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पौधे जीवन का आधार है (The plants are base of our life)

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प्रकृति समस्त जीवों के जीवन का मूल आधार है। प्रकृति का संरक्षण एवं संवर्धन जीव जगत के लिए बेहद ही अनिवार्य है। प्रकृति पर ही पर्यावरण निर्भर करता है। गर्मी, सर्दी, वर्षा आदि सब प्रकृति के सन्तुलन पर निर्भर करते हैं। यदि प्रकृति समृद्ध एवं सन्तुलित होगी तो पर्यावरण भी अच्छा होगा और सभी मौसम भी समयानुकूल सन्तुलित रहेंगे। यदि प्रकृति असन्तुलित होगी तो पर्यावरण भी असन्तुलित होगा और अकाल, बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प आदि अनेक प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं कहर ढाने लगेंगी। प्राकृतिक आपदाओं से बचने और पर्यावरण को शुद्ध बनाने के लिए पेड़ों का होना बहुत जरूरी है। पेड़ प्रकृति का आधार हैं। पेड़ों के बिना प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने पेड़ों को पूरा महत्व दिया। वेदों-पुराणों और शास्त्रों में भी पेड़ों के महत्व को समझाने के लिए विशेष जोर दिया गया है। पुराणों में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि एक पेड़ लगाने से उतना ही पुण्य मिलता है, जितना कि दस गुणवान पुत्रों से यश की प्राप्ति होती है। इसलिए, जिस प्रकार हम अपने बच्चों को पैदा करने के बाद उनकी परवरिश बड़…

कोकोपिट को घर पर कैसे तैयार करें ( How to make coco peat at home )

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कोकोपिट को घर पर कैसे तैयार करें
नमस्कार दोस्तों,     मैं हूँ मुकेश कुमार और आप पढ़ रहे हैं हमारे पौधे पर कृषि के बारे में। दोस्तों सबसे पहले तो आप सभी से क्षमा चाहता हूं कि में बहुत दिनों से एक्टिव नही था। लेकिन अब से मैं हमेशा आपके साथ बने रहने कि पूरी कोशिश करूंगा। तो दोस्तों शुरू करते हैं आज की पोस्ट के बारे में। दोस्तों आज मैं आपसे बात करने वाला हूँ मेरी एक अधूरी पोस्ट के बारे में जो मैने बीच मे छोड़ दी थी और आपको इंतज़ार करने के लिए कहा था । तो दोस्तो आज उस को ही पूरी करने की कोशिश करूंगा। दोस्तों आज में आपसे बात करने वाला हूँ कोकोपिट को हम अपने घर पर ही कैसे तैयार कर सकते हैं। तो दोस्तों अगर आपको कोकोपिट के बारे में नही पता है तो पहले आप मेरी पिछली पोस्ट कोको पीट : बिना मिट्टी के खेती करने का तरीका को एक बार जरूर देखें। तो दोस्तो अब आप ये तो जान गए कि कोकोपिट क्या होती है। लेकिन आप ये सोच रहे होंगे कि अब कोकोपिट कहाँ से प्राप्त करे तो दोस्तो वैसे से तो कोकोपिट मार्केट में बहुत ही आसानी से मिल जाती है फिर भी कुछ जगह इसका मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है तो दोस्तो आज में आपको इसे घर पे बनाने क…

पपीते की खेती ( Farming of papaya )

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दोस्तों आपने हमारी पिछली पोस्ट में पढ़ा जैविक खेती के बारे में पढ़ा और कुछ पाठकों ने सुझाव भी दिए मुझे भुत अच्छा लगा इसी कड़ी में आज में आपके सामने लाया हूँ पपीते की खेती के बारे में तो पढ़िए पपीते के बारे में और पोस्ट अच्छी लगे तो कमेंट करके बताएं और अपने दोस्तों को भी बताये इसके बारे मे।

●परिचय

पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है। गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं। 

पेड़ के ऊपर के हिस्से में पत्तों के घेरे के नीचे पपीते के फल आते हैं ताकि यह पत्तों का घेरा कोमल फल की सुरक्षा कर सके। कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होता है। आजकल नयी जातियों में बिना बीज के पपीते की किस्में ईजाद की गई हैं।  एक पपीते का वजन 300, 400 ग्राम से लेकर 1 किलो ग्राम तक हो सकता है।

पपीते के पेड़ नर और मादा के रुप में अलग-अलग होते हैं लेकिन कभी-कभी एक ही पेड़ में दोनों तरह के फूल खिलते हैं। हवाईयन और मेक्सिकन पपीते बहुत प्रसिद्ध हैं। भारतीय पपीते भी अत्यन्त स्वादिष्ट होते हैं। अलग-अलग किस्मों के अनुसार इनके स्वाद में थोड़ी बहुत भिन्नता हो सकती है।

ग्वारपाठा (Alovera)

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ग्वारपाठादोस्तों कई दिनो से कोई नई पोस्ट नहीं लिख पाया उसके लिये आपसे माफी चाहता हुं । मेरी पिछली पोस्ट पर आपका बहुत प्यार मिला उसके लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आज मैं आपको बताने वाला हूं ग्वारपाठा के बारे में तो दोस्तों आइये जानते हैं ग्वारपाठा के बारे में :- 






औषधीय पौधा एलोवेरा फायदे की खेती :-
घृतकुमारी जिसे ग्वारपाठा एवं एलोवेरा के नाम से भी जाना जाता है, प्राचीन समय से ही चिकित्सा जगत में बीमारियों को उपचारित करने के लिए इसका प्रयोग किया जा रहा है। घृतकुमारी के गुणों से हम सभी भली-भांति परिचित हैं। हम सभी ने सीधे या अप्रत्यक्ष रुप से इसका उपयोग किसी न किसी रुप में किया है। घृतकुमारी में अनेकों बीमारियों को उपचारित करने वाले गुण मौजूद होते हैं। इसीलिए ही आयुर्वेदिक उद्योग में घृतकुमारी की मांग बढ़ती जा रही है। एक बार लगाने पर तीन से पाँच साल तक उपज ली जा सकती है। और इसे खेत की मेड पर भी लगा सकते है जिसके कई फैदे है एक आप के खेत में कोई आवारा पशु नही आएगा | आपके खेत की मेडबंधी भी हो जाएगी एलोवेरा को कोई जानवर भी नही खाता है आप को अतिरिक्त आमदनी हो जाएगी |
मृदा एवं जलवायु:-
प्राकृतिक …

सरसों की खेती (Musterd)

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दोस्तों आप सभी का इतना प्यार और साथ मिल रहा है उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद। आप सब मेरी सारी पोस्ट पढ़ते हैं इस बात से मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है।और मै ये ख़ुशी के पलों के साथ लाया हूँ आपके सामने एक और पोस्ट वैसे तो ये पोस्ट मुझे मेरे एक दोस्त ने भेजी है लेकिन इसमें बहुत ज्यादा जानकारियां है इसलिए इसे मै आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ जिससे आप सभी का ज्ञान बढ़े।

किसान भाइयों आज मैं आपको सरसों की खेती के बारें में विस्तार से जानकारी दूंगा इस को पढ़कर आप अपने दिमाग के निम्न प्रश्नों को शांत कर पाएंगे –

सरसों
की फसल की भूमि तैयारी एवं सिंचाई कैसे करें?

सरसों
में कीटों के नियंत्रण कैसे करें?

सरसों
में लगने वाले रोगों के बारे में

सरसों
की उन्नत किस्मे कौन कौनसी है?

सरसों में
सिंचाई बुआई, निराई, गुड़ाई कब, क्यों एवं कैसे की जातीहै?

सरसों
की फसल में वार्षिक उत्पादन कितना होता है?

पालक (palak)

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पालक  की  खेती

जलवायु एवं  भूमि:-
पालक की खेती के लिए दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है, पानी का निकास अच्छा होना अति आवश्यक हैI जिस भूमि का पी.एच 6 से 7 होता है, वह भूमि अच्छी मानी जाती हैI

पालक की उन्नतशील प्रजातियां :-
पत्ती और बीज के आधार पर दो-दो प्रकार की पालक की प्रजातियां पाई जाती है, बीज के आधार पर इसमे रिंकिल सीड वाली तथा गोल सीड वाली होती हैI पत्ती के आधार पर इसमे चिकनी पत्ती तथा खबोई रिंकिल पत्ती वाली होती है, इनके आधार पर विर्जीनिया सबोई एवं अगेती चिकनी पत्ती वाली प्रजातियां पाई जाती है जैसे की पालक आल ग्रीन, पूसा ज्योति, हरित, आरती तथा जाबनेर ग्रीन आदि हैI

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विनियर ग्राफ्टिंग ( Grafting )

स्ट्राबेरी: एक अदभुत पादप (Strawberry: a magical p...

कोको पीट : बिना मिट्टी के खेती करने का तरीका (Coco...

पोषक तत्वों की कमी के लक्षण Sign for mineral loss

दोस्तों बहुत दिन हो गए कुछ लिख नही पाया लेकिन फिर भी आप ने मेरा साथ नही छोड़ा उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।
आज मै आपके लिए एक ऐसी पोस्ट लाया हूँ जिसकी जरुरत आप सभी महसूस करते होंगे तो दोस्तों पढ़िए हमारी ये पोस्ट।

पोषक तत्वों की कमी के लक्षण

नाइट्रोजन

1.  पौधों की बढवार रूक जाती है तथा तना छोट एवं पतला हो जाता है।
2. पत्तियां नोक की तरफ से पीली पड़ने लगती है। यह प्रभाव पहले पुरानी पत्तियों पर पड़ता है, नई पत्तियाँ बाद में पीली पड़ती है।
3. पौधों में टिलरिंग कम होती है।
4. फूल कम या बिल्कुल नही लगते है।
5. फूल और फल गिरना प्रारम्भ कर देते है।
6. दाने कम बनते है।
7. आलू का विकास घट जाता है।

दोस्तों आज में आपके सामने लाया हूँ हमारे पौधे की सभी पोस्ट तो देखिये पढिये और अमल कीजिये इन पर। जो समझ में ना आये वो पूछिये।

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विनियर ग्राफ्टिंग ( Grafting )

स्ट्राबेरी: एक अदभुत पादप (Strawberry: a magical plant)

कोको पीट : बिना मिट्टी के खेती करने का तरीका


जैविक खेती के लिए खाद निर्माण (Fertilizer making for Organic Farming)

दोस्तों आपने पिछली पोस्ट में पढ़ा की जैविक खेती क्या होती है? आज में आपको बताऊंगा कि जैविक खेती में काम में आने वाली खाद कैसे बनाते हैं तो दोस्तों जानिए और जैविक खेती करिये।

दोस्तों जैसा कि आपको पता ही है कि आज के समय में जैविक खेती एक बहुत ही आवश्यक चीज़ हो गईं है क्योकि खेतों में रसायन डालने से ये जैविक व्यवस्था नष्ट होने को है तथा भूमि और जल-प्रदूषण बढ़ रहा है। खेतों में हमें उपलब्ध जैविक साधनों की मदद से खाद, कीटनाशक दवाई, चूहा नियंत्रण हेतु दवा बगैरह बनाकर उनका उपयोग करना होगा। इन तरीकों के उपयोग से हमें पैदावार भी अधिक मिलेगी एवं अनाज, फल सब्जियां भी विषमुक्त एवं उत्तम होंगी। प्रकृति की सूक्ष्म जीवाणुओं एवं जीवों का तंत्र पुन: हमारी खेती में सहयोगी कार्य कर सकेगा।

जैविक खाद बनाने की विधि:-

अब हम खेती में इन सूक्ष्म जीवाणुओं का सहयोग लेकर खाद बनाने एवं तत्वों की पूर्ति हेतु मदद लेंगे। खेतों में रसायनों से ये सूक्ष्म जीव क्षतिग्रस्त हुये हैं, अत: प्रत्येक फसल में हमें इनके कल्चर का उपयोग करना पड़ेगा, जिससे फसलों को पोषण तत्व उपलब्ध हो सकें।
दलहनी फसलों में प्रति एकड़ 4 से 5 पैकेट राइजोबि…

जैविक खेती क्या है? ( What is Organic Farming)

दोस्तों बहुत दिनों से कोशिश कर रहा था कि आपको जैविक खेती के बारे में कुछ बताऊँ लेकिन परिस्थितिवस कर नही पा रहा था। आज विकिपीडिया की मदद से आपको जैविक खेती के बारे में कोशिश करूंगा। अगर आपको अच्छी लगे तो कमेन्ट बॉक्स में जरुर लिखें।

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जैविक खेती कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के बिना प्रयोग या न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाये रखने के लिये फसल चक्र,हरी खाद,कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है। सन् 1990 के बाद से विश्व में जैविक उत्पादों का बाजार काफ़ी बढ़ा है।

परिचय
  संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है, बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकालाजी सिस्टम) प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है तथा मनुष्य के स्वास्थ…
फसलो के वानस्पतिक नाम
आम (राष्ट्रीय फल) – मेँजीफेरा इण्डिकारोहिड़ा (रोहिड़ा का फूल राज॰ का राज्य पुष्प) – टिकोमेला अण्डूलेटाअशोक – सरेका इण्डिकाकमल (रा॰ पुष्प) – नीलम्बियम न्यूसीफेराखेजड़ी (राजस्थान राज्य वृक्ष) – प्रोसोपिस स्पाइसीगेरागेहूँ – ट्रीटिकम एसटिवमचावल – ऑरिजा सेटाइवामक्का – जिया मेजगन्ना – सेकेरम आफिसिनेरमजौ – होर्डियम वल्गरजई – एवेना स्टर्लिसराई – सीकेल सीरलबाजरा – पेनीसिटम अमेरिकोनमज्वार – सोरगम वल्गरसिघाड़ा – ट्रापा नेटेन्सपालक – स्पाइनेसिया ओलेरेसियामैथी – ट्राइगोनेला फेनूग्रेसममूली – रेफेनस सेटाइवसगाजर – डॉकस केरोटाआलू – सोलेनम टयूबरोसमशलजम – ब्रेसिका रापाशकरकंद – आइपोमिया बटाटसचुकन्दर – बीटा वल्गरिसटमाटर – लाइकोपर्सिकम एस्कूलेन्टमबैँगन – सोलेनम मेलेन्जीनामिर्च – केपिस्कम एनुअमकालीमिर्च – पाइपर नाइग्रमलालमिर्च – केप्सिकम एनुअमभिण्डी – एबलमोशस एस्कूलेन्टसलौकी – लूफा सिलिड्रिकाटिँडा – सिर्टुलस वल्गरिसमटर – पाइसम सेटाइवमपत्ता गोभी – ब्रेसिका ओलरेसिया वेराइटी केपीटेटाफूल गोभी – ब्रेसिका ओलरेसिया वेराइटी ब्रोट्रीटिसप्याज – एलियम सीपालहसून – एलियम सेटाइवमकरेला – मामोर्डिका चेरेन्…