वैज्ञानिक वर्गीकरण

जगत:- पादप
विभाग:- मेंगोलिओफाईटा
वर्ग:- मेंगोलिओप्सीडा
गण:- रोजेल्स
कुल:- रोजेसी
प्रजाति:- फ़्रागार्या
जाति:- अन्नानास्सा

द्विपद नाम
फ़्रागार्या अन्नानास्सा

परिचय:-
दुशैन स्ट्रॉबेरी
फ़्रागार्या जाति का एक पादप होता है, जिसके फल के लिये इसकी विश्वव्यापी खेती की जाती है। इसके फल को भी इसी नाम से जाना जाता है। स्ट्रॉबेरी की विशेष गन्ध इसकी पहचान बन गयी है। ये चटक लाल रंग की होती है। इसे ताजा भी, फल के रूप में खाया जाता है, साथ ही इसे संरक्षित कर जैम, रस, पाइ, आइसक्रीम, मिल्क-शेक आदि के रूप में भी इसका सेवन किया जाता है।

बगीचा स्ट्रॉबेरी, फ़्रागार्या × आनानास्सा, एक संकर प्रजाति है जिसकी अपने फल (सामान्य स्ट्रॉबेरी) के लिए दुनिया भर में खेती की जाती है। फल (जो वास्तव में एक बेर नहीं है, लेकिन एक समग्र गौण फल है) व्यापक रूप से अपनी विशिष्ट सुगंध, चमकीले लाल रंग, रसदार बनावट और मिठास के लिए मशहूर है। यह बड़ी मात्रा में सेवन किया जाता है, ताजा अथवा संरक्षित करके फलों के रस, आइसक्रीम और मिल्क शेक के रूप में तैयार खाद्य पदार्थों में इसका उपयोग बहुतायत में होता है। कृत्रिम स्ट्रॉबेरी खुशबू भी व्यापक रूप से कई औद्योगिक खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल की जाती है।

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इतिहास:-

पहली उद्यान स्ट्रॉबेरी फ्रांस में 18 वीं सदी के पूर्वाध के दौरान स्थापित हो गया था खेती से पहले जंगली स्ट्रॉबेरी प्रजातियाँ इस फल के आम स्रोत थे।

खेती:-
स्ट्रॉबेरी की खेती एक विशिष्ट कला है। इसकी खेती विभिन्न प्रकार के वातावरण में की जा सकती है। फिर भी इसकी खेती के लिए निम्न वातावरणीय परिस्थितियां उत्तम रहती हैं।

जलवायु:-
यह शीतोष्ण जलवायु की फसल है इसकी खेती के लिए उपयुक्त तापक्रम 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट मन गया है।

मृदा:-
स्ट्रॉबेरी के लिए कोई निश्चित मृदा का प्रकार निर्धारित नही है फिर भी इसकी खेती के लिए बलुई दोमट मृदा में इसकी खेती अच्छी तरह से की जा सकती है। स्ट्रॉबेरी की खेती कच्छारी मृदा में करने पर यह अधिक मीठी होती है।

बुवाई का समय:-
इसकी पौध अगस्त के प्रारम्भ में तैयार की जाती है जिससे अगस्त अंत या सितम्बर आरम्भ में इसकी पौध खेत में लगा दी जाती है एवं नवम्बर-दिसम्बर तक फसल पक कर तैयार हो जाती है और उससे फल तोड़ लिए जाते हैं।

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भूमि की तयारी:-
स्ट्रॉबेरी की खेती में भूमि की तैयारी करना बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। इसके लिए खेत में 5-6 बार अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए जिससे भूमि भुरभुरी हो जाती है और भूमि में वायु का संचार अच्छा होता है। जो कि बहुत ही आवश्यक है।

खाद व उर्वरक:-
स्ट्रॉबेरी में भी अन्य फसलों की भांति 120 किलोग्राम नत्रजन, 80 किलोग्राम पोटाश, तथा 80 किलोग्राम फास्फोरस की आवश्यकता रहती है।

सिंचाई:-
स्ट्रॉबेरी में सिंचाई के लिए उत्तम विधि बूंद-बूंद सिंचाई विधि रहती है। इसमें पतली छिद्र युक्त पाइप पुरे खेत में निश्चित अन्तराल पर बिछा दी जाती है और यह एक जाल की तरह उपस्थित रहती है जिसे एक बड़ी टंकी से जोड़ दिया जाता है व भूमि को नम रखा जाता है।

बेड तैयार करना:-

खेत में बिछाई गई पाईपों के उपर 2 से 2.50 फीट चौड़ा बेड बनाया जाता है तथा बेड से बेड की दूरी 1 से 1.50 फीट रखी जाती है। इसके बाद पूरे खेत में पॉलीथिन की चादर बिछाई जाती है। जिसके दो फायदे होते हैं।
1. स्ट्रॉबेरी के फल मीठे होते है जो कि मिट्टी लगने पर ख़राब हो जाते है व उनकी गुणवत्ता गिर जाती है उन्हें मिट्टी से पॉलीथिन बचाती है।
2. इसकी वजह से खेत में खरपतवार कम होती है।

पौध लगाना:-
स्ट्रॉबेरी की पौध अगस्त प्रारम्भ में तैयार की जाती है जिसको अगस्त अंत या सितम्बर आरम्भ में खेत में स्थानांतरित कर दिया जाता है। पौध लगाने के लिए बनाए हुए बेड पर उपस्थित पॉलीथिन में 20 से 30 सें.मी. के अन्तराल पर छेद करके उसमे पौधे लगा दिए जाते है। अगले तीन महीने में फसल पक कर तैयार हो जाती है तथा फल चटक लाल रंग के हो जाते हैं तब इन्हें हाथ की सहायता से मोड़ कर तोड़ लिया जाता है।

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उपज:-
स्ट्रॉबेरी में 20 टन प्रति हेक्टेयर या 80 से 200 क्विंटल प्रति एकड़ तक उपज मिल जाती है।

कीट:-
लगभग 200 से अधिक कीटों की प्रजातियां स्ट्रॉबेरी की फसल को सीधे या परोक्ष रूप से हमला करने के लिए जानी जाती है। ये कीटों में पतिंगे, मक्खियां, चेफर, स्ट्रॉबेरी जड़ वीविल्स, झरबेरी एक प्रकार का कीड़ा, स्ट्रॉबेरी रस भृंग, स्ट्रॉबेरी मुकुट कीट, कण, एफिड इत्यादि शामिल हैं।

रोग:-
स्ट्राबेरी के पौधे विभिन्न रोगों के शिकार हो सकते हैं। इसकी पत्तियां ख़स्ता फफूंदी, पत्ता स्पॉट (कवक Sphaerella fragariae के कारण), पत्ता ब्लाइट (कवक Phomopsis obscurans के कारण) से संक्रमित हो सकती हैं। शीर्ष एवं जड़ें red stele, verticillium wilt, black root rot एवं निमेटोड्स के शिकार हो सकता है। फलों को ग्रे मोल्ड, rhizopus rot और leather rot से नुकसान हो सकता है। पौधों में सर्दियों के दौरान अत्यधिक तापमान बढ़ने से भी रोग विकसित हो सकते हैं।

अपने स्ट्रॉबेरी के पौधों में पानी देते समय यह ध्याम रखें कि पानी पत्तों को नहीं जड़ों को ही दें अन्यथा पत्तियों पर नमी कवक के विकास को प्रोत्साहित करती है। सुनिश्चित करें कि स्ट्रॉबेरी एक खुले क्षेत्र में हो जिससे कि कवक रोगों का खतरा कम किया जा सके।

Mukesh Kumar Pareek

https://www.hamarepodhe.com

3 Comments

  1. ye bhaut hi acchi crop hai mujhe ye bahut passnad aayi hai ye to ek magic hai ki itna acchha fruit hame jayada kuch na karke bhi mil raha hai its a very fentestic

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