//शिमला मिर्च में कीट प्रबंधन

शिमला मिर्च में कीट प्रबंधन

परिचय

ग्रामसभा दहा जागीर, हरियाणा के करनाल जिला में पश्चिमी यमुना नदी से करीब 2 कि. मी. की दूरी पर जी. रोड के पास, शिमला मिर्च के लिए प्रसिद्ध, सब्जी पट्टी क्षेत्र में बसा एक गाँव है। इस ग्राम सभा में चार छोटे गाँव दहा, बजीदा जट्टान, मदनपुर तथा सिरसी आते हैं। जिनकी कुल संख्या 8000 है। इस ग्राम में साक्षरता दर 70 प्रतिशत है। ग्राम सभा दहा में कई दशकों से किसान शिमला मिर्च की खेती करते आ रहे हैं जो इनकी आय का प्रमुख स्रोत है। करनाल के आस पास का यह पूरा क्षेत्र में शिमला मिर्च की फसल के लिए जाना जाता है किन्तु इसके साथ ही शिमला मिर्च के कई वर्षों तक लगातार उगाने से विभिन्न प्रकार के कीटों एवं बीमारियों का प्रकोप बढ़ा है। इनमें चेपा, सफेद मक्खी, थ्रिप्स, माईट, फल की सूंडी, तम्बाकू की सूंडी, फल सड़न, वायरस कम्पलैक्स, बैक्टीरियल पत्ता धब्बा एवं सं सकाल्ड आदि प्रमुख हैं। इस क्षेत्र में कृषक थ्रिप्स, फल सूंडी एवं पत्ता मरोड़ से ज्यादा परेशान रहते हैं।

वर्ष 2007 से पहले इनकी रोकथाम के लिए किसान 12 से 14 बार विषैली दवायों का प्रयोग करते थे, मिश्रण दवाईयों का प्रयोग काफी प्रचलित था। इसके बावजूद भी किसान शिमला मिर्च की उत्पदकता बढ़ाने में असर्मथ थे। वर्ष 2007 से 2009 के दौरान, संस्थान की स्कीम सोलेनेशियम सब्जियों की फसलों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन तकनीक का विकास एवं मानकीकरण तथा वर्ष 2010 से राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की परियोजना शिमला मिर्च एवं टमाटर में समेकित नाशीजीव प्रबंधन का सत्यापन एवं प्रोत्साहन को समेकित नाशीजीव प्रबंधन केंद्र, नई दिल्ली के तत्वाधान में इस सब्जी पट्टी क्षेत्र के ग्राम सभा दहा जागीर में चलाया गया। इसके अच्छे परिणाम प्राप्त हुए, जिसके फलस्वरूप यहाँ के किसानों की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

जैसा कि शुरू में यहाँ के कृषक समेकित नाशीजीव प्रबंधन के बारे में सुनने को भी तैयार नहीं थे उनको तसल्ली देने एवं राजी करने के लिए तथा आई. पी. एम. कार्यक्रम, उनके लाभ एवं क्रियान्वयन के लिए उन्नतशील किसानों की कई सभाएं आयोजित की गई।

तकनीक

मुख्य फसल के अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ पनीरी का होना आवश्यक है क्योंकि कई कीट, बीमारियाँ एवं सूत्रकृमी पनीरी को नुकसान पहुंचाते हैं और पनीरी से मुख्य फसल में चले जाते हैं। इसी कारण से स्वस्थ पनीरी उगाने/तैयार करने की तरफ खास ध्यान दिया गया जो कि समेकित नाशीजीव प्रबंधन का मुख्य अंग है।

पनीरी

अच्छी जल निकासी एवं जड़ सड़न रोगों से बचने के लिए क्यारियों को भूमि सतह से ऊपर बनाया गया। भूमि जनित कीटों, सूत्रकृमी एवं बीमारियों से बचाव के लिए अक्टूबर के माह में क्यारियों को तीन सप्ताह तक भूमि तापिकरण के लिए 0.45 मी. गेज वाली पालीथीन चद्दर से ढक कर रखा गया। 250 ग्राम ट्राईकोडर्मा वीरीडी को प्रति तीन कि. ग्रा. गोबर खाद के हिसाब से मिलाकर क्यारियों में मिलाया गया। रॉयल वंडर प्रजाति को ज्यादा से ज्यादा किसानों द्वारा इस परियोजना के अंतर्गत लगाया गया। समय – 2 पर खरपतवारों एवं बीमारी वाले पौधें को निकाला गया।

मुख्य फसल

पौध रोपाई के तुरंत बाद दस पक्षी पर्च स्टैंड प्रति एकड़ के हिसाब से लगाये गये ताकि खेतों में परजीवी पक्षियों का आगमन सुगम हो सके और कीटों का प्रकोप कम करने में काफी प्रभावी रहे। रस चूसने वाले कीटों के लिए डेल्टा ट्रैप 2 – 3 प्रति एकड़ की दर से लगाये गये जोकि कीटों का प्रकोप कम करने में काफी अच्छे सिद्ध हुए। पांच प्रतिशत नीम अर्क/सत घोल का छिड़काव, जोकि परजीवियों के लिए भी सुरक्षित था, आवश्यकतानुसार दो से तीन बार 15 – 20 दिन के अन्तराल पर किया गया। इससे रस चूसने वाले कीटों के प्रकोप में काफी आई और कुछ हद तक फल सूंडी के प्रकोप में भी कमी आई। केवल कुछ खेतों में ही रासायनिक दवाई इमिडाक्लोपरीड  का इस्तेमाल एक बार करना पड़ा। थ्रिप्स की संख्या में कमी के लिए जैविक दवाई स्पाइनोसैड का इस्तेमाल करना पड़ा जिससे आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त हुए तथा थ्रिप्स का सफलता पूर्वक प्रबंधन हुआ। केवल एक दो बार रासायनिक दवाई एसिफेट का छिड़काव थ्रिप्स के प्रबंध के लिए करना पड़ा।

इस क्षेत्र में यहाँ के किसान सबसे अधिक फल सूंडी से परेशान रहते हैं। इसके प्रबंधन के लिए के सस्ती तकनीक अपनाई गई। पूरे क्षेत्र में 5 प्रपंच ट्रैपस प्रति हेक्टेयर की दर से फलसूंडी की निगरानी के लिए लगाई गई उसके पश्चात् अंडे का परजीवी ट्राईकोग्रामा को एक लाख प्रति हेक्टेयर की दर से एक सप्ताह के अन्तराल पर 4 – 5 बार छोड़ा गया। इसके पश्चात् एच. ए. एन. पी. वी. का 250 एल ई प्रति हेक्टेयर पौध रोपण के 60 दिन पर 2 -3 बार शाम के समय छिड़का गया। आवश्यकतानुसार पर्यावरण सुरक्षित कीटनाशक जैसे प्रोक्लेम पांच प्रतिशत डब्ल्यू. डी. जी. 0.25  ग्राम प्रति लीटर अथवा स्पाईनोसैड 0.6 मी. लिटर प्रति लीटर अथवा रचनाक्वर 18.5 एससी घोल की दर से सूंडी के नियंत्रण के लिए का छिड़काव किया गया।

स्वच्छता अभियान

खेतों के स्वच्छता रखने से अनेक कीटों एवं रोगों जैसे की सूंडी और पत्ता मरोड़ (मरोड़िया) के प्रबंधन में सहायता मिलती है। अत: सूंडी ग्रसित फलों को इकट्ठा करके मरोड़िया ग्रसित पौधों को समय- समय पर उखाड़ कर नष्ट कर दिया गया। इसे सभी किसानों द्वारा एक अभियान के रूप में चलाया गया। फसल के अवशेषों को नष्ट पर कीटों एवं बीमारियों के रोकथाम में आश्चर्यजनक तथा उत्साहपूर्वक परिणाम प्राप्त हुए। गैर सोलेनेसियास फसलों के साथ फसल चक्र अपनाया गया। फसल की कटाई के बाद  खेतों की तुरंत जुताई करवाई गई। इस तरह आई. पी. एम. के खेतों में पूरे फसल की अवधि के दौरान 6 – 7 बार विषैली दवाईयों का छिड़काव किया गया।

इस ग्राम सभा के किसानों द्वारा स्वयं नीम की निबोली एकत्रित की गई, जिसका प्रयोग निबौली सत बनाने के लिए किया गया। इसके लिए सबसे पहले 5 किलोग्राम निबौली (बीज) को चक्की में पीसा गया। फिर बारीक कपड़े में पोटली बनाकर रात भर 10 लीटर पानी में भिगों दिया गया। सुबह पोटली को दबा – 2 कर दूधिया रसा निकालकर उसमें 1 किलोग्राम सस्ता साबून मिलाकर 100 लीटर घोल तैयार कर लिया गया। इसका प्रयोग रस चूसने वाले कीटों जैसे चेपा, सफेद मक्खी तथा थ्रिप्स इत्यादि के प्रकोप को रोकने के लिए किया गया।

आई.पी.एम. परियोजना से प्रमुख लाभ

वर्ष 2007 से 2010 के दौरान दहा जागीर ग्राम सभा क्षेत्र में प्रारंभ में पचास एकड़ क्षेत्र में इस परियोजना का सत्यापन/ मानकीकरण किया गया जिसको वर्ष 2010 – 11  के दौरान बढ़ाकर सौ एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में मदनपुर, बजीदा एव सिरसी के सभी किसानों ने बी समेकित नाशीजीव प्रबंधन प्रणाली अपना कर कीटों एवं रोगों का प्रबंधन किया। समेकित नाशीजीव प्रबंधन तकनीक अपनाने के फलस्वरूप इस ग्राम सभा (दहा) के किसानों ने औसतन 8 से 9 छिड़काव किये तथा शिमला मिर्च की औसतन ऊपज 310 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हुई जबकि दुसरे गांवों की औसतन ऊपज 245 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हुई तथा 14 – 15 छिड़काव किये तथा कम खर्चा लाभ अनुपात 1:2.48 हुआ। इस प्रकार से दोनों तरह के किसानों (आई. पी.एम. एवं बिना आई. पी. एम. अपनाये) की तुलना करने पर आई. पी. एम. अपनाये किसानों की आय में 41704 रूपये प्रति हेक्टेयर की वृद्धि हुई।

समेकित नाशीजीव प्रबंधन कार्यक्रम के तहत पर्यावरण सुरक्षित तरीकों को अपनाते हुए किसानों की निर्भरता विषैली दवाईयों पर से काफी कम हो गई तथा जैविक विविधता के साथ – साथ शिमला मिर्च के उत्पादन एवं उत्पादकता में काफी बढ़ोतरी हुई। कुछ किसान तो बिना किसी रासायनिक दवाईयों एवं उर्वरकों के शिमला मिर्च उगा रहे हैं इन परिणामों को देखकर बिना आई. पी. एम. अपनाने वाले किसान तथा आस–पास के गांवों के किसान भी अब आई. पी. एम. की तकनीक शिमला मिर्च के लिए अपनाने के लिए आगे आये हैं और काफी उत्साहित हैं उस ग्राम सभा के किसानों द्वारा आत्मनिर्भरता बढ़ाने हेतु गांवों में नीम के बीज इकट्ठा करने तथा केंचुएं की खाद बनाने का बीड़ा उठाया है जिससे भविष्य में विषैली कीटनाशको तथा रासायनिक उर्वरकों पर इनकी निर्भरता कम होगी। आई.पी.एम. अपनाने के परिणाम स्वरुप कुछ किसानों ने व्यवासायिक तौर पर शिमला मिर्च की पनीरी उगाना शुरू किया और आई.पी.एम. का संदेश फैला रहे है। जिससे आई. पी. एम. अपनाये गांव में रासायनिक दवाईयों का प्रयोग काफी कम हुआ तथा एक दवाई विक्रेता ने तो पांच हजार रूपये प्रति माह की दर से कम लाभ अर्जित होने को बताया। फलों की तुड़ाई उपरांत कीटनाशी के अवशेषों का प्रयोगशाला में विश्लेषण कराया गया। तुलनात्मक अध्ययन में परियोजना के अंतर्गत अपनाये गये आई. पी. एम. अपनाये गए खेतों से फलों में ज्यादा मात्रा में दवाईयों के अवशेष पाए गये जो हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक हैं अता विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से काफी ज्यादा हैं कृषकों द्वार आई. पी. एम. कार्यक्रम के बारे में जागरूकता, इसकी सफलता एवं स्वीकारिता का ही नतीजा है कि अब उन्होंने मिश्रित दवाईयों एवं अत्यंत विषैली तथा चिस्थायी रहने वाली दवाईयों का प्रयोग बिलकूल ही बंद कर दिया है।

किसानों के व्यक्तिगत अनुभव

दहा जागीर के सुखदेव शर्मा का मानना है कि सन 2007 से पहले मैं शिमला मिर्च में लगने वाले कीटों एवं बीमारियों की रोकथाम के लिए विभिन्न प्रकार की विषैली दवाईयों  का तेरह चौदह बार प्रयोग करता था लेकिन इस परियोजना के अंतर्गत अपनाये ये आई.पी.एम. तकनीक से मैं अत्यधिक प्रभावित हूँ, क्योंकि अब मैं पौध एवं मुख्य फसल में चेपा के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोपरिड के स्थान पर नीम (निबौली) सत 5 प्रतिशत का प्रयोग करता हूँ इससे मेरे खेतों में सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स के प्रकोप में भी काफी कमी आई है खेतों में चारों ओर चमकती प्लास्टिक पट्टियों की बाड़ लगाने से नीलगाय और कुत्तों द्वारा होने वाले नुकसान में काफी कमी आई है। इसी परियोजना के अंतर्गत बल सूंडी के प्रकोप को रोकने के लिए एक अत्यंत उपयोगी तकनीक गंध्य पाश का प्रयोग निगरानी के तौर पर करके ट्राईकोग्रामा परजीवी को अधिक पैमाने पर अपनाने हेतु हम लोगों ने एक स्वयंसेवी समूह का गठन किया। इस समूह के द्वारा इस परियोजना के अंतर्गत चलाये जा रहे आई.पी.एम. तकनीक को एक अभियान के रूप में चलाया गया। जिसके परिणामस्वरूप अधिक से अधिक किसान लाभान्वित हो रहे हैं।

इस परियोजना के अंतर्गत, ग्राम दहा में चयनित किसान श्री सत्यदेव का मानना है की शिमला मिर्च में लगने वाले प्रमुख कीटों एवं बीमारियों की रोकथाम के लिए आई.पी.एम. तकनीक में सबसे उपयुक्त बात यह है कि हम लोगों की विषैली दवाओं पर निर्भरता पहले  की अपेक्षा काफी कम हुई है और प्राकृतिक शत्रुओं के साथ – साथ, शिमला मिर्च के उत्पादन और उत्पादकता में काफी परिवर्तन हुआ है।

चौधरी जिले सिंह का मानना है कि आई.पी.एम. तकनीक अपनाने से शिमला मिर्च कि उत्पादकता काफी बढ़ी है। मुझे अब उन्नतशील किसानों की श्रेणी में आने से काफी गर्व महसूस हो रहा है। इससे इस गांव के ज्यादा से ज्यादा अन्य किसान हमारे द्वारा अपनाने गये आई.पी.एम. पद्धति को अपनाने के लिए उत्सुक दिख रहे हैं। ऐसी स्थिति में आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में विषैली एवं घातक कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग कम तो होगा साथ ही साथ उत्पादन लागत में भी कमी आयेगी। साथ ही उनहोंने आशा जताई की सरकारी एजेंसियों आगे आयेंगी जिससे किसानों को अधिक से अधिक लाभ होगा तथा छोटे और मारजीनल किसानों के साथ पूरे किसान समुदाय का आर्थिक स्थर काफी सुधरेगा।

स्त्रोत: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली

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