/शरीफा की खेती

शरीफा की खेती

परिचय

झारखंड की भूमि और जलवायु शरीफा की खेती के लिये अत्यंत उपयुक्त है। यहाँ के जंगलों में इसके पौधे अच्छे फल देते है जिसे इक्ट्ठा करके स्थानीय बाजारों में अगस्त-अक्टूबर तक बेचा जाता है। यदि इसकी वैज्ञानिक विधि से खेती की जाय तो यहाँ के किसान इससे अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते है साथ ही पोषण सुरक्षा में भी मदद मिलेगी।

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शरीफा एक मीठा व स्वादिष्ट फल है। इसे “सीताफल” भी कहा जाता है। इसका वानस्पतिक नामअनोनस्क्चैमोसा है। इसकी पत्तियाँ गहरी हरी रंग की होती है। जिसमें एक विशेष महक होने की वजह से कोई जानवर इसे नहीं खाते हैं। इसलिये उसके पौधे को विशेष देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है। साथ ही इसके पौधों पर हानिकारक कीड़े एवं बीमारियाँ भी नही लगते हैं। शरीफा औषधीय महत्व का भी पौधा है। इसकी पत्तियाँ हृदय रोग में टॉनिक का कार्य करता है क्योंकि इसकी पत्तियों में टेट्राहाइड्रो आइसोक्विनोसीन अल्कलायड पाया जाता है। इसकी जड़े तीव्र दस्त के उपचार में लाभकारी होती हैं। शरीफे के बीजों से निकालकर सुखाई हुई गिरी में 30 प्रतिशत तेल पाया जाता है, इससे साबुन तथा पेन्ट बनाया जाता है। पोषण की दृष्टि से भी शरीफा का फल काफी अच्छा माना गया है। फलों में 14.5 प्रतिशत शर्करा पाई जाती है जिसमें ग्लूकोज की अधिकता होती है। फलों के गूदे को दूध में मिलाकर पेय पदार्थ के रूप में उपयोग किया जाता है एवं आइस्क्रीम इत्यादि बनाया जाता है।

भूमि एवं जलवायु

शरीफा के पौधे लगभग सभी प्रकार के भूमि में पनप जाते हैं परन्तु अच्छी जल निकास वाली दोमट मिट्टी इसकी बढ़वार एवं पैदावार के लिये उपयुक्त होती है। कमजोर एवं पथरीली भूमि में भी इसकी पैदावार अच्छी होती है। इसका पौधा भूमि में 50 प्रतिशत तक चूने की मात्रा सह लेता है। भूमि का पी.एच.मान 5.5 से 6.5 के बीच अच्छा माना जाता है। शरीफा के पौधे के लिये गर्म और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र जहाँ पाला नहीं पड़ता है, अधिक उपयुक्त होता है। पाले वाले क्षेत्र में इसकी फसल को हानि होती है। झारखंड के हजारीबाग, राँची, साहेबगंज, पाकुड़, गोड्डा इत्यादि जिलों में इसकी अच्छी खेती की जा सकती है।

किस्में

शरीफा की किस्में स्थान, फलों के आकार, रंग, बीज की मात्रा के आधार पर वर्गीकृत किये गये है। प्रमुखत: बीज द्वारा प्रसारित होने के कारण अभी तक शरीफा की प्रमाणिक किस्मों का अभाव है। परन्तु फलन एवं गुणवत्ता के आधार पर कुछ किस्मों का चयन किया गया है।

बाला नगर

झारखंड क्षेत्र के लिए यह एक उपयुक्त किस्म है। इसके फल हल्के हरे रंग के होते हैं। यहाँ के जंगलों में इसके अनेक स्थानीय जननद्रव्य पाये गये है।

अर्का सहन

यह एक संकर किस्म है जिसके फल अपेक्षाकृत चिकने और अधिक मीठे होते है।

लाल शरीफा

यह एक ऐसी किस्म है जिसके फल लाल रंग के होते हैं तथा औसतन प्रति पेड़ प्रति वर्ष लगभग 40-50 फल आते हैं। बीज द्वारा उगाये जाने पर भी काफी हद तक इस किस्म की शुद्धता बनी रहती है।

मैमथ

इसकी उपज लाल शरीफा की अपेक्षा अधिक होती है। इस किस्म में प्रतिवर्ष प्रति पेड़ लगभग 60-80 फल आते हैं। इस किस्म के फलों में लाल शरीफा की अपेक्षा बीजों की संख्या कम होती है।

पौधा प्रसारण

शरीफा मुख्य रूप से बीज द्वारा ही प्रसारित किया जाता है। किन्तु अच्छी किस्मों की शुद्धता बनाये रखने, तेजी से विकास एवं शीध्र फसल लेने के लिये वानस्पतिक विधि द्वारा पौधा तैयार करना चाहिए। वानस्पतिक विधि में बडिंग एवं ग्राफ्टिंग से अधिक फसल पायी गई है। ग्राफ्टिंग के लिये अक्टूबर-नवम्बर एवं बडिंग के लिए फरवरी मार्च का महीना छोटानागपुर क्षेत्र के लिये उचित पाया गया है।

शील्ड बडिंग जनवरी से जून तथा सितम्बर-अक्टूबर के महीने में अच्छी सफलता प्राप्त होती है। शरीफा में शील्ड बडिंग के द्वारा पौधा तैयार करना सबसे आसान है। पिछली ऋतु में निकली स्वस्थ एवं परिपक्व कालिका काष्ठ का चुनाव कर लेते है। मूलवृंत एक वर्ष पुराना तथा पेंसिल की मोटाई का होना चाहिये। प्रतिरोपण के बाद लगभग 15 दिन तक कलिका को पॉलीथीन की पतली मिट्टी या केले के रेशे द्वारा बांध देते है।

पौधा रोपण

शरीफा लगाने के लिये जुलाई का महीना उपयुक्त रहता है। शरीफा का बीज जमने में काफी समय लगता है। अत: बोने से पहले बीजों को 3-4 दिनों तक पानी में भिगा देने पर जल्दी अंकुरण हो जाता है। इसके पौधे को सीधे बगीचे में जहाँ लगाना हो वहीं पर थाले बनाकर एक स्थान पर 3-4 बीज बोते हैं। जब पौधे लगभग 15 सें.मी. के हो जायें तो अतिरिक्त पौधे निकालकर केवल एक पौधा को बढ़ने के लिए छोड़ देना चाहिये। नर्सरी में बीज बोकर बाद में पौधों की रोपाई करने पर शरीफा का काफी पौधा मर जाता है इसको लगाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पॉलीथीन के थैलियों में मिट्टी भरकर बीज लगाये और जब पौधे जमकर तैयार हो जायें तब पॉलीथीन के थैलियों को नीचे को अलग कर दें। पौधें को पिंडी सहित बगीचे में तैयार गड्ढे में लगा दें। शरीफा के पौधे के लिये गर्मी के दिनों में 60 x 60 x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे 5 x 5 मी. की दूरी पर तैयार किये जाते हैं। इन गड्ढों को 15 दिन खुला रखने के बाद ऊपरी मिट्टी में 5-10 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद, 500 ग्राम करंज की खली तथा 50 ग्राम एन.पी.के. मिश्रण को अच्छी तरह मिलाकर भर देना चाहिये। इसके बाद गड्ढे की अच्छी तरह दबा दें और उसके चारों तरफ थाला बनाकर पानी दे दें। यदि वर्षा न हो रही हो तो पौधों की 3-4 दिन पर सिंचाई करने से पौधा स्थापना अच्छी होती है।

खाद एवं उर्वरक

शरीफा के पेड़ में प्रत्येक वर्ष फलन होती है अत: अच्छी पैदावार के लिये उचित मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद एवं रासायनिक उर्वरक देनी चाहिये। शरीफे की पूर्ण विकसित पेड़ में 20 कि.ग्रा. गोबर की खाद, 40 ग्रा. नाइट्रोजन, 60 ग्रा. फास्फोरस और 60 ग्रा. पोटाश प्रति पेड़ प्रति वर्ष देना चाहिए।

सिंचाई

शरीफा के पौधों को गर्मियों में पानी देना आवश्यक होता है। अत: इस समय 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिये। वर्षा की समाप्ति के बाद एक या दो सिंचाई करने से फलों का आकार बड़ा होता है।

पौधों की देख-रेख एवं काट-छांट

पौधा लगाने के बाद से पौधे की नियमित रूप से देखभाल की जानी चाहिये। पौधे के थालों में समय-समय पर खरपतवार नियंत्रण करना चाहिए। पौधों में जुलाई-अगस्त में खाद एवं उर्वरक प्रयोग तथा आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिये। नये पौधों में 3 वर्ष तक उचित ढाँचा देने के लिये कांट-छांट करना चाहिये। कांट-छांट करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि तने पर 50-60 सें.मी. ऊँचाई तक किसी भी शाखा को नहीं निकलने दें उसके ऊपर 3-4 अच्छी शाखाओं को चारों तरफ बढ़ने देना चाहिये जिससे पौधा का अच्छा ढांचा तैयार होता है। शरीफा में फल मुख्यत: नई शाखाओं पर आते हैं। अत: अधिक संख्या में नई शाखायें विकसित करने के लिये पुरानी, सूखी तथा दूसरों से उलझ कर निकलती हुई शाखाओं को काट देना चाहिये।

पुष्पन एवं फलन

शरीफा में पुष्पन काफी लम्बे समय तक चलता है। उत्तर भारत में मार्च से ही फूल निकलना प्रारंभ हो जाता है और जुलाई तक आता है। पुष्प कालिका के आँखों से दिखाई पड़ने की स्थिति से लेकर पूर्ण पुष्पन में लगभग एक महीने तथा पुष्पन के बाद फल पकने तक लगभग 4 महीने का समय लगता है। पके फल सितम्बर-अक्टूबर से मिलना शुरू हो जाते है। बीज द्वारा तैयार किये गये पौधे तीसरे वर्ष फल देना प्रारंभ करते हैं जबकि बडिंग एवं ग्राफ्टिंग द्वारा तैयार पौधे दूसरे वर्ष में अच्छी फलन देने लगते है। फूल खिलने के तुरन्त बाद 50 पी.पी.एम. जिबरेलिक एसिड के घोल का छिड़काव कर देने से फलन अच्छी होती है।

फलों की तुड़ाई

शरीफा के फल जब कुछ कठोर हों तभी लेना चाहिए क्योंकि पेड़ पर काफी दिनों तक छुटे रहने पर वे फट जाते हैं। अत: इसकी तुड़ाई के लिये उपयुक्त अवस्था का चुनाव करना चाहिये। इसके लिये जब फलों पर दो उभारों के बीच रिक्त स्थान बढ़ जाय तथा उनका रंग परिवर्तित हो जाय तब समझना चाहिये फल पकने की अवस्था में हैं। अपरिपक्व फल नहीं तोड़ना चाहिये क्योंकि ये फल ठीक से पकते नहीं और उनसे मिठास की मात्रा भी कम हो जाती है।

अंत: सस्य फसलें

शरीफा के पौधे जब छोटे हों तो उसके बीच में सब्जियाँ व अन्य फसलें उगा सकते हैं। शरीफा के बाग़ में फ्रेंचबीन एवं बोदी आदि फसलें झारखंड के लिए अधिक उपयुक्त पायी गयी है।

उपज

पौधा लगाने के तीसरे वर्ष से यह फल देना प्रारंभ कर देता है। एक 4-5 वर्ष पुराने पौधे में 50-60 फल लगता है जबकि पूर्ण विकसित पौधे से 100 फल तक उपज मिलता है।

स्त्रोत: समेति, कृषि विभाग , झारखण्ड सरकार

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