//म.प्र. में उड़द की उत्पादन तकनीक

म.प्र. में उड़द की उत्पादन तकनीक

परिचय

मानसिक विकार पेट की बीमारियाँ तथा गठियावात जैसी बीमारियों को दूर करने की क्षमता होती उड़द एक महत्वपूर्ण दलहन फसल है। उड़द की खेती प्राचीन समय से होती आ रही है। हमारे धर्म ग्रंथों में इसका कई स्थानों पर वर्णन पाया गया है। उड़द का उल्लेख कौटिल्य के “अर्थशास्त्र तथा चरक सहिंता” में भी पाया गया है। वैज्ञानिक डी कॅडोल (1884) तथा वेवीलोन (1926) के अनुसार उड़द का उद्गम तथा विकास भारतीय उपमहाद्वीप में ही हुआ है। उड़द की फसल कम समयावधि मे पककर तैयार हो जाती है। इसकी फसल खरीफ रबी एवं ग्रीष्म मौसम के लिये उपयुक्त फसल है। हमारे देश में उड़द का उपयोग प्रमुख रूप से दाल के रूप में किया जाता है। उड़द की दाल व्यंजन जैसे कचौड़ी, पापड़, बड़ी,बड़े, हलवा इमरती, पूरी, इडली, डोसा आदि भी तैयार किये जाते है।

इसकी दाल की भूसी पशु आहार के रूप में उपयोग की जाती है। उड़द के हरे एवं सूखे पौधों से उत्तम पशु चारा प्राप्त होता है। उड़द दलहन फसल होने के कारण वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके भूमि की उर्वरा शक्ति मे वृद्धि करती है। इसके अतिरिक्त उड़द को उगाने से खेत मे पत्तियाँ एवं जड़ रह जाने के कारण भूमि में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है। उड़द की फसल को हरी खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है। उड़द के दानो मे औषधि गुण भी विद्यमान होते हैं।

उपयोगिता

पोषण में योगदान

भोजन का मुख्य अंग प्रोटीन होता है जो कि माँस, मछली, अण्डा एवं दूध से प्राप्त होता है। भारत की जनसंख्या का अधिकांश भाग शाकाहारी होने के कारण प्रोटीन की पूर्ति दालों से ही होती है। सभी दालों में उड़द की दाल में सबसे अधिक प्रोटीन होता है। अतः उड़द की दाल का भोजन में महत्वपूर्ण स्थान है। प्रोटीन के अतिरिक्त इसमें कई प्रकार के महत्वपूर्ण विटामिन एवं खनिज लवण भी पाये जाते हैं यह स्वास्थ्य के लिये लाभप्रद होते हैं। उड़द की पोषक मूल्य सारणी -1 मे दिया गया है।

क्र

घटक

मूल्य

खनिज लवण एवं विटामिन (100 ग्रा0 में )

1.

नमी

10.9

कैल्शियम

154 मि.ग्र.

2.

प्रोटीन

24.0

फास्फोरस

385 मि.ग्रा.

3.

वसा

01.4

लोहा

09.1 मि.ग्रा.

4.

रेशा

00.9

विटामिन

बी-1 0.42 मि.ग्रा.

5.

लवण

03.2

बी-2 0.37 मि.ग्रा.

कैलोरीफिक मूल्य (कैलो. /100 ग्राम) -350

वितरण

वैश्विक स्तर पर

विश्व स्तर पर भारत उड़द के उत्पादन मे अग्रणी देश है। भारत के अतिरिक्त म्यानमार, पाकिस्तान, सिंगापुर, जापान, थाइलैण्ड, बांग्लादेश, कनाडा, ईरान, ग्रीस एवं पूर्वी अफ्रीका के कुछ देश उड़द के प्रमुख उत्पादक देश है। भारत के मैदानी भागो मे इसकी खेती मुख्यतः खरीफ मौसम मे होती है। परंतु विगत दो दशको से उड़द की खेती ग्रीष्म ऋतु मे भी लोकप्रिय हो रही है। हमारे देश मे उड़द की खेती 3243 हजार हेक्टेयर मे हो रही है। वार्षिक उत्पादन 1400 हजार मैट्रिक टन है। देश के कुल दलहन क्षेत्रफल एवं उत्पादन मे क्रमशः लगभग 16.28 प्रतिशत एवं 11.48 प्रतिशत उड़द का योगदान है। देश मे उड़द की औसत उपज 451.6 किग्रा./हेक्टेयर है। देश के महाराष्ट्र(18.55 प्रतिशत), आंध्रप्रदेश(16.23 प्रतिशत), मध्यप्रदेश(18.55 प्रतिशत), उत्तरप्रदेश(12.61 प्रतिशत) एवं तमिलनाडू (11.00 प्रतिशत) प्रमुख उड़द उत्पादक प्रदेश है। (स्त्रोत – एग्रोइंडिया वेवसाइट) देश के कुल उड़द उत्पादन का 70 प्रतिशत केवल महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश एवं तमिलनाडू से प्राप्त होता है।

मध्यप्रदेश में जिलेवार

टीकमगढ़ में उड़द की खेती 68.90 (2013-14) तथा 84.50 हजार हे 0 वर्ष 2014-15 क्षेत्रफल में हुई और वर्ष 2013-14 में 50.43 मीट्रिक टन उपज प्राप्त हुई। जिले की औसत उपज 732 किग्रा/हे 0 है टीकमगढ़ जिले की प्रदेश के कुल क्षेत्रफल 18.36 प्रतिशत एवं उत्पादन में लगभग 21.40 प्रतिशत हिस्सेदारी है। जिले के दलहन फसलों के 50 प्रतिशत क्षेत्रफल में उड़द की खेती होती है। और कुल उत्पादन में उड़द का 33.46 प्रतिशत योगदान है। मनुष्य के दैनिक जीवन मे प्रोटीन का विशेष महत्व है। शाकाहारी भोजन में प्रोटीन प्राप्ति का सबसे सरल स्त्रोत दलहनी फसले हैं। इन दलहनी फसलों में उड़द का विशेष महत्व है। उड़द में लगभग 23-27 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। शरीर तथा मस्तिष्क के समुचित विकास और मरम्मत के लिये प्रोटीन अति आवश्यक है। भोजन में प्रोटीन के अभाव में बच्चों का शारीरिक विकास ही नहीं बल्कि मानसिक विकास भी उचित ढंग से नही हो पाता है। कम समय में पकने वाली उड़द की फसल का ग्रीष्म ऋतु में उगाकर अधिक फायदा ले सकते हैं। उड़द की फसल से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।

मध्यप्रदेश में उत्पादन

क्र.

वर्ष

क्षेत्रफल(हे.)

उत्पादन(हे.)

1.

2002-03

526.70

147.40

2.

2003-04

619.00

227.50

3.

2004-05

563.40

203.70

4.

2005-06

449.70

159.20

5.

2006-07

438.00

156.00

6.

2007-08

472.00

166.10

7.

2008-09

516.6

195.70

8.

2009-2010

570.3

214.0

9.

2010-2011

557.2

214.6

10.

2011-2012

601.3

163.3

टीकमगढ़ जिले में उड़द का उत्पादन

क्र

वर्ष

क्षेत्रफल(हे.)

उत्पादन(हे.)

उत्पादकता(किग्रा/हे)

1.

2002-03

57.70

12.51

216

2.

2003-04

66.20

21.53

325

3.

2004-05

62.97

18.89

313

4.

2005-06

25.30

9.50

373

5.

2006-07

64.30

25.40

388

6.

2007-08

45.00

13.00

389

7.

2008-09

29.60

10.90

370

8.

2009-2010

62.50

22.50′

360

9.

2010-2011

64.21

23.12

361

10.

2011-2012

66.90

23.20

961

स्त्रोत- डीडीए किसान कल्याण तथा कृषि विभाग टीकमगढ़

उत्पादन तकनीक

जलवायु -उड़द के लिये नम एवं गर्म मौसम की आवश्यकता पड़ती है। उड़द की फसल की अधिकतर जातियाँ प्रकाशकाल के लिये संवेदी होती है। वृद्धि के लिये 25-30 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान उपयुक्त होता है। 700-900 मिमी वर्षा वाले क्षेत्रों में उड़द को सफलता पूर्वक उगाया जाता है। फूल अवस्था पर अधिक वर्षा होना हानिकारक है। पकने की अवस्था पर वर्षा होने पर दाना खराब हो जाता है। जिले की जलवायु उड़द के लिये अति उत्तम है। उड़द की खरीफ एवं ग्रीष्म कालीन खेती की जा सकती है। भूमि का चुनाव एवं तैयारी -उड़द की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि मे होती है। हल्की रेतीली, दोमट या मध्यम प्रकार की भूमि जिसमें पानी का निकास अच्छा हो उड़द के लिये अधिक उपयुक्त होती है। पी.एच. मान 7-8 के बीच वाली भूमि उड़द के लिये उपजाऊ होती है। अम्लीय व क्षारीय भूमि उपयुक्त नही है। वर्षा आरम्भ होने के बाद दो- तीन बार हल या बखर चलाकर खेत को समतल करे । वर्षा आरम्भ होने के पहले बोनी करने से पौधो की बढ़वार अच्छी होती है।

उड़द की उन्नत किस्में –

मध्यप्रदेश के लिये अनुमोदित जातियाँ का चुनाव करे। उपयुक्त जातियाँ है-

किस्म

पकने का दिन

औसत पैदावार(क्विंटल/हे.)

अन्य

टी-9

70-75

10-11

  • बीज मध्यम छोटा, हल्का काला,
  • पौधा मध्यम ऊँचाई वाला।

पंत यू-30

70

10-12

  • दाने काले मध्यम आकार के,
  • पीला मौजेक क्षेत्रो के लिये उपयुक्त।

खरगोन-3

85-90

8-10

  • दाना बड़ा हल्का काला,
  • पौधा फैलने वाला जातियाँ

पी.डी.यू.-1(बसंत बहार)

70-80

12-14

  • दाना काला बड़ा,
  • ग्रीष्म के लिये उपयुक्त।

जवाहर उड़द-2

70

10-11

  • बीज मध्यम छोटा चमकीला काला,
  • तने पर ही फलियाँ पास-पास गुच्छो मे लगती है।

जवाहर उड़द-3

70-75

4-4.80

  • बीज मध्यम छोटा हल्का कालपौधा
  • मध्यम कम फैलने वाला।

टी.पी.यू.-4

70-75

4-4.80

  • पौधा मध्यम ऊँचाई का सीधा।

बीज की मात्रा एवं बीजउपचार – उड़द का बीज6-8 किलो प्रति एकड़ की दर से बोना चाहिये। बुबाई के पूर्व बीज को 3 ग्राम थायरम या 2.5 ग्राम डायथेन एम-45 प्रति किलो बीज के मान से उपचारित करे। जैविक बीजोपचार के लिये ट्राइकोडर्मा फफूँद नाशक 5 से 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपयोग किया जाता है।

बोनी का समय एवं तरीका – मानसून के आगमन पर या जून के अंतिम सप्ताह मे पर्याप्त वर्षा होने पर बुबाई करे । बोनी नाली या तिफन से करे, कतारों की दूरी 30 सेमी. तथा पौधो से पौधो की दूरी 10 सेमी. रखे तथा बीज 4-6 सेमी. की गहराई पर बोये।

खाद एवं उर्वरक की मात्रा – नत्रजन 8-12 किलोग्राम व स्फुर 20-24 किलोग्राम पोटाश 10 किलोग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से दे। सम्पूर्ण खाद की मात्रा बुबाई की समय कतारो मे बीज के ठीक नीचे डालना चाहिये। दलहनी फसलो मे गंधक युक्त उर्वरक जैसे सिंगल सुपर फास्फेट, अमोनियम सल्फेट, जिप्सम आदि का उपयोग करना चाहिये। विशेषतः गंधक की कमी वाले क्षेत्र मे 8 किलो ग्राम गंधक प्रति एकड़ गंधक युक्त उर्वरको के माध्यम से दे।

सिंचाई- क्रांतिक फूल एवं दाना भरने के समय खेत मे नमी न हो तो एक सिंचाई देना चाहिये।

निदाई-गुड़ाई – खरपतवार फसलो की अनुमान से कही अधिक क्षति पहुँचाते है। अतः विपुल उत्पादन के लिये समय पर निदाई-गुड़ाई कुल्पा व डोरा आदि चलाते हुये अन्य आधुनिक नींदानाशक का समुचित उपयोग करना चाहिये। नींदानाशक वासालिन 800 मिली. से 1000 मिली. प्रति एकड़ 250 लीटर पानी मे घोल बनाकर जमीन बखरने के पूर्व नमी युक्त खेत मे छिड़कने से अच्छे परिणाम मिलते है।

एकीकृत नाशी कीट प्रबंधन

उड़द मध्यप्रदेश में ही नहीं अपितु देश की प्रमुख खरीफ दलहन फसल है। इसकी खेती हेतु सामान्यतः अच्छे जल निकास वाली फसल उपयुक्त होती है। दलहन फसल के रूप में इसकी जड़ों में पाई जाने वाली गांठों के कारण इसमें नत्रजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है। इसके साथ देना ही साथ इस फसल में कीट प्रकोप रोकथाम हेतु संतुलित उर्वरक आवश्यक है। उड़द की फसल में अब तक 15 प्रकार के कीटों द्वारा क्षति दर्ज की गई है।कीट प्रकोप द्वारा इस फसल में 17 से 38 प्रतिशत तक हानि दर्ज की गई है। इनमें से कुछ प्रमुख कीट इस प्रकार है-

  • क्ली वीटिक (पिस्सू भृंग)- यह उड़द तथा मूंग का एक प्रमुख हानिकारक कीट है। इस कीट के भृंग तथा प्रौढ़ दोनों ही हानिकारक अवस्थायें है। भृंग रात्रि में सक्रिय रहकर पत्तियों पर छेद बनाकर क्षति पहुँचाते हैं। अधिक प्रकोप की स्थिति में 200 से अधिक छेद एक पत्ती पर पाए जा सकते हैं गर्मियों में बोई जाने वाली उड़द, मूंग को इस कीट से ज्यादा हानि देखी गई है। इस का भृंग (ग्रव) भूमिगत रहकर उड़द, मूंग तथा ग्वार आदि फसलों में जड़ों एवं तनों को क्षति पहुंचाते हैं। भृंग मुख्यतः उड़द की जड़ों में छेदकर घुस जाते हैं व खाकर ग्रंथियों को नष्ट करते हैं। जिससे 25 से 60 प्रतिशत तक गांठे प्रति पौधा नष्ट कर दी जाती है। इस प्रकार पौधों की नत्रजन स्थरीकरण की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे उत्पादन में अत्यधिक कमी आती है। प्रौढ़ भृंग भूरे रंग के धारीदार होते हैं जबकि भृंग (ग्रव) मटमैले सफेद रंग के भूमिगत होते हैं।
  • पत्ती मोड़क कीट (इल्ली)- प्रौढ़ कीट के पंख पीले रंग के होते हैं। इल्लियां हरे रंग की तथा सिर पीले रंग का होता है। इस कीट की इल्लियाँ ही प्रमुख रूप से हानि पहुँचाती हैं। इल्लियां पत्तियों को ऊपरी सिरे से मध्य भाग की ओर मोड़ती है। यही इल्लियां कई पत्तियों को चिपका कर जाला भी बनाती है। इल्लियां इन्हीं मुड़े भागों के अन्दर रहकर पत्तियों के हरे पदार्थ (क्लोरोफिल) को खा जाती हैं जिससे पत्तियां पीली सफेद पड़ने लगती है। कभी कभी क्षति प्रकोप अधिक होने पर पत्तियों की शिरायें ही बाकी रह जाती हैं।
  • सफेद मक्खी- इस कीट के प्रौढ़ एवं शिशु दोनों ही हानिकारक अवस्थाएं हैं। ये हल्का पीलापन लिए हुए सफेद रंग के होते हैं। शिशु पंखहीन होते हैं जबकि प्रौढ़ पंखयुक्त होते हैं। दोनों ही पत्तियों की निचली सतह पर रहकर रस चूसते रहते हैं जिससे पौधे कमजोर होकर सूखने लगते हैं। यह कीट अपनी लार से विषाणु पौधों पर पहॅंचाता है एवं ‘‘यलो मौजेक’’ नामक बीमारी फैलाने का कार्य करते हैं। यही कारण है कि यह एक अत्यन्त हानिकारक कीट सिद्ध होते हैं।पीले मोजेक का नियत्रंण रोग शुरु होते ही प्रारम्भ होते ही कर देना चाहिये । पीले रोग ग्रस्त पौधो को उखाड़ कर नस्ट कर दे तथा फसल को डायमेथोएट 30ई.सी. 2मिली./ली. पानी के साथ घोल कर छिडकाव करे यह विषाणु ‘‘पीला मौजेक’’ का प्रभावी उपचार है। अतः केवल स्वस्थ्य पौधों को इस की द्वारा प्रकोप से बचाकर ही इस बीमारी की रोकथाम की मध्य प्रदेश में उड़द-मूंग को सर्वाधिक क्षति सफेद मक्खी द्वारा जनित ‘‘यलो मौजेक’’ रोग से ही होती है। यहाँ तक की कम संख्या में भी यह कीट अत्यन्त हानिकारक है। सफेद मक्खी द्वारा इस फसल में 10 से 40 प्रतिशत तक उपज में कमी दर्ज की गई है।
  • पत्तियां भेदक इल्लियां- विभिन्न प्रकार की इल्लियां उड़द व मूंग की पत्तियों को क्षति पहुंचाकर उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। इसमें बिहार रोमिल इल्ली, लाल रोमिल इल्ली, तम्बाकू, इल्ली अर्द्ध गोलाकार (सेमीलूक) इल्ली आदि पत्ती भक्षक इल्लियां हानि पहुँचाती है। इस दशक में बिहार रोमिल इल्ली प्रमुख रूप से क्षति कारक है।
  • बिहार रोमिल इल्ली- इस कीट का प्रौढ़ मध्यम आकार का तथा प्रौढ़ के पंख भूरे पीले रंग के होते हैं। प्रौढ़ पंख में किनारे लाल रंग के एवं अग्र पंख जोड़ों पर काले धब्बे होते है। इल्लियां छोटी अवस्था में झुण्ड में रहकर पत्तियों को खाती हैं जिससे पत्ती पर जाला नुमा आकृति बन जाती है। बड़ी इल्लियाँ फसल में फैलकर पत्तियों में अत्यधिक क्षति पहुँचाती है। इनके शरीर पर घने बाल या रोय होते हैं। जिस कारण इन्हें ‘‘कंबल कीट’’ भी कहा जाता है। अत्यधिक प्रकोप की स्थिति में पौधे पत्ती विहीन होकर केवल ढांचे के रूप में रह जाते हैं। इनके प्रकोप से पौधे में दाने छोटे व उपज कम हो जाती है।

रासायनिक कीटनाशकों में उपयोग हेतु सुझाव

  • कीटनाशी रसायन का घोल बनाते समय उसमें स्टीकर (चिपचिपा) पदार्थ जरूर मिलाएं ताकि वर्षा जल से कीटनाशक पत्ती व पौधे पर से घुलकर न बहें।
  • धूल (डस्ट) कीट नाशकों का भुरकाव सदैव सुबह के समय करें।
  • दो या अधिक कीटनाशकों का व्यापारिक सलाह पर मिश्रण न करें। कीटों में प्रतिरोधकता रोकने हेतु सदैव हर मौसम में कीटनाशक बदल-बदल कर उपयोग करें।
  • कीट नाशक का घोल सदैव पहले डबले या मग्गे में बनाएं उसके बाद उसे स्प्रेयर की टंकी में पानी के साथ मिलाएं। कभी भी टंकी में कीटनाशक न डालें।

उपयोगी रासायनिक, कीटनाशकों की मात्रा

उपरोक्त कीट नाशकों का छिड़काव हेतु चयन करें। नेपसेक स्प्रेयर (15 ली. क्षमता) की 12 टंकी प्रति एकड़ तथा पॉवर स्प्रेयर की 5 टंकी प्रति एकड़ की दर से उपयोग करें। आवश्यकता होने पर दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव से 15 दिन बाद करें।

क्र

कीट का नाम मात्रा मात्रा/टंकी

कीटनाशक

मात्रा प्रति लीटर

मात्रा/टंकी(15 लीटर पानी)

मात्रा/हे.

1.

बिहार रोमिल, इल्ली तम्बाकू इल्ली,फली भेदक,फली भृंग एवं अन्य इल्लियाँ

क्वीनालफास

2 मि.ली.

30 मिली

500 ली.

2.

सफेद मक्खी

डाइमिथोएट 30 ई.सी.

2 मि.ली.

30 मिली

500 ली.

3.

हरा फुदका

डाइमिथोएट 30 ई.सी.

2 मि.ली.

30 मिली

500 ली.

कीट नाशकों के प्रयोग हेतु सूत्र दवा की मात्रा ज्ञात करना

दवा की मात्रा = छिड़काव घोल की ताकत * छिड़काव घोल की मात्रा / उपलब्ध दवा की ताकत

एकीकृत रोग प्रबंधन

प्रमुख रोग

  • पीला चित्तेरी रोग- इस रोग की प्रारम्भिक अवस्था में चित्तकवरे धब्बे के रूप में पत्तियों पर दिखाई पड़ते हैं। बाद में धब्बे बड़े होकर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। जिससे पत्तियों के साथ-साथ पूरा पौधा भी पीला पड़ जाता है।यदि यह रोग आरम्भिक अवस्था में लग जाता है तो उपज में शतप्रतिशत हानि संभव है। यह रोग विषाणु द्वारा मृदा, बीज तथा संस्पर्श द्वारा संचालित नहीं होता है। जबकि सफेद मक्खी जो चूसक कीट है के द्वारा फैलता है।
  • पर्ण व्याकुंचन रोग या झुर्रीदार पत्ती रोग – यह भी विषाणु रोग है। इस रोग के लक्षण बोने के चार सप्ताह बाद प्रकट होते हैं। तथा पौधे की तीसरी पत्ती पर दिखाई पड़ते हैं। पत्तियाँ सामान्य से अधिक वृद्धि तथा झुर्रियां या मड़ोरपन लिये हुये तथा खुरदरी हो जाती है। रोगी पौधे में पुष्पक्रम गुच्छे की तरह दिखाई देता है। फसल पकने के समय तक भी इस रोग में पौधे हरे ही रहते हैं। साथ ही पीला चित्तेरी रोग का संक्रमण हो जाता है।
  • मौजेक मौटल रोग- इस रोग को कुर्बरता के नाम से भी जाना जाता है तथा इसका प्रकोप मूंग की अपेक्षा उर्द पर अधिक होता है। इस रोग द्वारा पैदावार में भारी हानि होती है। प्रारम्भिक लक्षण हल्के हरे धब्बे के रूप में पत्तियों पर शुरू होते हैं बाद में पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं तथा फफोले युक्त हो जाती हैं। यह विषाणु बीज द्वारा संचारित होता है।
  • पर्ण कुंचन- यह रोग प्रारम्भिक अवस्था से लेकर पौधे की अंतिम अवस्था तक प्रकट हो सकता है। प्रथम लक्षण सामान्यतः तरूण पत्तियों के किनारों पर, पाश्र्व शिराओं व उनकी शाखाओं के चारों ओर हरीमहीनता का प्रकट होना है। संक्रमित पत्तियों के सिरे नीचे की ओर कुंचित हो जाते हैं तथा यह भंगुर हो जाती है ऐसी पत्तियों को यदि उंगली द्वारा थोड़ा झटका दिया जाये तो यह ढंठल सहित नीचे गिर जाती है। यह भी विषाणु जनित बीमारी है जो थ्रिप्स कीट द्वारा संचारित होती है।
  • सरकोस्पोरा पत्ती बुंदकी रोग- पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। जिनकी बाहरी सतह भूरे लाल रंग की होती है। यह धब्बे पौधे की शाखाओं एवं फलियों पर भी पड़ जाते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में यह धब्बे बड़े आकार के हो जाते हैं तथा पुष्पीकरण एवं फलियाँ बनने के समय रोग ग्रसित पत्तियाँ गिर जाती हैं। अनुकूल वातावरण में रोग उग्र रूप ले लेता है जिसके कारण बीज भी संक्रमित हो जाते है।
  • श्याम वर्ण (एन्थ्रेकनोज)- उड़द का यह रोग एक फफूंद जनित बीमारी है। बीमारी के लक्षण पौधे के सभी वायवीय भागों पर एवं वृद्धि की किसी भी अवस्था में प्रकट हो सकते हैं। पत्तियों एवं फलियों पर हल्के भूरे से गहरे भूरे, काले रंग के वृत्ताकार धब्बे दिखाई पड़ते हैं। धब्बों का मध्य भाग गहरे रंग का होता है एवं किनारे हल्के लाल रंग के होते हैं। रोग का अत्यधिक संक्रमण होने पर रोगी पौधा मुरझाकर मर जाता है। यदि बीज के अंकुरण होने पर शुरू में ही रोग का प्रकोप हो जाता है तो बीजोकुट झुलस जाता है।
  • चारकोल (मेक्रोफामिना) झुलसा- यह भी एक फफूंद जनित बीमारी है। जो मेक्रोफोमिना फेसियोलियाना से होता है। एक से डे़ढ़ माह की फसल में तने के आधार वाले भाग से सफेद केन्कर जैसे फेसियोलियाना हो जाते है। एक से डे़ढ़ माह की फसल में तने के आधार वाले भाग में सफेद केन्कर जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। उसके बाद ये भूरी धारियों में परिवर्तित होकर ऊपर की ओर बढ़ते हैं। रोगी पौधों की वृद्धि रूक जाती है जिससे वे वौने दिखाई देते है। पत्तियों का रंग गहरा हरा एवं चित्तीदार हो जाता है एवं आकार में छोटी हो जाती है। रोग ग्रसित पौधे की सामान्य पत्तियाँ भी अचानक झड़ने एवं सूखने लगती है। रोग से पौधे की फूल एवं फली बनने की क्रिया प्रभावित होती है। रोगी पौधों के कॉलर क्षेत्र के नीचे ऊध्र्वाधर अवस्था में देखने पर उसमें लाल भद्दे कलर की रंगहीनता दिखाई देती है जबकि जड़ के आन्तरिक अटकों में सफेद रंग की संरचना दिखती है।
  • चूर्णिता आसिता- इस बीमारी में सर्वप्रथम पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद पाउडर जैसी वृद्धि दिखाई देती है जो कवक के विषाणु एवं कवक जाल होते हैं। रोग की बढ़वार के साथ-साथ रोग के धब्बे भी बढ़ते जाते हैं जो कि वृत्ताकार हो जाते हैं और पत्तियों की निचली सतह पर भी फैल जाते हैं रोग का तीव्र प्रकोप होने पर पत्तियों की दोनों सतह पर सफेद चूर्ण फैल जाने के कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है। रोग पत्तियाँ पीली पड़कर झड़ने लगती है। बीमारी से प्रभावित पौधे समय से पूर्व पक जाते हैं जिससे उत्पादन में भारी नुकसान होता है।
  • जड़ सड़न एवं पत्ती झुलसा- यह बीमारी राइजोक्टोनिया सोलेनाई फफूंद से होते हैं। इसका प्रकोप फली वाली अवस्था में सबसे अधिक होता है। प्रारम्भिक अवस्था में रोगजनक सड़न, बीजोंकुर झुलसन एवं जड़ सड़न के लक्षण प्रकट करता है। रोग से ग्रसित पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती है एवं उन पर अनियमित आकार के भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। कुछ समय बाद ये छोटे-छोटे धब्बे आपस में मिल जाते हैं और पत्तियों पर बड़े क्षेत्र में दिखते हैं। पत्तियां समय से पूर्व गिरने लगती हैं। आधारीय एवं जल वाला भाग काला पड़ जाता है एवं रोगी भाग आसानी से छिल जाता है। रोगी पौधे मुरझाकर सूखने लगते हैं। इन पौधों की जड़ को फाड़कर देखने पर आंतरिक भाग में लालिमा दिखाई देती है।
  • जीवाणु पत्ती झुलसा- यह बीमारी जेन्थोमोनासा फेसिओलाई नामक जीवाणु से पैदा होती है। रोग के लक्षण पत्तियों की ऊपरी सतह पर भूरे रंग के सूखे हुए उभरे धब्बों के रूप में प्रकट होते है। रोग बढ़ने पर बहुत सारे छोटे-छोटे उभरे हुए धब्बे आपस में मिल जाते हैं। पत्तियां पीली पड़कर समय से पूर्व ही गिर जाती हैं। पत्तियों की निचली सतह लाल रंग की हो जाती है। रोग के लक्षण तना एवं पत्तियों पर भी दिखाई देते हैं।
  • गेरूआ- यह भी एक फफूंद जनित बीमारी है जो यूरोमाईसीस फेसिओलाई द्वारा पैदा होती है। रोग के प्राथमिक लक्षण पत्तियों पर दिखाई देते हैं पत्तियों पर वृत्ताकार, लाल भूरे रंग के उभार लिए हुए दाग बनते हैं जिन्हें पस्चूल कहते हैं। ये पस्चूल पत्तियों की निचली सतह पर सर्वाधिक बनते हैं जबकि तना एवं फलियों पर अपेक्षाकृत कम होते हैं। रोग का अधिक संक्रमण होने पर पत्तियों की दोनों सतह पर पस्चूलों (दागों) की संख्या अधिक हो जाती है जिससे यह झड़कर गिरने लगती है।

प्रतिरोधी प्रजातियों का चयन

  • पीला चित्तेरी रोग के लिये पंत उर्द-19, पंत उर्द-30, पी.डी.एम.-1 (वसंत ऋतु), यू.जी. 218, पी.एस.-1, नरेन्द्र उर्द-1, डब्ल्यू.बी.यू.-108, डी.पी.यू. 88-31, आई.पी.यू.-94-1 (उत्तरा), आई.सी.पी.यू. 94-1 (उत्तरा),
  • चूर्ण कवक के लिये एल.बी.जी.-17, एल.बी.जी. 402
  • जीवाणु पर्ण बुंदकी रोग के लिये कृषणा, एच. 30 एवं यू.एस.-131
  • पर्ण व्याकुंचन के रोग के लिये एस.डी.टी 3

रासायनिक प्रबंधन

  • पीला चित्तेरी रोग में सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु मेटासिस्टाक्स (आक्सीडेमाटान मेथाइल) 0.1 प्रतिषत या डाइमेथोएट 0.2 प्रतिशत प्रति हेक्टयर (210मिली/लीटर पानी) तथा सल्फेक्स 3ग्रा./ली. का छिड़काव 500-600 लीटर पानी में घोलकर 3-4 छिड़काव 15 दिन के अंतर पर करके रोग का प्रकोप कम किया जा सकता है।
  • झुर्रीदार पत्ती रोग, मौजेक मोटल, पर्ण कुंचन आदि रोगों के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोपिरिड 5 ग्रा./कि.ग्रा. की दर से बीजोपचार तथा बुबाई के 15 दिन के उपरांत 0.25 मि.मी./ली. से इन रोगों के रोग वाहक कीटों पर नियंत्रण किया जा सकता है।
  • सरकोस्पोरा पत्र बुंदकी रोग, रूक्ष रोग, मेक्रोफोमिना ब्लाइट या चारकोल विगलन आदि के नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम या बेनलेट कवकनाशी (2 मि.ली./लीटर पानी) अथवा मेन्कोजेब 0.30 प्रतिशत का छिड़काव रोगों के लक्षण दिखते ही 15 दिन के अंतराल पर करें।
  • चूर्णी कवक रोग के लिये गंधक 3 कि.ग्रा. (पाउडर)/हेक्ट. की दर से भुरकाव करें।
  • बीज को ट्राइकोडर्मा विरिडी, 5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें।
  • जीवाणु पर्ण बुंदकी रोग के बचाव हेेतु 500 पी.पी.एम. स्ट्रेप्टोमाइसीन सल्फेट से बीज का उपचार करना चाहिये। स्ट्रेप्टोमाइसीन 100 पी.पी.एम. का छिड़काव रोग नियंत्रण के लिये प्रभावी रहता है।

भण्डारण के प्रमुख कीट

  • दालो का घुन -इस कीट का प्रकोप खेत तथा भण्डार गृहो दोनो जगह ही होता है। यह भण्डार गृह मे ज्यादा नुकसान पहुँचाता है। इसके ग्रव तथा प्रौढ़ कीट दोनो ही नुकसान पहुँचाते है। दोनों के ही काटने चबाने वाले मुखांग होते है। परंतु अधिक क्षति ग्रव के द्वारा ही होती है। इसका प्रकोप फरवरी के महीने से ही जिस समय पौधो मे हरी फलियाँ लगती है शुरू हो जाता है। मादा हरी फलियो पर अण्डे रखती है। अण्डो से निकलने के बाद ग्रव फली मे छेद करके अंदर घुस जाता है। तथा दानो को खाता है। दानो के अंदर ग्रव जिस जगह से घुसता है।वह बंद हो जाता है तथा दाना बाहर से स्वस्थ दिखाई देता है। इस प्रकार ग्रसित दाने के अंदर ही कीट भण्डार गृहो मे पहुँच जाती है। वहाँ पर प्रौढ़ बनकर निकलता है जो कि प्रजनन कार्य शुरू कर देता है।
    भण्डार ग्रह मे यह कीट दरारो मे बोरो मे छिपा रहता है। जब दालें भण्डार गृह मे रखी जाती है। तो यह कीट दानो की सतह पर चिपके हुये आसानी से देखे जा सकते है। अण्डे से निकलने के बाद गृव दानो मे प्रविष्ट कर जाते है। ये ग्रव दानो के अंदर कृमिकोष अवस्था मे बदलते है। तथा बाद मे प्रौढ़ बनकर गोल छेद काटकर दानो से बाहर निकलते है। इसके बाद दाने खाने और बोने के योग्य नही रह जाते है।
  • खपरा बीटिल -यह कीट की दालो को नुकसान पहुॅचाने वाला महत्वपूर्ण कीट है। इस कीट का ग्रव ही ज्यादा नुकसान पहुँचाते है वयस्क कीट नही के बराबर ही नुकसान करते है। दोनो के काटने चबाने वाले मुखां होते है। सबसे अधिक क्षति जुलाई से अक्टूबर के महीनो मे होती है। यह दानो के भ्रूण वाले भागो को खाना अधिक पसंद करते है। इसके साथ ही यह दानो के अंदर प्रविष्ट नही करते है। इसीलिये दाना खोखला नही होता। कुछ भाग कटा हुआ दिखाई पड़ता है। इस प्रकार दानो की मात्रा मे कोई विशेष कमी नही होती है। भू्रण वाला भाग खा लेने से बीज के उगने की क्षमता नष्ट हो जाती है तथा उसकी पौष्टिकता वाले गुणो मे भी कमी आ जाती है। इस प्रकार कीट द्वारा ग्रसित दानो की गुणवत्ता मात्रा की अपेक्षा अधिक प्रभावित होती है।
  • लाल सुरही – इस कीट की ग्रव व प्रौढ़ दोनो ही अवस्थाये नुकसान पहुँचाते है। परंतु प्रौढ़ सूण्डी की अपेक्षा अधिक हानिकर होता है। प्रौढ़ दानो मे टेढ़ मेढ़े छेद करके उन्हे खाकर आटे मे बदल देते है। जिससे केवल भूसी और आटा शेष बचता है। ये खाते कम है तथा नुकसान अधिक पहुँचाते है। सूण्डी दानो के स्टार्च को खाती हैं परंतु बड़ी हो जाने पर जब ये टेढ़ी मेढ़ी हो जाती है तो दानो के अंदर प्रवेश नही कर पाती अतः प्रौढ़ द्वारा छोड़े गये बेकार टुकड़ो अथवा आटे को खाकर जीवन निर्वाह करती है। प्रौढ़ कीट खेतो से आक्रमण प्रारम्भ कर देते है। जिससे ग्रसित दाने भण्डार गृह मे आ जाते है। जहाँ पर उचित वातावरण मिल जाने से इनकी संख्या काफी बढ़ जाती हैं तब ये अत्याधिक नुकसान पहुँचाते हैं ।

भण्डारण के प्रमुख कीटो का प्रबंधन

  • जहाँ तक संभव हो गोदाम पक्का हो एवं उनकी दीवाले नमी विरोधी होना चाहिये।
  • जहाँ तक संभव हो नये बोरो को प्रयोग मे लाना चाहिये। पुराने बोरो को 15 मिनट तक उबलते पानी मे डुबोकर बोरो केा सुखाकर प्रयोग मे लाना चाहिये। अथवा इकाई प्रतिशत मैलाथियान घोल मे 10 मिनट तक डुबोकर बोरों को सुखाकर प्रयोग मे लाये।
  • दालो को सुरक्षित रखने के लिये एक भाग दाल मे 3/4 भाग राख मिलाये।
  • दालो को कड़ी धूप मे अच्छी तरह सुखा लें ताकि उसमें नमी 8-10 प्रतिशत रह जाये। यदि दालो को बोरियों में भरकर रखना है तो पर्याप्त मात्रा मे भूसे की तह बिछा देना चाहिये एवं बोरों को दीवार से 50 सेमी की दूरी पर रखना चाहिये।
  • भण्डार के लिये पूसा बिन, आर.सी. कोटी, पंतनगर कुठला, हापुड़ बिन, जी.आई. कोठी का उपयोग करें।
  • बोरों को लकड़ी से बने पटरो, जिनकी ऊँचाई 6 से 10 सेमी हो पर रखना चाहिये। बोरों को दीवार से 2-3 फीट की दूर पर तथा दो बोरो के बीच की दूरी 3 फीट होनी चाहिये।
  • बोरियो के ढेर की ऊँचाई 3 मीटर से अधिक तथा आकार 9मी.×6मी. से अधिक नही होना चाहिये।
  • भण्डारित करते समय यह ध्यान रखे कि नये दानो को पुराने दोने के साथ न मिलाये।

उड़द की खेती का आय एवं व्यय विश्लेषण

सामान्य परिस्थिति में उड़द की उपज (क्वि/हे.) – 10 क्विंटल /हे.
बाजार में प्रचलित मूल्य (रू/क्वि) – 4500 प्रति क्विंटल
कुल आमदानी (रू./हे.) – 45000
शुद्ध लाभ (रू./हे.) -26698
लाभ- लागत अनुपात – 2.40

स्त्रोत : किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग, मध्यप्रदेश सरकार

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