसे अच्छी तरह छाना जाए। कंक्रीट बेस के ऊपर क्यारी तैयार करने के लिए अपेक्षित संख्या में ईंटों को एकत्र किया जाए। क्यारी की लम्बाई को 6 मी० तक सीमित रखा जाए और इसकी ऊंचाई को एक के ऊपर रखते हुए तीन ईंटों के बराबर होनी चाहिए। इसकी चौड़ाई अन्दर से लगभग 1.2 मीटर होनी चाहिए। किसी मोरटार का प्रयोग नहीं किया जाय। इसके बाद क्यारी को छानी गई रेत से भर दिया जाए और ईंटों के बीच होने वाले रिक्त स्थान को भरने का कोई प्रयास न किया जाए। अपेक्षित शेड को किसी भी बाँस नर्सरी के लिए व्यवस्थित किया जा सकता है। उचित सिंचाई को बनाए रखा जाए।

बाँस का संग्रहण तथा कटिंग की तैयारी

  • स्वस्थ क्लम्स से 1.6 से 2 वर्ष पुरानी कल्म को निकालने के लिए। के ठीक ऊपर से काटा जाए। संवर्धन को प्ररोह प्रारम्भ होने से पहले अप्रैल – मई माह के दौरान करने के लिए प्राथमिकता दी जाए।
  • कल्म के पत्ते वाले पतले हिस्से के टैंडर टाप को हटा दिया जाए। और साइड वाली शाखाओं को काट दिया जाए। पत्ते और साईड वाली शाखाओं को हटाते समय नोड्स पर लगी औक्सिलारी बड्स को कोई नुकसान न हो इस बात का ध्यान रखा जाए।
  • कल्म को जहां तक सम्भव हो शीघ्र-अतिशीघ्र नर्सरी तक पहुंचाया जाए। सूखे के प्रकोप से बचाने पर अधिक ध्यान दिया जाए। इस प्रयोजन हेतु या तो कटे हुए सिरे को नमी वाली बोरी (गनी बैग) में लपेटा जाए या नमी युक्त बुरादे वाले बक्से में इसे रखा जाए।
  • एक या दो नोड के कटिंग तैयार की जाएं (दोनों तरफ 5 से०मी० छोड़कर 1-2 नोड्स काटें) इसके लिए हैक्सा या पैने चाकू (डेओ) का उपयोग किया जाए।
  • लगभग 2 से० मी० लम्बा और 1 से० मी० चौड़ा बाँस का टुकड़ा लेकर या पोरी (इंटरनोड्स) के मध्य में दो छेदों को (लगभग 7 मि०मि० परिधि) ड्रिल किया जाए। छेद करते समय इस बात पर ध्यान रखा जाए कि दोनों नोड्स पर आक्सलरी कली या शाखाएं सतह के सममतल रूप में होनी चाहिए।

जड़ निकलने के लिए कटिंग का उपचार

  • आधे लिटर पानी में 20 ग्राम एन ए ए या बोरिक एसिड को घोला जाए। इस घोल को एक साफ जार में उंडेल दें और 100 लिटर बनाने के लिए इसमें पानी मिलाएं। इस घोल को अच्छी तरह हिला कर मिलाएं। बोरिक एसिड का अंतिम संकेन्द्रित पानी के 200 मिली० ग्राम या 200 पी पी एम (पार्ट पर मिलियन) के समतुल्य हो जाएगा। यह घोल 1000 कटिंग के उपचार के लिए पर्याप्त होगा।
  • लगभग 100 एम एल घोल को कल्म की सतह में उंडेले । स्पीईलेज से बचने के लिए ड्रिल किए गए छेदों द्वारा घोल को डालने के लिए साफ बोतल या कीप का उपयोग करें।
  • पिघली हुई मोम से छेदों को बंद कर दें या रैंपिंग कर दें और पोलीथीन स्ट्रिप की रैंपिंग 6 से० मी० चौड़ा X 60 से० मी० लम्बा) या सैलोटेप से बांध दें। यह सुनिश्चित कर लें कि पोलीथीन टाईट है ताकि घोल का इसमें से रिसाव न हो सके। कटिंग को समानान्तर रखें तथा इसके आमुख वाले हिस्से को ऊपर रखें।
  • निष्कर्षण के बाद जहां तक सम्भव हो शीघ्र ही कल्म कटिंग को नेप्थलिन एसिटिक एसिड/बोरिक एसिड के साथ उपचारित किया जाए। यदि रोपण स्थल काफी दूर है और रोपण में होने वाले विलम्ब से बचा नहीं जा सकता तो उपचारित कटिंग को तीन दिन तक आर्द्र बुरादे में रखकर संरक्षित किया जा सकता है।

कटिंग का रोपण

  • 10 से 16 से० मी० फरो को नर्सरी क्यारी के आर-पार से 50 से० मी० की दूरी पर बनाए जाएं।  फरो की गहराई और दूरी को कल्म कटिंग के डायमीटर के आधार पर घटाया-बढ़ाया जा सकता है।
  • कटिंग को फरो के समानांतर नर्सरी क्यारी के आर-पार इस तरह रखें कि छेद/आमुख हिस्सा ऊपर हो या कली (बड्स) को किनारे पर (लेटरली) रखें | 10 मी० X 10 मी० आकार की तैयार नर्सरी क्यारी में लगभग 50-60 कटिंग को सुविधाजनक ढंग से रोपित किया जा सकता है। कटिंग को 2-3 से० मी० मृदा परत से ढ़क दें । जब तक उचित जड़ विकसित नहीं होती तब तक इसकी नियमित सिंचाई की जाए। रूटिड कल्म खेत के पानी से भरने या वर्षा के मौसम के दौरान उस समय बाहर निकलेगी जब क्यारी की मिट्टी ढीली हो जाएगी। विधिवत् गहरी जड़ वाले पौधे कल्म के साथ-साथ जड़ और पोली-पोटिड के साथ जुड़ जाते हैं। कल्म के शीर्ष को पैने चाकू से काट दें ताकि अत्यधिक श्वसन से बचा जा सके।

डाली की कटिंग द्वारा संचरण

माटी परत वाली बांस प्रजातियों में स्पष्ट आरम्भिक डाली । होती है, डाली कटिंग एक आदर्श रोपण सामग्री हैं। यह छोटे आकार की होती है और तथ्य यह है कि अनके डालियों को मातृ क्लम्प को नुकसान पहुचाएं बनाई जा सकती है। डाली की आयु 0.5 से 1 वर्ष तक गांरटी निर्वाह दर होनी चाहिए। शीर्ष भाग को काट दें तथा दो नोड्स और आरम्भिक उभरे हिस्से को छोड़ दें। इसके बाद कटिंग को बढ़वार नियामकों में भिगों दें जैसे आई बी ए/एन ए ए 200 पी पी एम की दर से (20 ग्राम/लि० को 200 लि० तक मिलाया जाए) जो 200 मिली० ग्राम/लि० पानी के या 24 घंटे के लिए रूटैक्स- 3 पाउडर के समतुल्य है। कटे हुए किनारों को निर्जलीकरण से रोकने के लिए मोम से बंद कर दें। रोपण से ठीक पहले कटिंग को बेविस्टीन (0.1 प्रतिशत) घोल में भिगोएं। कटिंग को सीधा पौलीबैग या उठी हुई क्यारी में इस प्रकार रोपित करे कि राईजोमेट्स फुलाव और एक नोड हमेशा मिट्टी की सतह से नीचे रहे। पोली बैग को आंशिक शेड (75 प्रतिशत शेड, ऍग्रोशेड नैट द्वारा प्रदान की जाए) में रखा जाए और इसकी प्रतिदिन सिंचाई की जाए। रोपण के बाद अंकुरण और जड़ में 1-4 माह का समय लगता है। सफलतम जमे हुए और राईजोम कटिंग को अगले वर्षाकालीन मौसम में लगाया जाय।

पूरी कल्म का दाब कल्म द्वारा संचरण

यह प्रक्रिया समस्त प्रजातियों के लिए उपयुक्त नहीं है और यह मैदानी क्षेत्रों में स्थिर छितरे हुए खड़े बांसों के लिए उपयुक्त है। यद्यपि इस प्रक्रिया में लगभग 1-2 वर्ष पुरानी क्लम्प से कल्म को चुनना उपयुक्त होता है। इसके बाद कल्म को नीचे से काटते हुए मोड़कर नीचे किया जाता है और लगभग 20 नोड्स रखते हुए कल्म के शीर्ष को हटा देते हैं। डालियों को छांट दिया जाता है सिर्फ आधार पर कुछ डालियों रह जाती हैं। इस काम में सावधानी बरती जाए ताकि प्रसुप्त कलियों को क्षति न पहुंच पाए। इसके बाद कल्म को विधिवत तैयार मिट्टी से दाब दें और डालियों और पत्तों को मिट्टी से ऊपर बाहर के वातावरण की ओर कर दें। तैयार की गई मिट्टी की गहराई लगभग 5 से 8 से० मी० होनी चाहिए और इसे मिट्टी से ढ़क दें और मिट्टी में दबा दें। इसके बाद मृदा को पलवार से कवर कर दें और नियमित रूप से इसमें पानी डालें। दबाई गई कल्म की प्रायः जांच की जाए ताकि एक (रीबाउंड) कल्म को जमीन में पुनः तत्काल दबाया जा सके। मिट्टी में दबने के कुछ सप्ताह के बाद नई जड़ और प्ररोह विकसित होने लगते हैं। इसके बाद इंटरनोड्स को तैयार किए गए खेत में रोपण के लिए लगभग 6-8 माह बाद पृथक कर दिया जाए।

सम्पूर्ण कल्म कटिंग द्वारा संचरण (स्टम्प सहित या रहित)

लगभग 2 वर्ष आयु वाली स्वस्थ कल्म का चयन किया जाए और इसे स्टम्प के साथ सतह से अलग किया जाय या कल्म को नीचे से काटा जाए। बेस में एक या दो डालियों को बनाए रखा जाए और आधार पर लगभग 20 नोड्स को बनाए रखा जाए और अन्य हिस्सों को अलग कर दिया जाए। क्यारी को उस जगह तैयार किया जाए जहां गहराई 15 से 20 से० मी० हो और कल्म को समान्तर रखा जाए। यदि यहां स्टम्प है तो स्टम्प हैड की स्थिति को अपसाईड डाउन करके रखा जाए। यह सलाह दी जाती है कि प्रत्येक इंटरनोड के सैक्सन को देखा जाए साथ ही बेहतर परिणामों के लिए लगभग 1/2 से 1/3 की गहराई होनी चाहिए (स्टम्प के नजदीक सैक्शन काफी गहरे होते हैं, इसके बाद मिट्टी की 5 से 10 से० मी० मोटी परत से ढ़ककर इसे टाईट करके दबाया जाए। इसके बाद इसे पलवार से ढका जाए और पानी देना शुरू किया जाए। कुछ सप्ताह बाद जड़ और प्ररोह विकसित होते हैं।

व्यापक प्रचुरोद्भव (पौद प्रगुणन)

इस तरीके का इस्तेमाल सामान्यतः छोटी पौद में होता है। सफलतम रूप में जमने और वृद्धि के लिए बांस प्रवर्ण्य (प्रोपग्यूल) में सुदृढ़ जड़ प्रणाली, राईजोम और प्ररोह होनी चाहिए। राईजोम पृथक्करण द्वारा बाँस पौद के प्रगुणन के कारण छोटे आकार के रोपण सामग्री होती है जिसे व्यापक प्रचुरोद्भव के रूप में जाना जाता है। खेत में हस्तांतरण से पहले रोपण स्टॉक को बढ़ाने के क्रम में, व्यापक प्रचुरोद्भव का इस्तेमाल किाय जाए। 30-40 दिन की आयु में एक बांस पौद से नई कल्म तैयार होती है और राईजोम विकसित होने लगते है। चार से पांच माह की अवधि में इन पादपक (प्लांटलेट) में छ: कल्म (हिल्लर) विकसित होती हैं। इन हिल्लरों को ज्यादा यूनिटों के साथ-साथ प्ररोह, राईजोम और प्रकन्द के छोटे टुकड़ों में बांटा जाए। दुर्घटनाओं से बचन/ कम करने के क्रम में पृथक्करण के बाद पौद को शेड में रखा जाए और नियमित रूप से कुछ दिन पानी दिया जाए और इसके बाद नर्सरी की क्यारी में ले जाया जाए। यह प्रवर्थ्य खेत में चार माह के अन्दर रोपण योग्य पौद का आकार ले लेते हैं या इन्हें व्यापक प्रचुरोद्भव द्वारा आगामी प्रगुणित किया जा सकता है। बानिक (1985) ने यह प्रतिवेदित किया कि बी० टूल्डा की पांच से नौ माह पुरानी पौद को इस तकनीक के द्वारा 3-5 गुणा प्रगुणित किया जा सकता है। इन प्रगुणित पौद की निर्वाह दर 90-100 प्रतिशत के बीच होती है। इस प्रौद्योगिकी द्वारा अनेक पहचानी गई रोपण स्टॉक उपलब्ध कराई जा सकती है। इस तरीके का लाभ यह है कि एक बार बांस की प्रजाति की पौद उपलब्ध होती है तो इस प्रक्रिया को अनेक वर्षों तक जारी रखा जा सकता है। इसका रख-रखाव और इसे एक जगह से दूसरी जगर लाना-ले जाना आसान है क्योंकि नियमित राईजोम पृथक्करण के कारण इसका लघु आकार होता है। वानिक (1985) द्वारा यद्यपि, यह सुझाव दिया गया कि इस प्रकार की पौद प्रगणुन को अधिक लम्बे समय तक जारी नहीं रखा जा सकता। इस तरीके का यह लाभ है कि एक बार बांस की पौद उपलब्ध हो जाती है तो यह प्रक्रिया अनेक वर्षों तक नियमित रह सकती है।

बॉस का रोपण

बाँस को वाणिज्यिक रोपण को सघन प्रबंधन सहित बाँस रोपण को उसी रूप में स्पष्ट किया गया है। जैसे अन्य नगदी फसलों की खेती की वार्षिक पूर्व निर्धारित पैदवार स्तर को बढ़ाने के लिए किया गया है। एक बार बांस रोपण अपने इष्टतम स्तर पर पहुंचने के बाद अर्थात् पूर्वोत्तर क्षेत्र (एन ई आर) की प्रचलित जियो-मौसम स्थितियों के तहत सीम्पोडियल बांस के लिए रोपण के सातवें वर्ष में, आय काफी स्थायी हो जाती है और यह तब तक नियमित रहती है जब तक इसकी आयु लगभग 20 से 25 वर्ष तक पहुंचती है। इसके बाद यह जरूरी है कि नए रोपण को तैयार करने के लिए सभी रोपण को चरणबद्ध रूप में उखाड़ दिया जाए। इसके अलावा तीन प्रयोजनों के लिए वाणिज्यिक बांस रोपण किया जाए –

  1. सिर्फ प्ररोह की उच्च पैदावार के लिए
  2. सिर्फ पोल्स की उच्च पैदावार के लिए
  3. प्ररोह और पोल्स की उच्च पैदावार के लिए।

इस प्रकार के विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रबंधन क्रियाएं भी अलग-अलग है। किन्तु यहां एन बी एम के अनुसार यह दिशा निर्देश एक ही समय में प्ररोह और पोल्स दोनों की उच्च पैदावार पर अधिक जोर देते हैं।

प्रस्तावित रोपण स्कीम

रोपण स्कीम में प्रजाति के आकार और वृद्धि व्यवहार पर विचार किया जाए। प्रस्तावित रोपण स्कीम (निम्नलिखित) में यह नोट किया जाए कि पंक्तियों के बीच पौधों का अंतराल पौधों की लाईन में अंतराल से ज्यादा होना चाहिए। पंक्तियों के बीच इस विशाल अंतराल के कारण रखरखाव तथा सस्योत्तर कार्यकलापों के लिए आने-जाने में आसानी होती है।

चयनित प्रजातियां

पादप अंतराल (मी०)

कुल

पंक्ति में

पंक्तियों के मध्य

पादप/हे०

बम्बुसा टुडला

5

6

333

बम्बुसा बालकोआ

5

6

333

डैन्ड्रोकैलेमस हैमिलटोनी

5

6

333

मैलोकाना बैसिफेरा

4

6

417

डैन्ड्रोकैलेमस जिगाटेस

6

7

238

डैन्ड्रोकैलेमस आस्पर

6

7

238

निम्नलिखित कुछ विषय हैं जो उत्पादक रोपण को स्थापित करने में काफी सहायक होते है-

  1. रोपण स्थल का चयन करने में मृदा की गुणवत्ता की जांच की जाए। बांस को अधिकांशतः अच्छी तरह मृदा पर उगाया जा सकता है किन्तु डीप-पोट्स उर्वरक मृदा जो उच्च नमी युक्त और पी एच 5.5 वाली हो उसे प्राथमिकता दी जाए।
  2. मृदा में बेहतर जल निकासी काफी महत्वपूर्ण है। इस बात की जांच की जाए कि भूमि बाढ़ग्रस्त न हो। जलमग्न मृदा में बांस का निष्पादन अच्छा नहीं होता। अतः इस बात को प्राथमिकता दी जाए कि रोपण कार्य मामूली ढालू भूमि पर करना उचित होगा।
  3. भूमि को सभी तरह के खरपतवार और अवांछनीय वनस्पति से साफ किया जाए। सूखे मौसम के दौरान इन्हें जलाना जरूरी होगा।
  4. रोपण के कार्यक्रम की सावधानीपूर्वक योजना बनाई जाए ताकि रोपण छेदों को विशेष दूरी और अंतराल पर रखा जा सके।
  5. कार्यकलापों को इस तरह योजनाबद्ध किया जाए जिससे रोपण कार्यक्रम को कम से कम 2 सप्ताह पहले रोपित किया जा सके।
  6. रोपण छिद्रों को उत्तरदक्षिण पंक्ति में स्थित किया जाए। यह सभी पौधों को धूप के अनुकूल वितरण प्रदान करता है।
  7. 30 से० मी० डायामीटर और 30 से० मी० गहराई वाले रोपण छिद्र को प्रत्येक प्रजाति की संस्तुत अंतराल के अनुरूप अंतराल पर रखा जाए। रोपण कार्य को वर्षा के प्रारम्भ होने के साथ ही अप्रैल या मई में शुरू किया जाए। रोपण करते समय 1.5 कि० ग्रा० गोबर को प्रत्येक छिद्र में डालकर ऊपरी मिट्टी के साथ मिश्रित किया जाए।
  8. एक या दो सप्ताह के बाद अनुशंसित उर्वरकों (एन पी के) की एक छोटी मात्रा का अनुप्रयोग रोपण छिद्रों पर किया जाए। उर्वरकों की निर्धारित खुराक निम्न तालिका में दी गई है।

अजैविक उर्वरक एन पी के 2:1:1

पौधा प्रति सामग्री (ग्राम)

प्रति पौधा मिश्रण

*हिस्सा (प्रतिशत)

वजन (किलो ग्राम)

यूरिया (एनः46 प्रतिशत)

33

35 प्रतिशत

0.07

सुपर फास्फेट (पीः16 प्रतिशत)।

16

51 प्रतिशत

0.10

पोटाश (के 20:60 प्रतिशत)

16

14 प्रतिशत

0.03

कुल

0.20

अजैविक मिश्रण को उपरोक्त दर्शाए गए अनुपात के अनुरूप तैयार किया जाए। पहले वर्ष में सिर्फ 200 ग्राम मिश्रण का अनुपयोग लगभग प्रत्येक पौधे पर किया जाए।

खरपतवार

किसी तरूण पोधे की बढ़वार में खरपतवार तथा कम्पीटिंग प्ररोहण पर बाधा डाल सकती है कि प्रत्येक बांस के झुरमुट के आस-पास खरपतवार का नियंत्रण रखा जाये तथा साथ ही खरपतवार की बढ़वार को रोका जाए। ऐसा न होने पर तरूण बांसों में अपरिहार्य रूप से खराब जड़ तथा तने का विकास न हो सकेगा। 50 सें० मी० व्यास के क्षेत्र को सभी खरपतवारों तथा प्ररोहतण से मुक्त होना चाहिए।

चराई करने वाले पशुओं का नियंत्रण

नाशीजीव की मौजूदगी तथा चरने वाले पशुओं का भली भांति नियंत्रण होना चाहिए । प्रत्यके उपलब्ध उपायों में चरने वाले पशुओं की रोक होनी चाहिए। छोटे होमस्टेड, बाडा एक हल है परन्तु बड़े पैमाने पर रोपण में यह महंगा है। इस संबंध में सावधानीपूर्वक ध्यान देना महत्वपूर्ण है। रोपण निरीक्षक को रोजाना चक्कर मारने चाहिए तथा कोई नुकसान न हो, कारण जानना चाहिए तथा समस्या से निपटने के लिए उन्मूलन करना चाहिए।

उर्वरक

द्वितीय तथा तृतीय वर्ष में नाईट्रोजन फास्फोरस तथा पोटाश के जरूरत को तालिका में नीचे दिया गया है। द्वितीय वर्ष में यह अनुमान है कि प्रति हेक्टर में 307 कि०ग्रा० नाइट्रोजन फास्फोरस तथा पोटाश मिश्रण की आवश्यकता है। तीसरे वर्ष से आगे करीब एक टन नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश की आवश्यकता होती है। प्रत्येक झुरमुट के इर्द-गिर्द समान रूप से खुराक की मात्रा दी जानी चाहिए। विक्षालन से बचने तथा पौधों की बढ़वार को अधिकतम करने के उद्देश्य से सामान्य वर्षा की अवधि में उर्वरकों का एडवान्स में उपयोग किया जाना चाहिए।

2 वर्ष में अकार्बनिक उर्वरक

मिश्रण(कि०ग्रा०/हे०)

नाइट्रोजन फास्फोरस तथा पोटाश (कि०ग्रा०/हे०)

थैला प्रति हे०(50 कि०ग्रा०/बैग)

नाकापो 2:2:1

यूरिया (एनः46:)

 

109

50

2.2

सुपर फास्फेट (पीः16:)

 

156

 

25

3.1

पोटाश (के 20:46:)

 

42

 

25

0.8

कुल

307

 

100

 

 

अकार्बनिक उर्वरक 3 वर्ष से आगे उपयोग

मिश्रण(कि०ग्रा०/हे०)

नाइट्रोजन फास्फोरस तथा पोटाश (कि०ग्रा०/हे०)

थैला प्रति हे०(50 कि०ग्रा०/बैग)

एनपीके 2:2:1

यूरिया (एनः46:)

217

100

4.3

सुपर फास्फेट (पीः16:)

313

50

6.3

पोटाश (के 20:46:)

530

150

1.7

कुल

1060

300

 

पलवार

बांस की वृद्धि को सुधारने में पलवार एक सिद्ध किया हुआ तरीका है। पलवार बांस के मोटे तल्ले के चारों ओर मृदा का तल पर एकरूपता के साथ मृदा की एक परत फैला कर, पत्तियों के कचरे आदि को और अन्य जैविक सामग्री को फैलाकर प्राप्त की जाती है। पलवार खरपतवार वृद्धि को रोकने का एक प्रभावी तरीका है इससे मृदा अच्छी संरक्षित होती है और मृदा की जैविक सामग्री में वृद्धि होती है। पलवार अच्छी गुणवत्ता वाले बांस प्ररोहों के उत्पादन के लिए बहुत ही आवश्यक है। पलवार नए प्ररोहों को सीधी धूप से बचाती है और उन्हें नम रखती है और इस प्रकार उन्हें एक अधिकतम आकार तक बढ़ने में सहायता करती है और ऐसा बिना किसी कठोरता और उनकी गुणवत्ता खोए बिना होता है।

बाँस के कल्म्प की देखभाल

मोटे तल्ले के उपयुक्त रखरखाव से उत्पादकता बढ़ती है और रोपण कमियों का काम भी आसान हो जाता है। मोटे तल्ले का प्रबंधन एक अधिक रखरखाव का कार्य है आंशिक तोर पर कटाई के परिणामस्वरूप होता है। रखरखाव गतिविधि के रूप में इसमें मोटे तल्ले की सघनता को रोकने के लिए अवांछित नाल को हटाना भी सम्मिलित है। यह सघन रूप से गुच्छेदार प्रजातियों के साथ विशेष रूप से आवश्यक है। कभी-कभी मोटे तल्ले में बेहतर प्ररोह उत्पादन के लिए कुछेक नालों को हटाना आवश्यक है। आर्दश रूप से मोटा तल्ला इस प्रकार प्रबंधित होना चाहिए कि प्रत्येक मोटे तल्ले में 9 से 12 नालों से अधिक नालें न हों। नालों को एक समान रूप से अवस्था के आधार पर एक, दो और तीन वर्षों के आधार पर 3-4 नाल द्वारा बांटा जाना चाहिए। सिम्पोडियल बांसों के लिए, चार वर्ष वाली और पुरानी सभी नाले कटाई में समय नालों से हटा दी जानी चाहिए। सिम्पोडियल बांसों के लिए, चार वर्ष वाली और पुरानी सभी नाले कटाई में समय नालों से हटा दी जानी चाहिए। मेलोकैना बैसिफेरा के मामले में, नाले दो वर्ष बाद पक जाती हैं, प्रौढ़ हो जाती हैं और इसीलिए दो वर्ष वाली और पुरानी नालों को हटा दिया जाना चाहिए।

सड़न के लिए नालों को नियंत्रित करना, प्ररोहों की स्वस्थ वृद्धि ओर नई नालों की बढ़वार के लिए आवश्यक है कि जिन नालों की कटाई कर दी गई है उनके ठूठों में सड़न पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि सड़न स्पष्ट हो तो ढूंठ के आसपास खुदाई और इसे पूरी तरह से हटाने की सलाह दी जाती है। इसी प्रकार सड़तें ढूंठों को हटा दिया जाना चाहिए। फफूदी संदूषित या रोग के लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए और एक पादप रोग विशेषज्ञ को संभावित रोग निदान और नियंत्रण उपायों की सलाह के लिए बुलाया जाना चाहिए।

कटाई और संचालन

बांस रोपाई में कटाई प्रचालन वर्षों के मौसम में प्ररोहों के संग्रह में और शुष्क मौसम में बांसों की कटाई में बांटे जाते हैं। कटाई एक श्रम समेकित प्रचालन है और रोपण कर्मियों के साथ अच्छी व्यवस्था बनाने के लिए यह आवश्यक है ताकि कटाई प्रचालन में विलंब न हो। यह विशेष रूप से प्ररोह कटाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो कि वर्षा काल के महीनों की अल्प अवधि में पूरा किया जाता है। कल्म कटाई सीम्पोडियल बांस की कटाई में निम्नलिखित नियमों का पालन किया जाए।

  1. परिपक्व कल्म की कटाई को रोपण के बाद चौथे वर्ष में आरम्भ किया जाए।
  2. क्लम्प ऎप्रोच में सावधानी रखी जाए। यह जरूरी है कि काफी शोर किया जाए जिससे डरावने सांप जो बांस क्लम्प में अपना बसेरा बना लेते हैं, वे इसमें से निकल जाएं।
  3. सूखे सर्द मौसम के दौरान सिर्फ कल्म को काटा जाए। सूखे की अवधि के दौरान बांस का स्टार्च तत्व कम हो जाता है। कल्म में कम स्टार्च तत्व बेधक आदि द्वारा आक्रमण के प्रति इसे संवेदनशील बनाता है।
  4. कटाई कार्य चयनित होना चाहिए: सिर्फ परिपक्व कल्म को काटा जाए।
  5. कटिंग कार्यकलाप के इस रूप में योजना बनाई जाए जिससे युवा क्लमों को नुकसान न होने पाए ।
  6. अधिक पैने औजारों का उपयोग किया जाए। यह सुझाव योग्य है कि कटाई औजारों को ब्लीच का उपयोग करते हुए संक्रमता रहित किया जाए। इससे पौधों में संक्रमण का खतरा कम हो जाता है।
  7. युवा कल्मों को न काटा जाए जब तक कि क्लम्प में संकुलन पके हुए कल्मों को काटने से रोकता है।
  8. प्रत्येक उस कल्म को काटा जाए जो भू-स्तर से प्रथम नोड के ठीक ऊपर स्थित हो। यह जरूरी है ताकि प्रोट्रीयूडिंग इंटरनोड में पानी एकत्र न हो पाए। पानी के एकत्रीकरण से विलगन हो सकता है और यह नाशीजीव को अपने अंडे छोड़ने के लिए आमंत्रित करता है।
  9. कभी भी पूरी क्लम्प को पूरी तरह तब तक न काटा जाए जब तक कि इस बात की पूरी जांच न कर ली जाए कि यह रोग द्वारा गंभीर रूप से सवंमित है।

10.  वर्षा मौसम के दौरान कल्म को न काटा जाए।

11.  कटाई के बाद प्रत्येक क्लम्प पर पलवार लगाई जाए।

इनको काटने के बाद कल्म की डालियों और पत्तों को काटा जाए। पलवार के लिए जैविक सामग्री प्रदान करने के लिए क्लम्प के चारों ओर स्वच्छ रूप से लगाया जाए। मानक नियम और प्रजाति के आधार पर अनेक कल्म (औसतन) को काटते समय निम्नलिखित का पालन किया जाए-

  • 4/5 वर्षों में 3 कल्म प्रति क्लम्प
  • 5/6 वर्षों में 4 कल्म प्रति क्लम्प
  • 7 वर्षों में 5 कल्म प्रति क्लम्प

अथवा रोपण के सातवें वर्ष के बाद 1500 और 2000 कल्में प्रति हैक्टर।

प्ररोह कटाई एवं रखरखाव

नए प्ररोह का उत्पन्न होना रोपण के बाद वाले वर्ष के वर्षा वाले मौसम के दौरान आरम्भ हो जाता है। इन नई प्ररोह की कटाई नहीं की जाए । स्वस्थ क्लम्प स्थापित करने को बढ़ावा देने के लिए इन्हें पूरी ऊंचाई तक बढ़ने दिया जाए । प्रति क्लम्प उत्पादित क्लम्प की संख्या हमेशा भिन्न होती है। सिर्फ कुछ क्लम्प में ही एक या दो प्ररोह दिखाई देते हैं। अन्य क्लम्प इससे भी ज्यादा तैयार कर सकते है।

खाद्य योग्य युवा प्ररोह की छोटी मात्रा को रोपण के तीसरे वर्ष में अर्थात रोपण के दो मौसम वर्ष के बाद करा लिया जाए। कुछ प्रजातियों की शूटिंग अन्य के मुकाबले जल्दी आरम्भ हो जाती है। बढ़वार के पैटर्न की जानकारी काफी महत्वपूर्ण होती है। यद्यपि यह प्रजाति-दर-प्रजाति तथा स्थान-दर-स्थान अलग-अलग होती है। प्ररोह की कार्रवाई सिर्फ अच्छी तरह स्थापित क्लम्प से की जाए। प्ररोह की कटाई के लिए कुछ नियमों का पालन किया जाए।

  1. प्रथम बारिश के आरम्भ से कल्म के अलावा क्लम्प के चारों ओर खाली जमीन पर बम्प या फुलाव की जांच की जाए।
  2. प्रत्येक प्रजाति के शूटिंग मौसम के बारे में जानकारी होनी चाहिए। कुछ प्रजातियों में प्ररोह अप्रैल या मई के प्रारम्भ में होते हैं, जबकि अन्य प्ररोह कई माह बाद करते हैं।
  3. इस बात को ध्यान में रखा जाए कि शूटिंग सामान्यतः एक निश्चित समय के बाद होती है। अतः यह जरूरी है कि नई प्ररोह के क्लम्प की जांच की जाए।
  4. यह देखा जाए कि क्लम्प के चारों ओर पलवार अच्छी तरह लगी है। पलवार से नए प्ररोह में नमी बनी रहती है और इनकी गुणवत्ता रहती है।
  5. समय बहुत महत्वपूर्ण है। प्ररोह जब जमीन से दिखाई देने लगे तब इनको एक से दो सप्ताह के बाद काटा जाए। ज्यादा विलम्ब से काटने पर प्ररोह सख्त हो जाते हैं और खाद्य की गुणवत्ता भी निम्न स्तर की हो जाती है। अभी भी बांस की कुछ प्रजातियां (डी.ओल्डामी) ऐसी हैं जिन्हें कच्चा खाया जा सकता है किन्तु जब यह एक बार मृदा से बाहर आ जाते हैं इनका स्वाद कड़वा हो जाता है। अतः इन्हें हमेशा मृदा से ढ़ककर उचित प्रबंधन के साथ रखा जाए और सही समय पर मृदा हटाकर काटा जाए।
  6. एक नया प्ररोह 10 से 20 सें०मी० लम्बे होते है जो प्रजाति पर निर्भर करते हैं।
  7. युवा प्ररोह को पैने कटाई ब्लेड से काटा जाए (विशाल छैनी जैसी) मृदा से लगभग 10 से 15 सं०मी० नीचे नरम भाग में कट लगाया जाए जहां प्ररोह सख्त राईजोम से उत्पन्न होते हैं।
  8. उन प्ररोह को न काटा जाए जो औसत खाद्य प्ररोह आकार से बाहर उगे हुए हों। यह रेशेदार, सख्त और गैर–खाद्य वाले होते हैं और इन्हें कल्म में उगाया जा सकता है।
  9. प्ररोह की कटाई के बाद नए प्ररोह के उत्पन्न होने के लिए क्लम्प की समय-समय पर जांच की जाए। यह दूसरे चक्र के प्ररोह के उत्पन्न होने के असामान्य नहीं है विशेष रूप से अधिक वर्षा और तीव्र वृद्धि में यह असामान्य नहीं है।
  10. क्लम्प के सभी प्ररोह न काटे जाएं। हमेशा यह देखा जाए कि प्ररोह को क्लम्प में उगने दिया जाए।

काटे गए प्ररोह का सावधानीपूर्वक रख-रखाव किया जाए। कटाई के बाद प्रत्येक प्रजाति के प्ररोह की छंटाई उसके आकार के अनुसार की जाए और सब्जी के रूप में उपयोग करने के लिए पारम्परिक तरीके का इस्तेमाल करते हुए बंडल बनाए जाएं। काटे गए प्ररोह ठंडे स्थान पर भंडारण करके रखा जाए और इसे सीधे प्रकाश और आर्द्रता से दूर रखा जाए। इससे उत्पाद की स्वजीवन आयु बढ़ जाती है। यदि यहां बांस रोपण की लम्बी मिश्रित प्रजातियां हैं तो प्ररोह कटाई के मापदण्ड निम्नलिखित होंगे –

प्ररोह

आकलित पैदावार(टन/वर्ष)

बी०

बी०

डी०

डी०

एम०

जी०

टुल्डा

बालको

आस्पर

हैमिलटोनी

बेसीफेरा

जिजैन्टस

औसत वनज (कि०ग्रा०) प्ररोह

1.5

2

3.5

1.8

0.53

3.5

काटे गए/क्लम्प की औसतन संख्या

4

4

4

4

4

4

औसत कि०ग्रा०/क्लम्प प्रक्षेपित

6

8

14

7.2

2

14

अधिकतम पैदावार (टन प्रति हे०)

2

3

3

2

1

3

प्रति हैक्टर प्रति वर्ष औसत पैदावार

 

 

267

 

 

 

आकलित पैदावार

अधिकतम पैदावार के अनुरूप वार्षिक पैदावार

प्ररोह

टन/हे०

तीन वर्ष

10 प्रतिशत

0.27

चार वर्ष

25 प्रतिशत

0.67

पांच वर्ष

50 प्रतिशत

1.34

छः वर्ष

75 प्रतिशत

2.00

सात वर्ष से आगे

100 प्रतिशत

2.67

बाँस के नाशीजीव तथा रोग एवं उनका नियंत्रण

बाँस को क्षति पहुंचाने वाले अनेक प्रकार के कीट होते हैं जो पेड़-पौधों पर निर्भर करते हैं। इन कीटों के आक्रमण से बांस पौधों की शक्ति और उत्पादकता में कमी आ जाती है। बहुत से कीट ऐसे होते हैं। जिनके मुंह में बहुत पैन भाग होते हैं, ये पत्तों, टहनियों, तनों, कोंपलों, जड़ों और राइजोम को खा जाते हैं। ये कीट बांस को चार तरह से क्षति पहुंचाते हैं-

  1. पौधे के तरल पदार्थ को समाप्त करना।
  2. अंडे देकर यांत्रिक क्षति पहुंचाना।
  3. पौधे में छेद करके विषैले तत्व भर देना।
  4. रोग संक्रमण इन क्षतियों के फलस्वरूप नई कोंपलों और टहनियों का विकास रूक जाता है और वे मुरझा जाती है और पौधा सूख भी जाता है।

बाँस का रोग

इस रोग और विकार से संबंधित कुल 440 फफूद, दो विषाणु, एक फाइटोप्लाज्मा और एक बैक्टिरियम की तरह के जीव का पता लगा है। गम्भीर तरह के थोड़े से रोगों की पहचान हुई है, जिनसे बांस के नाल उत्पादन और इसके डंडों की उत्पादकता प्रभावित होती है। बांस के तनों (डंडों) को हानि पहुंचाने वाले रोगों में पूर्ण रोग सबसे अधिक होता है और ऐसे संक्रमण लभगभ 200 फहूंदों के कारण होते है। जो रोग ज्यादा भंयकर माने जाते है, उनमें कल्म ब्लाइट है जो सैरोक्लैडियम ऑराइजी से होता है, उभरते हुए और विकसित होने वाली नालों (तनों) का सड़न रोग जो फ्यूजेरियम प्रजाति के कारण होता है, विचेजबूम बैलेंसिया के कारण, छोटी पत्ती रोग शुष्क क्षेत्रों में फाइटोप्लाज्मा के कारण, कल्म मौजेक बांस के मौजेक विषाणु से और कल्म रतुवा रोग स्टेटोस्टैटम कोर्टिसिऑइड्स व टॉप ब्लाइट के कारण होता है।

संक्रामक रोगों के अलावा बांस नालों के उत्पादन को प्रभावित करने वाले अजैविक घटकों के कारण होने वाले गैर-संक्रामक रोगों की भूमिका भी प्रमुख होती है।

बाँस के मुख्य नाशीजीव और रोग डेम्पिंग ऑफ रोग

कारक

राइजोक्टोनिया सोलैनी, फ्यूजेरियम मोनिलिफॉकी और एफ० ऑक्सिस्पोरम

लक्षण – डेम्पिंग ऑफ रोग बाँस की पौधशाआलों में आमतौर से होता है जिससे पौधों को बहुत नुकसान हो जाता है। बुवाई के 7 से 12 दिन बाद यह बिमारी क्यॉरियों में शुरू हो जाती है। पौधा उगने से पहले डेम्पिंग ऑफ रोग अच्छे खासे बीज को सड़ा देता है और पौधा उगने के बाद यह रोग मिट्टी स्तर के नजदीक उगने वाले अंकुरों को मुरझा देता है और उनमें भूरापन आ जाता है। यह रोग सारी क्यारियों में लग जाता है जिसके फलस्वरूप अंकुरण समाप्त हो जाता है।

नियंत्रण -डेम्पिंग ऑफ रोग को नियंत्रण करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि जिन क्यारियों में बांस बोये हों उन्हें फफूद लगने से बचाया जाये। डेम्पिंग ऑफ रोग का नियंत्रण पौधशाला की उचित तकनीकों को अपनाकर ही किया जा सकता है। क्यारियों में अधिक पानी न दिया जाए और छाया न पड़ने दी जाए। क्यारियों में धूप का उचित प्रबंध होना चाहिए और बैविस्टीन जैसी फफूदनाशी दवाओं का प्रयोग किया जाए जिससे इस रोग के प्रकोप से बचाया जा सकता है।

स्मट

लक्षण – फफूद का प्रकोप छोटे-छोटे भ्रूणों पर होता है और अक्सर देखा गया है कि बीज में काली फफूद पूरी तरह से लग जाती है और वह समाप्त होने लगता है, जिससे स्मट रोग हो जाता है। जो बीज सवंमित नहीं होते उन्हीं में परिपक्वता आती है, मगर उनमें भी फंगल स्पोर लग जाते हैं। ऐसे सवंमित बीजों से स्वस्थ पौधे उत्पन्न नहीं होते।

नियंत्रण – रोग रोधी प्रजाति के पौधे ही लगाने और बीज का भी उपचार करने से स्मट का नियंत्रण संभव है। स्मट फफूद के प्रभावी नियंत्रण के लिए कार्बोक्सिन, थियाबेंडैजोल, इटैकोनैजोल और अन्य तरह की फफूदनाशी दवाओं का प्रयोग किया जाए। हरे बाँस का कैटरपिलर (लॉडोन्टा डिस्पर) नियंत्रणः गड्ढा खोदकर या खेती की दूसरी विधि द्वारा शीतकालीन कीटों को मिट्टी को नीचे से दबा देना चाहिए और इन्हें खाने वाले परजीवियों, मकड़ियों और पक्षियों से संरक्षित किया जाए।

ग्रीन स्लग वॉर्म (पैरासा वाइकलर) नियंत्रण – जुताई करने के समय कृमिकोश को मिट्टी में दबा दिया जाए और उसे समाप्त किया जाए, पैरासाइटौयड को निकाल दिया जाए, जहां जरूरी हो वहां रासायनिक कीटनाशी दवाओं का छिड़काव किया जाए।

ब्लैक मिल्ड्यू

लक्षण – परिपक्व पत्तियों की ऊपरी सतह पर काले रंग की चूर्णक फफूद दिखाई देती है जैसे ही इसका संक्रमण बढ़ता है तो पत्ती की ऊपरी सतह में काले रंग की फफूद की गहरी परत जम जाती है। और इसका संक्रमण पत्ती के डण्ठलों और छोटी-छोटी शाखाओं तक फैल जाता है। इस तीव्र संक्रमण से पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित हो जाती है।

नियंत्रण – पौधे की कैनोपी खुली रखने से संक्रमण रूक जाता है।

सूटी मॉल्ड

लक्षण – इसका संक्रमण अक्सर पत्तियों के ऊपरी सतह पर स्पार्ज के रूप में दिखाई देता है, जो हाइपीज का एक संजाल बन जाता है अथवा पतले, एफ्यूज काली चूर्णक फफूद से ढक जाता है। यह रोग शाखाओं पर भी जो जाता है। प्रायः बांस के ऐफिड सूटी मॉल्ड के साथ मिलते हैं।

नियंत्रण – ऐफिडों का नियंत्रण मुख्य उपचार है। इसके लिए इसके प्राकृतिक शत्रु जैसे लेडी बग बीटल, परजीवी आदि।

बांस का चूर्णक मूंग (डाइनोडेरस मिनट्स)

नियंत्रण – प्रतिरोधी बांस का चयन जैसे कडुवा बांस । पतझड़ से शीतकाल तक बांस को काटने का समय चुनना चाहिए जब उसमें स्टार्च और शर्करा की मात्रा कम होती है, बांस को शर्करा व स्टार्च मुक्त करने के लिए उसे पानी में रख देना और बांस को कीटनाशी दवाओं से उपचारित करना चाहिए।

बाँस की परिरक्षण तकनीकें

इमारती लकड़ी आदि की तुलना में बाँस की मजबूती (मियाद) कम समय तक बनी रहती है। यदि बॉस को उपचारित न किया गया हो और वातावरण के अनुसार ही इसका उपयोग किया गया हो तो इसका तेजी से जैविक क्षरण होने लगता है। इसका कारण यह है कि इसमें बड़ी मात्रा में हेमिसेलुलोज, स्टार्च होता है तथा इसमें नमी लग जाती है जो जैविक रूप से नुकसान पहुंचाने वाले अभिकारकों के लिए पौष्टिक तत्वों आदि के रूप में कार्य करती हैं। ये सभी जैविक क्षति पहुंचाने वाले घटकों जैसे व्हाइट रॉट, स्टेन फफूद के समूह और कीट जैसे बौरर व दीमक आदि बांस पर आक्रमण कर देते हैं और इसे तेजी से नष्ट कर देते हैं। बांस के उपयोग के समय और भंडारण के दौरान उपचारित स्थितियों में न रखने से इन जैविक अभिकारकों से 40 प्रतिशत से अधिक क्षति होने का आकलन किया गया है। बांस की मियाद को परिरक्षण के दौरान उचित विधियों से रसायनों के प्रयोग से अथवा इनके बिना बढ़ाया जा सकता है। फिर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और खेत के अनुभव से यह सिद्ध हुआ है कि परिरक्षण विधियों में रसायनों के प्रयोग करने से बांस की मियाद बिना रसायनों के प्रयोग की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है। कटे हुए बांस के डंडों की मियाद बढ़ाने के लिए प्रारम्भिक उपायों में परिरक्षण विधियों को भंडारण के समय शुरू से ही अपनाया जाना चाहिए, कटे हुए डंडों का उचित भंडारण एक मुख्य पहलू है, क्योंकि इसमें थोड़ी सी भी ढ़ील होने पर भारी क्षति हो सकती है। जब बांस का भंडारण किया जाता है, तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि डंडों में ज्यादा नमी न हो, वे वर्षा के कारण या जमीन में पानी गिरने से गीले न हों। जमीन पर इन्हें खुले में रखने से उन पर फफूद, कीड़े आदि लग जाते है। इसके अलावा धूप में पड़े रहने से इनमें दरारें पड़ जाती हैं, इसलिए बांस के डंडों को 6 से 12 सप्ताह तक यदि रखा जाना हो तो इन्हें बंद स्थान में भंडारित किया जाना चाहिए जो मौसम पर निर्भर करता है।

परिरक्षण के उपाय – परिरक्षण की कई तरह की तकनीकें हैं, पारम्परिक और रासायनिक विधियां भी है।

परिरक्षण के उपाय – पारम्परिक विधियां

बांस उगाए जाने वाले सभी देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में कई तरह की पारम्परिक परिरक्षण विधियां प्रचलित है। अनुभवी ग्रामीण लोग रासायनिक उपायों के बिना इन विधियों को आसानी से अपनाते हैं। और इसमें किसी तकनीकी उपकरण की आवश्यकता भी नहीं होती, इनमें लागत भी बहुत कम आती है।

बाँस का स्व-उपचार

इस प्रक्रिया में चयनित बांसों को उसके आधार पर काटा जाता है और उसे कुछ दिनों तक उसी झुरमुट में छोड़ दिया जाता है जिससे यह झुकता नहीं है और सीधा खड़ा रहता है। ऐसे कटे हुए बांस की निचली सतर जमीन को नहीं छूती और किसी पत्थर आदि पर टिकी होती है। जब पत्तियां, टहनियां आदि पीली व भूरी पड़ जाती हैं, तो तभी इन बांसों को वहां से हटाया जाता है और संग्रहण के लिए ले जाया जाता है। यह ध्यान रखने की बात है कि झुरमुट से बांस को हटाते समय इसका भार कम हो जाता है क्योंकि पत्तियों द्वारा लगातार उनका पानी सोख लिया जाता है और नमी की मात्रा भी कम हो जाती है तथा स्टार्च की मात्रा भी घट जाती है।

पानी का उपचार

यह एक आम प्रथा है। नए कटे हुए कल्म 1 से 3 महीने के लिए किसी ठहरे पानी अथवा बहते पानी में रखें जाते हैं। यह विधि अधिक कारगर सिद्ध होती है अगर इसकी नोडल दिवारें फटी हुई हो। फिर भी अगर कल्मों को लम्बे समय तक पानी में रखा जाए तो दुर्गंध आनी शुरू हो जाती है और दागी हो जाते हैं। यह उपाया छिद्रकों से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है, और फुगी से रोकता है। कल्म और स्लीवर्स जो हथकरघा कार्यों में प्रयोग होते हैं उनको अच्छे परिणाम पाने के लिए 30 से 60 मिनट तक उबलते पानी में उबाला जाता है।

धुएँ से उपचार

एशिया के कुछ बांस उगाने वाले देशों में धूम्र उपचार की एक पारम्परिक विधि भी प्रचलन में है, जिसमें बांस के डंडों को घर में आग जलने वाले स्थान के ऊपर रखा जाता है। कुछ दिनों तक ऐसा किया जाने से बांस से नमी काफी हद तक समाप्त हो जाती है। और उनमें जैविक क्षति होने की सम्भावना नहीं होती। मगर ऐसा करने से बांस का रंग भूरा या काला पड़ जाता है, जो समय और तापक्रम पर निर्भर करता है, जिससे फफूद के स्पोर ओर कीड़ा नहीं लग पाता है।

रासायनिक उपचार की विधियां

कुछ समय के लिए अस्थाई संरक्षण

रासायनिक उपचार की विभिन्न प्रकार की विधियां होती हैं। कुछ विधियों में महंगे उपकरणों की आवश्यकता होती है जिसमें बिजली भी शामिल है और कुछ रसायनों की जरूरत होती है जैसे सीसीए बहुत ही जहरीले होते हैं और इनके लिए बहुत ही सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। किन्तु कुछ विधियां ऐसी भी हैं जिनमें रसायनों के लिए ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं होती और ये अधिक जहरीले भी नहीं होते, इनकी चर्चा यहां की जा रही है –

रसायनों का छिड़काव – इस विधि में रसायनों/कीटनाशी दवाओं को मिलाया जाता है और उन्हें पानी में घोलकर कटे हुए बांसों पर छिड़काव किया जाता है अथवा बांसों को ही घोल में लगभग 30 मिनट तक रख दिया जाता है। यह घोल विभिन्न प्रकार के रसायनों से बनाया जाता है। किन्तु ग्रामीण वातावरण की दृष्टि से और ऐसे रसायनों का इस्तेमाल करने की विधि की जानकारी होनी चाहिए। 6-8 प्रतिशत सान्द्रता के साथ बोरेक्स व बोरिक एसिड (1:5:1) 5 प्रतिशत सान्द्रता के साथ छिड़काव की संस्तुति की जाती है। कटे हुए बांस सीधे जमीन को नहीं छूने चाहिए और वर्षा में भी नहीं भीगने चाहिए।

  • डूबोना (डिपिंग) – इस प्रक्रिया में पोल्स या स्लीवर्स का उपयोग हस्तशिल्प उत्पादों या फर्नीचर, मैट्स आदि बनाने के लिए सिफारिश की जाती है क्योंकि यह प्रक्रिया पिछली प्रक्रिया से ज्यादा प्रभावशाली है। यदि स्लीवर/ स्ट्रिप्स का उपयोग किया जाता है तो इन्हें डूबोने से पहले एक साथ बंडल बना दिया जाएं। घोल को बोरेक्स : बोरिक एसिड से 1.5 : 1 के अनुपात से बनाया जाए साथ में लगभग 5 प्रतिशत संकेन्द्रण होना चाहिए। डूबोने (डिपिंग) का समय जरूरत और उपयोग पर निर्भर करता है। यद्यपि यह एक मान नियम है कि 30 मिनट डूबोने (डिपिंग) का समय कुछ सुरक्षा प्रदान करता है।

स्थायी सुरक्षा या लम्बी सेवा

  • स्टीपिंग या बट-एंड उपचार – इस प्रक्रिया में अपेक्षित लम्बाई वाले ताजे कटे हुए बांस को लगभग 1 प्रतिशत संकेन्द्रण के बोरिक एसिडः बोरेक्स (50:50) के घोल में बट-एंड्स के साथ डुबोया जाता है। निमज्जन घोल को बट-एंड के लगभग 30 से० मी० की लम्बाई तक किया जाए। उपचार को 8 से 12 दिन तक किया जाए। इस प्रक्रिया में अवसादन से बचने के लिए घोल की क्रियाशीलता की मांग प्रतिदिन होती है और अपटेक हानि की पूर्ति के लिए बोरिक एसिडः बोरेक्स मिश्रण की थोड़ी मात्रा भी शामिल की जाती है। यह उपचार बागवानी फसलों जैसे केला आदि की फैसिंग/सहायता में उपयोग के लिए उचित उपचार है क्योंकि इसका किनारा सतह से जुड़ा होता है।
  • संचरण/सोकिंग प्रक्रिया – संचरण प्रक्रिया में, ताजे कोट हुए कल्म जो एम सी झ50 प्रतिशत हैं उन्हें 1-2 दिन के लिए संरक्षण घोल में भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद 10-15 दिन के लिए शेड में ढेर लगाकर रखा जाता है। सूखे बांस कल्म के उपचार के लिए इसे पानी तब तक भिगोया जाए जब तक एम सी लगभग 50 प्रतिशत तक न पहुंचे। इस प्रक्रिया में बांस की डंडियों को भी उपचारित किया जा सकता है। प्रभावशाली व्यापन के लिए कल्म के निमज्जन (इमर्सन)से पहले प्रत्येक इंटरनोड में दो विपरीत छिद्र किए जाएं। परिरक्षक तत्व के ठंडे घोल में साधारण रूप से डूबोकर फास्टन करने के क्रम में घोल को गर्म किया जा सकता है। इस तरह के मामले में प्रक्रिया को पूरा करने की कुल अवधि लगभग 3 घंटे होती है।
  • गरम और ठंडी प्रक्रिया – इस प्रक्रिया का इस्तेमाल विशेष रूप से पोल्स के रूप में उपयोग की जाने वाली कल्म के लिए किया जाए साथ ही अंतिम कट को भूमिगत रखा जाए या पोल्स और स्ट्रिप दोनों की फैंसिंग रूप में इस्तेमाल में लाया जाए। बांस कल्म को ड्रम को क्रिअसोट तेल और डीजल आयल मिश्रण (1:1) से भरा जाए। 2-3 ड्रम को सीधे गरम किया जाए इसके बाद घोल को पूरी रात ठंडा होने दें। इससे व्यापन में कुछ वृद्धि होती है।
  • इंटरनोड इन्जैक्शन – शुष्क बांस पोल्स के लिए भी क्रिअसोट और डीजल ईंधन का समानुपात मिश्रण इंटरनोड में ड्रिलिंग छेदों द्वारा इंजैक्टिड किया जा सकता है। आयल सम्पूर्ण क्रास स्ट्रक्चरल क्षेत्र की आंतरिक परत को शामिल करता है। इंजैक्शन के बाद छेद को सील किया जा सकता है और इसे सप्ताह से पहले उपयोग करने के लिए दो दिनों में एक वितरण के लिए बेहतर रूप में रोल किया जा सकता है।

ग्राम स्तर पर बाँस का प्राथमिक प्रसंस्करण इकाई

प्रारम्भिक प्रसंस्करण की अनिवार्यता का तात्पर्य यह है कि कटाई के बाद बांस को अन्य रूप में परिवर्तन किया जाए। इसमें क्रास कटिंग, स्पल्टिंग, गांठ को हटाना आदि शामिल हैं चाहे यह हस्तशिल्प उत्पादों, फर्नीचर और अन्य उत्पाद के लिए हो या विशाल बांस प्रसंस्करण यूनिटों की जरूरतों को पूरा करने के लिए हो। प्राथमिक प्रसंस्करण कार्य को या तो स्थानीय रूप से उपलब्ध औजारों जैसे डाओ या बिजली या हाथ द्वारा चालित मशीनों का इस्तेमाल करते हुए किया जा सकता है। पैदावार, उत्पादकता बढ़ाने ओर समान रूपी आकार बनाए रखने के लिए मशीनों के उपयोग की सलाह दी जाती है। बांस के इस प्राथमिक प्रसंस्करण को कच्चे माल अर्थात् बांस के श्रोत के नजदीक ग्राम स्तर पर स्थापित किया जा सकता है। इन यूनिटों को या तो ग्रामीण उद्यमियों, स्वयंसेवी दलों, गैर-सरकारी संगठनों, पी आर आई या क्लस्टर अवधारणा के आधार पर सामुदायिक तौर पर भी स्थापित किया जा सकता है। यह प्राथमिक प्रसंस्करण यूनिटें सिर्फ आय और रोजगार सृजन में सहायक नहीं होगी बल्कि इससे ग्रामीण औद्योगिकरण की शुरूआत होगी। इसक फलस्वरूप ग्रामीण जनता निम्नलिखित तरीकों से स्वयं अपना विकास करने में सक्षम होगी –

  • संसाधनों पर नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी जिसे इन्होंने स्वयं बनाया है;
  • सामुहिक दल के रूप में काम करने से स्वावलम्बन हासिल होगा और वित्तीय सहायता मिलेगी;
  • स्वतंत्रता का अहसास होगा और अपना संगठन बनाने तथा व्यवस्थित करने की जिम्मेवारी महसूस होगी;
  • उद्योग/उपभोक्ता के साथ सशक्त सम्पर्क विकसित होंगे;
  • सहयोग की भावना को प्रोत्साहन मिलेगा जो “आपरेशन फ्लड” के समान रूपी होगा जो कि भारतीय स्थितियों के अन्तर्गत एक सफलतम मॉडल है। इस प्रकार के मॉडल सम्भवतः इस देश में दोहराते रहेंगे जिससे समुदाय के रूप में बांस को अपनाने पर दुग्ध से ज्यादा प्रबल संभावनाएं हैं

प्राथमिक प्रसंस्करण के तहत विभिन्न कार्यकलापों को निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है-

  1. क्रास कटिंग – क्रास कटिंग का तात्पर्य पूर्ण बांस कल्म को अपेक्षित लम्बाई के अनुलम्ब रूप में आकार दिया जाता है। इसे या तो बिजली से क्रास कटिंग या हाथ द्वारा हैक्सा, डेओ आदि के द्वारा किया जा सकता है।
  2. स्पिल्टिंग – इस क्रास कट पोल्स को अपेक्षित चौड़ाई की स्ट्रिप बनाने में सीधा स्पिलिट किया जाता है। इस कार्य को विद्युत चालित स्पिल्टिंग मशीन या हाथ से चलने वाली स्पिल्टिंग मशीन के इस्तेमाल से किया जा सकता है।
  3. अंदर की गांठो को हटाना – अन्दर की अवांछनीय गांठों को या तो आंतरिक नौट रिमूवल मशीन या दो तरफ वाली प्लानर या हाथ द्वारा चालित उपकरण के उपयोग द्वारा किया जा सकता है।
  4. स्लाईसिंग – स्पिल्टिंग के बाद बांस की स्ट्रिप और आंतरिक गांठों को फिर से हटाया जाता है तथा अपेक्षित आकार तक अधिक पतला किया जाता है (पतलेपन की सीमा के साथ) । इस कार्य को बिजली या हाथ द्वारा चालित स्लाईसिंग मशीन से किया जाता है। स्ट्रिप की स्लाईसिंग के बाद 0.6 मि०मि० से 1.5 मि०मि० तक की मोटाई को सामान्यतः स्लीवर कहा जाता है। इन स्लीवर के विभिन्न उपयोग हैं अर्थात् मैट बनाने, स्टिक बनाने, हस्तशिल्प और फर्नीचर आदि बनाने में उपयोग किया जाता है।
  5. स्टिक बनाने वाली मशीन – विभिन्न डायामीटर की गोल बांस स्टिक और विभिन्न प्रयोजनों हेतु अगरबत्ती, पुष्प स्टिक, टूथ-पिंक्स, माचिस की तिल्ली, बुनाई आदि के लिए विभिन्न आकार की आयताकार बांस स्टिक बनाने की मशीन है। इन स्टिकों को या तो बिजली या हाथ द्वारा चालित मशीनों से बनाया जाता है। किन्तु तकनीकी कारणों से हाथ से चलने वाले मशीन सिर्फ बिना गांठ वाली आयताकार स्टिक बनाती है।

बाँस क्लस्टर विस्तार मॉडल

इस  चित्र के अनुसार प्रत्येक क्लस्टर में परिवार हैं या कम या ज्यादा हो सकते हैं और यह एक निर्धारित परिधि में लाजिस्टीकलबाँस -1 फायदे के साथ इस प्रकार का पर्याप्त क्लस्टर होगा ताकि संग्रहण केन्द्र (कलैक्शन सेंटर) ट्रक में विक्रय हेतु भरने के लिए पर्याप्त उत्पाद का एकत्रण कर सकें, यह साप्ताहिक आधार पर है। मुख्य संग्रहण केन्द्र को क्षेत्र के प्रमुख गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) द्वारा परिचालित तथा चलाया जाए। इस मॉडल की अवधारणा के साथ ग्रामवासी एक दल की भावना के रूप में काम करेंगे और प्रतिस्पर्धी भावना के साथ आर्थिक स्केल यूनिट के तौर पर एकल परिवार स्तर पर थोड़ा बहुत योगदान देंगे। इस प्रकार के मॉडल देश के अन्य क्षेत्रों जैसे कपड़ा उद्योग, आटोमोबाइल्स स्पेयर पार्ट्स आदि में बहुत अच्छा काम कर रहे है। उपरोक्त के अलावा एक प्रमुख एन जी ओ या स्वयं समुदाय एक सामान्य सुविधाजनक केन्द्र (सी एफ सी) की अवधारणा को अपना सकते है। इस मॉडल के तहत प्रमुख एन जी ओ या समुदाय एक सी एफ सी को कार्यान्वित कर सकते हैं और मशीन की खरीद तथा अपेक्षित क्षेत्र में शेड बनाने के लिए निवेश करेंगे। दस्तकार/ग्रामवासी एक नाममात्र के कनवर्जन शुल्क का भुगतान करते हुए विभिन्न आधे बने हुए उत्पादों के रूपांतरण के लिए अपने बांस पोल्स लाएंगे या निवेशक द्वारा ग्रामवासियों/ वन विभाग से बांस खरीदे जाएंगे और उन्हें आधे बने हुए उत्पादों जैसे स्लीवर्स आदि में रूपांतरित किया जाएगा और मैट/ बास्केट बनाने के लिए इन्हें इस्तकारों/ग्रामवासियों में बांटा जाएगा और किए गए काम का भुगतान करते हुए समय-समय पर इन्हें एकत्र किया जाएगा और आगामी विक्रय के लिए भंडारण डिपों में इन्हें भंडारित करके रखा जाएगा।

अनेक बांस आधारित उत्पादों को हमारे दस्तकारों द्वारा बनाया जा रहा है वास्तव में स्थानीय विशाल मांग वाले उत्पाद जैसे सब्जी और फल ले जाने की टोकरी, चाय पत्ती की टोकरी, चिक्स आदि शामिल है। किन्तु इन सभी को दस्तकार द्वारा सिंगल हैंडिड रूप में बनाया जा रहा है जो पोल्स की कटाई से इसे अपने घर में लाते हैं और स्लाईसिंग के लिए आंतरिक गांठ निकालने के लिए स्पिलिटिंग की क्रास कटिंग करते हैं और फिर इसे बनाते हैं।

यदि ऐसा श्रोत आस-पास उपलब्ध हो जहां स्लीवर को दस्तकारों को दिया जा सके तो यह अपने दस्तकारी/ बुनाई क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित कर पाएंगे और ज्यादा उत्पाद तैयार करेंगे जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी। इसके आगे यदि दो-तीन परिवार समानरूपी टोकरी बनाने में शामिल होते हैं, इसी में अलग-अलग कार्य करते हैं जैसे एक परिवार स्लीवर की पौलिशिंग में लग जाए, अन्य दो परिवार मुख्य टोकरी के खुले हुए सिरे की फिनिशिंग में लग जाएं तो यह कार्य आधुनिक फैक्टरी में असैम्बली लाईन के तौर पर होगा और पैदावार में कई गुना वृद्धि होगी। इस प्रकार बाजार में उत्पाद लागत प्रतिस्पर्धी बनेगा और दस्तकारों की आय मुख्य रूप से उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी ज्यादा मात्रा में वृद्धि से बढ़ेगी क्योंकि इसका मूल्य कम होगा।

हार्मोन्स घोल तैयार करना

आई बी ए (इंडोले ब्यूट्रीक एसिड) – जड़ उत्पन्न करने वाले हार्मोन

एन ए ए (नेथील एक्टिक एसिड) – प्ररोह उत्पन्न करने वाले हार्मोन

बैविस्टीन- फफूदनाशक

बोरिक एसिड – एक रसायन जो रूटिंग को सक्रिय करता है।

पी पी एम (पार्ट पर मिलियन) 1 मिलियन – 10 लाख

200 पी पी एम, आई बी ए या एन ए ए या बोरिक एसिड घोल तैयार करना

  1. मापन पैमाने की मदद से 20 ग्राम आई बी ए/एन ए ए/बोरिक एसिड लें और इसे साफ मग में डालें, इसमें 1/2 लिटर डिस्टिल्ड वाटर मिलाएं (इसे रीटेल आउटलेट्स, बैटरी रिचार्ज दुकान आदि से खरीद सकते हैं।)
  2. इस तब तक जब तक यह पानी में पूरी तरह घुल न जाए, इसमें 200 लीटर तक डिस्टिल्ड वाटर मिलाएं।
  3. यह मिश्रण 1000 कटिंग पर 200 मि० लि० प्रति दो नोडिड दर से कटिंग में इस्तेमाल के लिए तैयार है। यद्यपि बोरिक एसिड का इस्तेमाल करते समय मात्रा ज्यादा होनी चाहिए क्योंकि इस घोल से इंटरनोड पूरी तरह भर जाने चाहिए।

1 प्रतिशत वैविस्टीन घोल तैयार करना

मापक पैमाने की मदद से 10 ग्राम बैविस्टीन लें या दो चम्मच लें और 1 लिटर साफ पानी में इसे मिला दें।

अनुसूची – 1

राष्ट्रीय बाँस मिशन (बिहार हॉर्टिकल्चर डेभलपमेंट सोसाइटी)

अनुदान प्राप्त करने हेतु आवेदन-पत्र

फोटो

  1. जिला का नाम

किसान/समूह/संगठन का नाम …….

  1. पिता का नाम (संस्था के लिए निबंधन सं०
  2. किसान का प्रकार

(क) लघु/सीमान्त/अन्य

(ख) अनुसूचित जाति/जनजाति

(ग) पुरूष/महिला

  1. पूर्ण खाता

(क) ग्राम .

(ख) पोस्ट

(ग) पंचायत

(घ) प्रखंड

(ङ)जिला

5. प्रस्तावित कार्यक्रम का नाम ………………………………………………………………………………………………….

6.  प्रस्तावित/किए गए व्यय की राशि (व्यय का विवरण एक अलग पन्ने पर संलग्न करें)

7. मांगी गयी अनुदान की राशि .

(क) जमीन का पूर्ण विवरण

(1) खाता सं०…..

(2) खेसरा सं०…

(3) रकवा (हे० में) ……..

(4) सिंचित/असिंचित …

(ख) प्रस्तावित जमीन में पूर्व उगायी जाने वाली फसलों/प्रजातियों का ब्यौरा

(ग) शेष राशि की व्यवस्था कहाँ से की गयी है………..

8. क्या बैंक ऋण लिया गया है (उसका विवरण)

(क) बैंक का नाम …

(ख) स्वीकृत राशि ………..

(ग) प्राप्त भुगतान …………..

प्रमाणित किया जाता है कि उपर्युक्त सूचनाएँ सही हैं तथा आवेदन-पत्र में उल्लेखित कार्यक्रम के लिए अनुदान का उपयोग मैं इसी कार्यक्रम में करूंगा।

कृषक का नाम हस्ताक्षर

राज्य सहायता केन्द्र

जिला सहायता केन्द्र

क्षेत्र सलाहकार

प्रखंड स्तरीय कृषि स्नातक/ प्रगतिशील

कृषक का नाम एवं दूरभाष सं०

आवेदन क्रमांक –

की प्राप्ति रसीद

श्री/श्रीमति …………………………………………………………………पिता/पति ………………………………………………….. ग्राम ……………………….. प्रखण्ड………………………………….जिला……….. से प्राप्त किया।

2. क्षेत्र सत्यापन हेतु दिनांक ……………./20 से ……………./20 की तिथि निर्धारित की गई है।

3. किसी प्रकार की सहायता/जानकारी के लिए अपने परिचय के साथ आवेदन क्रमांक का उल्लेख करते हुए बिहार राज्य बागवानी मिशन, उद्यान निदेशालय, बैरक संख्या – 13, मुख्य सचिवालय परिसर, पटना से सम्पर्क किया जा सकता है।

प्राप्तकर्ता का हस्ताक्षर एवं पूरा नाम

राष्ट्रीय बांस मिशन (एनबीएम)- अद्यतन

मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने 14वें वित्त आयोग (2018-19 तथा 2019-20) की शेष अवधि के दौरान सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (एनएमएसए) के अंतर्गत केन्द्र प्रायोजित राष्ट्रीय बांस मिशन (एनबीएम) को स्वीकृति दे दी है। मिशन सम्पूर्ण मूल्य श्रृंखला बनाकर और उत्पादकों (किसानों) का उद्योग के साथ कारगर संपर्क स्थापित करके बांस क्षेत्र का सम्पूर्ण विकास सुनिश्चित करेगा।

योजना का विवरण

  • कृषि आय के पूरक के रूप में गैर-वन सरकारी और निजी भूमि में बांस पौधरोपण क्षेत्र में वृद्धि करना और जलवायु परिवर्तन की दिशा में मजबूती से योगदान करना।
  • नवाचारी प्राथमिक प्रोसेसिंग इकाईयों की स्थापना करके, शोधन तथा मौसमी पौधे लगाकर, प्राथमिक शोधन करके संरक्षण प्रौद्योगिकी तथा बाजार अवसंरचना स्थापित करके फसल के बाद के प्रबंधन में सुधार करना।
  • सूक्ष्म, लघु और मझौले स्तरों पर उत्पाद विकास को प्रोत्साहित करना और बड़े उद्योगों की पूर्ति करना।
  • भारत में अविकसित बांस उद्योग का कायाकल्प करना।
  • कौशल विकास, क्षमता सृजन और बांस क्षेत्र के विकास के बारे में जागरूकता को प्रोत्साहित करना।

बांस क्षेत्र के विकास के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाएंगे-

  • मिशन जिन राज्यों में बांस के सामाजिक, वाणिज्यिक और आर्थिक लाभ है वहां बांस के विकास पर फोकस करेगा।
  • वाणिज्यिक और औद्योगिक मांग की बांस प्रजातियों की वंशानुगत श्रेष्ठ पौध सामग्री पर फोकस होगा।
  • प्रारंभ से अंत तक समाधान अपनाया जाएगा, यानी बांस उत्पादकों से लेकर उपभोक्ताओं तक सम्पूर्ण मूल्य श्रृंखला होगी।
  • निर्धारित क्रियान्वयन दायित्वों के साथ मंत्रालयों/विभागों/एजेंसियों के एकीकरण के लिए एक मंच के रूप में मिशन को विकसित किया गया है।
  • कौशल विकास और प्रशिक्षण के माध्यम से अधिकारियों, फील्ड में काम करने वाले लोगों, उद्यमियों तथा किसानों के क्षमता सृजन पर बल दिया जाएगा।
  • बांस उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए अनुसंधान और विकास पर फोकस किया जाएगा।

लाभार्थी

इस योजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से किसानों, स्थानीय दस्तकारों और बांस क्षेत्र में काम कर रहे अन्य लोगों को लाभ होगा। पौधरोपण के अंतर्गत लगभग एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र को लाने का प्रस्ताव किया गया है। इसलिए यह आशा की जाती है कि पौधरोपण को लेकर प्रत्यक्ष रूप से लगभग एक लाख किसान लाभान्वित होंगे। मिशन उन सीमित राज्यों में जहां बांस के सामाजिक, वाणिज्यिक और आर्थिक लाभ हैं वहां बांस के विकास पर फोकस करेगा, विशेषकर पूर्वोत्तर क्षेत्र में और मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, कर्नाटक, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रेदश, तेलंगाना, गुजरात, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में। आशा है कि यह मिशन 4,000 शोधन/उत्पाद विकास इकाईयां स्थापित करेगा और 1,00,000 हेक्टेयर क्षेत्र पौधरोपण के अंतर्गत लाएगा। बांस पौधरोपण से कृषि उत्पादकता और आय बढ़ेगी और परिणामस्वरूप भूमिहीनों सहित छोटे और मझौले किसानों तथा महिलाओं की आजीविका अवसर में वृद्धि होगी और उद्योग को गुणवत्ता सम्पन्न सामग्री मिलेगी। इस तरह यह मिशन न केवल किसानों की आय बढ़ाने के लिए संभावित उपाय के रूप में काम करेगा, बल्कि जलवायु को सुदृढ़ बनाने और पर्यावरण लाभों में भी योगदान करेगा। मिशन कुशल और अकुशल दोनों क्षेत्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार सृजन में सहायक होगा।

देश में योजना की अद्यतन स्थिति

केन्द्रीय बजट 2018-19 में बाँस को हरा सोना बताया है। यह बिल्कुल सही है। बाँस मुख्य तौर पर घास की एक किस्म है, लेकिन एक सदी पहले पेड़ के तौर पर इसका वर्गीकरण कर दिये जाने से पूर्वोत्तर के लोग इस कमोडिटी का अधिकतम इस्तेमाल करने से वंचित हो गए। देश के कुल बाँस उत्पादन में पूर्वोत्तर भारत की हिस्सेदारी तकरीबन 68 फीसदी है। अनुमानों के मुताबिक, दुनिया के कुल बाँस संसाधनों में भारत की हिस्सेदारी 30 फीसदी है, लेकिन वैश्विक बाजार में इसका योगदान सिर्फ 4 फीसदी है। असली दिक्कत इसके कम उत्पादन को लेकर है और ऐसे में भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया बाँस मिशन काफी अहम है। यह केन्द्र सरकार की प्रायोजित योजना है।

इसकी 100 फीसदी फंडिंग भारत सरकार करेगी और इसका मकसद राज्यों के साथ मिलकर खास मकसद हासिल करना है। मसलन बाँस और बाँस आधारित हस्तकला को बढ़ावा देना और कौशल वाले और बिना कौशल वाले लोगों (खासतौर पर बेरोजगार युवाओं) के लिये रोजगार के मौके पैदा करना।

पूर्वोत्तर में बाँस उगाने वाले पारम्परिक किसानों और अन्य लोगों ने कई पीढ़ियों से तमाम ग्रामीण-शहरी फायदों के लिये बाँस का इस्तेमाल किया है। लोगों ने बाँस का पर्याप्त व्यावसायिक इस्तेमाल किया है बाँस को वर्षों ना कटाई के साथ बिना खेती वाली जमीन पर भी उगाया जा सकता है।

औद्योगिक फायदों के अलावा बाँस की शाखाओं का इस्तेमाल पौष्टिक आहार के तौर पर भी किया जा रहा है। इसमें औषधीय गुण भी हैं। मिजोरम, त्रिपुरा और नागालैण्ड जैसे राज्यों में बाँस उत्पादकों के बीच यह बात भी मशहूर है कि बाँस जमीन की सुरक्षा में भी काम आता है और इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है। इससे मिट्टी की पानी संचय की क्षमता भी बेहतर होती है।

सरकार ने नवम्बर 2017 में बाँस को पेड़ों की सूची से हटा दिया और बाँस को काटने, इसकी आवाजाही और इसके संसाधन के इस्तेमाल सम्बन्धी नियमों में ढील दे दी गई। इसके साथ ही बाँस पर से 90 वर्षों पुरानी पाबन्दियाँ हट गईं व बाँस से जुड़े उत्पादों के बेरोकटोक निर्यात को बढ़ावा मिला और इस बाबत नए मौके पैदा हुए। इस बीच, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकारों ने भी असम की नुमालीगढ़ रिफाइनरी की आगामी बायो-रिफाइनरी के लिये बाँस की सप्लाई करने पर सहमति जताई है। इस सम्बन्ध में आर्थिक गतिविधियों की शुरुआत हो चुकी है।

हालांकि, इन गतिविधियों से सरकार पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं है और उसने नई रणनीति पर काम करने का फैसला किया है, ताकि बाँस की खेती से जुड़े किसानों के लिये यह आमदनी पैदा करने का स्थायी साधन बन सके। कई राज्यों में बाँस के काम से जुड़े देशी समूहों को इससे फायदा होगा।

केन्द्रीय वित्त मंत्री ने बजट 2018-19 में राष्ट्रीय बाँस मिशन पर फोकस कर नए सिरे से काम करने के लिये इसके लिये 1,290 करोड़ रुपए आवंटित किये थे। एक आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, त्रिपुरा जैसे राज्य में बाँस सेगमेंट को आजीविका के मुख्य साधन के तौर पर विकसित किया जा सकता है और इसकी खेती से जुड़े कम-से-कम 20,000 किसानों को सम्मानजनक रोजगार के मौके मुहैया कराए जा सकते हैं।

इस इलाके में बाँस के कई उत्पाद भी देखे जा सकते हैं। इनमें से कुछ इस तरह हैं:- बाँस का अचार, बाँस सिरका, फूलदान अगरबत्ती की छड़ी, मोबाइल कवर, टूथ पिक, कलम रखने वाला स्टैंड, फर्नीचर, जेवर, खाने वाली शाखाएँ, ताबूत, झाड़ू, फोटो फ्रेम, हैंगर, एश ट्रे, सीढ़ी और यहाँ तक कि पानी के बोतल का कवर भी।

अपनी पारम्परिक कला से लैस स्थानीय कारीगर बाँस से बनी खूबसूरत टोपी बनाते हैं। बाँस और बेत से बनी टोपी और अन्य उत्पादों के निर्यात की जबरदस्त सम्भावना है, लेकिन इसके बाजार का पूरी तरह से फायदा नहीं उठाया गया है। इस सिलसिले में निजी खिलाड़ियों और कारपोरेट घरानों को शामिल करने के लिये प्रोत्साहित करना पूर्वोत्तर के लिये काफी फायदेमन्द होगा।

यहाँ इस बात का भी उल्लेख करना जरूरी है कि किसानों के लिये अनाज रखने की खातिर डिब्बा तैयार करने में भी बाँस बेहद उपयोगी है। अलग-अलग साइज के बाँस के डिब्बे या धानी में धान रखा जाता है। बीज को सुरक्षित रखने के लिये भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। बीज के लिये धान को बाँस से बने खास डिब्बे (कंटेनर) में रखा जाता है। मेघालय में इस डिब्बे को थियार के नाम से जाना जाता है। थियार को बाँस के पतले-पतले टुकड़ों से बुना जाता है। साथ ही, इसके अन्दर धान के पुआल की मोटी परत लगाई जाती है। इसी तरह, मेघालय की खासी जनजाति द्वारा बनाई गई लकड़ी की धानी को दुली कहा जाता है। यह दोहरी परत वाला बाँस का बास्केट होता है और इसके दोनों तरफ गोबर और कीचड़ से पोत दिया जाता है। यह धानी अनाज को सुरक्षित रखने के लिये सबसे बेहतर व्यवस्था है। साथ ही, इस इलाके के कुछ हिस्से में ऐसे डिब्बों में मक्का रखा जाता है। कभी-कभी चूहों को भगाने के लिये इसमें ऊपर में शंकु के आकार का बाँस का बक्सा भी लगाया जाता है।

अद्यतन स्रोत: इंडिया वाटर पोर्टल, पसूका

स्रोत- कृषि विभाग, बिहार

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