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लत्तरवाली सब्जियों की वैज्ञानिक खेती

शाक

सब्जियाँ हमारे दैनिक भोजन व आहार के महत्वपूर्ण अंग हैं। हमारे प्रतिदिन के भोजन में सब्जियों की विशेष अहमियत इसलिए है कि सब्जियों से हमें कार्बेहाइड्रेट, प्रोटीन, लवण, विटामिन तथा खाद्य-रेशे प्राप्त होते हैं। सब्जियाँ हमें स्वस्थ शरीर, मजबूत दांत और लम्बी उम्र प्रदान करती हैं। शाक-सब्जियाँ न केवल हमारे भोजन को पौष्टिक, स्वादिष्ट तथा रुचिकर बनाती हैं बल्कि हमें सम्पूर्ण जीवन शक्ति प्रदान करती हैं जिससे हमारा शरीर स्वस्थ एवं सुडौल बना रहता है। शाक-सब्जियों में अनेक रोगों को जड़ से नष्ट करने की अचूक क्षमता होती है।

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प्रकृति ने हमें उपहार के रूप में विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ, जलवायु और मौसम प्रदान किया हैं, जिसके फलस्वरूप विश्व में पैदा होने वाली सभी प्रकार की सब्जियाँ यहाँ उपजती तो हैं परन्तु लत्तरवाली सब्जियों का विशेष महत्व है। राष्ट्रीय सब्जी उत्पादन में लत्तरवाली सब्जियों का आर्थिक महत्व अधिक है। इन्हें उगाना सरल है। आप जहाँ चाहे वहाँ उगा सकते हैं, परन्तु इन सब्जियों की उत्पादकता प्रति इकाई भूमि में बहुत कम है। परम्परागत किस्मों की उन्नत तथा संकर किस्मों की खेती वैज्ञानिक ढंग से की जाय तो उत्पादन तथा उत्पादकता अवश्य बढ़ेगी। परन्तु सब्जी उत्पादन में हम अभी भी विश्व में चीन के बाद दूसरे स्थान पर हैं।

विशेषता

ईश्वर ने हमें अनुपम उपहार के रूप में विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु प्रदान किया है जिसके फलस्वरूप भारत की इस पवित्र धरती पर विभिन्न प्रकार की शाक-सब्जियाँ उपजती हैं जिनमें कद्दू वर्गीय लत्तर वाली सब्जियों की विशेष अहमियत है। इनके लोक प्रियता के निम्नलिखित कारण हैं:

  1. लत्तर वाली सब्जियों की कृषि प्रणाली अत्यंत सरल है। अत: इनकी खेती अत्यंत लोकप्रिय है।
  2. लत्तर वाली सब्जियों का प्रति हेक्टेयर बीज दर अत्यंत कम है तथा उत्पादन में लागत खर्च भी कम है।
  3. लत्तर वाली सब्जियों की खेती सालों भर होती है।
  4. इनकी बागवानी न केवल समतल जमीन पर होती है बल्कि पेड़ों पर, छप्परों पर, आंगन में तथा नदियों के किनारे पर भी की जाती है।
  5. कद्दू परिवार की लत्तर वाली सब्जियों के बिना प्रत्येक गृह-वाटिका अधूरी मानी जाती है।
  6. एस वर्ग की सब्जियों का भंडारण आसान है तथा इन्हें दूर-दराज के बाजारों में आसानी पूर्वक बेचा जा सकता है।

वर्गीकरण: कद्दू परिवार की लत्तर वाली सब्जियों को मुख्य दो वर्गो में बांटा जा सकता है।

1.  आग पर पकाकर खायी जाने वाली कद्दू परिवार की लत्तर वाली सब्जियाँ: इस वर्ग में ऐसी सब्जियों को रखा गया है जिनको सदैव आग पर पकाकर ही सब्जी के रूप में खाया जाता है। इनकी आप भुजिया, रसदार, सब्जी, कोफ्ता तथा पकौड़ा भी बना सकते हैं। जैसे कद्दू, लौकी, नेनुआ, झिंगली, करैला, सीस कुम्हड़ा, टिंडा, चप्पन कद्दू तथा चठेल मुख्य हैं। परवल की खोवा भरी मिठाई तथा कुंदरू का जायेकेदार आचार सबके मन को हर लेता है।

2.  कच्ची, बिना पकाये खायीं जाने वाली कद्दू परिवार की लत्तरवाली सब्जियाँ: इस वर्ग में ऐसी सब्जियों को रखा गया है, जिनको कच्ची अवस्था में सलाद के रूप में भोजन के साथ या बाद में खाया जाता है। जैसे: खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज इत्यादि। एस सब्जियों के उपयोग की प्रधानता फल की तरह है।

उत्पादन वृद्धि के तरीके

जलवायु: लत्तरवाली सब्जियाँ गर्मी मौसम अधिक पसंद करती हैं। औसत तापक्रम 60-850 फारेनहाइट होना चाहिए। विशेष नमी से कीड़े एवं व्याधियों का प्रकोप बढ़ जाता है। शुष्क एवं विशेष गर्म जलवायु में फलन कम हो जाता है तथा लताएँ सूखने लगती हैं।

भूमि एवं उसकी तैयारी

ये सब्जियाँ किसी भी प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है, परन्तु इनकी अच्छी पैदावार के लिए जल निकासयुक्त दोमट, बलुई दोमट मिट्टी जिसमें पर्याप्त मात्रा में जीवांश हो, अधिक उपयुक्त होती है।

खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा अन्य जुताईयाँ देशी हल से करना चाहिए। बुआई के एक महीना पहले खेत में गोबर की सड़ी खाद अथवा कम्पोस्ट (200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) की दर से अच्छी तरह मिला देना चाहिए।

उन्नत किस्में: व्यवसायिक दृष्टि से लत्तरवाली सब्जियों की उन्नत किस्में निम्नलिखित है –

कद्दू: राजेन्द्र चमत्कार, ढोली सफेद, पूसा मंजरी, पूसा मेघदूत (संकर), पूसा समर प्रौलिफिक लौंग एवं राउण्ड तथा स्थानीय प्रभेद।

करैला: पूसा दो मौसमी, बारहमासी, जौनपुरी, स्थानीय प्रभे।

कोहड़ा: ग्लोब परफेक्शन, लाल कोहड़ा बड़ा गील।

नेनुआ: राजेन्द्र नेनुआ-1, पूसा चिकनी, सतपुतिया।

परवल: राजेन्द्र परवल-1, राजेन्द्र परवल-2, हिल्ली, डंडाली, निमियाँ, सफेदा, गुथलिया, स्वर्ण रेखा, स्वर्ण अलौकिक, संतीखवा।

खीरा: बालम खीरा, पूसा संजोग, जापानी लौंग ग्रीन।

झिंगनी: पूसा नसदार, सतपुतिया।

खरबूज: सूगर बेबी, पूसा महारस, दुर्गापुर मधु, पंजाब संकर।

तरबूज: सूगर बेबी, अर्का मानिक, अर्का ज्योति, दुर्गापुर केसर।

बुआई का समय एवं विधि: बुआई का समय भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग होता है। परन्तु रबी मौसम के लिए बीज दिसम्बर से फरवरी तक बोना चाहिए।

इन सब्जियों के बीज थाले या नाले में बोये जाते हैं। थाला या नाला में एक स्थान पर दो-तीन बीज बोना चाहिए। बाद में एक-दो पौधा ही रखना चाहिए। थाले में नमी बनाकर तथा बीज को भींगाकर अंकुरित कर लगाना चाहिए।

लगाने की दूरी एवं बीजदर: कद्दू, कोहड़ा, नेनुआ, झिंगनी, परवल

खरबूज, तरबूज: 1.5 से 2 मी. दोनों ओर से

खीरा, करैला: 1 से 1.5 मी. दोनों ओर से

अपेक्षाकृत कम दूरी हर मौसम में विशेष लाभदायक होती है।

बीज दर: कद्दू, नेनुआ, कोहड़ा, करैला (6-8) किलोग्राम प्रति हेक्टेयर खीरा, झिंगनी 2.5-3.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।

खाद एवं उर्वरक: रबी मौसम में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग सिंचाई सुविधा के अनुसार करना चाहिए। जैविक खाद का व्यवहार से मिट्टी की स्थिति सुधरती है तथा नमी बनी रहती है। खाद एवं उर्वरक की औसत मात्रा निम्न प्रकार देना चाहिए।

कद्दू, कोहड़ा, नेनुआ: 200 क्विंटल कम्पोस्ट, 150-200 किग्रा. यूरिया, 250-300 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट, 60 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर।

करैला, खीरा, झिंगनी: 150-200 क्विंटल कम्पोस्ट, 100-125 किग्रा. यूरिया, 200-250 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट, 60 किग्रा. पोटाश/हेक्टेयर। कद्दू, कोहड़ा तथा नुनुआ में नेत्रजन तीन किस्तों में उपरिवेशन के रूप में तथा करैला, खीरा, झिंगनी में दो किस्तों में देना अधिक लाभदायक होता है।

सिंचाई: 10 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए।

निकाई-गुड़ाई: सिंचाई के बाद उपयुक्त समय पर निकाई-गुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रित रहता है और नमी भी बनी रहती है।

सहारा देना

लत्तीदार सब्जियों में सहारा देना अतिआवश्यक है। इसके लिए बांस गाड़कर मचान बनाना चाहिए। सहारा देने से लत्तरवाली सब्जियों में वृद्धि अच्छी होती है एवं अधिक फल लगते हैं। ऐसा करने से पौधों को धूप एवं हवा अच्छी तरह मिलती है। इस तरह कीड़े-मकोड़े एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है। अत: सहारा देने के काम को अच्छी ढंग से करना चाहिए। इसी पर अधिक फलन एवं अच्छी उपज निर्भर करती है। कुछ लत्तीदार सब्जियों जैसे नेनुआ, परवल, कुंदरी आदि की लत्तियाँ जमीन की संपर्क में आकर गांठों से जड़ निकल आती है और व्यक्तिगत पौधे के समान व्यवहार करने लग जाते हैं, जिससे शाकीय वृद्धि अधिक होती है और फलन कम होता है। अत: एस अवगुण से बचाने के लिए पौधों को सहारा देना आवश्यक है।

उपज: उचित ढंग से खेती करने पर निम्नलिखित औसत उपज प्राप्त किये जा सकते हैं:

कद्दू, कोहड़ा, परवल: 125 से 150 क्विंटल/हेक्टेयर

नेनुआ, खीरा: 80-90 क्विंटल/हेक्टेयर

करैला, झिंगनी: 60-65 क्विंटल/हेक्टेयर

पौधा संरक्षण

लत्तीदार सब्जियों में लगने वाले मुख्य कीड़ों, लाल कीड़ा, फल की मक्खी, एपीलैकना बीटल एवं जौसिड है। ये पत्तियों, तना, फूल तथा फल खाते हैं एवं पत्तियों के रस चूसते हैं जिससे फसल को भारी नुकसान पहुंचता है। फलत: उपज सीधे प्रभावित होता है, इसके नियंत्रण के लिए कार्बोरिल 50 प्रतिशत डब्लू. पी. 1.5 से 2 किलोग्राम या इंडोसल्फान 35 ई. सी. 1 से 1.5 लीटर या लिंडेन 1 से 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से व्यवहार करना चाहिए।

लत्तीदार सब्जियों में एन्थ्रेकनोज, मोजैक, पर्णदाग एवं जड़ गलन नामक बीमारियाँ मुख्य रूप से लगती है। एन्थ्रेकनोज की बीमारी में पत्तियों एवं तनों पर धब्बे हो जाते हैं एवं काले पड़ जाते हैं। इस रोग से बचाने के लिए इमीसान 6 का 2 ग्राम अथवा वैविस्टीन 1 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करके ही बीज बोना चाहिए। खड़ी फसल में लगे रोग से बचाव के लिए इंडोफिल एम. 45, 2 से 2.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। मोजैक नामक बीमारी में पत्ते सिकुड़ जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए प्रतिरोधी किस्मों के बीजों का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि यह विषाणु जनित रोग है जिसका फैलाव कीटों द्वारा होता है। पर्णदाग की बीमारी में पत्तियों पर गहरे भूरे धब्बे हो जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए इंडोफिल एम. 45, 2 से 2.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर छिड़काव 10-15 दिनों पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करना चाहिए। इससे बचाव के लिए बीज को इमीसान 6 या थिरम या वैविस्टीन द्वारा उपचारित कर ही बोना चाहिए।

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता: कृषि विभाग, बिहार सरकार

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