//मूंग उत्पादन से सफलता की सीढ़ी चढ़ रहे गढ़वा के कृषक

मूंग उत्पादन से सफलता की सीढ़ी चढ़ रहे गढ़वा के कृषक

भूमिका

मेरा नाम बबलू महतो है और मेरा जन्म एक गरीब कृषक परिवार में सन 1982 में श्री अभिनाथ महतो, ग्राम-चंदनी, प्रखंड-खरौंधी, जिला-गढ़वा में हुआ। स्थानीय राज्यकृत उच्च विद्यालय खरौंधी में मेरी प्रारंभिक शिक्षा हुई। इसी विद्यालय से मैंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। तत्पश्चात भवनाथपुर माइंस कॉलेज से इंटर तक शिक्षा ग्रहण की। मेरी शादी 2009 में रमना प्रखंड में एक कुशल कृषक की बेटी से हुआ। मैं दो भाईयों से छोटा था। पिताजी और माताजी वृद्ध थे। घर की माली हालत नाजुक थी। साथ-ही-साथ आर्थिक-सामाजिक स्थिति अच्छी नहीं थी।  शिक्षित बेरोजगार होने के कारण नौकरी की तलाश कई बार की, परन्तु निराशा ही हाथ लगी। हमलोगों का परिवार वर्षों से पारम्परिक विधि से धान, गेहूँ एवं दलहन की खेती किया करता था।  जिससे पैदावार कम होता था एवं घर के सदस्यों का भरण-पोषण ठीक से संभव नहीं था। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बाल-विवाह की प्रथा है।  फिर परिवार बढ़ते ही जमीन-जायदाद का बंटवारा कर दिया जाता है। मेरे भी भाई-भाई में बंटवारा हो गया। मेरे दो नन्हें-नन्हें बच्चे हैं, साथ में वृद्ध माता-पिता भी हैं। मैंने स्वयं खेती करने का निर्णय लिया तथा गेहूँ और धान के अलावा नकदी फसल, सब्जी, दलहन इत्यादि लगाया। मेरे इस कार्य में पत्नी का भी सहयोग मिला। चूँकि वह भी एक कुशल कृषक की बेटी थी। मैं उक्त फसलों की खेती कर अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में जुट गया।  जमीन के जोत छोटे होने के कारण धान, गेहूँ और दलहन का जो उत्पादन हो रहा था वह काफी नहीं था। इसी बीच आत्मा गढ़वा द्वारा मेरे चंदनी ग्राम में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें प्रभारी प्रखंड कृषि पदाधिकारी सुशील कुमार के अलावा प्रखंड तकनीकी प्रबंधक (बी.टी.एम.) डॉ. नीरज कान्त भी प्रशिक्षण दे रहे थे। बी.टी.एम. द्वारा प्रशिक्षण के क्रम में श्री विधि एवं स्व विधि के बारे में बताया जा रहा था। इस बीच प्रभारी बी.ए.ओ.द्वारा मूंग फसल की खेती के बारे में जानकारी दी गई।  प्रशिक्षणोंपरांत मैं उनसे मिला तो वे मेरी उत्सुकता देखकर रा.खा.सु.मि. के तहत प्रत्यक्षण पर (मूंग फसल) मेरे नाम पर उपलब्ध कराने का आश्वसान दिए। मेरे गाँव में इसके पूर्व गर्मा मूंग की खेती कभी नहीं हुई थीं, इसलिए लोग सशंकित थे।

इसी क्रम में उप-परियोजना निदेशक, आत्मा श्री योगेन्द्रनाथ सिंह का दौरा खरौंधी प्रखंड में हुआ। साथ में कृषि निरीक्षक श्री पुरुषोतम सिंह भी आये। इन दोनों ने भी एक प्रशिक्षण में दलहन फसल पर विस्तृत परिचर्चा किया। प्रशिक्षण में बताया गया कि मूंग एक दलहनी फसल है, जिसका वैज्ञानिक विधि द्वारा उत्पादन कर अधिक लाभ मिलता है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सरकार द्वारा शतप्रतिशत अनुदान पर 20% बीज मिलता है, शेष 80% बीज किसान स्वयं व्यवस्था करता है।

गाँव के आत्मा केंद्र ने बताई मूंग की खेती के फायदे

इसके अतिरिक्त किसान को प्रति हें. प्रत्यक्षण वाले खेत के लिए शतप्रतिशत अनुदान पर चूना/डोलोमाईट 3.0 क्विं., बोरेक्स (10.5%)- 10 किलो, यूरिया 10 किलो, राईजोवियम कल्चर तथा पी.एस.बी. 100 ग्राम x 5 पै. एवं बीज उपचार हेतु कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम/किलो बीज बुआई के पूर्व मुहैया कराया जाता है। यह बात मेरे लिए रामबाण का कार्य किया। वैज्ञानिक विधि को पूर्णत: समझ कर विभाग से बीज प्राप्त कर अपने प्लाट पर प्रत्यक्षण करने का मन बना लिया। मेरे परिवार के लोग वैज्ञानिक विधि से खेती करने में इच्छुक नहीं थे। उनका कहना था कि जमीन की बर्बादी होगी एवं उत्पादन कम होगा, परन्तु मैंने हार नहीं मानी। प्रत्यक्षण प्रभारी बी.ए.ओ. से दूरभाष पर बातें करवाकर परिवार के लोगों को समझाया। प्रभारी बी.ए.ओ., तकनीकी सहायक एवं कृषक मित्र के द्वारा रा.खा.सु.मि. के तहत वैज्ञानिक विधि से मूंग फसल की खेती हेतु नि:शुल्क बीज और कीटनाशी के अलावा आत्मा, गढ़वा से प्रकाशित पम्पलेट (पत्रिका) भी उपलब्ध कराया गया।

प्रारंभ में जब मैंने खेत तैयार कर प्रभारी बी.ए.ओ. एवं कृषक मित्र के सहयोग से मूंग के प्रभेद को वैज्ञानिक विधि से उपचारित कर बोना शुरू किया तो अगल-बगल के पड़ोसियों द्वारा मजाक किया जाने लगा कि भविष्य में जमीन बेकार हो जाएगा और उत्पादन भी कम होगा। मैंने बीज की बुआई की दूरी 30 10 सेमी. रखी। तकनीकी सलाह के अनुसार 15-20 दिन के बाद निकाई-गुड़ाई शुरू किया। 50-55 दिनों बाद ही शाखाओं की संख्या और बढ़ गई एवं उसमें से फूल आने लगे। फलियों की लम्बाई लगभग 3 इंच तक बढ़ी हुई थी। जब पड़ोसियों ने मेरे खेत को देखा, कहने लगे कि फसल बहुत ही अच्छा है। सभी पौधे स्वस्थ थे। प्रत्यक्षण प्लाट देखकर मैं फुला नहीं समा रहा था। फिर दुबारा पंचायत के कृषक मित्र, प्रभारी बी.ए.ओ. आए और समय-समय पर कीटनाशी का प्रयोग करने की सलाह दी।

बुआई से पूर्व बीज को कवकनाशी तथा राईजोवियम कल्चर एवं पी.एस.बी. कल्चर से उपचारित करना लाभकारी हुआ। फसल इतना अच्छा था कि आस-पास के पंचायतों के ग्रामीण मूंग की खेती देखने आने लगे। फसल लगभग 60-65 दिन में तैयार हो गया था। कटनी के पूर्वं पंचायत के मुखिया, उपप्रमुख, प्रमुख, अन्य जन प्रतिनिधि, प्रखंड कृषि पदाधिकारी, कृषक मित्र, प्रखंड तकनीकी प्रबंधक सभी उपस्थित हुए एवं किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया। मैं उस दिन को नहीं भूल सकता, जब सारे गणमान्य हमारी फसल देखने हमारे खेत पहुंचे थे।

इस प्रकार मूंग की खेती करके मुझे तीन प्रकार का लाभ हुआ। खाने को दाल मिला। गर्मी के दिनों में खेत का उपयोग कर रोजगार मिला तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार होने से अगला फसल कम खर्च में अधिक लाभ दे गया। दाना का उत्पादन 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आया। सभी लोग बहुत खुश हुए एवं खेतों में वैज्ञानिक विधि से खेती करने का निर्णय लिया। मैं रा.खा.सु.मि. आत्मा, गढ़वा एवं प्रखंड के सभी कृषि पदाधिकारियों का हार्दिक रूप से शुक्रगुजार हूँ।

स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार

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