/वर्षा आधारित कृषि में आय बढ़ाने वाली तकनीकें

वर्षा आधारित कृषि में आय बढ़ाने वाली तकनीकें

क्र. सं.

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बाधाएं

कारण

उपयुक्त तकनीक/सुझाव

प्रभाव

1.

असंतुलित पोषक तत्व प्रबंधन

अन्य उपयोग (ईंधन, घर लेपना इत्यादि) के कारण लगातार जैविक खादों (गोबर की खाद) की उपलब्धता में गिरावट

कुल फसल पोषक तत्वों की मांग का 50 प्रतिशत भाग जैविक खादों द्वारा पूरा करना

अनुसंधान दर्शाते हैं कि 2 -10 टन [प्रति हे. की दर से जैविक खाद (गोबर की खाद) देने से लगभग सभी फसलों में अपेक्षित बढ़ोतरी एवं मृदा स्वास्थ्य में सुधार

2

असंतुलित मात्रा में रासायनिक खादों का उपयोग

मृदा परिक्षण सुविधाओं की कमी एवं समय पर सभी आवश्यक खादों की अनुपलब्धता

मृदा स्वास्थ्य परिक्षण के आधार पर क्षेत्र, फसल एवं मृदा विशेष के अनुसार रासायनिक खादों का प्रयोग करना

विभिन्न फसलो की उपज में 5 -50 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ मृदा स्वास्थ्य को इसके उच्चतर स्तर पर पाया गया है।

3

भूमि की निचली सतह पर बनी कठोरता/कठोर परत

कुछ मृदाओं (लाल) में नैसर्गिक रूप से कठोर परत का विद्यमान होना तथा साल दर साल एक ही प्रकार के कृषि यंत्रों द्वारा निश्चित गहराई पर जुताई क्रियाएँ, करना

कोयम्बटूर की मृदा में चिजल हल से गहरी जुताई करनेसे बाजरा,मूंगफली,चना , मूंग के बीजोत्पादन में 18 – 60 प्रतिशत तक की वृद्धि। इसी प्रकार हिसार की मृदाओं में गहरी जुताई करने से गेहूं एवं राई में क्रमश: 17 तथा 41 प्रतिशत बीजोत्पादन में बढ़ोतरी

4.

रेतीली मृदाओं में अधिक सतह जल भेदता

भुरभुरी  मृदा संरचना एव अधिक मात्रा में वृहद् मृदा छिद्र्ता का होना

1. बिजाई पूर्व सतह पर वजनी रोलर (500 -2000 कि. ग्रा.) को कई बार घुमाना 2 चिकनी मिट्टी/तालाब की गाद को 2 प्रतिशत की दर से मृदा में मिलाना 3. रेगिस्तान तकनीकी (2 प्रतिशत चिकनी मिट्टी मिलाने के बाद सतह पर रोलर घुमाना)

विभिन्न फसलों (बाजरा, मक्का, ज्वर, ग्वार इत्यादि) के बीजोत्पादन में 29 – 39 प्रतिशत बढोतरी देखी गई, जिसकी मुख्य वजह रही मृदा  जल संचालकता में कमी एवं अधिक मृदा जल की उपलब्धता

5

काली मृदाओं में कम सतह जल भेदता

2 – 5 टन प्रति हे. जिप्सम के साथ 2 – 10  टन प्रति हे. की दर से गोबर की खाद का प्रयोग करना

विभिन्न क्षेत्रों में फसल उपज एवं मृदा स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार

6.

मृदा सतह पर वर्षा उपरांत सतह पर कठोर परत का बनना

कमजोर मृदा संरचना के साथ मृदा सतह पर किसी भी प्रकार के जैविक आवरण का न होना

1. हल्के कृषि यंत्रों द्वारा सतह पपड़ी को तोड़ना 2. बीज कतारों में 1 – 2 टनप्रति हे. गोबर की खाद डालना, 3. बीज कतारों पर फसल अवशेषों (चावल, गेहूं का भूसा, नारियल की जटा, मूंगफली का छिलका इत्यादि डालना, 4. काली मृदाओं में जिप्सम का प्रयोग

विभिन्न फसलों (बाजर, कपास, ज्वार, मक्का) के बिजांकुर  में  4- 33 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई। लाल मृदाओं में विभिन्न जैविक पदार्थों की प्रभावशीलता निम्नलिखित रूप से देखी गई : गोबर की खाद *10 टन प्रति हे. ) > नारियल की जजटा (20 टन प्रति हे.)> मूंगफली का छिलका (5 टन प्रति हे.) > जिप्सम (4 टन प्रति हे.) > चावल का भूसा (5 टन प्रति हे.)

7.

तीव्रजल बहाव एवं मृदा क्षरण

1. नैसर्गिक रूप से मृदा होना 2. कई मृदाओं से सतह जल भेदता का कम होना 3. अधिक तीव्रता के साथ वर्षा होना 4. मृदा सतह पर किसी भी प्रकार का जैविक आवरण होना

1. गहरी जुताई करना 2. ढलानों के विपरीत जुताई एवं बिजाई करना, 3. मृदा के अनुसार बिजाई सतह विन्यास में बदलाव करना, 4. 1.5 प्रतिशत सतह ढलानों वाली काली मृदाओं में स्म्मोच्च विधि, टीला एवं कुंड, उत्थित क्यारी, उपखंड क्यारी, संरक्षित नाली, घांसी क्यारी इत्यादि सतह विन्यास में बिजाई करना

टीला एवं नाली पद्धति से बिजाई करने से जबलपुर में ज्वार की फसल में 27 प्रतिशत तथा इसी फसल में परभटी में 17 प्रतिशत बढोतरी देखी गई। परभनी में वृहद क्यारी में टीला एवं कूंड बिजाई से मूंग एव ज्वार में क्रमशः 19 एवं 25 प्रतिशत बढ़ोतरी देखी गई। इसी प्रकार अनेक क्षेत्रों में उत्थित क्यारी में विजाई करने से फसलों में 5 – 55  प्रतिशत बढ़ोतरी

8.

जैविक फसल अवशेषों की कमी

1. ज्यादातर क्षेत्रों में एकल फसल प्रणाली का होना 2. जैविक फसल अवशेषों को मृदा में न मिलाकर अन्य उपयोगों में लाना

1. फसलों की कटाई मृदा सतह से 10 – 60 सें. मी. की ऊंचाई पर करना 2. मृदा सतह को ढकने वाली फसलें (कूल्थी, मूँगबीन, सोयाबीन, उड़द, लोबिया इत्यादि) लगाना 3. हरी खादों का प्रयोग करना 4. खेती की सीमा पर जैवभार पैदा करने वाले वृक्षों सतह पर डालना

हैदराबाद की लाल मृदाओं मर गिरी पुष्पाद की टहनियों की कतरनों को 20 टन प्रति हे. की दर से डालने से ज्वार की उपज में आशातीत बढ़ोतरी देखी गई। इसी पाकर पालम पूर की मृदाओं में राई मुनिया (खरपतवार) को 20 तन प्रति हे. ताजा भार के अनुसार सतह पर डालने से मक्का की उपज में बढ़ोतरी

9.

वर्षा जल संग्रहण का उचित प्रबंधन न होना

1. छोटी खेत जोत आकार। 2. कई खेत जोतों पर प्राकृतिक ढलान न होना 3. लागत की समस्या

बड़ी खेत जोतों के  लिए खेत तालाब  तकनीक एवं सामूहिक भूमि पर समुदायिक तालाब तकनीक

भाकृअनुप – केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद द्वारा किये गये अनुसंधान दर्शाते हैं कि संग्रहित जल से विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाई जा सकती है तथा फसल मध्य सूखे के दौरान जीवन रक्षा सिंचाई करके फसलों को बचाया जा सकता है। इससे उपज एवं आय में बढ़ोतरी

10

संग्रहित जल का विवेकपूर्ण एवं तार्किक रूप से प्रबंधन न होना

किसान द्वारा ज्ञान के अभाव में लंबी अवधि की फसलें लगाने से अधिक जल की आवश्यकता

क्षेत्र विशेष के अनुसार कम अवधि तथा अधिक लाभदायक फसलों (सब्जियां, औषधियां, घास इत्यादि) की प्रजातियां लगाना। क्षेत्र विशेष में विद्यमान कृषि विश्वविद्यालय से समय – समय पर इनकी जानकारी

कम अवधि एएवं अधिक सूखा सहन करने वाली फसलों से किसान की आय में वृद्धि

11.

अंत: फसलीकरण का अभाव

किसानों द्वारा उदासीनता एवं अधिक मेहनत न  करने की वजह से परंपरागत रूप से एक ही फसल बोना

विभिन्न फसल प्रणालियों (कपास आधारित, चावल आधारित, सोयाबीन आधारित इत्यादि के लिए अंत फसलीकरण की तकनीकियाँ विकसित की गई है। उदहारण के लिए पौष्टिक अनाज आधारित कृषि प्रणाली, जहाँ की वार्षिक वर्षा 561 – 936 मि. ली. होती है, के लिए निम्नलिखित अंत: फलीकरण प्रणालियों का सुझाव दिया गया है: ज्वार+अरहर (2:1), सूरजमुखी +अरहर 2:1), चना+कुसूम (3:1), बाजरा + अरहर (2:1), बाजरा + मोठ (2/3:1), ज्वार + अरहर (1:1), अरहर + बाजरा (1:3), चना + कुसूम (3:1), अरहर + मूंग (1:1), जौ + चना (3:2), बाजरा + ग्वार (2:1), रागी + अरहर (10:1), सोयाबीन + रागी (1:1), मूंगफली + अरहर (8:2) इत्यादि

अनुसंधान दर्शाते हैं कि उपरोक्त अंत:फलीकरण ने केवल फार्म से आय में वृद्धि दर्ज की गी बल्कि बदलते हुए जलवायु परिवर्तन से मुकाबले करने में सहायता मिली है। अंत:फलीकरण का मृदा स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव

12.

वर्ष भर (हरे चारे की अनुपलब्धता)

किसानों द्वारा हरा चारा उत्पादन पर विशेष ध्यान न देना तथा सूखे चारे पर ही निर्भर रहना

भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झाँसी द्वारा विभिन्न तकनीकियाँ विकसित की गई है। इनमें से एक अर्ध -शुष्क वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए सुबबूल + पेनिसेटम ट्रेस्थोपनिक – ज्वार चारा + अरहर अनुक्रमण सबसे प्रभावी तकनीक

उपरोक्त प्रणाली में हरा चारा 50 – 55 टन प्रति हे. प्रति वर्ष+सूखा चारा 13 – 14 टन प्रति हे. वर्ष +0.41 टन प्रति हे. वर्ष अनाज प्राप्त होता है तथा इस चारा उत्पादन प्रणाली की लागत केवल 25,000 रूपये प्रति हे. प्रति वर्ष है

13

कृषि वानिकी आधरित कृषि प्रणालियों का अभाव

तकनीकियों का किसानों तक सुचारू रूप एवं समयबद्ध तरीके से न पहुँचना

1. वन – चारागाह तकनीकी

2. फसल वृक्ष तकनीकी

3. फसल बागवानी तकनीकी

4. अर्ध – शुष्क उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अफ्रीकन विटरर्थान+ अंजन घास+पेड़ पंक्तियों के बीच बाजरा, उड़द एवं मूंग लगाना

काजरी, जोधपुर के अनुसंधान दर्शाते हैं कि शुद्ध कृषि योग्य फसल की तुलना में वृक्ष आधारित खेत प्रणाली से अधिक लाभ:लागत अनुपात

14.

क्षेत्र विशेष के लिए विकसित की गई खेत प्रणालियों का विस्तार न होना

विस्तार तंत्र की कमी एवं किसान ज्ञान में कमी तथा शुरूआती लागत की समस्या

1. दक्षिणी तेलंगाना के छोटे किसानों (1.12 हे. जोत) के लिए खेत, खेत प्रणाली : फसल (अरहर, बाजरा, अरंडी, कुल्थी) + सब्जियां (भिंडी, बैंगन, ग्वार फली) + फल (शरीफा)

2. कोविलपट्टी तमिलनाडु में फसल + बकरी + मुर्गा पालन + भेड़ डेरी पालन

3. कर्नाटका में मूंगफली आधारित फसल प्रणाली में फसल + डेरी + शुष्क बागवानी + भेड़ प्रणाली

4. धान आधारित फसल  प्रणाली बैंगन + पटसन + मशरूम + मुर्गा पालन

1. मौजूद फसल प्रणाली (अरहर+ज्वार) के मुकाबले तीन गुना अधिक आय

2. केवल फसल प्रणाली की मुकाबले समेकित प्रबंधन में शुद्ध आय में लगभग आठ गुना वृद्धि

3. केवल फसल प्रणाली के मुकाबले शुद्ध आय में पांच गुना वृद्धि

4. केवल फसल प्रणाली के मुकाबले शुद्ध आय में तीन गुना वृद्धि

15

उपयुक्त कृषि यंत्रों की अनुपलब्धता की कमी

कृषि यंत्रों की लागत की समस्या

केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा इस क्षेत्र के किसानों के लिए प्रिसिजन प्लान्टर, जिरोटिल सीडाड्रिल कम  हर्बिसाईड एप्लीकेटर, अनाज एवं हरी पत्तियां सुखाने का यंत्र, हल्के जुताई यंत्रों इत्यादि का निर्माण किया है

प्रिसीजन प्लांटर से बिजाई करने से विभिन्न फसलों (मक्का, अरंडी) के बीजांकुर में 10 -12 प्रतिशत बढ़ोतरी

16.

कृषि मौसम परामर्श सेवाओं का अभाव

1. किसानों का कम शिक्षित होना

2. अभी भी आम किसानों की पहुँच से दूर होना

केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद से जारी नीक्रा परियोजना, एक्रीपड़ा एवं एक्रीपाम परियोजनाओं द्वारा सतत प्रयास जारी है।

समय – समय पर कृषि परामर्श सेवाएँ प्रदान करके कुर्नूल (आंध्र प्रदेश), कानपुर (उत्तर प्रदेश), बेलगाम (कर्नाटक) और राजसमंद, (राजस्थान) में फसल उपज में बढ़ोतरी दर्ज की गई तथा किसानों को मौसमी जोखीम से बचाकर विभिन्न आगतों पर होने वाले खर्चे को कम किया जा सका। अकोला (महाराष्ट्र), के जलगाँव में कृषि परामर्श मौसम सलाह से लाभ:लागत अनुपात 2:24 जबकि बिना कृषि मौसम सलाह वाले किसानों का लाभ: लागत अनुपात 1.92 था। इसी प्रकार कोविलपट्टी (तमिलनाडु) के अतीकूंदम गाँव में यह अनुपात क्रमश: 2.3 तथा 1.71

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