/सरसों की फसल में आईपीएम प्रणाली का वैधीकरण – एक सफल कहानी

सरसों की फसल में आईपीएम प्रणाली का वैधीकरण – एक सफल कहानी

परिचय

भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में तिलहनी फसलों का बहुत बड़ा योगदान है, जिसमें सरसों वर्गीय फसलें तेल उत्पादन की दृष्टि से विश्व में सोयाबीन और ताड़ (पाम) के बाद खाद्य तेल के सन्दर्भ में मूंगफली के बाद दुसरे स्था पर सबसे ज्यादा खपत होने वाला तेल है। भारत में उगाई जाने वाली नौ तिलहनी फसलों में, सरसों वर्गीय फसलों का 32 प्रतिशत योगदान है। सरसों वर्गीय फसलें, हमारे देश की तिलहनी अर्थव्यवस्था में मुख्य भूमिका निभाती है। सरसों वर्गीय फसलों की खेती हमारे देश में लगभग 5.76 मिलियन हेक्टेयर में की जाती है जिसका 1184 कि.ग्रा./ हेक्टेयर उत्पादकता की दर से कुल उत्पादन 6.82 मिलियन टन है। सरसों वर्ग की फसलों में राया या राई, पीली व भूरी सरसों, तोरिया, गोभी सरसों, अफ्रीकन सरसों व तारामीरा है। इन फसलों के कुल क्षेत्रफल में हमारा देश विश्व में दुसरे स्थान पर है, लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में काफी पीछे है। इन फसलों की ऊपज में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव विदेशी मुद्रा की बचत में देखा जा सकता है। भारतीय सरसों की खेती मुख्यतः भारत में ही की जाती है, जो कुल सरसों वर्गीय फसल उत्पादन का लगभग 85 प्रतिशत योगदान देती है। सरसों की खेती मुख्यत: रबी मौसम में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, गुजरात और पश्चिम बंगाल में की जाती है जो भारत में कुल क्षेत्र के 86.5 प्रतिशत एवं उत्पादन में 91.4 प्रतिशत के लिए  उत्तरदायी है। पौष्टिक भोजन के रूप में सरसों में 28 – 45 प्रतिशत तेल सामग्री होती है सरसों वर्गीय तेलों को खाने एवं खाना बनाने के लिए उत्तम एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित समझा जाता है। यद्यपि इन तिलहनी फसलों को उत्पादन और उत्पादकता दोनों में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है, लेकिन प्रयोगात्मक और किसानों के खेतों में संभावित पैदावार के बीच एक व्यापक अंतर है। तिलहन की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरसों वर्गीय फसलों में आईपीएम प्रणाली के प्रयोग से इस अंतर को कम किया जा सकता है।

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इन फसलों की उपज को बढ़ाने तथा उसको टिकाऊ बनाये रखने में एक प्रमुख समस्या नाशीजीवों का प्रकोप है जो कुछ हद तक इन फसलों के अस्थिर उत्पादन के लिए उत्तरदायी है। समेकित पर्यावरण – अनुकूल कीट – रोग प्रबंधन प्रणाली दृष्टिकोण जो कि नाशीजीवों से फसलों को बचाने के लिए विषैले रासायनों के उपयोग को कम करता है, को ही समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) कहा जाता है। आईपीएम का लक्ष्य पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर न्यूनतम विपरीत प्रभाव के साथ उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद प्राप्त करना है एवं किसानों को उच्च आर्थिक लाभ प्रदान करना भी है। किसानों के सहभागिता से समेकित नाशीजीव प्रबंधन का विकास और कार्यान्वयन संभावित उपज उत्पादन के लिए एक विकल्प माना गया है। सरसों में आर्थिक रूप से प्रभावी व्यवहार्य आईपीएम को विकसित और मान्य करने के लिए किसानों के खेतों में स्थान – विशिष्ट टिकाऊ पर्यावरण – अनुकूल प्रयोग किए गये।

सरसों के प्रमुख नाशीजीव

भा. कृ. अनु. प. – राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र पिछले दो दशकों से सरसों में आईपीएम मॉड्यूल के संश्लेषण और वैधीकरण में कार्यरत है। सरसों उत्पादक क्षेत्रों के व्यापक सर्वेक्षण से किसानों द्वारा रासायनिक नाशीजीव नाशकों और उर्वरकों के अत्यधिक और अविवेकपूर्ण उपयोग का पता कला। अत्यधिक मात्रा में इन रासायनिक नाशीजीव नाशकों का प्रयोग नाशीजीवों के खतरों को बढ़ावा, दुसरे दर्जे के नाशीजीवों को प्रकोप में बढ़ोतरी और पर्यावरणीय में चेपा, चितकबरा कीट, (बागराडा हिलेरिस), आरा मक्खी (एथालिया, लुगनस प्रॉक्सीमा) और पत्ती सुरंगक (क्रोमेटोमायिया हरटिकोला) शामिल हैं जो बुवाई से फसल अवधि के अंत तक फसल के लिए खतरा हैं। स्क्लेरोटिनिया विगलन (स्क्लेरोटिनिया स्क्लेरोटिनिया स्क्लेरोशियरम), सफेद रतुआ (एलबुगा कैंडीडा), आल्टरनरिया ब्लाईट (आल्टर नरिया ब्रेसिकी), मृदुरोमिल असिता (हायलोपरनोस्पोरा पैरासितिका), चूर्णिल आसिता (इरिसिफी क्रूसिफेरेरम), मुदगर विगलन (प्लासमोडियोफोरा ब्रौसिकी), काला विगलन (जेंथामोनास कैम्पस्टिरिस), डंठल सड़न (इरविनिया कैरटोवोरा), मोजेक (टर्निप वायरस – I) और पर्णभित्ती (फाई टोप्लाज्मा एस्टरिस) महत्वपूर्ण रोग हैं। कूर्च प्ररोह (ओरोबेंकी) एक मूल परजीवी खरपतवार भी सरसों में एक गंभीर समस्या है। नई किस्मों/संकर बीजों को शुरूआत के कारण नाशीजीव परिदृश्य में हुए परिवर्तन, सिंचाई और जल से सरोबर मिट्टी वाले बड़े क्षेत्रों में सरसों की एक खेती, पक्तियों में कम अंतर और उर्वरकों का अधिक मात्रा में उपयोग, इन सब के लिए आईपीएम की गतिशील प्रक्रियाओं की आवश्यकता है। हाल ही में, सरसों में कुछ अतिसंवेदनशील संकर बीजों की खेती के कारण स्क्लेरोटिनिया विगलन (स्क्लेरोटिनिया स्केलेरोशियोरम) सरसों में एक गंभीर समस्या के रूप में उभरा है। समेकित नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) रणनीति के माध्यम से इन समस्याओं को दूर करने के लिए एक अंतर – संस्थागत टीम द्वारा आईपीएम रणनीतियों को संश्लेषित किया गया। आईपीएम प्रदर्शनों के अतिरिक्त हरियाणा और राजस्थान के सरसों उत्पादक क्षेत्रों में ग्रामीण स्तर पर आईपीएम का वैधीकरण किया गया। फसल अवधि के दौरान सरसों के लिए मान्य किये गये आईपीएम मौड्यूल (युक्तियाँ) नीचे दिए गये हैं।

आईपीएम युक्तियाँ

बुवाई से पूर्व अवस्था

  • चितकबरा कीट के संक्रमण और अन्य पादप बीमारी के कारक रोगजनकों से बचने के लिए पिछली फसल के अवशेषों को नष्ट कर दें।
  • कवक बीजाणुओं और कीट – नाशीजीवों की अवशिष्ट संख्या को ख़त्म करने के लिए गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें।
  • 15 कि. ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर तथा स्थान विशिष्ट सिफारिश के अनुसार अतिरिक्त सल्फर का प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।
  • समतल व पानी की अच्छी निकासी वाला खेत तैयार करें।
  • उपयुक्त फसल चक्र अपनाएं।
  • संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें, इसमें नत्रजन 60 कि. ग्रा. फास्फोरस 40 कि. ग्रा. पोटास 40 कि. ग्रा. सल्फर 40 कि. ग्रा./हे. की मात्रा का प्रयोग करें।
  • 2.5 कि. ग्रा. ट्राईकोडर्मा को 62.5 कि. ग्रा. अच्छी तरह तैयार गोबर की खाद में मिलाकर प्रति हेक्टेयर के साथ मृदा में प्रयोग करें।

बुवाई की अवस्था

  • 15 – 31 अक्टूबर के दौरान बुवाई करने से नाशीजीवों के प्रकोप से बचा जा सकता है।
  • क्षेत्र विशिष्ट अनुशंसित किस्मों के उन्नत, स्वस्थ और प्रमाणित बीजों की बुआई करें।
  • चितकबरा कीट संभावित क्षेत्रों में पहले बीजोपचार इमिडाक्लोप्रिड (70 डब्ल्यू एस) 7 मिली./किग्रा. बीज की दर से करें। उसके बाद, मृदा जनित रोगों के प्रबंधन के लिए ट्राईकोडर्मा 10 ग्रा./किग्रा. बीज की दर से जलीय लहसून सत (2 प्रतिशत) से बीजोपचार करें।
  • क्षेत्र विशेष में मृदुरोमिल आसिता रोग प्रबंधन के लिए मेटालेक्सिल – एम 31.8 प्रतिशत ई. एस 3.5 मिली/किग्रा बीज के साथ बीजोपचार करें।
  • स्केलेरोटीनिया विगलन प्रबंधन के लिए संकरी पंक्ति तथा उच्च बीज दर से बचें।

पौध और वानस्पतिक अवस्था

  • पहली सिंचाई समय पर करें जो कि चितकबरा कीट के लिए पौधों को सहन शक्ति प्रदान करने से सहायक होती है।
  • चितकबरा कीट दिखाई देने पर बुआई के दस दिन बाद 15 कि. ग्रा. मिथाइल पैराथोन  2 प्रतिशत डी. पी. का बुरकाव करें।
  • पहले बोई जाने वाली आनुशंगिक पोषक फसलों जैसे मूली, शलगम में आरा मक्खी का प्रबंधन करें।
  • खेत में अनुशंसित दूरी के साथ पौधों की अधिकतम संख्या बनाये रखें।
  • माहू/चेपा के प्रारंभिक आक्रमण होते ही ग्रसित टहनियां को हाथ से तोड़ कर मिट्टी में दबा दें।
  • बोरान और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव नाशीजीव मैनकोजेब (0.2 प्रतिशत) या ताजा तैयार जलीय लहसून सत (2 प्रतिशत भार/आयतन) को छिड़काव करें।

फूल और फली बनने की अवस्था

  • फसल की  निगरानी और यथोचित नाशीजीव नाशकों का छिड़काव करें।
  • प्रारंभिक अवस्था में ही चेंपा से ग्रसित पुष्पवृन्त को हाथ से तोड़ कर हटा दें।
  • चेंपा कीट के आर्थिक हानि स्तर (25 माहू/10 सेंटीमीटर मध्य तना) पार करने पर आवश्यकतानुसार डाईमिथोएट 30  ईसी का 1 मिली/ ली पानी की दर से या थायामिथोक्सम 25 डब्ल्यू जी का 1 ग्राम/ 10 ली पानी की दर से छिड़काव करें।
  • रोग/कीट संक्रमित पौधों को उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें।
  • फूल आने की शुरूआती अवस्था में ट्राईकोडर्मा या जलीय लहसून सत का 2 प्रतिशत (भार/आयतन) की दर से पर्णीय छिड़काव बुवाई के 50 दिन बाद तथा दूसरा छिड़काव 20 दिनों के बाद करें।
  • सफेद रतुआ का अधिक संक्रमण होने की स्थिति में आवश्यकता आधारित मेटालेक्सिल एम 4 प्रतिशत + मेन्कोजेब 64 प्रतिशत का 2.5 ग्रा/लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
  • चूर्णिल आसिता या स्क्लेरोटिनिया सड़न रोग के प्रकट होने की पहली अवस्था में ही कार्बेन्डाजिम 50 ताकत का 2 ग्रा./ली. पानी की दर से पर्णीय छिड़काव करें।
  • स्क्लेरोटिनिया संक्रमित पौधों के समय से पहले पकने के लक्षणों के आधार पर, स्क्लेरोटिनिया (गांठ) बनने से पहले खेतों से संक्रमित पौधों को उखाड़ कर फेंक दें।\
  • मृदा में स्क्लेरोशियल निवेश द्रव्य की अधिकता को कम करने के लिए सभी संक्रमित डंठल को एक स्थान पर एकत्रित कर मिट्टी में दबायें।

आईपीएम क्रियान्वयन

वर्ष 2000 -2001 के दौरान, हरियाणा के गुडगाँव जिले के भोड़ा खुर्द गाँव में 40 हे. में सरसों की वरूणा किस्म के साथ किसान सहभागिता में आईपीएम वैधीकरण कार्यक्रम शुरू किया गया। वर्ष 2001 – 02 के दौरान लगातार दुसरे वर्ष के लिए भी इसका पुनः वैधीकरण किया गया। वर्ष 2002  – 03 के दौरान वजीरपुर के आस – पास के गांवों में 32 हे. में पूसा जयकिसान किस्म के साथ आईपीएम का सत्यापन किया गया। हरियाणा के गुडगाँव में भोड़ा खुर्द और वजीरपुर में आईपीएम वैधीकरण की सफलता के बाद, राजस्थान के बाढ़ प्रभावित पूर्वी मैदानी खंड III बी में एस. के. एन.ए. यू. कृषि अनुसंधान केंद्र, नवागांव, (अलवर) के सहयोग से वर्ष 2004 – 08  के दौरान आईपीएम का संश्लेषण किया गया। सरसों के प्रमुख हानिकारक रोगों में सफेद रतुआ तथा कीटों में चितकबरा कीट की पहचाने की गई। आईपीएम का बड़े पैमाने पर वैधीकरण वर्ष 2008 – 09 और 2009 – 10 के दौरान नवगांव, अलवर के आस – पास के गांवों में 118.9 हे. क्षेत्र में किया गया।

वर्ष 2008 – 09 से 2010 – 11 के दौरान राजस्थान के अलवर, श्रीगंगानगर और हनूमानगढ़ और हरियाणा के गुडगाँव में 18 हे. क्षेत्रफल में किसानों के खेतों पर स्क्लेरोटिनिया विगलन रोग प्रबंधन प्रणाली का संश्लेषण किया गया। इसके पश्चात् वर्ष 2011 – 12 से 2013 – 14 के दौरान, स्क्लेरोटिनिया विगलन रोग प्रबंधन का वैधीकरण कृषि अनुसंधान केंद्र, नवगाँव, (अलवर) और कृषि विज्ञान केंद्र, महेंद्रगढ़ व मेवात, (हरियाणा) के सहयोग से 120 हे. क्षेत्रफल में किसान सहभागिता मोड़ में किया गया।

वर्ष 2014 – 15 से 2016 -17 के दौरान प्राथमिकता के आधार पर घटक आधारित आईपीएम पैकेज का विकास व सत्यापन किया गया। इसमें दो मुख्य उपचारों, ट्राईकोडर्मा का 2.5 कि. ग्रा. / हे. के हिसाब से 62.5  कि. ग्रा. तैयार गोबर की खाद में बुवाई से पहले उपचार व बिना ट्राईकोडर्मा उपचार, पांच उप – उपचारों जैसे जैवकारक (ट्राईकोडर्मा), वानस्पतिक (लहसून – एलियम स्टाईवम), नाशीजीव नाशक (कार्बेन्डाजिम + मेन्कोजेब व थायमिथोक्सम) एवं पानी के पर्णीय छिड़काव व चार विभिन्न उप – उप – उपचारों (ट्राईकोडर्मा, मेटालेकिस्ल – एम, लहसून एवं अनुपाचिरत) के साथ स्पलिट – स्पलिट प्लाट डिजाइन का भाकृ.अनुप – रासनाप्राअनुके. नई दिल्ली एवं एसकेएनएयू, दुर्गापुरा में रबी फसल मौसम के दौरान प्रयोग किया गया। इस में चेपा (लिपाफिस इरिसिमी)  अल्टरनेरिया  ब्रेसिका) और सफेद रतुआ (एल्बूगो केंडिडा) प्रमुख नाशीजीव पाए गये।

इसके साथ – साथ वर्ष 2014 – 15 से 2016 – 17 के दौरान ही आईपीएम मौड्यूल का फसल अवस्था आधारित प्रचालन कृषि विज्ञान केंद्र, महेंद्रगढ़, हरियाणा और कृषि विज्ञान केंद्र, नवगांव, अलवर राजस्थान के सहयोग से 60 हे. क्षेत्र में किसानों से खेतों में उनकी सहभागिता से आईपीएम का आवश्यकता आधारित नियमित रूप से वैधीकरण किया गया। बुआई से पहले नाइट्रोजन की अनुसंशित मात्रा, टेल्कम पाउडर आधारित ट्राईकोडर्मा (1 प्रतिशत स. त.) का 2.5 कि. ग्रा./ हे. की दर से 62. 5 कि. ग्रा.  गोबर की खाद में मिलाकर मिट्टी में समावेश, अनुपचारित की तुलना में नाशीजीवों की हानि को कम करने के कारण बेहतर पाया गया एवं इससे उपज में भी वृद्धि हुई।

तकनीकी

सरसों में आईपीएम के कार्यान्वयन से नाशीजीव तीव्रता में कमी और उपज में महत्वपूर्ण रूप से वृद्धि हुई। किसान की अपनी पद्धति की तुलना में आईपीएम में लाभ – लागत अनुपात अधिक रहा। वर्ष 2000 – 02  में, गाँव भोड़ा खुर्द (जिला गुडगाँव, हरियाणा) में पता चला कि दो फसल मौसम के दौरान आईपीएम में बीज और मृदा में जैव – नियंत्रण (ट्राईकोडर्मा) के प्रयोग के परिणामस्वरुप सफेद रतुआ का संक्रमण गैर आईपीएम क्षेत्रों की तुलना में काफी कम रहा। वर्ष 2002 – 03 के दौरान वजीरपुर में पूसा जयकिसान किस्म में सफेद रतुआ का संक्रमण 1.6 से 19.7 प्रतिशत रहा जबकि गैर आईपीएम क्षेत्रों में यह 12.5 -22.2 प्रतिशत था। सभी तीन फसल मौसम (2000 – 2003) के दौरान सरसों की पैदावार गैर – आईपीएम क्षेत्रों की तुलना में आईपीएम खेतों में काफी अधिक रही। भरतपुर क्षेत्र (राजस्थान के सिंचित परिस्थितियों के तहत अलवर में दो साल के आईपीएम पैकेज को 118.9 हे. के बड़े क्षेत्र के लिए मान्य किया गया। वर्ष 2010 – 11 के दौरान राजस्थान में नवगाँव, अलवर अनुसंधान फार्म में सरसों के लिए सत्यापित आईपीएम मॉड्यूल को क्षेत्रीय अनुसंधान और विस्तार सलाहकार समिति (जेडआरईएसी) द्वारा राजस्थान जोन III  बी (भरतपुर जोन) की उन्नत कृषि विधियाँ पुस्तिका में शामिल किया गया।

फसल वर्ष 2007 – 08 के दौरान, राजस्थान के पांच मुख्य सरसों उगाने वाले जिलों के सर्वक्षण से पाया गया कि स्कलेरोटिया विगलन रोग सरसों की फसल के लिए एक गंभीर समस्या बन गयी है। फसल वर्ष 2008 -09 से 2010 – 11 के दौरान, राजस्थान के अलवर. श्रीगंगानगर  और हनुमानगढ़ और हरियाणा के गुडगाँव में 18 हे. क्षेत्र में किसानों के खेतों पर स्कलेरोटिया विगलन रोग प्रबंधन का संश्लेषण किया गया। इन जैव – सघन आईपीएम युक्तियों का संशोधित परंपरागत कार्यप्रणाली जैसे कि रोगग्रस्त फसल के अवशेषों को दबाना, गर्मियों में गहरी जुताई करना रोग प्रतिरोधक फसलों के साथ फसल चक्र अपनाना, स्वच्छ और स्केलेरोशिया मुक्त प्रमाणित बीजों का प्रयोग, उर्वरकों की संस्तुतित मात्रा जैसे : नत्रजन 60 किग्रा. फास्फोरस 40 कि. ग्रा. पोटास 40 कि. ग्रा./हे. की दर से प्रयोग, उचित पादप संख्या का अनुरक्षण, आवश्यकता आधारित सिंचाई और संक्रमित पौधों को उखाड़ना इत्यादि शामिल हैं। आईपीएम युक्तियों में 62.5 कि. ग्रा. अच्छी तरह से तैयार की हुईगोबर की खाद में ट्राईकोडर्मा का 2.5 कि. ग्रा. प्रति हे.  की दर से मिट्टी में समावेश, उसके बाद ट्राईकोडर्मा का 0.2 प्रतिशत की दर से पर्णीय छिड़काव और उसके 20 दिनों के बाद पुनः छिड़काव भी शामिल किये गये हैं। सभी तीन स्थानों पर बीमारियों को कम करने और और बीज उपज बढ़ाने के लिए जैव – सघन  आईपीएम युक्तियाँ प्रभावी पाई गई। किसानों की प्रक्रियाओं की तुलना में आईपीएम तकनीकियों को अपनाने के कारण लाभ लागत अनुपात बढ़ने से किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिला।

इन परीक्षणों के फलस्वरूप वर्ष 2011 में, कृषि अनुसंधान केंद्र, श्रीगंगानगर द्वारा सत्यापित स्क्लेरोटिनिया विगलन रोग आईपीएम मॉड्यूल को क्षेत्रीय अनुसंधान और विस्तार सलाहकार समिति (जेडआरईएसी) द्वारा राजस्थान जोन। बी (श्रीगंगानगर जोन) की उन्नत कृषि विधियाँ पुस्तिका में शामिल किया गया। उसके बाद वर्ष 2012 में कृषि अनुसंधान केंद्र, नवगाँव, अलवर द्वारा सत्यपित स्क्लेरोटिनिया विगलन रोग आईपीएम मॉड्यूल को क्षेत्रीय अनुसंधान और विस्तार सलाहकार समिति (जेडआरईएसी) द्वारा राजस्थान जोन III बी (भरतपुर जोन)  की उन्नत कृषि विधियाँ पुस्तिका में भी शामिल किया गया। वर्ष 2011- 12 से 2013 – 14 के दौरान स्क्लेरोटिनिया विगलन रोग प्रबंधन का बड़े स्तर पर प्रचालन, कृषि अनुसंधान केंद्र, नवगाँव, अलवर (राजस्थान) और कृषि विज्ञान केंद्र महेंद्रगढ़ व मेवात (हरियाणा) के सहयोग से कुल 120 हे. में किसान सहभागिता द्वारा किया गया।

वर्ष 2011 में, स्क्लेरोटिनिया विगलन रोग का संक्रमण अधिक होने से गाँव सियाली खुर्द (270 54’23.2” ऊ. 760 36’27.7” पू.)  (जिला अलवर, राजस्थान) के सरसों उगाने वाले निराश किसानों ने भा.कृ.अनु.प.- राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र से संपर्क किया। गाँव की आधारभूत जानकारी से संकेत मिलता है की आईपीएम कार्यान्वयन से पहले क्षेत्र के किसानों द्वारा सरसों में फसल चक्र न अपना कर एकल फसल की चक्र न अपना कर एकल फसल की परंपरा थी,  गर्मियों में खेत की गहरी जुताई भी नहीं की जाती थी और न ही ट्राईकोडर्मा के साथ कोई बीज उपचार किया जाता था। इस क्षेत्र में आईपीएम पद्धति अंतर्गत जिप्सम के साथ उर्वरकों की संस्तुति मात्रा 250 कि. ग्रा./ हे. और पोटाश 40 कि.ग्रा. अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद के साथ मिट्टी में समावेश और ट्राईकोडर्मा 10 ग्राम/किग्रा. बीजोपचार को अपनाया गया। आईपीएम में पिछले फसल की अवशेषों को नष्ट करने से फसल में चितकबरा कीट के प्रकोप और मिट्टी से पैदा होने वले रोगजनकों के कारण होने वाली बीमारी की हानि से भी बचा जा सका आईपीएम में 4 किग्रा./हे. की उचित बीज दर के साथ क्षेत्रीय विशिष्ट बुवाई के उचित समय का पालन किया गया जिससे चेंपा, अल्टरनेरिया  अंगमारी, सफेद रतुआ और स्क्लेरोटिनिया विगलन से फसल को बचाया जा सका। किसान आईपीएम अवधारण से आवगत नहीं थे और वे हानिकारक कीट रोग और मित्र कीटों की पहचान करने में सक्षम नहीं थे। संशोधित आईपीएम मॉड्यूल 2011- 12 में राजस्थान और हरियाणा में 40 हे. में लागू किया गया जो की वर्ष 2012 – 13 और 2013 – 14 में भी जारी रहा फलस्वरूप अधिक से अधिक किसान आईपीएम कार्यक्रम के हिस्सा न गये। आईपीएम तकनीक के क्रियान्वयन से सियाली खुर्द के किसानों के क्षेत्र में स्क्लेरोटिनिया विगलन की समस्या का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया गया। हरियाणा और राजस्थान में गाँव स्तर पर आईपीएम का किसानों की सहभागिता से सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया गया।

रबी फसल मौसम 2014 – 15 से 2016 – 17 के दौरान प्राथमिकता के आधार पर घटक आधारित आईपीएम पैकेज के सत्यापन के बाद, सत्यापित आईपीएम पैकेज को कृषि अनुसंधान केंद्र, दुर्गापुर की क्षेत्रीय अनुसंधान और विस्तार सलाहकार समिति (जेडआरईएसी) द्वारा राजस्थान खंड III  ऐ (जयपुर जोन) की उन्नत कृषि विधियाँ पुस्तिका में शामिल करने के लिए वर्ष 2007 में प्रस्तुत किया गया जिसे एक वर्ष के लिए कृषि तकनीकी केंद्र, अजमेर व राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुर पर पुन: परिक्षण के लिए अनुमोदित किया गया।

आईपीएम कार्यक्रम की सफलता के प्रमुख घटक

किसान पाठशाला का आयोजन

कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाले स्थानों पर फसल मौसम के पाठशालाओं का आयोजन किया गया जिसके फलस्वरूप तकनीकी को समझने एवं उसके क्रियान्वयन में सहायता मिली साथ ही किसानों एवं वैज्ञानिकों के मध्य महत्वपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने एवं विचार – विमर्श करने में सफलता मिली।

नाशीजीवों की निगरानी

सभी स्थानों पर प्रगतिशील किसानों को नाशीजीवों एवं उसके द्वारा हानि के लक्षणों की पहचान करने तथा नाशीजीवों के आर्थिक हानि स्तर को जानने की जानकारी दी गई। इस प्रक्रिया द्वारा किसानों को आवश्यक होने पर ही  उपयुक्त कीटनाशकों के चयन करने में सहायता मिली।

गुणवत्ता युक्त जैविक कारकों की उपलब्धता

आईपीएम कार्यक्रम की सफलता के लिए गुणवत्ता युक्त जैविक कारकों की उपलब्धता स्थानीय बाजार/ब्लॉक स्तर पर होना अति आवश्यक है। वर्तमान कार्यक्रम में राज्य कृषि विभाग/कृषि विश्वविद्यालय द्वारा स्थानीय ब्लॉक के माध्यम से स्वयं की जैव प्रयोगशालाओं द्वारा जैविक कारकों की उपलब्धता में सहायता की गई।

संचार व्यवस्था

आईपीएम कार्यक्रम के क्रियान्वयन के दौरान केंद्र की सरसों टीम के सभी सदस्यों के मोबाइल फोन नम्बर क्षेत्र की प्रगतिशील किसानों को दिये गये जीसे कि वह आवश्यकता ओं पर टीम के वैज्ञानिकों से संपर्क कर सही जानकारी प्राप्त कर सकें।

राई सरसों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन युक्तियाँ अपनाने से सरसों की पैदावार में बढ़ोतरी के साथ –साथ उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ी जिसके कारण किसानों की सामाजिक व आर्थिक दशा में सुधार हुआ।

लेखन: महेंद्र सिंह यादव, सुरेन्द्र कुमार सिंह, नीलम मेहता, नसीम अहमद एवं देवेन्द्र कुमार यादव

स्त्रोत: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र

Source

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